Monday, February 24, 2014

केजरीवाल कि खुजली और गैस के दाम

आम आवाम को पैसठ साल बाद भी सता मे हिस्सेदारी नही नसीब हुई कुच्छेक नेता जरुर उनके बीच से पैदा हुआ और अब तो खासो ने आम के नाम का भी कापी राईट करवा लिया चुनाव आयोग से। कभी संघर्ष से मतलब नही , ड्रायंग रुम मे बैठकर देश की सता को बदलते रहने की ख्वाहिस रखने वालो को एक प्लेटफ़ार्म मिल गया । ड्रेस सामान्य भेष से ही भीख मिलती है; वह मिडल क्लास जिसकी नस नस मे गुलामी भरी पडी है , मुरीद बन गया है, उसे लगता है जैसे भगत सिंह ने पुन्रज्नम लिया है । खुद कोई सवाल नही करता ,दुसरे करते है तो आपति जताता है। सीआईए , फ़ोर्ड , कबीर, जनलोकपाल का ड्राफ़्ट , पानी मुफ़्त, बिजली आधे दाम पर लोक लूभावने वादे , लेकिन पुरे एक भी नही हुये। अब नया शगूफ़ा गैस का दाम बढाकर सरकार मुकेश को फ़ायदा पहुंचाना चाहती है । यह झुठ भी बिक जायेगा अफ़वाहो का बाजार जो है भले इसका परिणाम देश मे गैस उत्पादन मे कमी और विदेश पर निर्भरता हीं क्यो न हो। दुनिया के गैस एवं तेल उत्पादक मुल्क दो वर्ग मे बटे हुये है ; एक जो अपनी पूर्ति के बाद बेचते है और जिनके यहां आनेवाले वर्षो मे मांग मे कमी आयेगी और उनको बाजार चाहिये ; दुसरे वे जो तेजी से आगे बढ रहे है; OECD (Organization for Economic Cooperation and Development ) मुल्को मे 2040 तक खपत मे कोई बढोतरी नही होगी परन्तु तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले मुल्क , चीन, रुस, भारत (NON – OECD) मे मांग मे बहुत वर्द्धि होगी। OECD मुल्को मे २०१०-२०४० के बीच मांग मे संभावित वर्द्धि 0.5% और NON – OECD मुल्को मे उस दरम्यान मांग मे अनुमानित सालान वर्द्धि 2.2% होगी । भारत मे गैस के उपभोग मे जहां 1.5 % सालान बढोतरी होगी वही उत्पाद्न मे 1.1 % सालाना कमी आयेगी । भारत वर्ष 2004 से कतर से $10 $12 per MMBTU की दर से गैस का आयात कर रहा है और उसपर निर्भर है। जापान भी कतर से $16 to $17 per MMBTU की दर पर गैस का आयात करता है परन्तु आज दिनांक 23 फ़रवरी को उसने कतर से गैस का आयात कम करने का निर्णय लिया है। भारत मे सरकारी कंपनी ओ एन जी सी एवं आयल ईंडिया मुख्य रुप से गैस का उत्पादन करती है परन्तु लागत अधिक आने के कारण वे दाम बढाने की मांग कर रही है । कतर अमेरिका के इशारे पर सिरिया के विद्रोहियो को आर्थिक मदद कर रहा है । देश मे गैस का भंडार है परन्तु कोई विदेशी कंपनी आना नही चाहति क्योकि दाम कम है अब खुजलीवाल जवाब दे कतर से १० डालर मे खरिदने की बजाय देश मे आठ डालर मे लेना सही होगा या गलत ? 

साभार --मदन तिवारी (फेसबुक)

Saturday, February 22, 2014

यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या अमेरिकी एजेंट?--शिमिरित, कबीर और केजरीवाल !

नई दिल्ली |  यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या अमेरिकी एजेंट? दस्तावेज बताते हैं कि वह बतौर शोधार्थी ‘कबीर’ संस्था से जुड़े थी। इस संस्था के गॉड-फादर अरविंद केजरीवाल रहे हैं।
शिमरित ली को लेकर अटकलें लग रही हैं, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी।
शिमिरित ली दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न विषयों पर काम करती रही है। भारत आकर उसने नया काम किया। कबीर संस्था से जुड़ी। प्रजातंत्र के बारे में उसने एक बड़ी रिपोर्ट महज तीन-चार महीनों में तैयार की। फिर वापस चली गई। आखिर दिल्ली आने का उसका मकसद क्या था? इसे एक दस्तावेजी कहानी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बहरहाल कहानी कुछ इस प्रकार है। जिस स्वराज के राग को केजरीवाल बार-बार छेड़ रहे हैं, वह आखिर क्या है? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि अगर इस गीत के बोल ही केजरीवाल के हैं तो गीतकार और संगीतकार कौन है? यही नहीं, इसके पीछे का मकसद क्या है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें अमेरिका के न्यूयार्क शहर का रुख करना पड़ेगा।
न्यूयार्क विश्वविद्यालय दुनिया भर में अपने शोध के लिए जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में ‘मध्यपूर्व एवं इस्लामिक अध्ययन’ विषय पर एक शोध हो रहा है। शोधार्थी का नाम है, शिमिरित ली। शिमिरित ली दुनिया के कई देशों में सक्रिय है। खासकर उन अरब देशों में जहां जनआंदोलन हुए हैं। वह चार महीने के लिए भारत भी आई थी। भारत आने के बाद वह शोध करने के नाम पर ‘कबीर’ संस्था से जुड़ गई।
सवाल है कि क्या वह ‘कबीर’ संस्था से जुड़ने के लिए ही शिमिरित ली भारत आई थी? अभी यह रहस्य है। उसने चार महीने में एक रिपोर्ट तैयार की। यह भी अभी रहस्य है कि शिमरित ली की यह रिपोर्ट खुद उसने तैयार की या फिर अमेरिका में तैयार की गई थी
बहरहाल, उस रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें भारत के लोकतंत्र की खामियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट का नाम है ‘पब्लिक पावर-इंडिया एंड अदर डेमोक्रेसी’। इसमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ब्राजील का हवाला देते हुए ‘सेल्फ रूल’ की वकालत की गई है। अरविंद केजरीवाल की ‘मोहल्ला सभा’ भी इसी रिपोर्ट का एक सुझाव है। इसी रिपोर्ट के ‘सेल्फ रूल’ से ही प्रभावित है, अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’। अरविंद केजरीवाल भी अपने स्वराज में जिन देशों की व्यवस्था की चर्चा करते हैं, उन्हीं तीनों अमेरिका, ब्राजील और स्विट्जरलैंड का ही जिक्र शिमिरित भी अपनी रिपोर्ट में करती हैं।
‘कबीर’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं। यहां शिमरित के भारत आने के समय पर भी गौर करने की जरूरत है। वह मई 2010 में भारत आई और कबीर से जुड़ी। वह अगस्त 2010 तक भारत में रही। इस दौरान ‘कबीर’ की जवाबदेही, पारदर्शिता और सहभागिता पर कार्यशालाओं का जिम्मा भी शिमरित ने ही ले लिया था। इन चार महीनों में ही शिमरित ली ने ‘कबीर’ और उनके लोगों के लिए आगे का एजेंडा तय कर दिया। उसके भारत आने का समय महत्वपूर्ण है।
इसे समझने से पहले संदिग्ध शिमरित ली को समझने की जरूरत है, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी।
यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाली शिमिरित ली को 2007 में कविता और लेखन के लिए यंग आर्ट पुरस्कार मिला। उसे यह पुरस्कार अमेरिकी सरकार के सहयोग से चलने वाली संस्था ने नवाजा। यहीं वह सबसे पहले अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में आई। जब उसे पुरस्कार मिला तब वह जेक्शन स्कूल फॉर एडवांस स्टडीज में पढ़ रही थी। यहीं से वह दुनिया के कई देशों में सक्रिय हुई।
जून 2008 में वह घाना में अमेरिकन ज्यूश वर्ल्ड सर्विस में काम करने पहुंचती। नवंबर 2008 में वह ह्यूमन राइट वॉच के अफ्रीकी शाखा में बतौर प्रशिक्षु शामिल हुई। वहां उसने एक साल बिताए। इस दौरान उसने चाड के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा और विश्लेषण का काम किया। जिन-जिन देशों में शिमिरित की सक्रियता दिखती है, वह संदेह के घेरे में है। हर एक देश में वह पांच महीने के करीब ही रहती है। उसके काम करने के विषय भी अलग-अलग होते हैं। उसके विषय और काम करने के तरीके से साफ जाहिर होता है कि उसकी डोर अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी है।
दिसंबर 2009 में वह ईरान में सक्रिय हुई। 7 दिसंबर, 2009 को ईरान में छात्र दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में वह शिरकत करती है। वहां उसकी मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि इस कार्यक्रम में ईरान में प्रजातंत्र समर्थक अहमद बतेबी और हामिद दबाशी शामिल थे।
ईरान के बाद उसका अगल ठिकाना भारत था। यहां वह ‘कबीर’ से जुड़ी। चार महीने में ही उसने भारतीय लोकतंत्र पर एक रिपोर्ट संस्था के कर्ताधर्ता अरविंद केजरावाल और मनीष सिसोदिया को दी। अगस्त में फिर वह न्यूयार्क वापस चली गई। उसका अगला पड़ाव होता है ‘कायन महिला संगठन’। यहां वह फरवरी 2011 में पहुंचती। शिमिरित ने वहां “अरब में महिलाएं” विषय पर अध्ययन किया। कायन महिला संगठन में उसने वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग का प्रबंधन संभाला। यहां वह सात महीने रही। अगस्त 2011 तक। अभी वह न्यूयार्क विश्वविद्यालय में शोध के साथ ही ‘अर्जेंट एक्शन फंड’ से बतौर सलाहकार जुड़ी हैं।
पूरी दुनिया में जो सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और स्त्री संबंधी मुद्दों पर जो प्रस्ताव आते हैं, उनकी समीक्षा और मूल्यांकन का काम शिमिरित के जिम्मे है। अगस्त 2011 से लेकर फरवरी 2013 के बीच शिमिरित दुनिया के कई ऐसे देशों में सक्रिय थी, जहां उसकी सक्रियता पर सवाल उठते हैं। इसमें अरब देश शामिल हैं। मिस्र में भी शिमिरित की मौजूदगी चौंकाने वाली है। यही वह समय है, जब अरब देशों में आंदोलन खड़ा हो रहा था।
शिमिरित ली 17वें अरब फिल्म महोत्सव में भी सक्रिय रहीं। इसका प्रीमियर स्क्रीनिंग सेन फ्रांसिस्को में हुआ। स्क्रीनिंग के समय शिमिरित ने लोगों को संबोधित भी किया। इस फिल्म महोत्सव में उन फिल्मों को प्रमुखता दी गई, जो हाल ही में जन आंदोलनों के ऊपर बनी थी।  
शिमिरित आई तो फंडिंग बढ़ी
शिमिरित ली के कबीर संस्था से जुड़ने के समय को उसके विदेशी वित्तीय सहयोग के नजरिए से भी देखने की जरूरत है। एक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत एक जानकारी मांगी। उस जानकारी के मुताबिक कबीर को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले। 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड ने कबीर की आर्थिक सहायता की।
इसके बाद 2010 में अमेरिका से शिमिरित ली ‘कबीर’ में काम करने के लिए आती हैं। चार महीने में ही वह भारतीय प्रजातंत्र का अध्ययन कर उसे खोखला बताने वाली रिपोर्ट केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को देकर चली जाती है। शिमिरित ली के जाने के बाद ‘कबीर’ को फिर फोर्ड फाउंडेशन से दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला। इसे भारत की खुफिया एंजेसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी. रमन की इन बातों से समझा जा सकता है।
एक बार बी. रमन ने एनजीओ और उसकी फंडिंग पर आधारित एक किताब के विमोचन के समय कहा था कि “सीआईए सूचनाओं का खेल खेलती है। इसके लिए उसने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘रेडियो फ्री यूरोप’ को बतौर हथियार इस्तेमाल करती है।” अपने भाषण में बी. रमन ने इस बात की भी चर्चा की कि विदेशी खुफिया एजेंसियां कैसे एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं। किसी भी देश में अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए सीआईए उस देश में पहले से काम कर रही एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा सुलभ समझती है। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए वह फंडिंग का सहारा लेती है। जिस क्षेत्र में एनजीओ नहीं है, वहां एनजीओ बनवाया जाता है।

(राकेश सिंह की यह रपट यथावत पत्रिका से साभार है।)

Sunday, February 16, 2014

केजरीवाल कि असलियत

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)’ ने घोर सांप्रदायिक ‘सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम’ का ड्राफ्ट तैयार किया है। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो ‘श्रीमान ईमानदार’ को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में ‘परिवर्तन’ में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके।  इसके बाद अरविंद ने उसी पैसे से 19 दिसंबर 2006 को पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन(सीपीआरएफ) नामक संस्‍था का गठन किया और अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ से भी जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।

'अरविंद को समझने से पहले ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को समझ लीजिए!
अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो  ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘छवि निर्माण’ से लेकर उन्हें ‘नॉसियोनालिस्टा पार्टी’ का  उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी ‘एडवर्ड लैंडस्ले’ ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।
ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और ‘डर्टी ट्रिक्स’ के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘क्वायरिनो’ की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की ‘गढ़ी गई ईमानदार छवि’ और क्वायरिनो की ‘कुप्रचारित पतित छवि’ ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल को एक मात्र ईमानदार और नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक व एक लड़की की जासूसी कराने वाला बताकर, मीडिया जो 'डर्टी ट्रिक्‍स' का खेल, खेल रही है, वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।
उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल को वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है।

भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग!
‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।
अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है।  इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।
डच एनजीओ ‘हिवोस’  दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं।  इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। ‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’  पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।
माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रही हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।
‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’  ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।

1 लाख 63 हजार करोड़ के घोटाले में फंसी कंपनी ने अरविंद केजरीवाल को बनाया इंडियन ऑफ द ईयर!

अरविंद केजरीवाल के उभार के पीछे है अमेरिका का हथियार उद्योग!

‘जनलोकपाल आंदोलन’ से ‘आम आदमी पार्टी’ तक का शातिर सफर!
आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नारा देते हुए वर्ष 2011 में ‘जनलोकपाल आंदोलन’ की रूप रेखा खिंची।  इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में ‘लॉंच’ कर दिया।
अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा उस वक्‍त समझ में आई समझने में जब आंदोलन का पैसा अरविंद ने अपने एनजीओ सीपीआरएफ के एकाउंट में डालना शुरू कर दिया। अन्‍ना के पूर्व ब्‍लॉगर राजू पारूलकर ने अपने ब्‍लॉग में लिखा है कि उस आंदोलन व अन्‍ना के नाम का एसएमएस कार्ड बेचकर अरविंद ने करीब 200 करोड़ रुपए इकट्ठा किया और अन्‍ना को केवल 2 करोड रुपए थमाना चाहा। इसे लेकर अन्‍ना-अरविंद के बीच काफी विवाद हुआ, जिसे उन लोगों ने कैमरे में कैद कर लिया और इसे दिखाकर अन्‍ना को ब्‍लैकमेल करने लगे कि इसके बाहर आते ही आपकी 'सर्वस्‍व त्‍याग' वाली छवि खंडित हो जाएगी। अन्‍ना चुप हो गए, हालांकि दिल्‍ली विधानसभा चुनाव के वक्‍त उन्‍होंने फिर से इस रकम की मांग के लिए पत्र लिखा, लेकिन उस निजी पत्र को भी अरविंद ने मीडिया में जारी कर 'मीडिया ट्रिक्‍स' के जरिए अन्‍ना को चुप करा दिया। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के बाद वही मीडिया अरविंद का फेवर करते हुए अन्‍ना पर हमलावर हो उठी।
विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।
आगे बढ़ते हैं...! अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ खड़ा करने में सफल  रहे।  जनलोकपाल आंदोलन के पीछे ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड  को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से ‘कबीर’ व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया।  लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने ‘बिजनस स्टैंडर’ अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने ‘कबीर’ को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।
सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था ‘आवाज’ की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था। डॉ सब्रहमनियन स्‍वामी के मुताबिक इसी ‘आवाज’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी ‘आवाज’ संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस ‘फंडिंग का खेल’ खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और ‘आम आदमी पार्टी’ उसी की देन हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010’ के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
अमेरिकी ‘कल्चरल कोल्ड वार’ के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल!
फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ की नीति को ‘कल्चरल कोल्ड वार’ का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति  व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से ‘भारत माता’ की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को ‘सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का’ समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।
एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?
प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को ‘क्रांतिकारी सेक्यूलर दल’ के रूप में प्रचारित करने लगी।  प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।
अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके।  यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी।  आम आदमी पार्टी के नेता  प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी ‘अपनी राजनैतिक पार्टी’ हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से ‘लिटमस टेस्ट’ था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी ‘ईमानदारी’ और ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का ‘कॉकटेल’ तैयार कर रही थी।
8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस ‘कॉकटेल’ का ही परीक्षण  है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?
प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके ‘पंजीकृत आम आदमी’  ने जब देखा कि ‘भारत माता’ के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर ‘मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल’ शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चासनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, ‘इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है’, तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि ‘बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।’ इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।
याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि ‘हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।’ उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके।  वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं।

नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया ‘आखिरी पत्ता’ हैं अरविंद!
दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में।  मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर ‘आम आदमी पार्टी’ का निर्माण कराया गया है।
दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने यह दर्शा दिया है कि उनकी मंशा कांग्रेस के भ्रष्‍टचार के खिलाफ चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि कांग्रेस के सहयोग से हर हाल में भाजपा को सत्‍ता में आने से रोकने की है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ‘‘भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।’’
कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। ‘फोर्ड फाउंडेशन’ ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का ‘ब्रेन चाइल्ड’ बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई। अब तो अन्‍ना के पूर्व ब्‍लॉगर राजू पारुलकर ने सरकार गठन के लिए अरविंद केजरीवाल और कांग्रेसी नेता शकील अहमद, अजय माकन व अरविंदर सिंह लवली के बीच दिल्‍ली के लोधी रोड स्थित अमन होटल में गुप्‍त बैठकों का भी खुलासा कर दिया है। इस बैठक में हीरा होंडा कंपनी के मालिक पवन मुंजाल भी मौजूद थे, जिन पर अरविंद-केजरीवाल डील को संपन्‍न कराने का आरोप है। इस बैठक में भाजपा को देश भर में रोकने व कांग्रेस को सत्‍ता में लाने के लिए आम आदमी पार्टी द्वारा करीब 300 सीटों पर उम्‍मीदवार खड़े करने के लिए हामी भरने की बात भी सामने आई है।
‘आम आदमी पार्टी’ व  उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने 13 दिसंबर 2013 को ‘मेल टुडे’ अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था। लेकिन सूत्रों के अनुसार, प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने बाद में न केवल अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया, बल्कि एक 'नए शांतिभूषण' को भी पैदा कर दिया गया। जहां अरविंद रहते हैं, उसी गाजियाबाद से एक व्‍यक्ति खुद को शांतिभूषण बताते हुए सामने आ गया और कहा कि यह मेरा लेख है। ‘मेल टुडे’ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर ‘टुडे ग्रुप’ ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया। वैसे भी नए शांतिभूषण को पैदा कर मेल टुडे की प्रतिष्‍ठा और अरविंद की विश्‍वसनीयता बनाए रखने का खेल तो खेल ही लिया गया था। देश का हर आम नागरिक व पत्रकार यह जानता है कि बिना जांच किए कोई अखबार किसी लेख को नहीं छापता है, लेकिन जब उसी अखबार वाली कंपनी का चैनल 'आजतक' अरविंद के सोने-खाने-कपड़े पहनने तक की खबरें लगातार दिखा रहा हो तो फिर उस कंपनी के लिए एक लेख से पल्‍ला झाड़ना कौन सी बड़ी मुश्किल है?
शांति भूषण ने लिखा था, ‘‘अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला।  वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।’’
‘‘आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए । अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए ‘आम आदमी पार्टी’ के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया।  केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें।  एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?’’
‘‘बीजेपी ‘आम आदमी पार्टी’ को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली की चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया।  ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।’’
‘‘दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने जा रहे हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।’’
‘‘मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई है। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बन रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से रोकना है।  ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर मोदी एक बार सत्ता में आ गए तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।’’

 साभार -- संदीप देव !

AAPtards कृपया जवाब दें

आम आदमी पार्टी के फोल्लोवेर्स और कार्यकर्ता से कुछसवाल, उम्मीद है जबाब देंगे||||

Q1. जब केजरीवाल ने माँ भारती का चित्रआन्दोलन से ये कहकरहटाया था की माँ भारती का चित्र सांप्रदायिकहैं ..इससे हिंसा भड़केगी तब "AAP" कहाँ थे ?ANS______

Q2. जब केजरीवाल ने ईद की बधाई दी वदिवाली को इग्नोर कर दिया तब " AAP"कहाँ थे ?Ans______

Q૩. जब केजरीवाल जी का दोस्त प्रशांत भूषण नेकहा की कश्मीर पकिस्तान को दे देना चहियेताकि समस्या ख़तम हो सके तब " AAP"कहा थे ?Ans______

Q4. जब केजरीवाल टीम के कुमार विश्वास भरी सभा में भगवान् शिव जी का अपमान करतेनज़र आ रहे थे तब" AAP" कहाँ थे ?Ans______

Q5. जब केजरीवाल टीम की शालिया इजमी नेहिन्दुओ के भाग्यलक्ष्मी मंदिर को तोड़ने मेंओवेशी का समर्थन किया था तब"AAP"कहाँ थे /Ans______

Q6. जब केजरीवाल ने आरएसएसको आतंकवादी संगठन कहा था तब"AAP"कहाँ थे ?Ans_______

Q7. जब केजरीवाल ने मुस्लिमो को 11 %आरक्षण का समर्थन किया था तब "AAP"कहाँ थे ?Ans_______

Q8. जब केजरीवाल बुखारी को देशभक्तवबाबा रामदेव को मुर्ख कह रहा तब "AAP"कहाँ थे ?Ans_______

Q9. जब केजरीवाल के सहयोगी संजय सिंह ने मोदी जी को हत्यारा व कातिल कहा तब "AAP"कहाँ थे ?Ans_______

Q1૦. जब भूषण परिवार पर भ्रष्ट्राचार केआरोप लगे और केजरीवाल ने जांच तकनहीं कराई"AAP" तब आप कहाँ थे ?Ans________

Q11. जब केजरीवाल ने मोदी जी पर अनैतिकसम्पति रखने का आरोप लगाया और कोर्ट नेइसे गलत करार दिया तब "AAP" कहाँ थे ?Ans____

Courtesy-Facebook

Saturday, February 15, 2014

शहादत या जिम्मेदारियों से पलायन

भारी माहौल बनाने के बाद अब जबकि आम आदमी पार्टी ने त्यागपत्र दे ही दिया है तो जान लीजिए कि :
1. कोई इसे  त्याग' नहीं मानेगा। कैसा त्यागपत्र? त्याग कहां है इसमें? आप कोई भी एक म़ुद्दा बनाकर, उसे बढ़ाकर, उसे 'अदर एक्सट्रीम' तक ले जाकर जिम्मेदारी से हटना चाह रहे थे, सो हट गए।
2. 'जन लोकपाल के लिए हजार बार करूंगा कुर्सी कुर्बान' जैसे वक्तव्य इतने खोखले हैं कि किसी को प्रभावित नहीं करते। कोई कुर्बानी नहीं है यह। पलायन है।
3. 'हिट एंड रन' आपका मूल स्वभाव है। अण्णा के जन आंदोलन के बाद जब आपने राजनीति में उतरने का निर्णय लिया तब एक-के-बाद-एक आरोप जड़ते चले गए। गंभीर आरोप लगाकर सबको भ्रष्ट कहकर मुद्दे को भूल जाना और मामले छोड़ देना अरविंद केजरीवाल के लिए सहज सामान्य बात है। सरकार बनाना भी 'हिट' जैसा था- फिर छोडऩा 'रन' जैसा।
4. वैलेन्टाइन डे पर कांग्रेस और भाजपा का गठजोड़ दिखाई दिया आप को। दोनों ने ग़ज़ब तालमेल दिखाया। ऐसा कि केजरीवाल ने कहा था '...वैसा तालमेल जैसा कि मार्च पास्ट के दौरान जवानों के कदमताल में रहता है...।' तो आप क्या समझते रहे? राजनीति इतनी आसान
होगी? सबकुछ आपके अनुसार चलेगा? विपक्ष को झेलना, विरोध का सामना करना - यही तो राजनीति है। आपके शॉट को कोई रोकता है तो आप शिकायत करते हैं कि रोका क्यों? विरोध तो होगा ही। होना ही चाहिए। यही तो लोकतंत्र है।

5. आप का कहना है 'मुकेश अम्बानी देश चला रहा है, सरकार चला रहा है, उसके विरुद्ध हमने मुकदमा दर्ज किया, पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली, पूर्व मंत्री मुरली देवड़ा पर मुकदमा किया - अब सब को डर है कि उन पर भी केस होगा- इसीलिए सबने मिलकर हमारी सरकार गिरा दी।' यह सबसे बड़ा झूठ है। क्योंकि किसी ने आपकी सरकार नहीं गिराई। 'अम्बानी देश चला रहा है', लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग एजेंट है, ख़ुद को अंग्रेजों का वाइसरॉय समझता है, केंद्र फिरंगियों की सरकार है क्या; लंदन से चलती है क्या' जैसी केजरीवाल की भाषा शैली पर तो अभी देश ने प्रतिक्रिया दी ही नहीं है। किसी को अम्बानी से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप एक क्या, सौ मुकदमे कीजिए। पहले ही हजार मुकदमे चल रहे हैं, उन पर, सीधे या प्रकारान्तर से।
6. केजरीवाल का आरोप है कि जब वे भ्रष्टाचार मिटाने चले तो सबने कहा- यह संविधान विरुद्ध है। यह पूरी तरह झूठ है। किसी ने ऐसा नहीं कहा। कोई ऐसा क्यों कहेगा? जहां तक जन लोकपाल बिल को पेश करने को विपक्षी दल व 'मित्र' कांग्रेस दोनों ने असंवैधानिक बताया तो यह एक बिल पर उनके विचार और स्टैंड हो सकते हैं। भ्रष्टाचार नहीं, लेफ्टिनेंट गवर्नर की चिट्ठी के आधार पर बिल को असंवैधानिक कहा गया है।
7. केजरीवाल दावा कर रहे हैं कि भ्रष्ट लोगों को जेल में डालने के कारण उन्हें गिराया गया। यह पूरी तरह सच से परे हैं। सच तो यह है कि उन्होंने लाख कोशिश कर ली, किन्तु कांग्रेस ने उनसे समर्थन वापस ही नहीं लिया। कांग्रेस ने तो वास्तव में उन्हें कुंठित कर दिया। वे रोज कांग्रेस और उसके जितने भी शीर्ष नेता हो सकते हैं - उनके विरुद्ध जमकर, निम्न स्तर पर जाकर बोलते रहे। किन्तु कांग्रेस उनका तमाशा देखती रही। समर्थन जारी ही रखा। और अंतत: केजरीवाल को ही तमाशा बना दिया। 'शहीद' बनने नहीं ही दिया।
8. 'शहीद' बनकर जनता के बीच जाने की अरविन्द केजरीवाल की रणनीति बिल्कुल गलत नहीं थी। उनकी अपनी राजनीतिक इच्छाएं हैं। महत्वाकांक्षाएं हैं। अति प्रचार, अति प्रशंसा और अति समर्थन को देखकर बौरा जाना कतई आश्चर्यजनक नहीं है। कोई भी ऐसा ही करेगा। अति देखकर उनमें अति महत्वाकांक्षा जाग उठी। किन्तु संसार की अन्य नीतियों और राजनीति में संभवत: यही सबसे बड़ा अंतर है।
यहां अति महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए अति संघर्ष करना पड़ता है। अत्यधिक संघर्ष। निरंतर संघर्ष। संघर्ष ही संघर्ष। यहीं केजरीवाल चूक गए। वे इसे अनदेखा कर गए कि जो लाखों हाथ उन्हें यदि रातोरात आसमान पर बैठा सकते हैं - तो रातोरात गिरा भी सकते हैं। रातोरात जो कुछ हुआ था, होता है - वो रातोरात ही मिट जाता है।
केजरीवाल भाग्यशाली हैं कि उन्हें तो किसी ने मिटाया ही नहीं। उनके बग़ैर संघर्ष शीर्ष पर पहुंचने और अति महत्वाकांक्षा पालने पर तो किसी ने कुछ अभी किया ही नहीं है।
हां, स्थायी खांसी खांसते, गर्मी-सर्दी सभी में कानों पर मफलर लपेटे और वैगन आर को 'सीएम की सवारी' के रूप में प्रचारित कर चुकने के बाद शुक्रवार 14 फरवरी 2014 की रात को 'आप' मुख्यालय से उन्होंने जब कार्यकर्ताओं को संबोधित किया तो 'शहादत' का ही अंदाज़ अपनाया। किन्तु सिर्फ अंदाज़ ही था। शहादत कहीं नहीं थी।
अपनी 13 दिन की सरकार के गिरने पर अटल बिहारी वाजपेयी ने सारगर्भित और मंत्रमुग्ध कर देने वाला भाषण धाराप्रवाह दिया था। उसमें 'शहादत' थी। क्योंकि उनके भाषण का आधार था विपक्ष के महारथियों के भाषण। जिनमें कहा गया था कि वाजपेयी बहुत अच्छे हैं, ईमानदार हैं, योग्य हैं, प्रधानमंत्री के रूप में सक्षम सिद्ध होंगे - किन्तु उनकी सरकार गिरनी चाहिए। देश ने 'शहादत' मानी। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकराया। देश ने 'अमेजिंग़ ग्रेस' कहकर शहादत मानी।

आप की सरकार बनी ही झूठ पर थी। कांग्रेस उस दिन चार राज्यों में बुरी तरह हार गई थी। उसने चतुराई से आप को समर्थन दे, सरकार बनवा दी और अपनी हार से मीडिया का ध्यान हटाने में सफल हुई। झूठ पर बनी सरकारें, मज़बूत से मज़बूत भी क्यों न हों, गिरती ही हैं। गिरनी ही चाहिए। विश्वनाथ प्रतापसिंह के नाम पर सत्ता में आए गठबंधन की शुरुआत भी झूठ से हुई थी। चंद्रशेखर द्वारा देवीलाल के नाम पर प्रस्ताव और देवीलाल द्वारा विश्वनाथ प्रतापसिंह के नाम लाने की रणनीति चतुराई तो लगती है, किन्तु थी तो झूठ ही। इसलिए पतन हुआ।
लोग सबकुछ जानते हैं। लोग सबकुछ समझते हैं।
झूठ, सौ तरह से कहा जाए, हजार बार कुर्सी कुर्बान कर कहा जाए - तो भी झूठ ही रहता है। आप लोकपाल कानून ला रहे हैं। किन्तु देश में लोकपाल कानून लागू हो चुका है, यह छुपा रहे हैं। दिल्ली में लोकायुक्त लाना था। किन्तु तयशुदा कानूनी तरीके तोड़कर। ऐसा कैसे हो सकता है? संविधान का मखौल उड़ाकर, गणतंत्र दिवस को तमाशे में बदलने का प्रयास कर, देश के हर विरोधी व्यक्ति को 'भ्रष्ट' घोषित कर कौनसी शहादत सिद्ध हो सकती है? कौन सा झूठ सच हो सकता है।

राजनीति में झूठ कम हो, यह असंभव है। किन्तु करना ही होगा। हर सच का साथ देकर। हर झूठ का विरोध कर। हम करेंगे। आसान नहीं है। वैसे, जैसा कि फ्रेडरिक नीत्शे ने ग़ज़ब कहा था :
...व्यक्ति जब भी झूठ बोलता है, उसके साथ उसका जो चेहरा बनता है वो लेकिन सच कह देता है

 साभार -- कल्पेश याग्निक

Friday, February 14, 2014

ममता बनर्जी से सम्बंधित जानकारी --ज़रूर पढ़िए

जैसे सोनिया गाँधी का असली नाम है आनटोनिया अड्विगे अलविना है.. वैसे ही एक बहुत बड़ी सच्चाई ममता बानेर्जी के बारे मे है .. जब पहली बार मैने खोजा था की ये औरत इतने हिंदुओं को बंगाल मे क्यूँ मरवा रही है तो विकीपीडिया पर मुझे इसके रिलिजन मे मुस्लिम दिखा पर अभी वो भी हटा दिया गया है .. मैने जिन दोस्तों को बताया था वो भी सवाल उठाने लगे की ऐसा तो नही है .. इसलिए एक बार फिर से कुछ जानकारी इकट्ठा किया है मैने ..
इस मुस्लिम अंधभक्त के रिलिजन के बारे मे अलग अलग किताबों मे अलग अलग विवरण है .. पर ममता बनर्जी एक मुसलमान है .. रोज़ नमाज़ पढ़ती है और इनका रियल नाम है मुमताज़ मासामा ख़ातून .. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता से इस ने मास्टर डिग्री ली है हिस्टरी ऑफ इस्लाम पर.. ..
क्या आपको इस पर कभी आश्चर्य नही हुआ की वो हिन्दी से ज़्यादा अच्छा उर्दू क्यूँ बोल लेती हैं ? आज तक किसी ने उसके माथे पर हिंदुओं की तरह बिंदिया देखा है क्या ?
क्या आपको पता है बांग्लादेशियों का सब से पहला पड़ाव बंगाल होता है .. इनको वहाँ "ढाका बेंगालिस" पुकारा जाता है
आपको शायद ही पता होगा की वास्तव मे ममता एक मौलवी और इमाम से भी ज़्यादा नफ़रत का भाव रखती है हिंदुओं के लिए
क्या आपको पता है की ममता बनर्जी जब रेलवे मंत्री थी तो ट्रेन से सारे हिंदू देवताओं के नाम और सिंबल्स को हटाने के लिए प्रयासरत थी .. और कुछ ट्रेन जो तीर्थ यात्रा के लिए चलती हैं उसे बैन करना चाहती थी.

आज तक ममता के राज मे बंगाल मे हज़ारों हिंदुओं का क़त्ल हो चुका है.. दरअसल उन हिंदुओं की हत्या उन हिंदुओं ने भी की है जिसने इसे वोट दे कर जिताया है ..

जो बंगाल मे रहते हैं .. मैने उनको भी बताया तो वो यह राज नही जानते थे .. कोई बड़ी बात नही इस्लाम को हिन्दुस्तान मे फैलाने के लिए हिंदुओं को मूर्ख बना कर उनके वोट लेने के लिए इस मुमताज़ बहन ने कितनी सफाई से सबकुछ छुपा कर रखा है ..

अब ये मोहतार्मा नरेंद्र मोदी को रोकना चाहती है तो क्यूँ? इसका जवाब आपको मिल गया होगा.. दोस्तों ये समय है खुद को और परिवार को बचाने का .. सरकार कोई भी हो नेता कोई भी हो पर ध्यान रखना वो हिंदुओं की हितैषी होनी ही चाहिए क्यूँ की उसी मे आप बच पाओगे ..

आप बचोगे तो ही 12 सिलिंडर यूज़ करोगे .. आप बचोगे तो ही लोकपाल काम आएगा ..आप बचोगे तो ही दुनिया की सारी खुशी आप देख पाओगे .. मेरे हिसाब से ये धर्म की नही अब यह अपने अस्तित्व की लड़ाई है .. जो दोगले सेक्युलर हैं वो वोही करेंगे उनके बाप दादाओं ने किया था यानी की हिंदू धर्म छोड़ कर इस्लाम अपना लेंगे .. अपनी बेटी को मुसलमान के हाथो सुपुर्द करेंगे .. गाय खाएँगे .. अगर आप भी वोही करने वाले तो फिर कोई बात नही ..


साभार -- (फेसबुक)

Saturday, February 1, 2014

आप पार्टी के भ्रष्ट और अपराधी नेताओ की लिस्ट

1) अरविन्द केजरीवाल - चंदा चोर, किताब चोर, अराजक समेत धरने इत्यादि कई केसेज़ में आरोपी
2) सोमनाथ भारती - इंटरनेशनल स्पैमर, सबूत मिटाने का दोषी, युगांडा कि महिलाओ से बदसलूकी का आरोपी !
3) कुमार विश्वास - धार्मिक भावनाए आहत करने का आरोपी, बिज़नस क्लास में सफ़र करके काला धन लेने वाला आम आदमी !
4) प्रशांत भूषण - स्टाम्प घोटाला का दोषी, आतंकवादी अलगाववादी माओवादी समर्थक
5) संजय सिंह - माओवादी नक्सलवादी समर्थक
6) मनीष सिसोदिया - विदेशी फंड लेने का आरोपी !
7) शाजिया इल्मी - असपनी माँ-भाई को गालिया देने मारपीट करने की आरोपी, पैसा लेके धरना देने की आरोपी
8) धरमेंदर कोली - शराब पीके दंगा करने और विधायक की पत्नी से छेड़छाड़ करने के आरोपी
9) राखी बिडलान - झूठा केस करने की आरोपी
10) अंजलि दमानिया - किसानो की जमीन हडपके महंगे में बेचने की आरोपी, मुम्बई की रोबर्ट वाड्रा !
11) मयंक गांधी - मुम्बई का रियल एस्टेट माफिआ !
12) कमाल फारूखी - इंडियन मुजाहिद्दीन समर्थक
13) कुंदन सिंह - गेंगस्टर, बिहार
14) मल्लिका सराभाई - कबूतरबाज
15) केप्टन गोपीचंद - कई बैंको का डिफाल्टर चोर !
16) बिन्नी - कश्मीर पे रेफेरेंडम करवाने वाला आप का बागी
17) देशराज राघव - राशन माफिया !
18) शोएब इकबाल : स्वघोषित दिल्ली का सबसे बड़ा गुंडा !
19) आशुतोष गुप्ता आईबीएन : पत्रकारो के पेशे को बदनाम करने वाला आप का दलाल !
20) अखिलेश त्रिपाठी : कैंसर के मरीज को जबरन टीबी कि दवा पिलाने का आरोपी !
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 साभार -फेसबुक