Wednesday, October 6, 2010

हमारे संस्कार अभी भी जीवित हैं-- धन्य हैं ऐसे माता-पिता !

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समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन में सबसे चिंता का विषय है हमारी नयी पीढ़ी का अपने संस्कारों को भूल जाना । आजकल बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों से सम्मान के साथ बात नहीं करते। खुद को ज्यादा होशियार और बाकी सभी को अपने से कमतर समझते हैं। नयी पीढ़ी का होने के नाते , वे खुद को ज़हीन और समय के साथ समझते हैं , लेकिन बड़े-बुजुर्गों को दकियानूस और आउट डेटेड समझते हैं। महिलाओं के साथ भी उनका रवैय्या कुछ अच्छा नहीं होता। ऐसे नव-युवकों से बात करने में भी डर लगता है की पता नहीं किस बात पर अपमान कर दें। इसलिए डर-डर कर ही औपचारिकता निभाने का कार्य होता है।

ब्लॉग-जगत में , अपने से छोटे, बड़े तथा हम -उम्र , सभी प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता है। कुछ खट्टे -मीठे अनुभव भी होते हैं। आज एक सुन्दर अनुभव बाँट रही हूँ यहाँ।

आइये मिलते हैं एक नव-युवक -यशवंत से। इनकी उम्र मात्र २७ वर्ष है। बेहद संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी यशवंत अपने माता-पिता का बहुत आदर करते हैं, और उनके साथ मित्रवत रहते हैं। छोटी बड़ी सभी बातों में माता [पूनम जी ] तथा पिता [ विजय जी ], की राय को ही पहला स्थान देते हैं। मुझे गर्व है इस नयी पीढ़ी के युवक यशवंत पर और उन्हें सुन्दर संस्कार देने वाले उनके माता-पिता पर।

यशवंत के लेखन में समाज के प्रति संवेदनशीलता और गंभीरता है। ये अपने आस-पास घट रही कटु स्थितियों के प्रति चिंतित रहते हैं , तथा विषम परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए निरंतर प्रत्नशील रहते हैं।

यदि हमारे देश के सभी नव-युवक और नवयुवतियां , इतने ही सजग, गंभीर, संवेदनशील, संस्कारों का मान रखने वाले तथा बड़ों का आदर करने वाले हों तो निश्चय ही हमारा देश अपने गौरवशाली इतिहास , संस्कारों और परम्पराओं को जीवित रख सकेगा।

आइये पढ़ते हैं यशवंत की भावुक कर देने वाली रचना। --

[१]-कल फिर तुझ को भुलायेंगे -

बापू तेरे देश में , हम तेरी बातें भूल गए,
तुम तो छप गए नोटों पर , हम काले धन में डूब गए।
...
...

[२]-" मैं नारी हूँ "... इनकी सशक्त कविता।

[३]- इनका लेख - " क्या हम सुधरेंगे ? "-- ये लेख इनके जिम्मेदार चिंतन को दर्शाता है।

यशवंत बहुत ही विनम्र और संवेदनशील युवक है। ये ' आर जे ' बनना चाहते हैं। मेरा आशीर्वाद है की यशवंत की मनोकामना पूरी हो ।

इश्वर करे हमारे देश में बहुत से सु-संस्कारित और संवेदनशील यशवंत हों।

यशवंत से मिलिए "जो मेरा मन कहे " नामक ब्लॉग पर।


jomeramankahe.blogspot.com







46 comments:

  1. यशवंत जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं आगे आने वाले भविष्य के लिए !
    आपका बहुत बहुत आभार इन से हमारा परिचय करवाने के लिए !

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  2. Dearest ZEAL:

    Strange.

    Laughz. Damn funny.


    Arth Desai

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  3. यशवंत जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं आगे आने वाले भविष्य के लिए !
    आपका बहुत बहुत आभार इन से हमारा परिचय करवाने के लिए !

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  4. दिव्याजी,

    क्या इस बार सबसे पहले टिप्प्णी करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त होगा?

    आप ठीक कहती हैं।
    हमने भी देखा कुछ मध्वर्गीय परिवारों में जहाँ पिता रेटायर हो चुके हैं और बेटा/बेटी अपना सोफ़्टवेयर कैरियर आरंभ कर रहा/रही है।
    पिता शायद सरकारी नौकरी कर रहे थे और उनकी कैरियर के अंत की आमदनी कभी अपने होनहार बेटे/बेटी की शुरुआत की आमदनी से कम है।

    पर इसके कारण क्या संतान अपने माँ बाप का सम्मान नहीं करना चाहिए?
    हमने देखा कि केवल आमदनी ज्यादा होने के कारण ये लोग अपने बुजुर्गों को ताने देते रहते हैं।
    आमदनी ज्यादा होने का कारण आज के आर्थिक हालात हैं और इसके लिए अपने बुजुर्गों को दोष देना या उन्हें नीचा दिखाना गलत है।


    यशवन्त से हमारा परिचय कराने के लिए धन्यवाद।
    उनका भी ब्लॉग समय और फ़ुरसत के अनुसार पढेंगे।
    उनको मेरी शुभकामनाएं।
    अच्छा लगता है जब एक ब्लॉग्गर दूसरे ब्लॉग्गर की सिफ़ारिश करता है।
    आज कल आपसी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्र्धा और पाठकों की संख्या बढाने के चक्कर में कई गलत काम किए जा रहे हैं।
    टिप्पणियों की गिनती में जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

    आशा है नए ब्लॉग्गर बन्धु इस भागदौड से बचेंगे और केवल लेख की श्रेष्ठता पर ध्यान देंगे।
    मेरी राय है कि श्रेष्ठ लेखों से पाठकों की संख्या अपने आप बढने लगेंगे।
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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  5. आपने एक संवदनशील व्यक्ति से परिचय कराने का श्रेय आपको जाता है. इनका ब्लॉग पढ़ आया हूँ. बहुत अच्छी शुरूआत.

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  6. बाबूत अच्छा लगा संवेदनशील यशवंत जी से मिलना ... समाज की नब्ज़ को अच्छी तरह से पहचान कर रचनाओं में उतारा है यशवंत जी ने .... मेरी शुभकामनाएँ हैं उनके उत्तम भविष्य के लिए ...

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  7. यशवंत जी को हमारी शुभकामनाये . उनकी कविताये उनके संवेदनशील व्यक्तित्व की और इशारा करती है.

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  8. यशवंत को शुभकामनायें!

    डा. अमर कुमार के मोडरेशन-अभियान को समर्थन भी!

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  9. सच में आज की पीढ़ी रास्ता भटक रही है, शायद इसका कारण माता पिता का उनको समय ना दे पाना है शायद | पहले संयुक्त परिवार होते थे बच्चों पर कई बुजुर्गों की नज़र होती थी | आज एकल परिवार का सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ा है ख़ासकर जहाँ माता-पिता दोनों कामकाजी हों..

    ऐसे में दोनों को चाहिए की परस्पर सहयोग से बच्चों का ख्याल रखें... पुरुषों को यह ना लगे के बच्चे संभालना सिर्फ स्त्रियों का काम है .. तभी हमारी आने वाली पीढ़ी संस्कारी हो पायेगी | यशवंत जी मिलकर बहुत अच्छा लगा | अगर कोई इंसान अपने माता-पिता को अपना भगवान् मानता हो तो उसे आस्तिक होने की कोई जरूरत नहीं है...
    बड़ों का आशीर्वाद सफलता और उन्नति की वो कुंजी है जो बुरे से बुरे वक़्त में भी साथ नहीं छोडती...

    जो लोग बुजुर्गों को आउटडेटेड समझते हैं वो शायद भूल रहे हैं कि एक दिन वो भी आउटडेटेड हो जायेंगे.

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  10. .

    अर्थ देसाई और डॉ अमर के आगे अपनी हार स्वीकार करती हूँ। मैंने अपनों से अपेक्षा की थी की वो समझेंगे , की दिव्या को मोडरेशन की ज़रुरत क्यूँ पड़ी। लेकिन किसी से भी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, यही जाना है आज तक।

    आज से मेरे ब्लॉग पर कोई मोडरेशन नहीं है।

    .

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  11. बहुत ही सुन्‍दर एवं बेहतरीन प्रस्‍तुति दी है आपने, बहुत-बहुत आभार ।

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  12. Diviyaji,
    Aapney Yashwant ke madhyam se Poonam tatha mera bhi ullekh kiya hai,hamney jaisa apne mata-pita sey sikha vaisa hi Yashwant ko sikhaney ka prayas kiya-kar rahey hain,yadi aapki evam sabhi logon ki nigah mey sahi paya gaya to yah hamarey liye badi uplabdhi hai.
    G. Vishwanathji ney aarthik aadhar ki bat kahi hai sahi hai.Merey pitaji ney zaidad thukra kar
    Govt.job kiya tha ham logon ka bachpan aabhavon me bita,mainey Pvt. job kiya IMANDARI key karan
    jobless bana.Dukan-2 naukri karkey aabhavon mey hi Yashwant ka palan hua hai.Apna makan Kishton mey banaya tha jismey Retirement ke bad
    till death mata-pita 17 varsh merey saath hi rahey they.
    hamney Sangharshon me jina sikha aaj bhi sangharshon mey hai parantu Satya Nyay evam Imandari se pichey nahi hatey hain.Yadi hamarey bad bhi Yashwant Imandari ka marg nahi chorega tabhi aap sab ki Duayen Sarthak hongi.

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  13. What! No more moderation?
    लो, हम हार गए!
    अमरजी, पार्टी कब है?

    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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  14. modration jaroori hai....bas dadda(amar)ko na
    kahiyega. yse is par bhi ek vimarsh jaroori hai...
    modration ho/na ho.

    bakiya jab aap recomend kar rahe hain to anuj yashvant ko jaroor padhenge....

    ek baat to universal hai....achhi chees samaj me
    kam matra me paya jata hai.

    pranam

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  15. अच्छा लगा यशवंत के बारे में जानकर ।

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  16. अच्छा लगा यशवंत जी को जानना...
    शुभकामनाएँ उन्हें
    आपको धन्यवाद

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  17. य़शवंत तो है ही ऐसी शख्सियत कि जो जितना भी जानेगा उतना ही मान-सम्मान करेगा और यशवंत का लेखन तो बहुत ही उम्दा है। अभी इस उम्र में जो समझ है अच्छे-अच्छे लोगों की बड़े होने पर नहीं होती। ये सारा तप उनके माता-पिता का है। य़े आपस में एक-दूसरे का भाग्य है जो माता-पिता को इतना अच्छा बेटा और बेटे को इतने अच्छे माता-पिता मिले और हां माता-पिता को आपस में एक-दूसरे जैसा जीवनसाथी मिला। आपने बहुत अच्छा किया जो सबका परिचय यशवंत से कराया। मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं और प्यार यशवंत के लिए...

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  18. प्रिय यशवंत और उसकी संवेदनशील रचनाओं से परिचय कराने के लिए आपका बहुत बहुत आभार। यशवंत की रचनाओं को मैंने पढ़ा, सचमुच इस तरह का चिंतन और ऐसा लेखन करने वाला युवक धन्य है और धन्य है उनके माता-पिता, जिन्होंने यशवंत को ऐसे संस्कार दिए। यशवंत के प्रति अशेष शुभकामनाएं कि वह अपने संस्कार से इसी तरह दूसरों को भी सुसंस्कृत होने की प्रेरणा देता रहे। यशवंत की प्रेरक संवेदनशीलता को नमन।

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  19. यशवंत जी को हार्दिक शुभकामनाएं !
    इनसे परिचय करवाने के लिए आपका भी आभार !
    -
    -
    ये माडरेशन का क्या चक्कर है ???
    क्या पब्लिक डिमांड पर निर्भर होती हैं ऐसी बातें ?
    यह आपका घर है ...इसको कैसे रखना है ...पूर्णतयः आपके विवेक पर है !

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  20. पोस्टें पढ़ी, अच्छे लेखन से परिचय कराया।

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  21. यशवंत जी से और उनकी रचनाओं से परिचित कराने का abhar.

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  22. अच्छा लगा यशवंत जी को जानना...अच्छे लेखन से परिचय कराया।

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  23. बहुत ही सुन्दर और अलग लगी पोस्ट....आज के समय में जब माता पिता का सम्मान करना एक अपवाद जैसा बन चुका है, यशवंत जैसी शख्शियत से आपने जो परिचय कराया वह बहुत अच्छा लगा..यशवंत के सुखद भविष्य की बहुत बहुत शुभ कामनाएं ....आभार...

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  24. डॉ. अमर कुमार ज़िंदाबाद!
    डॉ. दिव्या ज़ील ज़िंदाबाद!!
    मॉडरेशन मुर्दाबाद!!!

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  25. मन अच्छा तो सब अच्छा.
    विचारों से व्यक्ति तक पहुँचने की दौड़ लगाने वाले इस जगत में कम ही हैं.
    आपके प्रयासों से कुछ संस्कारवान युवकों से परिचय मिलेगा तो यह संसार निःसार नहीं लगेगा.
    आपकी ही तरह पोस्ट भी बेहद अच्छी है.
    आपके मन का दर्पण आपके विचार.

    आपके मन की दिव्यता दिखने लगी है.

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  26. This comment has been removed by the author.

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  27. आप का बहुत बहुत धन्यवाद
    ये जान कर अच्छा लगा की मेरी पीड़ी में ऐसे लोग अब भी है. वर्ना सिगरट और सराब ने तो अब फैसन का रूप ले लिया है .
    मेरा अपना अनुभव है की अगर दोस्तों के बीच अवसरों पर यदि आप इनकार करते है तो वो आप का मजाक उड़ाएंगे और उसकाते भी है की अब तो तुम बड़े हो गए हो .अर्थात
    जो अपने घर में विद्रोह न कर सके और सिगरट और मदिरा का सेवन न करता हो वह अभी आपरिपक्व है .
    अब ऐसी मानसिक को क्या कहे .

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  28. थैंक यू .... आपने इनके बारे में बताया... सच में हम सब
    बच्चों को माँ पापा की रिस्पेक्ट करनी चाहिए


    मेरे ब्लॉग पर है.... किताबों की दुनिया
    http ://chaitanyakakona .blogspot .com

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  29. Dearest ZEAL:

    Thanks a zillion and congratulations for the banishment of the despicable tool of moderation.

    It is a very welcome step and the right one.

    I have been quite vociferous all along against moderation - even when in the initial stages you had not imposed it and even all through your falling prey to the lure of 'control'.

    If I recall it right, when you had chosen to invoke the unethical instrument of moderation, you had not called it your victory.

    Thus, it is a bit saddening to see that your renunciation of the same is ascribed by you as a 'defeat'.

    There was never any case of victory or defeat with respect to moderation.

    The opposition was only on a matter of principle.

    All said and done, it is great to see the ominous obstacle thrown away and I earnestly appreciate your prudent decision.

    Welcome back to unbridled expression.

    Of course, people who see it as a matter of win or loss can go partying.

    Thanks.


    Arth Desai

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  30. मैं नहीं मानता कि युवा पीढी in general पथभ्रष्ट हो गयी है, या फ़िर अपने माता पिता का सम्मान नहीं करती है।

    पिछली पीढी की तुलना में मुझे नहीं लगता कि हमारी पीढी अधिक गालियां खाने लायक है।

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  31. अच्छी पोस्ट है..... हाँ बच्चों की बुराइयों के बारे में तो अक्सर बात होती है...
    उनकी अच्छाइयों को भी सामने लाना ज़रूरी है..... आपकी इस प्रस्तुति ने यही काम किया है....
    आभार अच्छा लगा पढ़कर....

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  32. प्रेरक पोस्ट। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  33. बहुत ही प्रशंसनीय प्रयास है ये आपका ...आपके मार्फ़त आज एक संवेदनशील युवा चिट्ठाकार से परिचय हो गया ..पहले कभी मैंने उन्हें शायद नहीं पढा ..अब नियमित पढते रहेंगे । आभार परिचय कराने के लिए

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  34. यशवंत जी को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं आगे आने वाले भविष्य के लिए !

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  35. thanks zeal for introducing yashwant.

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  36. आभार इस परिचय का.

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  37. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  38. .
    तुम्हारी भी जै जय
    हमारी भी जय जै
    न तुम हारे न मैं हारा
    .....धन्यवाद स्व. मुकेश

    मैंनें न की थी कभी कोई तकरार
    किसकी जीत और किसकी हार ?
    ....धन्यवाद, आपकी उदारता को

    यह मेरा सैद्धान्तिक मामला है, मैं यानि
    कि तीसरी दुनिया का एक आम आदमी
    इस प्रयोजन में एक अभिजात्य दूरी देखता है
    कँधे पर झोले और भर-चेहरा दाढ़ी की भाषा में
    a bourgeon priviledge to keep away masses
    मेरी क्लीनसेव्ड समझ इसे एक अभिजातिक अछूतवाद मानती है
    बहुत से होंगे नकाबपोश विकृत मानसिकता के गरियाते व्यक्तित्व
    पर वह इसी समाज के अँग हैं, हमारे ब्लॉगवुड के स्लॅम-निवासी
    यदि आप इनसे असहमत हैं, तो भी इन्हें अपनी जगह पड़े रहने दीजिये,
    इनका गला मत घोँटिये, डॉ. दिव्या.. ठग और पिंडारी किस युग में नहीं थे ?
    लगता है, मैं बोझिल होता जा रहा हूँ.. सो,
    कल घर से निकलने से लेकर घर लौटने तक 672 गालियों की आवाज़ मेरे कानों में आयी थीं
    और मैनें भी एक-डेढ़ दर्जन गालियाँ तो निकाली ही होंगी, क्योंकि इन सड़कों पर मुझे भी जीना है

    चील्लर के डरे भगवा कहाँ तक लुकायें ?
    ( यह तिरहुतिया कहावत है, भावार्थ "चीलर लगने के डर से लँगोट छिपा कर रखने का क्या तुक है ?" )
    उधर आस्तीन के साँप और कटही कुतिया से बेख़बर मुन्नी बदनाम हुई जा रही है, है ना दिव्या जी Zmiles :)

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  39. डा० अमर कुमार जी से सहमत हूँ !
    माडरेशन के प्रति यही अवधारणा मेरे मन में भी है ! मैं माडरेशन को उचित नहीं मानता ! गालियाँ और अपशब्द हमारे समाज का अभिन्न अंग हैं ! इनसे हम कैसे और कहाँ तक बच सकते हैं ?
    कहने वालों ने किसको बख्शा है ? कौन सा महापुरुष बच सका है ? क्या हम स्वयं को गांधी और बुद्ध से भी बड़ा मानते हैं जो आलोचना या अपशब्द से इस कदर भयभीत रहें ?

    वैसे भी मुझे काहे का डर ? मैंने खुद कोचिंग लेकर... उस्ताद पालकर गालियों सीखी हैं ! किसी समय मेरे पास 40 गालियों का बेहद उम्दा कलेक्शन हुआ करता था ! अजी था क्या बल्कि अभी भी है, लेकिन अब यहाँ शरीफों के बीच रहने के लिए खुद पे पर्दा डाला हुआ है :)

    हाँ तो बात माडरेशन की ! हमारे क्रिएटिव मंच ब्लॉग पर, जो कि किसी भी तरह की खेमेबाजी अथवा वाद-विवाद से सर्वथा दूर रहता है, कई बार अपशब्द और अश्लील गालियाँ फेकी गयीं ! क्रिएटिव मंच की हर पोस्ट बहुत ही महनत और लगन से तैयार होती है ....तो ऐसे में बुरा तो लगता ही है ! हर एक में सहनशीलता एक जैसी नहीं होती ! साथ के लोग अशांत और निराशा से भर जाते हैं ! इसके बावजूद भी मैंने माडरेशन नहीं लगाया ! बस एक आशंका अवश्य रहती है कि कोई मेरे ब्लॉग के सहारे अन्य किसी ब्लॉगर साथी को अपमानित ना कर दे !

    फिर भी मैं यही कहूँगा कि यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं ! आप अपने ब्लॉग पर माडरेशन का उपयोग अपनी सुविधा, अपनी सहनशीलता एवं अन्य बातों को ध्यान में रखकर करें !

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  40. इश्वर करे हमारे देश में बहुत से सु-संस्कारित और संवेदनशील यशवंत हों।

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  41. यशवंत को शुभकामनायें ...
    आपका आभार ...!

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  42. yashavant ko subhakaamanayen....vah sachmuc anukaraneey hain...aabhaar.

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  43. पढा है यशवंत जी को आज तो आपकी पिछली सभी पोस्ट्ज़ पढ रही हूँ। यशवन्त जी को बधाई।

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  44. यशवंत जी की पोस्‍ट पर टिप्‍पणी की है, आपको सुलभ कराने के लिए यहां भी पेस्‍ट कर रहा हूं- 'दिव्‍या जी के माध्‍यम से यहां तक पहुंचा. आचरण में शील और मर्यादा से भला कौन असहमत होगा. लेकिन यह देश-काल में परिवर्तनशील होता है. परंपरा गतिशील रहकर सहज रहती है, लेकिन उन्‍हें रूढि़ बन कर बोझ नहीं बनना चाहिए. यानि आपकी बातों से काफी हद तक सहमत होते हुए भी कहना चाहूंगा 'दुनिया रंग रंगीली' और कुछ बदरंग भी है, अवांछित और अप्रिय के अस्तित्‍व पर प्रश्‍न करने के बजाय, इनके प्रति अपना व्‍यवहार (treatment) निर्धारित करने की आवश्‍यकता होती है. आशा है यह टिप्‍पणी आपके मानकों के प्रतिकूल नहीं होगी, किंतु आपत्तिजनक लगे तो मुझे अपनी बात वापस लेने (टिप्‍पणी हटा देने) में अफसोस भी नहीं होगा.'

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