मतदाता का पक्ष होता है, वो किसी व्यक्ति को अपना मत देता है। लेकिन लेखक को निष्पक्ष होकर विषय पर ही लिखना चाहिए, व्यक्ति पर नहीं।
Thursday, September 13, 2018
Thursday, August 16, 2018
सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर के लिए डा. राजेंद्र प्रसाद को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी
ये जगजाहिर है कि जवाहल लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पक्ष में नहीं थे. महात्मा गांधी जी की सहमति से सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरु किया था. पटेल की मौत के बाद मंदिर की जिम्मेदारी के एम मुंशी पर आ गई. मुंशी नेहरू की कैबिनेट के मंत्री थे. गांधी और पटेल की मौत के बाद नेहरू का विरोध और तीखा होने लगा था. एक मीटिंग में तो उन्होंने मुंशी की फटकार भी लगाई थी. उन पर हिंदू-रिवाइवलिज्म और हिंदुत्व को हवा देने का आरोप भी लगा दिया. लेकिन, मुंशी ने साफ साफ कह दिया था कि सरदार पटेल के काम को अधूरा नहीं छोड़ेगे.
के एम मुंशी भी गुजराती थे इसलिए उन्होंने सोमनाथ मंदिर बनवा के ही दम लिया. फिर उन्होंने मंदिर के उद्घाटन के लिए देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को न्यौता दे दिया. उन्होंने इस न्यौते को बड़े गर्व से स्वीकार किया लेकिन जब जवाहर लाल नेहरू की इसका पता चला तो वे नाराज हो गए. उन्होंने पत्र लिख कर डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से मना कर दिया. राजेंद्र बाबू भी तन गए. नेहरू की बातों को दरकिनार कर वो सोमनाथ गए और जबरदस्त भाषण दिया था. जवाहर लाल नेहरू को इससे जबरदस्त झटका लगा. उनके इगो को ठेंस पहुंची. उन्होंने इसे अपनी हार मान ली. डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाना बड़ा महंगा पड़ा क्योंकि इसके बाद नेहरू ने जो इनके साथ सलूक किया वो हैरान करने वाला है.
सोमनाथ मंदिर की वजह से डा. राजेंद्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के रिश्ते में इतनी कड़वाहट आ गई कि जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति पद से मुक्त हुए तो नेहरू ने उन्हें दिल्ली में घर तक नहीं दिया. राजेंद्र बाबू दिल्ली में रह कर किताबें लिखना चाहते थे. लेकिन, नेहरू ने उनके साथ अन्याय किया. एक पूर्व राष्ट्रपति को सम्मान मिलना चाहिए, उनका जो अधिकार था उससे उन्हें वंचित कर दिया गया. आखिरकार, डा. राजेंद्र प्रसाद को पटना लौटना पड़ा. पटना में भी उनके पास अपना मकान नहीं था. पैसे नहीं थे. नेहरू ने पटना में भी उन्हें कोई घर नहीं दिया जबकि वहां सरकारी बंगलो और घरों की भरमार है.
डा. राजेंद्र प्रसाद आखिरकार पटना के सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे. न कोई देखभाल करने वाला और न ही डाक्टर. उनकी तबीयत खराब होने लगी. उन्हें दमा की बीमारी ने जकड़ लिया. दिन भर वो खांसते रहते थे. अब एक पूर्व राष्ट्रपति की ये भी तो दुविधा होती है कि वो मदद के लिए गिरगिरा भी नहीं सकता. लेकिन, राजेंद्र बाबू के पटना आने के बाद नेहरू ने कभी ये सुध लेने की कोशिश भी नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति किस हाल में जी रहा है?
इतना ही नहीं, जब डा. राजेंद्र प्रसाद की तबीयत खराब रहने लगी, तब भी किसी ने ये जहमत नहीं उठाई कि उनका अच्छा इलाज करा सके. बिहार में उस दौरान कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. आखिर तक डा. राजेन्द्र बाबू को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलीं. उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा. मानो ये किसी के निर्देश पर हो रहा हो. उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी. उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी. उसे भी दिल्ली भेज दिया गया. यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया.
एक बार जय प्रकाश नारायण उनसे मिलने सदाकत आश्रम पहुंचे. वो देखना चाहते थे कि देश पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष आखिर रहते कैसे हैं. जेपी ने जब उनकी हालत देखी तो उनका दिमाग सन्न रह गया. आंखें नम हो गईं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो क्या कहें. जेपी ने फौरन अपने सहयोगियों से कहकर रहने लायक बनवाया. लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई.
डा. राजेंद्र प्रसाद की मौत के बाद भी नेहरू का कलेजा नहीं पसीजा. उनकी बेरुखी खत्म नहीं हुई. नेहरू ने उनकी अंत्येष्टि में शामिल तक नहीं हुए. जिस दिन उनकी आखरी यात्रा थी उस दिन नेहरू जयपुर चले गए. इतना ही नहीं, राजस्थान के राज्यपाल डां. संपूर्णानंद पटना जाना चाह रहे थे लेकिन नेहरू ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया. जब नेहरु को मालूम चला कि संपूर्णानंद जी पटना जाना चाहते हैं तो उन्होंने संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो. इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया.
यही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दी. लेकिन, राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी और वो राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे. जब भी दिल्ली के राजघाट से गुजरता हूं तो डा. राजेंद्र प्रसाद के साथ नेहरू के रवैये को याद करता हूं. अजीब देश है, महात्मा गांधी के बगल में संजय गांधी को जगह मिल सकती है लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति के लिए इस देश में कोई इज्जत ही नहीं है. ऐसा लगता है कि इस देश में महानता और बलिदान की कॉपी राइट सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के पास है.
दलित
आज़ादी के 71 साल हो गए लेकिन देश की माटी से पैदा होने वाला हर नेता, दलित-दलित ही खेलता है आज भी।
कायर है वो
कायर है वो!
न सीने में आग है,
न रक्त में उबाल है।
न रक्त में उबाल है।
अन्याय सहता है
चुप रहता है
आवाज़ नहीं उठाता
वक़्त से पहले बूढ़ा हो गया।
चुप रहता है
आवाज़ नहीं उठाता
वक़्त से पहले बूढ़ा हो गया।
जो लड़ते हैं ज़माने से,
रखते हैं सरोकार समाज से
फिक्र करते हैं आने वाली पीढ़ियों की
उन पर ग्रहण बनकर बैठ जाते हैं,
कायर हैं ये
नपुंसक हैं ये
रखते हैं सरोकार समाज से
फिक्र करते हैं आने वाली पीढ़ियों की
उन पर ग्रहण बनकर बैठ जाते हैं,
कायर हैं ये
नपुंसक हैं ये
नासूर हैं इस धरती का,
बोझ हैं ये इस समाज पर,
कायर हैं ये,
बेमतलब हैं ये।
बोझ हैं ये इस समाज पर,
कायर हैं ये,
बेमतलब हैं ये।
Thursday, February 2, 2017
वीर भोग्या वसुंधरा
कुछ विद्वान् मित्रों का मत है कि आरक्षण से पहले जातिवाद को हटाया जाए ।
किन्तु जाति व्यवस्था से किसी को व्यक्तिगत नुक्सान नहीं है । किसी का अधिकार नहीं मारा जा रहा है । कोई ठाकुर , कोई बनिया , कोई कुर्मी , कोई बढ़ई है तो उससे फरक क्या पड़ता है । नाम दिव्या हो, सीमा हो, मोहन हो, राकेश हो , कोई फरक नहीं पड़ता । सब अपने आप में खुश हैं , कोई किसी का हक नहीं मार रहा , बशर्ते कि आरक्षण की तलवार न लटकी हो कीन्हों दो के कन्धों पर ।
जब आरक्षण नहीं होगा तो सभी को सामान अवसर मिलेगा । अपनी योग्यता से अपनी प्रतिभा सिद्ध कर ऊपर आया जा सकता है । अपना परचम लहराया जा सकता है । आगे आने का आधार मेरिट होना चाहिए ।
प्रतिभाओं के आगे सभी नतमस्तक होते हैं , किसी का किसी से द्वेष नहीं होता । यदि आरक्षण नहीं होगा तो जातिभेद होगा ही नहीं । सभी जतियाँ सामान हैं और वे सौहार्द के साथ इस भारत भूमि पर रहती हैं ।
जातियों को कलंकित करने का काम ये नेता करते हैं । अपने स्वार्थ में ये समाज के अनगिनत टुकड़े कर उनकी तरफ आरक्षण के टुकड़े फैंकते हैं । ये नेता ही आरक्षित जतियों से उनका स्वाभिमान छीनते हैं और अनारक्षित जातियों की प्रतिभाओं का गला घोंटकर असमानता और आपसी दुराचार पैदा कर हम पर राज करते हैं ।
बाहर आना होगा इस मृगतृष्णा से । आरक्षण नहीं होगा तो समस्त जातियाँ मिलजुल कर रहेंगी। अतः ये स्पष्ट है कि आरक्षण से जातिवाद का जहर फैलता है। जातियाँ स्वयं किसी प्रकार से किसी का नुक्सान नहीं करतीं ।
Wednesday, February 1, 2017
Saturday, January 28, 2017
अवन्तिका चल बसी
मानव ने उसको मार कर फेंक दिया
वीरान से एक गंदे पड़े मैदान में
फिर भी लाश ज़िंदा थी, जीना चाहती थी
दिल ने धड़कना नहीं बंद किया
वीरान से एक गंदे पड़े मैदान में
फिर भी लाश ज़िंदा थी, जीना चाहती थी
दिल ने धड़कना नहीं बंद किया
गिद्ध नोच नोच कर उसे खाते ..
मानव हर सुबह उसको देखने आता
अवन्तिका के बहते आंसू और
मांस से रिस्ता खून , उसके बेचैन मन को
दो पल का सुकून दे देते और वो लौट जाता
अवन्तिका पीछे से पुकारती रहती
मानव कभी मुड़कर नहीं देखता
मानव हर सुबह उसको देखने आता
अवन्तिका के बहते आंसू और
मांस से रिस्ता खून , उसके बेचैन मन को
दो पल का सुकून दे देते और वो लौट जाता
अवन्तिका पीछे से पुकारती रहती
मानव कभी मुड़कर नहीं देखता
प्रतिदिन का नियम
एक का इबादत के लिए आना
दुसरे की लाश का रिसना
और गिद्धों द्वरा नोचकर
खाया जाना जारी था
एक का इबादत के लिए आना
दुसरे की लाश का रिसना
और गिद्धों द्वरा नोचकर
खाया जाना जारी था
कहीं कुछ था जो अभी
मुकम्मल नहीं हुआ था
वो सोचती थी कि मानव
उसकी याद में यहाँ आता है
लेकिन जब वो बेरुखी से मुंहमोड़कर
लौट जाता तो वो हैरान हो जाती
क्यों आता है वो
क्या चाहिए उसे
मुकम्मल नहीं हुआ था
वो सोचती थी कि मानव
उसकी याद में यहाँ आता है
लेकिन जब वो बेरुखी से मुंहमोड़कर
लौट जाता तो वो हैरान हो जाती
क्यों आता है वो
क्या चाहिए उसे
गिद्धों ने अपना काम
वफादारी से जारी रखा
मांस का एक टुकड़ा भी
अब शेष न था
सूखे बचे पिंजर में
बस दो आँखें थीं और
एक लाल धड़कता दिल
वो बहती थीं , वो रिस्ता था
वफादारी से जारी रखा
मांस का एक टुकड़ा भी
अब शेष न था
सूखे बचे पिंजर में
बस दो आँखें थीं और
एक लाल धड़कता दिल
वो बहती थीं , वो रिस्ता था
अवन्तिका को अपने प्रश्न का
उत्तर मिल गया था
वो जान गयी थीं कि
मानव अपनी जीत के
बेहद नज़दीक आ चुका है
उत्तर मिल गया था
वो जान गयी थीं कि
मानव अपनी जीत के
बेहद नज़दीक आ चुका है
धीरे से अवन्तिका ने
अपनी आँखें बंद कर लीं
और मानव कि जीत को
मुकम्मल कर दिया !!
अपनी आँखें बंद कर लीं
और मानव कि जीत को
मुकम्मल कर दिया !!
Sunday, January 22, 2017
दर्ज हुए इतिहास हो तुम
जीवित होते हुए भी
मर चुके हो तुम
इस जीवन में अब
तुम्हारा स्थान वो है जहाँ
मृत 'अपनों' की यादें रहती हैं
तुम्हें याद तो किया जाएगा लेकिन
अब बातें न होंगीं तुमसे
मर चुके हो तुम
इस जीवन में अब
तुम्हारा स्थान वो है जहाँ
मृत 'अपनों' की यादें रहती हैं
तुम्हें याद तो किया जाएगा लेकिन
अब बातें न होंगीं तुमसे
तुम जाओ
तुम मुक्त हो
तुम उन्मुक्त उड़ो
अब पीछे से आवाज़ देने वाला
नहीं है कोई
कोई बाधा नहीं
कोई अवरोध नहीं
खाली वीरान सड़कों पर
अब निर्विघ्न चलो
मंज़िल खुद से तलाशो
कस कर हाथ पकडे अब
तुम्हारे कोई साथ नहीं
तुम मुक्त हो
तुम उन्मुक्त उड़ो
अब पीछे से आवाज़ देने वाला
नहीं है कोई
कोई बाधा नहीं
कोई अवरोध नहीं
खाली वीरान सड़कों पर
अब निर्विघ्न चलो
मंज़िल खुद से तलाशो
कस कर हाथ पकडे अब
तुम्हारे कोई साथ नहीं
तुम मेरा वर्तमान नहीं
तुम मेरा भविष्य नही
हाँ , बीत चुके कुछ पन्नों पर,
दर्ज हुए इतिहास हो तुम ।
तुम मेरा भविष्य नही
हाँ , बीत चुके कुछ पन्नों पर,
दर्ज हुए इतिहास हो तुम ।
Wednesday, January 18, 2017
श्रृंगार
कल मायावती मैम का ओजमयी भाषण सुना ! उनका भव्य स्वरुप अंतर्मन को धीरे से कहीं छू गया । हलके रंग का रेशमी परिधान उस पर बहुत ही हलके रंग का पीच कलर का गर्व से इतराता कोट, फ़िज़ां में एक अलग ही गरम्भीरता पैदा कर रहा था ।कानों के आभूषण किसी भी स्त्री का मन ललचा देने के लिए पर्याप्त थे । बेहद आधुनिक डिज़ाइनर अंदाज़ में । बायें कान में करीब दस इंच लंबे झुमके थे तो दाहिनी कान में मात्र एक छोटा सा गोलाकार टॉप्स चिपका हुआ था । ज़ुल्फ़ों को हवा में उड़ने की मनाही थी , उन्हें संयम से अपने स्थान पर रहने की हिदायत थी । वे अपनी सधी हुयी गरिमामयी वाणी में अपना भाषण पढ़ रही थीं । गलतियाँ उन्हें पसंद नहीं इसलिए झुकी हुयी पलकें कागज़ से किंचित मात्र भी हटती न थीं । जब हमारे नयन इस रूप छटा से थोड़ा मुक्त हुये तो अपने श्रवण यंत्रों को तकलीफ देते हुए सुना हमने की वे बेहद धीमी किन्तु कड़क आवाज़ में मासूम सा क्रोध करते हुए अपने प्रधानमन्त्री से नोटबंदी के पहले और बाद का मित्रवत हिसाब माँग रही थीं । बात तो वाजिब है लेकिन जब नोटों की बात चली तो मन फिर से श्रृंगार पर ही आ अटका । कहीं कुछ अधूरा था ... कंठ में नोटों के हार की कमी खल रही थी .. मन उदास हो चला ..
Friday, January 13, 2017
श्रद्धांजलि
जीवनसाथी से बढ़कर साथ निभाने वाला दूसरा कौन हो सकता है भला ? जब दो में से एक नहीं रह जाता तो उसका दर्द क्या होता है ये उनसे पूछिए जो नितांत अकेला होकर , जीवन के इस कठिन सफर को उसकी यादों के सहारे काट रहा होता है ! पिताजी (श्री वी पी श्रीवास्तव , रिटायर्ड बैंक अधिकारी) द्वारा , उनकी स्वर्गीय पत्नी की याद में रचित उनकी कविता , उनकी अनुमति से यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ!
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A tribute to my second self
A tribute to my second self
(my soulmate , my life companion )
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भूल न पाऊं तुम्हें मैं प्राणप्रिया
अगणित उपकार मुझपर तुमने किये
मोक्ष मिले तुम्हें यही विश्वास किया
क्षमाप्रार्थी हूँ भाव विह्वल कभी किया !
अगणित उपकार मुझपर तुमने किये
मोक्ष मिले तुम्हें यही विश्वास किया
क्षमाप्रार्थी हूँ भाव विह्वल कभी किया !
बन गयी तुम अब मेरा इतिहास
रक्षा कवच तुम्हारा सदा रहे मेरे पास
कैसा वियोग टूट गयी सब आशा
विधान मधुस्पर्श का होता काश
रक्षा कवच तुम्हारा सदा रहे मेरे पास
कैसा वियोग टूट गयी सब आशा
विधान मधुस्पर्श का होता काश
पीड़ा उभरी भवसागर में होने का
दिखे न कोई छोर, चहुँ और
प्रबल प्रवाह वेदना कर प्रताड़ित
बह रहा हूँ पकडे तेरी स्मृति डोर
दिखे न कोई छोर, चहुँ और
प्रबल प्रवाह वेदना कर प्रताड़ित
बह रहा हूँ पकडे तेरी स्मृति डोर
त्यागमूर्ति थी, त्याग किया जीवन भर
बहाई प्रेमपुंज की मधुधारा जी भर
करती रही सदा तुम सेवा निस्वार्थ
तत्पर रहती करने को पूण्य परमार्थ
बहाई प्रेमपुंज की मधुधारा जी भर
करती रही सदा तुम सेवा निस्वार्थ
तत्पर रहती करने को पूण्य परमार्थ
निर्मूल्य हुए सपने संजोये आस रही न मेरी
अपूर्ण लक्ष्य न होगी, सच श्रद्धांजलि तेरी
करने हैं कार्य तुम्हें ही, रहे जो शेष
करूँ याचना तुम्हीं से, शक्ति दो मुझे विशेष
अपूर्ण लक्ष्य न होगी, सच श्रद्धांजलि तेरी
करने हैं कार्य तुम्हें ही, रहे जो शेष
करूँ याचना तुम्हीं से, शक्ति दो मुझे विशेष
साथ निभाये तुमने जो तैतालीस वर्ष
सच्चा था वही मेरे जीवन का उत्कर्ष
हो गया हूँ संतप्त अब नहीं रही आस
विस्मृत नहीं होगी तुम मेरी अंतिम सांस
सच्चा था वही मेरे जीवन का उत्कर्ष
हो गया हूँ संतप्त अब नहीं रही आस
विस्मृत नहीं होगी तुम मेरी अंतिम सांस
शक्ति स्वरूपणी, शक्तिपुंज में हुयी विलीन
तेरे ज्ञान की गंगा बचा ले, होने से मेरा ह्रदय मलीन
वचन दो शुभे, आज न कहना काश
सदा रहो ह्रदय में जब तक आऊं तेरे पास
तेरे ज्ञान की गंगा बचा ले, होने से मेरा ह्रदय मलीन
वचन दो शुभे, आज न कहना काश
सदा रहो ह्रदय में जब तक आऊं तेरे पास
सरल स्वभाव तेरा , कैसा सलिल ह्रदय
निर्मल सारा जीवन , रही सदा करुणामय
त्यागमूर्ति थी तुम, ममता की पारावार
समझ न पाया कोई , तेरा विशाल आकार
निर्मल सारा जीवन , रही सदा करुणामय
त्यागमूर्ति थी तुम, ममता की पारावार
समझ न पाया कोई , तेरा विशाल आकार
तुम शक्ति अपार, कर दिया जीवन पार
ऋणी रहूँगा सदा तेरा, हुआ मैं लाचार
अनवरत प्रेरणा दो, न रहे अपूर्ण व्यवहार
चाहूँ बस हो पूर्ण तेरा विचार , मेरा आचार !
ऋणी रहूँगा सदा तेरा, हुआ मैं लाचार
अनवरत प्रेरणा दो, न रहे अपूर्ण व्यवहार
चाहूँ बस हो पूर्ण तेरा विचार , मेरा आचार !
वेद प्रकाश श्रीवास्तव
मनकामेश्वर का चमत्कार
लखनऊ का मनकामेश्वर मंदिर । प्रसिद्द है श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ती के लिए । हम भी बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंकों की मनोकामना लिए हुए वहाँ गए ।
बात पुरानी है । हमारी उम्र तकरीबन 16 वर्ष । शिवरात्रि का महापर्व । समस्त परिवार के साथ दर्शन करने गए । मंदिर के बाहर बहुत दूर तक स्त्री पुरुष की प्रथक कतारें महादेव के दर्शनों को आतुर ।
धीरे धीरे कतार खिसक रही थी । हम भी मंदिर प्रांगण तक पहुंचे । वहां लगा कपाट खुलता था और थोड़े श्रद्धालुओं को अंदर लेकर फिर बंद कर दिया जाता था । बंद कपाट के इस तरफ व्यग्र भीड़ उग्र होती जा रही थी । भीड़ इतनी ज्यादा की सरसों डालने की जगह नहीं । लोगों द्वारा पीछे से पड़ने वाला धक्का इतना तीव्र था की अग्रिम पंक्ति के लोगों का दम घुट रहा था लेकिन वापसी की कोई गुंजाइश नहीं थी ।
मेरी स्थिति बेहद नाज़ुक हो चुकी थी । कपाट के चौखट से लगी दीवार की edge शरीर में धंसती जा रही थी । पीछे से श्रद्धालुओं की फ़ौज बढ़ती जा रही थी और सामने के कपाट खुलने के इंटज़ार में बन्द थे । हमारी सांस रुकने लगी । मुँह से चिल्लाने की कोशिश की तो आवाज़ नहीं पा रही थी । घुरघुराने की आवाज़ निकल रही थी ।
साक्षात मृत्यु दिखाई दे रही थी । पता नहीं भीड़ के उस शोर में दीदी को मेरी घुटी घुटी आवाज़ कैसे सुनाई दे गयी । उन्होंने भीड़ के बीच में से हाथ बढाकर मेरा कुर्ता मुट्ठी में पकड़ा और पूरी ताकत से पीछे खींचा । बमुश्किल एक सेंटीमीटर पीछे खिंचे होंगे हम तब तक भीड़ के धक्के से हमारा स्थान बदल गया और वो दीवार जो हड्डी को तोड़ने को आतुर थी उससे बचाव हो गया और साँस का आवागमन शुरू हो गया । मृत्यु टल गयी थी ।
किन्तु इतना ही पर्याप्त न था । आगे जो होने जा रहा था वो सोचकर दिल दहल जाता है । उसी क्षण कपाट खुला । पीछे भीड़ के दबाव से अग्रिम पंक्ति के लोग तो फुटबॉल की तरह उछलकर सामने मंदिर प्रांगण में गिरे । कितने कुचले गए पता नहीं लेकिन मेरे साथ जो घटा वो कल्पना से परे किसी चमत्कार से कम नहीं था ।
हम भी भीड़ के धक्के से उछलकर सामने वरांडे में गिरे । लेकिन जहाँ गिरे वो फर्श नहीं थी बल्कि वहाँ तैनात पुलिस वाले का हाथ था जिस पर हम टंग गए जैसे किसी डोरी पर सूखने के लिए टंगे कपडे । उसने मुझे धीरे से उतारा और पूछा , "बेटा चोट तो नहीं लगी" ! मैं बिलकुल ठीक थी , सकुशल ।
यकीन ही नहीं हुआ । पहले दीदी ने जीवनदान दिया फिर मानो , साक्षात मनकामेश्वर महादेव ने उस पुलिसवाले के रूप में आकर मुझे भीड़ द्वारा कुचले जाने से बचा लिया ।
उस घटना को 20 25 साल गुज़र गए हैं लेकिन उसका असर ये है कि इतने सालों में फिर कभी , किसी पर्व पर मंदिर नहीं गए । केवल आम दिनों में जब भीड़ नहीं होती , तभी जाती हूँ ।
हर हर महादेव ।
जीवनदान
जन्म माँ देती है लेकिन जीवनदान कोई फरिश्ता दे देता है । आजीवन ऋणी हूँ ।
बात जनवरी 2011 की है । सर्द रात और तबियत खराब । संयोग से कोई बड़ा नहीं था घर में , अकेली थी बच्चे छोटे जिनसे मदद की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी उस समय । ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ा हुआ था । 190 के पार । उत्पन्न स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसी अवस्था में अक्सर माँ को फोन लगाया करती थी लेकिन 2007 में वे भी इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं । अन्य किसी को रात्रि में परेशान करने की हिम्मत नहीं थी । खैर बच्चों के पास उनके पिताजी और उनकी मौसी का नंबर लिखकर दे दिया और कहा की यदि कोई ज़रूरत पड़े तो इन दो नंबरों पर फोन कर देना ।
संयोग से एक शुभचिंतक मित्र का औपचारिक फोन आ गया उस रात्रि । दुआ सलाम के बाद जब उन्हें अपनी स्थितिजनित भय से अवगत कराया तो वे भी चिंतित हो गए । सैकड़ों किलोमीटर दूर खड़े एक दुसरे प्रांत से वे मेरी कोई मदद नहीं कर सकते थे । असहाय थे किन्तु स्थिति जानने के बाद इस तरह अकेला छोड़ना भी नहीं चाहते थे । उन्होंने कहा , "आप घबराओ मत , हम आपको कुछ सुनाते हैं और सब ठीक होगा "
फिर उन्होंने जाड़े की उस सर्द रात में, सड़क के किनारे खड़े होकर, पूरी हनुमान चालीसा गाकर सुनाई । शेष हमें कुछ याद नहीं लेकिन प्रातः जब नींद खुली तो हम ठीक महसूस कर रहे थे । एक कठिन रात टल चुकी थी ।
ये जीवन ऋणी है उस फ़रिश्ते का । उनका आभार व्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त हैं
ये जीवन ऋणी है उस फ़रिश्ते का । उनका आभार व्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त हैं
communism
An economics professor at a local college made a statement that he had never failed a single student before, but had recently failed an entire class.
*That class had insisted that socialism worked and that no one would be poor and no one would be rich, a great equalizer*
The professor then said, "OK, we will have an experiment in this class on this plan : All grades will be averaged and everyone will receive the same grade !
After the first test, the grades were averaged and everyone got a B.
The students who studied hard were upset and the students who studied little were happy.
As the second test rolled around, the students who studied little had studied even less and the ones who studied hard decided they wanted a free ride too so they studied little.
The second test average was a D!
No one was happy.
When the 3rd test rolled around, the average was an F.
As the tests proceeded, the scores never increased as bickering, blame and name-calling all resulted in hard feelings and no one would study for the benefit of anyone else.
To their great surprise, ALL FAILED and the professor told them that communism would also ultimately fail because when the reward is great, the effort to succeed is great, but when government takes all the reward away, no one will try or want to succeed.
*These are possibly the 5 best sentences you'll ever read and all applicable to this experiment
1. You cannot legislate the poor into prosperity by legislating the wealthy out of prosperity.
2. What one person receives without working for, another person must work for without receiving.
3. The government cannot give to anybody anything that the government does not first take from somebody else.
4. You cannot multiply wealth by dividing it!
5. When half of the people get the idea that they do not have to work because the other half is going to take care of them and when the other half gets the idea that it does no good to work because somebody else is going to get what they work for, that is the beginning of the end of any nation !
केजरीवाल
मुझे लगता है केजरीवाल जी को दिल्ली के साथ साथ हरयाणा , गोवा, पंजाब और उत्तर प्रदेश का भी मुख्यमंत्री बना देना चाहिए । धीरे धीरे भारत की सभी रियासतें उनके अधीन हो जाएंगी और वे चक्रवर्ती सम्राट बन जायेंगे । आप लोगों को भी चंदगुप्त मौर्य के शासनकाल में दुबारा जीने का मौक़ा मिलेगा । बस समस्या एक ही है । मनीष सिसौदिया तो एक ही हैं । अन्य रियासतों में किसको टिकाया जाएगा ?
Wednesday, December 14, 2016
प्रेम
प्रेम की उम्र बहुत छोटी होती है । किन्तु यदि इस बात की अभिलाषा हो कि प्रेम अखंड और अक्षुण् रहे तो कभी भी उसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। एक बार यदि पा लिया तो उसका खो जाना तयशुदा है । जो अप्राप्य है वही सर्वव्याप्त है । प्राप्त होते ही सिमट जाता है । और फिर विलीन । प्रेम यदि आत्मा के स्तर पर रहे तो अखंड रहता है ।
Saturday, November 5, 2016
Freedom of expression? or freedom of crime?
सबको आजादी चाहिए ! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में देशद्रोह , दुश्मन मुल्कों को ख़ुफ़िया एवम संवेदनशील जानकारियों का दिया जाना , किसी को बलात्कार की आजादी चाहिए , किसी को राशन कार्ड की आजादी चाहिए ! किसी को पटरी उखाड़ने की आजादी तो किसी बसें फूंकने की आजादी चाहिए !किसी को तीन तलाक की आजादी चाहिए तो किसी को इंशा अल्लाह देश के टुकड़े करने की आजादी चाहिए ! संसाधनों और बुद्धि का इतना दुरूपयोग अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! अभिव्यक्ति कि आजादी ? या हरकतबाजियों की आजादी ?
Friday, May 20, 2016
प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम पत्र
परमप्रिय/आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
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आपके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं बधाई । आप स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा अपनी जनता की सेवा इसी प्रकार करते रहें । आपका बहुत-बहुत आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी पोस्टों पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं और उन्हें संज्ञान में भी लेते हैं । पिछले दो वर्षों में मैंने आपसे जिन मुद्दों पर भी निवेदन किया आपने उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर उन्हें समय रहते दुरुस्त भी किया है । कुछ बहुत अहम् मुद्दों पर जहाँ आपसे चूक हो रही थी , उन्हें भी आपने हमारी पोस्टों द्वारा निवेदन किये जाने का सम्मान करते हुए सुधारा । हमारा एक निवेदन जो हम पिछली सरकार के समय से निरन्तर कर रह थेे कि आयुर्वेद को उसकी प्रतिष्ठा वापस दी जाए , आपने उस पर भी ध्यान दिया है । आपका ह्रदय से आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी खरी-खरी एवं कड़वी पोस्टों को दवाई समझ पी जाते हैं और बदले में हमें (जनता को) अमृत देते हैं । हम अपने मित्रों समेत आपका सादर आभार व्यक्त करते हैं ।
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आज आपसे पुनः एक अहम् निवेदन कर रही हूँ की भारत से जातिवाद और आरक्षण सदैव के लिए समाप्त कर दिया जाए । किसी के नाम के आगे कोई जाति न लिखी हो । सिर्फ नाम ही उसकी पहचान हो । न जाती होगी, न ही जातिगत आरक्षण , न कोई क्लेश , न ही किसी के मन में किसी प्रकार का असंतोष होगा । सभी को सामान अवसर मिलेंगे । प्रतिभाएं फलेंगी फूलेगी । देश का सच्चे अर्थों में विकास होगा । सबका साथ, सबका विकास होगा ।
.
आपने दो वर्षों में तकरीबन सभी अहम् कार्य पूरे कर दिखाए हैं , सिवाए दो कामों के । एक आरक्षण हटाना और दूसरा काम उससे भी अहम् अभी शेष है । कृपया हमारे इस निवेदन को संज्ञान में लेकर इस पर शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाये जाएँ और आरक्षण समाप्त किया जाए । तभी बुलेट ट्रेन आने की ख़ुशी हम सच्चे अर्थों में मना पाएंगे ।
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सादर,
आपकी शुभेच्छु,
दिव्या
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(हमारे जो मित्र आरक्षण के खिलाफ हैं , वे कृपया इस पोस्ट को शेयर कर हमारा सहयोग करें । सादर आभार )
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आपके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं बधाई । आप स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा अपनी जनता की सेवा इसी प्रकार करते रहें । आपका बहुत-बहुत आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी पोस्टों पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं और उन्हें संज्ञान में भी लेते हैं । पिछले दो वर्षों में मैंने आपसे जिन मुद्दों पर भी निवेदन किया आपने उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर उन्हें समय रहते दुरुस्त भी किया है । कुछ बहुत अहम् मुद्दों पर जहाँ आपसे चूक हो रही थी , उन्हें भी आपने हमारी पोस्टों द्वारा निवेदन किये जाने का सम्मान करते हुए सुधारा । हमारा एक निवेदन जो हम पिछली सरकार के समय से निरन्तर कर रह थेे कि आयुर्वेद को उसकी प्रतिष्ठा वापस दी जाए , आपने उस पर भी ध्यान दिया है । आपका ह्रदय से आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी खरी-खरी एवं कड़वी पोस्टों को दवाई समझ पी जाते हैं और बदले में हमें (जनता को) अमृत देते हैं । हम अपने मित्रों समेत आपका सादर आभार व्यक्त करते हैं ।
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आज आपसे पुनः एक अहम् निवेदन कर रही हूँ की भारत से जातिवाद और आरक्षण सदैव के लिए समाप्त कर दिया जाए । किसी के नाम के आगे कोई जाति न लिखी हो । सिर्फ नाम ही उसकी पहचान हो । न जाती होगी, न ही जातिगत आरक्षण , न कोई क्लेश , न ही किसी के मन में किसी प्रकार का असंतोष होगा । सभी को सामान अवसर मिलेंगे । प्रतिभाएं फलेंगी फूलेगी । देश का सच्चे अर्थों में विकास होगा । सबका साथ, सबका विकास होगा ।
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आपने दो वर्षों में तकरीबन सभी अहम् कार्य पूरे कर दिखाए हैं , सिवाए दो कामों के । एक आरक्षण हटाना और दूसरा काम उससे भी अहम् अभी शेष है । कृपया हमारे इस निवेदन को संज्ञान में लेकर इस पर शीघ्रातिशीघ्र कदम उठाये जाएँ और आरक्षण समाप्त किया जाए । तभी बुलेट ट्रेन आने की ख़ुशी हम सच्चे अर्थों में मना पाएंगे ।
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सादर,
आपकी शुभेच्छु,
दिव्या
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(हमारे जो मित्र आरक्षण के खिलाफ हैं , वे कृपया इस पोस्ट को शेयर कर हमारा सहयोग करें । सादर आभार )
Sunday, March 13, 2016
मनुवाद क्या है और क्या है मनुस्मृति।
मनु महराज कहते हैं- :
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में
‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है।
ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप
में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद
की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में
जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए
मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति
व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है,
उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है।
क्या है मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी
सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि
शासक माने जाते हैं।
मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या
मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी
प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति
प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृति में समाज संचालन के लिए जो
व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद
कहा जा सकता है।
मनुस्मृति : समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं,
उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है।
अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है,
न्याय व्यवस्था का शास्त्र है।
यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय
व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है।
उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का
निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का
नाम ही धर्मशास्त्र है।
महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित: । अर्थात जो
धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि
वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है
कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य
तथा समान होता है।
जिन्हें हम वर्तमान समय में धर्म कहते हैं दरअसल वे संप्रदाय हैं।
धर्म का अर्थ है जिसको धारण किया जाता है और मनुष्य
का धारक तत्व है मनुष्यता, मानवता।
मानवता ही मनुष्य का एकमात्र धर्म है। मुस्लिम,
ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्म नहीं मत हैं, संप्रदाय हैं ।
संस्कृत के धर्म शब्द का पर्यायवाची संसार की अन्य
किसी भाषा में नहीं है। भ्रांतिवश अंग्रेजी के ‘रिलीजन’
शब्द को ही धर्म मान लिया गया है, जो कि नितांत
गलत है। इसका सही अर्थ संप्रदाय है। धर्म के निकट यदि
अंग्रेजी का कोई शब्द लिया जाए तो वह ‘ड्यूटी’ हो
सकता है। कानून ड्यूटी यानी कर्तव्य की बात करता है।
मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी
कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति
है।
आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है,
कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में
विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि
याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया
जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल
आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून
के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान
हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।
मनुस्मृति में दलित विरोध :
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में
‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है।
ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप
में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद
की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में
जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए
मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति
व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है,
उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है।
क्या है मनुवाद :
जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी
सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या?
महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि
शासक माने जाते हैं।
मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या
मनुष्य कहा जाता है।
अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी
प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति
प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृति में समाज संचालन के लिए जो
व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद
कहा जा सकता है।
मनुस्मृति : समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं,
उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है।
अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है,
न्याय व्यवस्था का शास्त्र है।
यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय
व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है।
उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का
निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का
नाम ही धर्मशास्त्र है।
महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित: । अर्थात जो
धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि
वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है
कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य
तथा समान होता है।
जिन्हें हम वर्तमान समय में धर्म कहते हैं दरअसल वे संप्रदाय हैं।
धर्म का अर्थ है जिसको धारण किया जाता है और मनुष्य
का धारक तत्व है मनुष्यता, मानवता।
मानवता ही मनुष्य का एकमात्र धर्म है। मुस्लिम,
ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्म नहीं मत हैं, संप्रदाय हैं ।
संस्कृत के धर्म शब्द का पर्यायवाची संसार की अन्य
किसी भाषा में नहीं है। भ्रांतिवश अंग्रेजी के ‘रिलीजन’
शब्द को ही धर्म मान लिया गया है, जो कि नितांत
गलत है। इसका सही अर्थ संप्रदाय है। धर्म के निकट यदि
अंग्रेजी का कोई शब्द लिया जाए तो वह ‘ड्यूटी’ हो
सकता है। कानून ड्यूटी यानी कर्तव्य की बात करता है।
मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी
कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति
है।
आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है,
कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में
विसंगतियां देखने को मिलती हैं।
मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि
याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया
जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल
आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून
के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान
हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।
मनुस्मृति में दलित विरोध :
मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद
को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है
और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को
दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों
की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार
वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी
तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ
शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन
को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण,
द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र
की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी
जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य
जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं
पुरुष और स्त्री।
मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’
अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते
हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि
अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी
या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की
संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण
बन सकती है।
हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति
शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु
वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी
योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास
बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ
पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन
आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित
विरोधी थे।
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद् बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)
अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से
क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई।
दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के
कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट
मान लिया गया, जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक
हैं।
ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह
से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन
और अध्यापन।
आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग
या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति। उदर से पैदा हुआ वैश्य
अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से
उत्पन्न शूद्र वर्ग।
यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न
होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की
साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है
जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर
में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम
नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य
कर समाज में अपने योगदान दे सकता है।
आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु
की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी
भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।
वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने
का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि
किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि
शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से
अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा
सकती है? इसी तरह चतुर्वर्ण के बिना स्वस्थ समाज की
कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ब्राह्मणवाद की हकीकत :
ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित
स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे
लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने
जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने
अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान
संदर्भ में व्यापम घोटाला इसका सटीक उदाहरण हो
सकता है। क्योंकि कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार के माध्यम से
अपनी अयोग्य संतानों को भी डॉक्टर बना दिया।
हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपनाकर
अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं। इसके लिए मनु दोषी नही। हो सकता है मनुस्मृति में कुछ प्रक्षिप्त अंश डाल दिये हों जो मूल मनुस्मृति का अंग ही न हो।
मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं।
बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते,
जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का
एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण
अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ
हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को
लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद
या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और
उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों
को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना
चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का
भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह
के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी
पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान
की खुलकर प्रशंसा की है।
पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है :
पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका
जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से
मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से न कि जातिगत।
आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण
होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।
ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान
हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म
से दलित वर्ग से आते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता
को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी
प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों
को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के
अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।
को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है
और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को
दलित नहीं मानते।
दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों
की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार
वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी
तरह उसकी योग्यता पर आधारित है।
प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ
शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन
को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम,
द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण,
द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र
की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी
जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य
जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं
पुरुष और स्त्री।
मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’
अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते
हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है।
मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि
अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी
या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की
संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण
बन सकती है।
हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति
शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु
वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी
योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने।
एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास
बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ
पूजन की परंपरा है।
विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने।
ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन
आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित
विरोधी थे।
ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद् बाहु राजन्य कृत:।
उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)
अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से
क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई।
दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के
कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट
मान लिया गया, जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक
हैं।
ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह
से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन
और अध्यापन।
आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।
भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग
या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति। उदर से पैदा हुआ वैश्य
अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से
उत्पन्न शूद्र वर्ग।
यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न
होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की
साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है
जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर
में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम
नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य
कर समाज में अपने योगदान दे सकता है।
आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु
की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी
भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।
वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने
का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि
किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि
शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से
अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा
सकती है? इसी तरह चतुर्वर्ण के बिना स्वस्थ समाज की
कल्पना भी नहीं की जा सकती।
ब्राह्मणवाद की हकीकत :
ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित
स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे
लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने
जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने
अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान
संदर्भ में व्यापम घोटाला इसका सटीक उदाहरण हो
सकता है। क्योंकि कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार के माध्यम से
अपनी अयोग्य संतानों को भी डॉक्टर बना दिया।
हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपनाकर
अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं। इसके लिए मनु दोषी नही। हो सकता है मनुस्मृति में कुछ प्रक्षिप्त अंश डाल दिये हों जो मूल मनुस्मृति का अंग ही न हो।
मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं।
बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते,
जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का
एक वर्ग आज भी अनपढ़ है।
मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण
अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ
हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को
लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद
या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।
मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और
उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों
को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना
चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी।
दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का
भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह
के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी
पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान
की खुलकर प्रशंसा की है।
पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है :
पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका
जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से
मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से न कि जातिगत।
आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण
होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है।
ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान
हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म
से दलित वर्ग से आते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)
महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता
को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी
प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों
को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के
अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।
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