Wednesday, October 13, 2010

क्या प्यार की भी मर्यादाएँ होती हैं ?

अक्सर देखा है , हर कोई प्यार पाना चाहता है , लेकिन अगर कोई प्यार देना चाहे तो ? प्यार देकर भी तो प्यार महसूस किया जा सकता है लेकिन जब कोई निस्वार्थ भाव से , बिना किसी अपेक्षा के , किसी को प्यार करना चाहता है तो वो उसे उसकी मर्यादाओं का बोध कराकर उसके आत्मविश्वास को ही तोड़ देता है। क्या प्रेम करने के लिए भी , मर्यादाओं का बंधन होता है ?

बिना अपेक्षा या बिना किसी शर्त के , तभी किसी को प्यार किया जा सकता है , जब हम ये स्वीकार कर लेते हैं की हम सिर्फ प्यार करना चाहते हैं, खुद से भी , और दूसरों से भी । प्यार करना एक सुखद अनुभूति है । क्या इसके मध्य भी मर्यादाओं का होना आवश्यक है ?

छोटे , मासूम बच्चे , बिना किसी अपेक्षा के सदैव निश्छल प्रेम करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वो बड़े होते जाते हैं , उनका प्यार सिमटता जाता है । विवाहोपरांत तो लोग किसी को प्यार करना जुर्म समझने लगते हैं। उनका भावुक मन किसी अनजानी आशंका से भय ग्रस्त रहने लगता है। वो इसी उधेड़बुन में रहते हैं की क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं। क्या उनके मन के अंतस्थल में प्यार पाने की एक तृष्णा सांस नहीं ले रही होती , जिसे वे समझते हैं की वो कहीं खो गयी है ?

आज मन में बस यूँ ही एक प्रश्न आया की क्या प्यार की मर्यादाएं होती हैं ? क्या प्यार की भी उम्र अथवा अवस्था होती है । क्या मन में किसी के लिए प्यार का ख़याल आना भी गुनाह है ? क्या अपने प्यार की अभिव्यक्ति करना मर्यादा के विपरीत है।

मर्यादाएं सुनिश्चित कैसे होती हैं ?

123 comments:

  1. सही कहा कि प्यार निश्छल होता है किसी से भी, कभी भी किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन लेकिन रिश्तों की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए किसी के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की भी मर्यादा तो होनी ही चाहिए.

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  2. Our own true nature is Love. Love cannot be different in whatever form or shape it is described or used. Respecting Love means respecting our own true self. If one has no respect for our own true self then other forms of respect or "love" for everything else is fake. The true self lives forever, therefore love lives forever.

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  3. mujhe jaise bachhe keliye bahut bada prashn...soch me pad gaya ,....agar ye soch koi nishkarsh degi to aap ko bhi avgat karaunga..:)

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  4. Quote:
    मर्यादाएं सुनिश्चित कैसे होती हैं
    Unquote:

    यह समाज, आयु, समुदाय और परिस्थिति वगैरह पर निर्भर है।

    प्यार करना अच्छा है पर जिससे हम प्यार कर रहे हैं वह हमें यदि प्यार नहीं करता या हमारा प्यार उसे स्वीकार नहीं है तो जबरदस्ती अपना प्यार उनपर थोंपना उचित नहीं। दूर से उन्हें प्यार करो। मन ही मन उनसे प्यार करो पर न्यूसेन्स मत मनो।

    प्रेमी का यह मानना कि हम तो प्यार करके ही रहेंगे, चाहे वो हम से प्यार करें या न करें, उचित नहीं। यह स्वार्थता है, बेवकूफ़ी है।
    प्यार केवल वयस्क पुरुष/महिला के बीच नहीं होता।
    कई प्रकार के प्यार होते हैं। (अनुराग, वात्सत्ल्य, स्नेह इत्यादि)
    हम इतने सारे प्यारे प्यारे बच्चे देखते हैं। मन करता है कि उन्हें गोद में लेकर पुचकारूं। पर अपने आप पर नियंत्रण कर लेता हूँ। जब तक बहुत ही करीब का रिशता नहीं होता, हम औरों के बच्चों को दूर से और मन से प्यार करते हैं और आशीरवाद देते हैं।

    जवानी में हमें बहुत सी लडकियाँ अच्छी लगीं। किसी से भी प्यार और विवाह हो सकता था। पर जब से मेरा विवाह हो गया हम महिलाओं का सम्मान, करते हैं , उनके शुभचिंतक बन जाते हैं, एक भाई, या पुत्र, या पिता का प्यार देते हैं। एक प्रेमी का प्यार हम कभी नहीं देंगे और ऐसा प्यार को हम अनुचित मानते हैं।

    डर फ़िल्म याद आ रही है। जूही चावला से शाह रुख खान का प्यार याद है? क्या वह उचित था?
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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  5. प्यार अगर बच्चे के प्यार की तरह निर्मल है तो उसे किसी मर्यादा की आवश्यकता नहीं है. जब प्यार में किसी तरह का स्वार्थ , आकांक्षा या विकार आ जाता है और वह अपनी निश्छलता खो देता है तो अवश्य ही उसके लिए कुछ मर्यादाओं और सीमाओं की आवश्यकता हो जाती है. निस्वार्थ, निश्छल प्यार के लिए न किसी मर्यादाओं और न किसी उम्र का बंधन है.
    बहुत सुन्दर पोस्ट ...आभार..

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  6. Maryada insaan hone ki majboori hai... aur achhe insaan bane rehne ke liye maryaadon kaa palan karnaa padta hai......nahi to sara saamajik dhanchaa gir kar choor ho jayega .. bachhe bhi maa pitaa ko khojte firenge...yaa kahi alag pal rahe honge...

    laikin nischhal pyaar ko kyoo bandhan me bandhaa jaye .. sirf yahi ho sakta hai uttar..

    ab dekhiye naa kisi ke ghar kaa puppy agar aane jaane vale ki god me kood ke baithe to usey saraha jata hai Pyar milta hai ... Laikin vahi agar ghar ke sadsya is tarah se marvaadao ko tod kar aane jane vale ke saath ho le to kya hogaa... Laikin man to khuli havaa me udne ko karta hai .. pinjra kis ko pasand... :))
    ye baat to sach hai ki pyaar nischhal hota hai par fir vahi INSAAN ..

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  7. Pyar ya Love ek sahj anubhooti hai jise aap pyar karate hain aap kabhee bhee uska bura nahee chahte chah sakate bhee nahee to aisee maryadaen hamaree swayam kee ho samaj kee nahee. Pyar sahj ho to achcha jonoon na ho.

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  8. well written and asked Mam... but I think its totally based on the people who are in love... and kash pyaar ki simayen hoti, bandhan hote jinhe ye man jaanta aur maanta to honor killing ke cases aaj hame sunne ko na milte...

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  9. प्रेम न पाया जा सकता है न दिया जा सकता है,
    प्रेम शायद हुआ जाता है, It's a state of being.

    प्रेम गली अति सांकरी जा में दो न समायें!!

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  10. प्यार की वाह्य मर्यादायें व आन्तरिक गहराईयाँ होती हैं।

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  11. ये पोस्ट भी बहुत अच्छी लगी . वैसे भी मुझे
    प्यार के विषय में लिखना -पढ़ना बहुत अच्छा लगता है.
    बहुत अच्छा लिखा है आपने ..........

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  12. दिव्या जी
    नमस्कार !

    क्या प्यार की मर्यादाएं होती हैं ? जितना आसान प्रश्न है , उतना ही कठिन ।
    क्योंकि प्यार की मर्यादाएं होती हैं यह हम अच्छी तरह जानते हैं , लेकिन जानते हुए भी अनजान रहना चाहते हैं। विवाहेतर प्रेम संबंध कितने सही हैं , कौन नहीं जानता ? …लेकिन अवसर कौन चूकना चाहता है ?
    प्रेम जिसे आप-हम कहते हैं , उसकी मंज़िल क्या है … बच्चा भी जानता है … :)
    देखिए , हम कवि - शायर लोग तो अपनी रचनाओं में ही वह सब पाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं , जिसे सहजता से वास्तव में पा भी सकते है । मर्यादाओं का निर्वहन भी हो जाए , कुछ मन की भी तृप्ति हो जाए ।
    लेकिन ईमानदारी की बात यह है कि अवसर शत प्रतिशत हो तो स्वय को मर्यादित रखना बहुत बड़े योगी के लिए ही संभव हो शायद …
    क्या प्यार की भी उम्र अथवा अवस्था होती है ?
    क्या मन में किसी के लिए प्यार का ख़याल आना भी गुनाह है ?
    क्या अपने प्यार की अभिव्यक्ति करना मर्यादा के विपरीत है ?

    बड़े मा'सूम सवाल हैं , जिन्हें कोई भी आश्रय देना नहीं चाहता । सब अगले घर की ओर इशारा करते हैं ।

    मेरी आज की पोस्ट की काव्य रचना भी आपके विषय ही से संबद्ध है कुछ कुछ , आइएगा …

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  13. प्यार तो मर्यादाओं से ही श्रंगारित होता है।

    हमेशा विपरित लिंग शारीरिक प्यार को लोग निश्छल प्यार अनुराग, वात्सत्ल्य, स्नेह आदि से जोड कर महिमामंडित क्यों करना चाह्ते है?

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  14. बहुत कठिन प्रश्न है दिव्या। अभी 2-3 दिन बाद बाहर से लौटी हूँ कुछ परेशानिओं के साथ इस लिये आज कुछ नही कह पाऊँगी। शुभकामनायें\ लेकिन तुम्हारा ही जावब जानने की उत्सुकता रहेगी।

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  15. जब प्यार होता है तो कुछ भी याद नहीं रहता..
    न मर न यादा।

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  16. इस आलेख में उठाए गए सारे प्रश्नों के उत्तरों को आज से 600 साल पहले संत कबीर ने एक दोहे में बखूबी दे दिया है-

    पीया चाहे प्रेम रस, राखा चाहे मान।
    दोय खंग इक म्यान में, देखा सुना न कान।।

    अब इसके बाद मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं।

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  17. प्यार को हम समर्पण कह सकते है .बहुत उच्च कोटि क़ा लेख
    बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  18. प्रेम को अगर हम ढाई आखर के परिप्रेक्ष्य में देखे तो ये एक अनुभूति है . दो दिलो के मेल मिलाप के लिए . जहा तक बात है प्रेम कि मर्यादा या सीमा कि , मै इस बात का पक्षधर हूँ कि उन्मुक्त प्रेम समाज के ताने बाने (भारतीय परिप्रेक्ष्य) के खिलाफ है और कुछ मर्यादाओ का पालन जरुरी है . विज्ञ जनो ने बहुत कुछ लिख दिया है ,, जहा तक बात है विवाहेतर संबंधो कि , कम से कम मै तो इसके पक्ष में नहीं सोच सकता . हो सकता है ये दिल कि लम्बी उडान पर प्रतिबन्ध जैसा हो लेकिन सामजिक शुचिता पर प्रतिघात होगा .

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  19. प्रेम एक प्रवाह है जहाँ शक्तिशाली होता है वहाँ रास्ता बना लेता है. साधु-महात्मा तक प्रेम ढूँढते फिरते हैं. विवाहेतर संबंधों के बारे में जो आशीष ने कहा है, उसे सम्मान देते हुए कहना चाहता हूँ कि ये 35-65 वर्ष की आयु के बीच विवाहेतर संबंध पनपते हैं और और उनमें से कई लंबे समय तक मधुर प्रेम की ऊर्जा बने रहते हैं. कइयों की परिणती अच्छी नहीं होती यह सच है. उसके विविध कारण हो सकते हैं. मर्यादा एक वैयक्तिक चीज़ है. इसका सामान्यीकरण नहीं हो सकता.

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  20. हमने देखी है इन आँखों की महँकती ख़ुशबू,
    हाथ से छूके इन्हें रिश्तों का इल्ज़ाम न दो,
    सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो,
    प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो!
    और मेरे विचार से ख़ुशबू और एहसास की कोई सीमा नहीं होती!

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  21. भूषण जी ने जीवन का एक ऐसा सच सामने रखा है जिससे बहुत कम लोग सहमत होंगे,पर मैं हूं। मैं उनकी इस बात से भी सहमत हूं कि मर्यादा एक वैयक्तिक चीज है।
    वैसे प्रेम पर किसी का वश नही होता है।

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  22. हमसे ना पूछ मोहब्बत के मायने ए दोस्त
    हमने बरसो एक बन्दे को ख़ुदा माना है

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  23. बढ़िया लिखा है .....
    यहाँ भी आये , आपकी चर्चा है यहाँ
    http://malaysiaandindia.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html

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  24. 3.5/10

    मैच्योर पोस्ट नहीं है
    अधूरापन

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  25. Dearest ZEAL:

    Conveyance of love is always unbridled. Prima facie, we may try and contain the overt expression but there are myriad ways for love to be felt by the one who is loved without the spoken words thereto.

    Aql ke madrase se uth
    Ishq ke maiqade mein aa
    Jaam-e-fanaa-o-bekhudi
    Ab to piyaa, jo ho so ho

    Arise from the seminaries of intellect
    Come [hither] to the taverns of love
    Goblet of annihilation and self-detachment
    [I have] now consumed, what is to be, be it so

    Rational thought of observing the circumstantial limitations that we are beset with has no room when it comes to expressing what the heart feels. And because what we express is audacious, there is always the element of ridicule

    Mujh se mariz ko tabib
    Haath tu apnaa mat lagaa
    Isko Khudaa pe chhod de
    Bahr-e-Khudaa, jo ho so ho

    From a patient like me, O Doctor
    Keep your [healing] touch away
    Leave him to the God that be
    God’s mercy, what is to be, be it so

    When there is love in the heart, the words of healers/advisors cautioning against the expression of love are not welcome. They are consigned to farness for they present what the heart agrees not to.

    Bondages which impede our stating the thoughts of the heart are also at times our internal consternations, our inherent apprehensiveness. When we overcome this debate within us, the voice that emanates is loud and clear. It is a voice which wordlessly travels on to convey what the heart holds for the other person.

    There are no boundaries to the expression of love.

    Amor Vincit Omnia.


    Arth Desai

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  26. .

    आदरणीय निर्मला जी,

    सोचा था इस पोस्ट पर अपने विचार नहीं रखूंगी , क्यूंकि मुझे नहीं लगता था की मेरे विचार किसी से मेल खायेंगे या स्वीकार्य होंगे। शायद लोग मुझे सिरफिरी या फिर अमर्यादित समझ लें क्यूंकि जो लोग मर्यादा की बातें करते हैं वो प्यार को तो कभी नहीं समझ सकेंगे।

    लेकिन बहुत से लोगों की टिप्पणियां पढ़कर ये महसूस हो रहा है , कुछ लोगों के विचार मुझसे मिलते हैं। लोग प्रेम के उस विशाल स्वरुप को भी समझते हैं जिन्हें मर्यादाएं और सीमाएं नहीं बाँध सकतीं।

    प्रेम मन का विषय है। आत्मा इसे समझती और महसूस करती है । और आत्मा किसी बंधन में नहीं रहती । वह स्वेच्छा से किसी का भी वरण करती है और उससे प्रेम करती है। आत्मा अपेक्षा नहीं करती । आत्मा का किसी शारीरिक प्रेम से कोई सरोकार नहीं होता ।

    जब मन को कोई वस्तु या व्यक्ति मोहित करता है तो वही प्रेम है । ये दीर्घ या अल्पकालिक दोनों हो सकता है। ये जन्म-जन्मान्तर के लिए भी हो सकता है। हर वो बात या व्यक्ति जो मन को लुभाए वही प्रेम है। उस क्षण आत्मा का उससे संयोग होता है और वही प्रेम है।

    Continued...

    .

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  27. .

    क्या मन में विचार आना भी मर्यादा के विपरीत है ?

    मन में विचार आते ही हैं । जो इन्हें स्वीकार न करे वो खुद के साथ नाइंसाफी कर रहा है । प्रेम से रहित होकर जीवन यापन करना ज़रूर मनुष्य प्रकृति के विपरीत है। शायद ही कोई विरला होगा जिसके ह्रदय में कभी किसी के लिए प्रेम ही न जगा हो ।

    क्या मन में आये विचार को अभिव्यक्त करना चाहिए ?

    ज़रूर अभिव्यक्त करना चाहिए। यदि हम किसी के लिए अपने मन में आने वाले सुन्दर विचार को , जिसपर उसका भी हक़ बनता है , से न कहकर , उसके साथ अन्याय करेंगे। और ये हमारा स्वार्थ कहलायेगा । क्यूंकि उसके स्मरण मात्र से हम अपने ह्रदय- पुष्प को तो खिला लेते हैं, लेकिन उसे इससे महरूम रखते हैं।

    क्या विवाह के बाद ह्रदय में किसी के प्रति प्रेम का विचार आना अनैतिक है ?

    विचार तो खुद-बखुद आते हैं। पकड़कर तो लाये नहीं जाते। यदि आत्मा किसी पर रीझ जाती है , तो ये अनैतिक कैसे हुआ । विवाह एक सामाजिक बंधन है , जबकि प्रेम आत्माओं का बंधन है। सामाजिकता को नैतिकता और मर्यादा से जोड़ा जा सकता है , लेकिन प्रेम को नहीं।

    अंत में यही कहूँगी , कुछ प्रेमी जीव होते हैं , वो प्रेम ही करते हैं। प्रेम में न तो उम्र का बंधन होता है , न ही किसी सामाजिक रिवाज का । आत्माओं का व्यापार तो बहुत उच्च स्तर , पर होता है। प्रेम को मर्यादित नहीं किया जा सकता।

    मर्यादाएं छोटे नादान बच्चों के लिए होती हैं , जो ठीक से प्रेम का अर्थ भी नहीं जानते , और अनेक-नेक भूल करते रहते हैं।

    एक व्यस्क नानुश्य ही प्रेम को सही अर्थों में समझ सकता है। आधी उम्र तो ढाई आखर पढने में ही निकल जाती है , इसलिए प्रेम उम्र के दुसरे पड़ाव में ही होता है।

    प्रेम बच्चों का विषय ही नहीं।

    ..

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  28. नफ़रत की तो गिन लेते हैं, रुपया आना पाई लोग,
    ढ़ाई आखर कहने वाले, मिले न हमको ढ़ाई लोग।


    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    आंच-39 (समीक्षा) पर
    श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता
    क्या जग का उद्धार न होगा!, मनोज कुमार, “मनोज” पर!

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  29. जितना आसान प्रश्न है , उतना ही कठिन ।
    भूषण जी की टिप्पणी से सहमत हूँ

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  30. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

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  31. प्रवीण पाण्डेय जी से सहमत ...!
    बहुत उलझा सा सवाल है ..जवाब दे दिया तो और उलझ जाये कहीं ...
    http://vanigyan.blogspot.com/2009/08/blog-post_07.html...शायद यहाँ हो जवाब ..!

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  32. .........क्या प्रेम करने के लिए भी मर्यादाओं का बंधन होता है ?
    जी हाँ ! देश ,काल और परिस्तिथियों के अनुसार ही प्यार की सीमा तय की जानी चाहिए, कोई भी चीज मर्यादा के दायरे में रह कर ही शोभा देती है , चाहे वह प्यार ही क्यों न हो
    क्योंकि.-
    प्यार से भी जरुरी बहुत काम हैं ,
    प्यार सब कुछ नहीं जिन्दगी के लिए.........
    एक चिंतनीय पोस्ट हेतु आभार .

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  33. प्रेम बच्चों का भी विषय है...

    :)

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  34. कल और आज के प्यार का फ़र्क ,
    मेरा दोस्त कुछ यूं बतलाया करता था,
    आजकल "करतें" हैं सब प्यार ,
    पहले प्यार "हो जाया " करता था ॥

    देखिए कितनी सच्ची बात कही न उसने ..
    दिव्या जी सच कहूं तो मैं भी इत्तेफ़ाकन आपके विचारों से सहमति रखता हूं ...मगर साथ ही ये बात भी जरूर जोडना चाहता हूं कि समाज की कुछ मर्यादाएं हैं जो प्यार और नफ़रत ..दोनों के लिए लागू हैं ...पोस्ट उत्प्रेरक है ..हमेशा की तरह ..सच कहूं तो आपका ब्लॉग लेखन का स्टाईल ..पसंद आ रहा है ..लिख दिया । और पढने वाला अब रोक सके तो रोक ले खुद को टीपने से ...और बहस में कूद पडने से ..जारी रखिए

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  35. 40 basant nikal liye abtak aisa feel nahi kiye.

    bakiya ajay bhaijee ke dost ka quote mujhe sahi
    laga so cut-pest se chep diya.

    कल और आज के प्यार का फ़र्क ,
    मेरा दोस्त कुछ यूं बतलाया करता था,
    आजकल "करतें" हैं सब प्यार ,
    पहले प्यार "हो जाया " करता था ॥

    pranam.

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  36. सुज्ञ जी से पूर्णतया सहमत
    प्रेम तो स्वयं ही मर्यादित है .
    मोह और प्रेम में फर्क है. दोनों में ही हम अपना सर्वत्र निछावर कर सकते है पर मोह भंग भी हो जाता है और प्रेम कभी नही मरता .
    हमें पहले ये जान लेना चाहिए ही वह प्रेम है अथवा मोह है या जिद्द

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  37. .

    @--प्यार तो मर्यादाओं से ही श्रंगारित होता है।

    सुज्ञ जी ,

    प्रेम तो स्वयं ही श्रृंगार है। उसे मर्यादित करके उसका सौन्दर्य कम क्यूँ करें ?

    .

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  38. @- abhishek-

    Ref--वाह्य प्रकति द्वारा प्रेषित विछोभ (तरंग ) हमारी अन्तः प्रकति से संयोग कर के विचार उत्पन्न करती है .अतः
    मनुष्य प्रकति के द्वारा संचालित है ....

    ------

    मन में प्रेम का उत्पन्न होना अथवा विचार आना , प्रकृति से ही प्रेरित है। क्या मानवीय प्रकृति की भी मर्यादाएं हो सकती हैं ?

    प्रकृति पे बंधन ?----अनुचित कम असंभव ज्यादा लगता है।

    .

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  39. .

    राजेंद्र जी,

    प्रेम का वास्तविक स्वरुप तो आपकी रचनाओं में भरपूर देखने को मिलता है। प्रेम को इतनी गहनता से समझने वाले विरले ही होते हैं।

    आपकी रचना - "प्रेम के गीत मैं अविराम लिखूंगा " के लिए आपको नमन ।

    .

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  40. @प्रेम तो स्वयं ही श्रृंगार है। उसे मर्यादित करके उसका सौन्दर्य कम क्यूँ करें ?

    दिव्या जी,
    प्रेम तो स्वयं ही श्रृंगार है। इसलिये कि वह हमारी भावनाओं का श्रृंगार है।
    लेकिन प्रेम का श्रृंगार क्या?, अनावृत (उच्छंखल)प्रेम अनुशासन हीन बन कठीनाईयों का सर्जक बन जाता है।
    जी विश्वनाथ जी ने डर फ़िल्म का उदाहरण दिया ही है।
    मर्यादाएं प्रेम को भोग्य बना देती है,स्वीकार्य बना देती है। भोजन तो हम जैसे तैसे कर ही लेते है पर डिश जब सज कर आती है खाने का नज़ा दुगुना हो जाता। मसाले जब प्रमाण में डले होते है, खाना स्वादिष्ट होता है।
    बस उसी तरह मर्यादाएं प्रेम की शृंगार है।

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  41. मेरा भी मानना है की प्रेम की कोई सीमा नहीं होती, बंधन नहीं होता और इसमें मर्यादा जैसी कोई बात होती ही नहीं है, वहीँ अमर्यादित जैसी स्थिति भी प्रेम में पैदा नहीं हो सकती है.

    लेकिन यह जान लेना भी आवश्यक है, कि जिसे लोग प्रेम समझते हैं, वह प्रेम नहीं अपितु आकर्षण भर है. प्रेम तो कुछ और ही शय है. प्रेम करते तो सभी है लेकिन इसे जानना हर इक के बस की बात कहाँ है?

    प्रेम रस.कॉम

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  42. आत्मिक प्रेम मे किसी मर्यादा की जरूरत नही होती क्योंकि वो निस्वार्थ होता है मगर आज आत्मिक प्रेम देखने को मिलता ही नही और जहाँ तक आजकल के प्रेम की बात है तो उसमे तो मर्यादा ही वो कडी होती है जिसकी वजह से घर बसे हुय ेहैं वर्ना कबके काफ़ी घर तबाह हो गये होते………………प्रेम एक अनुभूति है जिसके लिये कोई बंधन नही मगर उसमे भी किसी से कोई अपेक्षा ना हो कि अगर मै चाहता या चाहती हूँ तो दूसरा भी मुझे चाहे जब ऐसा भाव ना हो तब वो प्रेम सात्विक बन जाता है और अपनी गरिमा को छू लेता है मगर आज उसके दर्शन दुर्लभ हैं। जब तक प्रेम के असली अर्थ को नही समझेंगे तब तक प्रेम सिर्फ़ एक लफ़्ज़ बन कर रह जाता है।

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  43. सुज्ञ जी,

    जो उच्छंखल है , वो प्रेम कहाँ ? प्रेम तो गंभीर होता है। प्रेम तो दुसरे का सम्मान करता है। ह्रदय में चुप चाप ही पलता है। किसी को खबर भी नहीं होती , फिर किस बात को मर्यादित किया जाए प्रेम में ?

    क्या मन में उपजने वाले प्रेम को पनपने से पहले सुखा दिया जाए ?

    क्या है जो मर्यादित किया जाए ? कृपया स्पष्ट करें।

    प्रेम तो एहसास है, मर्यादित कैसे हो सकता है ?

    हर तरफ शांति और प्रेम की अपील करता समाज , प्रेम को मर्यादित क्यूँ करना चाहता है ?

    नोट- कृपया कम-उम्र , नादान एवं अपरिपक्व नवयुवक और नवयुवतियों के परस्पर आकर्षण से इस प्रेम की तुलना न की जाए। यह सर्वथा अलग है।

    .

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  44. .

    वंदना जी,

    आपने सही कहा, आत्मिक प्रेम ही सात्विक प्रेम है। और ये इतना गरिमामय है की इसमें मर्यादा की आवश्यकता ही नहीं है। प्रेम तो स्वयं में ही एक मर्यादित भावना है ।

    मर्यादित तो द्वेष को करना है।

    मर्यादित तो स्वयं को करना है । एक अनुशासित व्यक्ति तो हर क्षेत्र में गरिमा और मर्यादाओं का पालन करेगा।

    इसलिए मर्यादित तो उचश्रंखल बच्चों को करना है....फिर उनका प्रेम स्वयं ही मर्यादित होगा।

    .

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  45. love ? ?
    no comments... sorry....

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  46. @ प्रेम तो एहसास है, मर्यादित कैसे हो सकता है ?

    आपने जो बात कही है, गुलज़ार साहब के शब्दों में कहें तो

    प्यार अहसास है
    प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं
    एक ख़ामोशी है, सुनती है, कहा करती है।
    न यह बुझती है, न रुकती है, न ठहरी है कहीं
    नूर की बूंद है, सदियों से बहा करती है।

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  47. .

    मनोज जी ,

    वाह क्या बात कही !

    गुलज़ार जी के आगे दिव्या का प्रेमी ह्रदय नत मस्तक है । इससे बेहतर तो कोई परिभाषा हो ही नहीं सकती।

    प्रेम तो सिर्फ प्रेमी-जन ही जानते हैं। विद्वान् तो सिर्फ समीक्षा कर सकते हैं।

    प्रेम ह्रदय का श्रृंगार है । दिमागी कसरत इसके सौन्दर्य को मलिन करती है।

    आभार।

    .

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  48. आपके इस पोस्ट पर एक गीत याद आ गया..
    १९६९ की ख़ामोशी फिल्म का गुलज़ार का लिखा हुआ और लता जी ने गाया है इसे....

    हमने देखी है उन आखों की महकती खुशबू, हाथ से छूकर इसे रिश्तों का इलज़ाम ना दो.

    सिर्फ एहसास है ये, रूह से महसूस करो प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो,,..

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  49. दिव्या जी,

    कुछ तो रहम करो:) आप तो प्रेम की आचार संहिता मुझसे बनवाना चाह्ती है।:)) फ़िर मुझे प्रेम का पहरेदार कहेंगी।(निर्मल हास्य)

    @"जो उच्छंखल है , वो प्रेम कहाँ ?"
    बस दिव्या जी, जो मर्यादित है वह प्रेम है।

    "प्रेम जो गम्भीर है," वह गम्भीरता ही मर्यादा है।
    "प्रेम तो दुसरे का सम्मान करता है।" यही तो मर्यादा नियम है।
    "ह्रदय में चुप चाप ही पलता है। किसी को खबर भी नहीं होती,"। चुप चाप रहना उसकी मर्यादा है।

    @"क्या मन में उपजने वाले प्रेम को पनपने से पहले सुखा दिया जाए ? "
    पानी फ़ैलने की गुंजाईश वाला तालाब सूख जाता है, वहीं पाल (मर्यादा)द्वारा बांधा हुआ तालाब पानी से सराबोर रहता है।

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  50. arre waah manoj ji ne bhi usi geet ka jikr kiya....

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  51. .

    शेखर जी ,

    A comment after 'no comments "...??

    Thanks and

    .

    ReplyDelete
  52. @ मनोज जी..

    आपके और मेरे ख्याल कुछ ज्यादा ही मिलते हैं...
    हा हा हा...

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  53. actually love is undefined...those who fell in love, only they know..
    no definitions..... no boundary....
    soon u will find this topic on my blog.... i was very much surprised to see this topic here..i am reading this post and comments since yesterday ...

    ReplyDelete
  54. http://i555.blogspot.com/2010/03/love-or-infatuation.html
    i've posted this a long time ago...u should read this, and watch d video too...

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  55. .

    @--फ़िर मुझे प्रेम का पहरेदार कहेंगी..

    सुज्ञ जी,

    अपने निर्मल मन के सात्विक प्रेम से पहरा हटाइए। उन्मुक्त बहने दीजिये इस अविरल सरिता को । परस्पर संवाद भी तो इसप्रेम का अभिन्न अंग है , फिर चाहे वो शब्दों में हो अथवा कल्पना में।

    मनुष्य में भांति-भांति की भ्रांतियों के चलते ही तो लोग प्रेम करने से बचते और सहमते हैं। इतने ज्यादा पहरे हैं की प्रेम का लोप सा हो चला है।

    भावनाओं के सूखे पड़े ह्रदय में प्रेम की वृष्टि ही समय की मांग है। सच्चे प्रेम को क्यूँ न हम सही अर्थों में ग्रहण करें।

    आजकल नक्सलवाद और आतंकवाद भी प्रेम पर पहरे होने के कारण ही पनप रहा है।

    ये प्रेम ही हल है समस्त जड़ और चेतन में नयी उर्जा के संचार होने का।

    .

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  56. @नोट- कृपया कम-उम्र , नादान एवं अपरिपक्व नवयुवक और नवयुवतियों के परस्पर आकर्षण से इस प्रेम की तुलना न की जाए। यह सर्वथा अलग है।

    सही बात है।

    नोट- मर्यादा शब्द को भी पहरेदारी या बंदिश न समझा जाय।

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  57. @अपने निर्मल मन के सात्विक प्रेम से पहरा हटाइए। उन्मुक्त बहने दीजिये इस अविरल सरिता को । परस्पर संवाद भी तो इसप्रेम का अभिन्न अंग है , फिर चाहे वो शब्दों में हो अथवा कल्पना में।

    - मन को निर्मल रखना एक प्रक्रिया है दूषणों के खिलाफ़ बांध (मर्यादा)बनाना।
    - प्रेम को सात्विक बनाये रखना मर्यादा नियमन है।
    - सरिता के उन्मुक्त बहने पर भी किनारों की मर्यादा-पाल है।

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  58. काफी चर्चा हो चुकी है ...मैं तो यहाँ इस लिए टिपिया रही हूँ कि उपस्थिति दर्ज हो सके ...जिससे मेरे ब्लॉग पर भी तुम टिपियाने आओ ...
    सच तो यह है कि प्यार कि क्या और कैसी अनुभूति होती है इससे अनभिग्य हूँ ..बस सामाजिक मर्यादाओं को समझती हूँ ...अत: इस विषय पर यहाँ से ज़रूर ज्ञान मिल रहा है ..शुक्रिया

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  59. .

    संगीता जी ,

    प्रेम के बदले प्रेम तो सुना है, दिया भी है और पाया भी है । लेकिन टिपण्णी के बदले टिपण्णी ? यह तो व्यापार है ।

    लेकिन मेरा प्रेमी ह्रदय आपकी पोस्ट पर जाने से स्वयं को रोक नहीं पाता....

    ठहरिये...आती हूँ आपके ब्लॉग पर...

    .

    ReplyDelete
  60. यादों के सूखे फूल

    आज भी

    महका रहे हैं

    मेरी ज़िंदगी की

    किताब को

    इस महक से

    ज़िंदगी में

    आज भी

    बहार है |


    -------

    संगीता जी ,

    यादों के फूल कभी सूखे नहीं होते। सदा ही हरे-भरे रहते हैं हमारे प्यार करने वाले मन आगन में। वो उनका प्यार ही है जो महका रहा है आपके तन और मन को।

    -----

    संगीता जी , टिपण्णी करके वापस आ रही हूँ... दिल से याद किया कीजिये...बार-बार आती रहूंगी आपके पास यूँ ही खिंचकर।

    .

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  61. Ofcourse LOve is undefined, but still there must be a limit.

    nice logical/analytical article,

    congrate Dr.

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  62. नोट- कृपया कम-उम्र , नादान एवं अपरिपक्व नवयुवक और नवयुवतियों के परस्पर आकर्षण से इस प्रेम की तुलना न की जाए। यह सर्वथा अलग है...

    :(
    :(

    ye hamaare pahale comment kaa hashra hai...?
    :(

    ReplyDelete
  63. दिव्या जी बहुत ही सही चर्चा छेड़ दी है आपने। यहाँ तो मेरे से बहुत बड़े बड़े महारथी पहले ही मैदान मार लिए है। कुछ मै भी कहता हूँ अगर किसी की अच्छा न लगे तो गुस्ताखी माफ़।
    १. प्यार किसी मर्यादा मे बंध कर रह ही नहीं सकता ।
    २. प्यार उम्र की जगह दिल को सुनता है
    ३. मन मे प्यार का ख्याल आना गुनाह नहीं बल्कि अपने प्यार को किसी पर जबरदस्ती थोपना गुनाह हो सकता है।
    ४. मर्यादित होकर अभिव्यक्ति करना उचित है
    ५. मन को मर्यादित करके .

    ReplyDelete
  64. दिव्याजी
    क्या प्यार एक स्त्री या पुरुष में ही हो सकता है
    क्या दो सहेलियों में नहीं ?क्या दो दोस्तों में नहीं ? या रिश्तो में नहीं ?क्या वहां भी मर्यादाये ,अभिव्यक्ति की जरुरत होती है ?
    आपकी पोस्ट में प्यार के बारे में सवाल है मुझे स्पष्ट नहीं हुआ की क्या स्त्री पुरुष या प्रेमी प्रेमिका का प्यार है ?या इसके आलावा भी तो प्यार की अनुभूति है ?जैसे बच्चो से प्यार |अपने बच्चो से तो सभी प्यार करते है लेकिन दूसरा कोई सुन्दर बच्चा कही थोड़ी देर के लिए देखा तो उसे क्या प्यार कहेंगे ?वह तो महज आकर्षण ही होगा |

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  65. This comment has been removed by the author.

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  66. दिव्या जी एक बार फिर आपसे गुजारिश है....

    plz go to your dashboard that is your blogger home page...
    then go to your blog setting... this will be right below of ZEAL blog..
    then go to formatting..
    you will find there time zone..
    please change it to GMT+5:30 that is INDIAN STANDARD TIME....

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  67. एक सवाल है,

    किस उम्र तक आकर्षण होता है और किस उम्र के बाद प्यार...
    और दोनों में ऐसा क्या है जिससे आप दोनों को अलग करेंगे....
    बहुत आसान सवाल है अगर आप जवाब दे सकें....

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  68. अलग अलग तरह के प्यार में अलग अलग तरह की मर्यादाएँ होती हैं ... और होनी भी चाहिएं ...

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  69. .

    शोभना चौरे जी,

    जिस प्रेम की यहाँ चर्चा है , वो स्त्री एवं पुरुष के बीच प्रेम की है। माँ और बच्चे के बीच अथवा भाई और बहन के बीच जो प्रेम होता है , उसपर कोई भी नहीं आएगा मर्यादा का प्रतिबन्ध लगाने।

    साहित्य में जहाँ भी प्रेम की चर्चा है , वो स्त्री और पुरुष के प्रेम की ही चर्चा है।

    बच्चों के प्रति जों प्रेम है वो वात्सल्य है और लोगों को स्वीकार्य है । दो सहेलियों के मध्य प्रेम भी समाज को स्वीकार्य है, इसलिए किसी मर्यादा का प्रश्न ही नहीं उठता ।

    जो जन-सामान्य को स्वीकार्य नहीं , वों है एक स्त्री और पुरुष के बीच परस्पर उत्पन्न होने मनोहारी कोमल भाव । वहां ही हर कोई मर्यादा की बात करता नज़र आएगा।

    जब प्रेम आत्मिक है, सात्विक है, बिना किसी अपेक्षा है, बिना किसी की मान-हानि किये और बिना किसी का अधिकार छीने होता है , तो मर्यादा किस बात की ?

    प्रेम तो ह्रदय में उत्पन्न हुआ और ह्रदय तक ही सिमित है , फिर मर्यादाएं कहाँ पर ?

    ह्रदय में उठने वाले भावों पर मर्यादा का अंकुश कैसे लग सकता है ?

    ..

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  70. प्यार
    सिर्फ शब्द नहीं है ,,
    ये भावना है,,,
    मन में उपजने वाली पावन भावना
    प्यार, भगवान की ओर से मिला हुआ आशीर्वाद है
    किसी के लिए मांगी गयी दुआ , प्यार है...
    मन के किसी कोने से, किसी के लिए उठती हुई
    पुकार,,,याद,,,,आह,,,
    ये सब प्यार ही है
    प्यार... पवित्र है,,, मुक़द्दस है,,,
    प्रार्थना है,,,आशीष है,,वरदान है
    प्यार , हर जीव का अधिकार है
    और
    मर्यादा !
    मर्यादा का... इतना तो अधिकार बनता है
    कि वो हर जीव के कर्तव्य के दायरे में तो आये ही !!

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  71. Love is indeed almost powerful force. It can take us to great heights and leave us light and airy. True love is based on understanding, mutual trust and respect, not simply on emotions. Love is being in balance, that is, in harmony with the self, God and our fellow men. Love is selflessness. Without love , all of life's treasures are locked away from our vision and experiences, for indeed "Love is the key".
    Best Regards,
    Shalabh Gupta
    www.shalabhguptapoems.blogspot.com
    www.shalabhguptaviews.blogspot.com

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  72. .

    शेखर सुमन जी-

    @--किस उम्र तक आकर्षण होता है और किस उम्र के बाद प्यार...
    और दोनों में ऐसा क्या है जिससे आप दोनों को अलग करेंगे....

    -----

    दोनों ही प्रेम है। आकर्षण अल्पकालिक है, और प्यार दीर्घकालिक ।

    " न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन,
    जब प्यार करे कोई , तो देखे केवल मन,
    तुम हार के दिल अपना,
    मेरी जीत अमर कर दो। "

    ------

    I have corrected the time on my blog but I am not sure if it is appearing correctly. kindly confirm. And also please note that the time difference between Thailand and India is one and a half hour. Thailand is ahead of IST.

    Thanks

    .

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  73. "प्यार हर दिल में बसे , अब यही अभिलाषा है
    फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का, प्यार की ही भाषा है "
    ---'दानिश'भारती---

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  75. .

    "प्यार हर दिल में बसे , अब यही अभिलाषा है
    फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का, प्यार की ही भाषा है "

    waah ! Nothing left to say ...

    .

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  76. कल भी पोस्ट पढ़ा आज भी पढ़ लिया दिमाग मथ डाला निकला कुछ नहीं पूरा कन्फ्यूजन फैला है यहाँ पर क्योकि मर्यादा और सीमा तो बाद में आएँगी पहले सब लोग मिल कर ये तय कर ले की प्रेम की क्या परिभाषा है २० लोगों के बीच से प्रेम की १२ परिभाषा निकल कर बाहर आ रही है तो चर्चा किस परिभाषा की हो रही है पता नहीं| दिव्या जी अपने परिभाषा की बात कर रही है और बाकि लोग अपने अपने परिभाषा की तो ही तो इतना बहस हो रहा है | पहले ये तय कर ले की किस प्रेम की किस परिभाषा पर बहस करनी है नतीजा अपने आप निकाल जायेगा | कल फिर आ कर देख जायेंगे की कुछ परिणाम निकला की नहीं | धन्यवाद

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  77. कुछ महीने पहले , एक पत्रिका को पढ़ते हुये एक पंक्ति पर मेरी निगाहें ठहर गयीं थी।
    वह पंक्ति थी --"इश्क, दौलत और जवानी तीनो अंधे होते हैं, इनकी आँखें नहीं होती हैं।"
    उस को पढने के बाद मेरे मन ने कुछ शब्द बुने थे , उन शब्दों को इस कविता के रूप में आपके साथ share करना चाहता हूँ।
    ============================
    इश्क अँधा नहीं, इश्क “मासूम” है ,
    आंखों से देख कर दिल में समाने वाला ,
    एक खूबसूरत सा एहसास है।
    खुशनसीब हैं वो लोग , जिनके पास यह एहसास है।
    इश्क अँधा नहीं , इश्क “खामोश” है ,
    बिना कुछ कहे बहुत कुछ समझने का एहसास है।
    खुशनसीब है वो लोग , जिनके साथ यह एहसास है।
    इश्क अँधा नहीं , इश्क “इंतज़ार” है ,
    किसी नज़र को, आज भी किसी का इंतज़ार है।
    खुशनसीब है वो लोग ,
    जो आज भी करते किसी का इंतज़ार है।
    इश्क अँधा नहीं , इश्क एक “कसम” है,
    खुशनसीब हैं वो लोग, जिनके लिए
    किसी की आँखें आज भी नम हैं ।
    इश्क , “राज” के सपनों में आने वाली
    एक खूबसूरत परी की ,
    प्यारी सी एक "प्रेम कहानी" है।
    खुशनसीब हैं , वो लोग जिनको
    आज भी याद वो कहानी जुबानी है।
    ========================
    फिर भी मुझे यह कहना है कि, "प्यार" को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। "प्यार" एक खूबसूरत अहसास है जिसको सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। यह "अहसास" ही उम्र भर एक दूसरे को "प्यार" के बंधन में बांधे रखता है।
    www.shalabhguptapoems.blogspot.com

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  80. .

    @-खुशनसीब हैं वो लोग, जिनके लिए
    किसी की आँखें आज भी नम हैं ....

    शलभ जी,

    बेहतरीन रचना हम सबके साथ साझा करने के लिए आभार । इसमें तो सब कुछ बखूबी व्यक्त किया है। मैं ये स्वीकार करती हूँ की मैं भी खुशनसीब हूँ।

    .

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  81. प्यार की भी हर जगह अपनी अपनी मर्यादा होती है .... जगह विशेष में इसकी परिभाषा और मर्यादा की सीमाएं अलग अलग हो जाती हैं .

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  82. .

    @--असल में प्रेम वो है जो आपको और दूसरों को सुखी बना सके...
    जीवन में प्रेरणा और उर्जा का संचार कर सके..
    और ऐसे प्रेम को करते हुए किसी से अपनी इस अभिव्यक्ति को बताने या जताने में
    कोई अपराध नहीं है... यदि किसी से प्रेम किया है.. और उसे नहीं बताया है.. तो मेरी समझ से उसके प्रति अपराध ही किया है..

    इश्क मर्ज़ अजीब है काफिर..ये वो बाला है...
    जीने में वो बात कहा जो इश्क में मरने का मज़ा है..
    -------

    काफिर जी--

    आपने इतनी ख़ूबसूरती से मन की बात समझा दी, जिसके लिए मेरे पास शब्द कम पड़ रहे थे।

    .

    ReplyDelete
  83. .

    मेरे पास एक संस्मरण है 'प्यार के सन्दर्भ में:

    मेरे पिता जब छात्र थे, उन्होंने मुझे सुनाया था. संक्षेप में कहता हूँ.
    ___________________
    सन १९५३ में मैनपुरी से ३० किलोमीटर दूर कुसमरा में महाकविदेव के स्मारक का उदघाटन राज्यपाल श्री के. एम्. मुंशी ने किया. उद्घाटन सुबह ११ बजे था और शाम को कवि-सम्मेलन की व्यवस्था थी. निराला जी को के. एम्. मुंशी के द्वारा उदघाटन करना नागँवार गुजरा.

    उन्होंने इसके लिये मुशी को लताड़ा भी जब वे उदघाटन करके उनसे मिलने पहुँचे
    "क्यों मुंशी! तू कब से महाकवी हो गया जो तूने महाकवी देव के स्मारक उदघाटन किया."
    मुंशी — 'निराला जी, यह तो सरकारी व्यवस्था थी' ............
    [ ध्यान रहे मुंशी जी स्वयं एक बड़े साहित्यकार थे, वे राज्यपाल हुए यह अलग बात है. ]
    सभी राष्ट्रीय और स्थानीय कवियों के रुकनेकी व्यवस्था राजा शिव मंगल सिंह के किले में रखी गयी थी. शाम को होने वाले सम्मेलन में उस समय के बड़े-बड़े कवि लोग भाग ले रहे थे. मैथिलीशरण गुप्त, बलबीर सिंह 'रंग'. सियाशरण गुप्त, महादेवी वर्मा आदि.
    बहरहाल, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' सम्मेलन में मैथिलीशरण गुप्त और महादेवी वर्मा जी के काफी मनाने पर भी नहीं पहुँचे. इधर मजबूरन सम्मेलन शुरू करना पड़ा. उधर निराला जहाँ ठहरे थे वहाँ से तांगा करके रेलवे स्टेशन पहुँच गये. ट्रेन के लिये पहले काफी इंतज़ार करना पड़ता था.
    सम्मेलन में इस बात की खबर कवियों को लगी और निर्णय किया गया कि महादेवी ही हैं जो निराला जी को लिवाकर ला सकती हैं.
    तब महादेवी वर्मा जी रेलवे स्टेशन पहुँची और जाते ही उन्होंने कहा
    — "ना इतने दूर ही जाओ कि जीवन भार हो जाए"
    निराला जी ने तुरंत उत्तर दिया
    — "ना इतने पास ही आओ कि दूषित प्यार हो जाए".
    कवि लोग जुगलबंदियों से सहज हो जाया करते हैं.
    तो इस प्रकार कवि निराला सम्मेलन में आये. लेकिन उन्होंने वहाँ कोई कविता नहीं सुनायी. सुनाया तो एक लंबा-चौड़ा इंग्लिश में धाराप्रावाह भाषण.

    ....... इस प्रकरण में महादेवी वर्मा और निराला जी की जुगलबंदी को सुनाने के लिये ही पूरी कथा सुनानी पड़ी. वह भी अधूरी.

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  84. .

    @--"ना इतने पास ही आओ कि दूषित प्यार हो जाए".

    प्रतुल जी,

    नहीं जानती महादेवी जी ने उनको क्या उत्तर दिया , पर निराला जी के वक्तव्य पर सिर्फ एक ही बात ध्यान में आ रही है --

    " जो दूषित हो जाए , वो प्यार नहीं,
    जिसे प्यार भी भार लगे, वो प्यार का हकदार नहीं "

    आभार।

    .

    ReplyDelete
  85. यहाँ दूषित प्यार के होने की संभावना से कवि निराला भी परिचित हैं.
    जबकि महादेवी जी निराला जी को न केवल राखी बाँधती थीं, उनको आर्थिक मदद भी काफी करती थीं. कवि निराला जी के त्याग की कथाएँ काफी प्रचलित हैं. वे बहिन से तो ले लेते थे लेकिन गरीबों को बाँट देते थे. यह कैसा भ्रातृ-धर्म था? यह कैसा प्रेम था भाई और बहिन के बीच? मर्यादा के पुरुष निराला और भौतिक प्रेम को ईश्वरीय प्रेम की छाया से आवेष्टित करने वाली महादेवी ने प्रेम को तो शायद जाना ही नहीं था. जानते हैं तो केवल आज के बुद्धिजीवी ब्लोगर. वाह रे प्रेम के पंडितों! मर्यादाहीन प्रेम तो पशुवत कहलाता है. मर्यादा का क्या स्थान है जीवन में. जिसकी स्थापना के लिये श्रीराम ने हर-संबंध में उसे ही महत्व दिया वही आज उसकी पूजा करते हुए भी मर्यादा को कैसे भुलाए दे रहे हैं? आश्चर्य है मुझे..........

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  86. बहुत बहुत धन्यवाद....
    वही मैं कहना चाहता था, कम उम्र में भी प्यार हो सकता है..लेकिन कोई भी उस प्यार को प्यार का दर्ज़ा नहीं देता...
    उम्मीद है आपने मेरा पोस्ट भी पढ़ा होगा इस सन्दर्भ में ...... प्यार वो है जहाँ हम सिर्फ प्यार देते हैं, पाने की कामना नहीं करते...
    अक्सर लोग ऐसे लोगों को पागल कहते हैं...मेरा निजी अनुभव है....
    आज से १० साल पहले किसी से प्यार हुआ था, आज भी उसी से करता हूँ...भले ही पिछले ४ सालों से उसने मुझसे बात भी नहीं की....उससे कोई गिला नहीं है...

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  87. प्रतुल जी
    अब क्या कहें ? ? चलिए मान लिया प्यार में मर्यादा होनी चाहिए...
    सवाल ये है ये मर्यादा कौन तय करे ?? और क्यूँ हम उस मर्यादा को सही माने.....

    ReplyDelete
  88. .

    भाई प्रतुल ,

    तनिक भी आश्चर्य न कीजिये। बहुतेरे मर्यादाहीन स्त्री-पुरुष मिल जायेंगे आपको इस धरा पर।

    इस पोस्ट को लगाने के बाद , और आपकी टिपण्णी पढने के बाद , अमर्यादित स्त्रियों की श्रेणी में तो मैं अग्रणी हो ही गयी हूँ।

    एक बार आपने अपनी ही पोस्ट पर लिखा था की बौद्धिक चर्चा करने वाली स्त्री , दों रैकटों के मध्य शटल कॉक अथवा फुटबॉल के सदृश होती है। तथा पुरुषों के मनोरंजन का साधन होती है।

    आपसे सहमत न होते हुए भी , भाई का मान रखते हुए , आपके साथ बहस नहीं करुँगी। डरती हूँ आपसे।

    बहिन दिव्या।

    .

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  89. बहुत दिन बाद प्रेम विषय पर इतना सुन्दर पढने को मिला है, आपके विचार अच्छे लगे, प्रेम में भोलापन ज़रूरी है जिसे कि हम बचपन के साथ पीछे छोड़ आये हैं, जैसे जैसे हम बड़े होते हैं प्रेम का अर्थ भूलते जाते हैं, कारण ये है कि बचपन में हम दिल से सोचते थे अब दिमाग से सोचते हैं!

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  90. हम जब अंतर्जाल पर नए नए आये थे तो कहीं किसी साईट पर ग़ज़ल पर बहस हो रही थी...हमें याद है कि बिना ग़ज़ल-शास्त्र को जाने-पढ़े हम उन गुरूजी से उलझ गए थे...उन्हें अपना पिंड छुडाने के लिए हमें बाकायदा कोर्ट में देख लेने की धमकी तक देनी पड़ी ....
    उस साईट के संचालकों का कहना था कि हमारे पैदा होने से पहले वो महाशय ग़ज़ल पर रिशार्च कर रहे हैं..फिर हमारी क्या बिसात है उन से बहस करने की.....
    इस अजीब सी बात का हमारे पास कोई जवाब था भी नहीं...सिर्फ ये कहने के सिवा...

    कि..


    शे'र कहने का, और समझने का
    उम्र से राबिता नहीं होता.....


    एकदम यही बात प्यार पर भी लागू होती है.....
    प्यार किसी भी उम्र में हो सकता है...ठीक वैसे ही..जैसे आकर्षण किसी भी उम्र में.....
    जिसे होता है उसे शायद ...मर्यादा आदि का पता नहीं होता...

    ReplyDelete
  91. PYAR DEKHNA HAI TO GURU NANAK DEV KE PANJ PYARON KA DEKHIYE.AUR DEKHNA HAI TO HAADAA RANI KA PYAR DEKHIYE.KISI ME KOI MARYADA NAHI TOOTEE.

    ReplyDelete
  92. निसंदेह विचार प्रकति द्वारा प्रेषित होते है .और उन पर बन्धन असंभव है .
    परन्तु मनुष्य ही वह अकेला प्राणी है जिस के पास (विवेक शक्ति ) सही और गलत निर्णय करने की छमता है .
    आज अनर्थ का कारण विवेक शक्ति का हास है निःसंदेह आप को किसी पर भी प्यार आ सकता है और उस पर रोक नही लगी जा सकती है पर विवेक तो आप का है फिर आप चाहे उस का उपयोग करे या नही आप की मर्ज़ी .
    लगभग साल भर पहले इमरान नामक महिला का बलात्कार उस के ही ससुर ने किया . उस ने तो विवेक का उपयोग नही किया . पर शरियत आदालत ने कुरान और हदीस की रोशनी में न्याय करते हुए उस बेचारी की शादी उस के ससुर से ही करा दी .
    मैं सिर्फ ये कहना चाहता हू की विचारो पर तो रोक नही है पर उस में से विवेक के द्वारा सही का चयन और गलत को बाहर करना भी आना चाहिए .
    उक्त उद्दहरण विवेकहीनता का है .

    ReplyDelete
  93. .

    अभिषेक जी,

    प्यार का बलात्कार से क्या लेना देना भला ?

    .

    ReplyDelete
  94. pyaar ka ek naya swarup layein abhishek ji....
    achha hai... :)

    ReplyDelete
  95. Yez, Love has no limitations.

    Limitations are for social order. and that order is breached so frequently for the simple reason that it is against basic nature.

    Liked your thoughts and discussion on the subject.

    Thanks.

    ReplyDelete
  96. दिव्या बहुत खुशी हुयी कि मुझे याद करती हो। असल मे मेरी बेटी अमेरिका से आयी है उसे मिलने चंडीगढ गयी थी। आज नेट नही था सुबह से। मुझे तुम से भी बटी की तरह ही लगाव सा हो गया है। आज कल तुम जैसी संस्कारी और लायक बेटियाँ बहुत मुश्किल से मिलती हैं। धन्यवाद । सदा सुखी रहो आशीर्वाद।

    ReplyDelete
  97. यहाँ पर उद्दहरण विवेकहीनता का था . मैं जो कहना चाहता हू उसे सही अर्थो में लिया जाये .मेरी टिप्पड़ी का भाव जानिए .बिना ठीक से उसे समझे उस को प्यार से जोड़ देना तो इस बात का सूचक है की मेरी टिप्पड़ी की आत्मा तक आप पहुचे ही नही .
    विचार पूछ कर नही आते है पर सही का चयन और गलत को बहार निकलना ही तो विवेक है . और आज का समाज कितना विवेकहीन है ये मैंने स्पष्ट करने की कोशिस की थी .
    पर मेरी बात अगर किसी को गलत लगी हो तो छमा चाहूँगा

    ReplyDelete
  98. क्या प्यार की भी मर्यादाएँ होती हैं ????????
    जहाँ पर विवेक है वहा पर हर वस्तु स्वयं ही मर्यादित हो जाती है .
    हिटलर को अपनी भतीजी से प्रेम था .तो क्या उस का प्रेम पवित्र था ?????
    अगर आप कहती है नही तो आप विचारो के प्रवाह पर स्वयं ही अंकुश लगा रही हैं या तो आप बताईये की वो कैसे पवित्र था .अगर वह पवित्र नही तो फिर वो प्रेम नही हो सकता .

    ReplyDelete
  99. .

    अभिषेक जी ,

    घर परिवार के सदस्यों जैसे चाचा -भतीजी के बीच प्रेम एक मानसिक रोग है जिसे - " Incest " कहते हैं।

    कृपया विषयांतर न करें।

    आभार।

    .

    ReplyDelete
  100. मैं विषय नही बदल रहा .मैंने सिर्फ आप से एक प्रश्न पूछा था .
    और आप ने सही जवाब दिया .
    आप का प्रश्न था की
    ''क्या प्यार की भी मर्यादाएँ होती हैं ?''

    मेरे प्रश्न का जवाब ही आप के प्रश्न का जवाब है
    जब प्रेम में मर्यादा नही होती तो वह कुछ और ही (मानसिक रोग ) कहलाता है .
    अर्थात
    प्रेम मर्यादित होता है .
    अगर आप ''मर्यादा'' की जगह ''बन्धन'' शब्द का प्रयोग करती तो यह चर्चा ही दूसरी होती .

    ReplyDelete
  101. दिव्या ,

    मैंने कभी व्यापार नहीं किया ..पर आज कल हर जगह टिप्पणियों की बातों को लोंग उछालते रहते हैं ...चर्चा मंच पर कुछ लिंक मिले थे ..वहीं से एक पोस्ट पढ़ी थी ...और उसके बाद तुम्हारी पोस्ट ...तो उसी पोस्ट का असर था ...वैसे तुम मेरे ब्लॉग पर आयीं ..ज़ाहिर है खुशी हुई ...पर मैंने आज तक कभी भी यह सोच कर किसी को टिप्पणी नहीं दी की यह भी मेरे ब्लॉग पर ज़रूर आये ...बस जो भी मैं पढ़ती हूँ , अच्छा लगता है तो टिप्पणी ज़रूर करती हूँ ...

    वो जो पहले लिखा शायद मेरे मन की व्यथा थी :):)

    वैसे प्यार को समझने वाले कितने हैं ? सब व्यापार ही करते हैं ..

    ReplyDelete
  102. .

    Sorry Madam..
    with reference to your clarification
    "घर परिवार के सदस्यों जैसे चाचा -भतीजी के बीच प्रेम एक मानसिक रोग है"
    Let me make it clear that you appear to be still hanging between Love and Lust, They are the two different poles of such relations, which saddingly exploit each other in weaker human moments, abusing the piety of a candid term, i.e. Love !
    Have I elaborated too much ?
    I felt helpless for lack of words in such a delicate matter.
    I feel sorry for being myself, that is another point in such a helplessness for proper word.

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  103. मन्नैं दिक्खै, घडी इब ठीक चल रैई से !

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  104. प्रेम.. एक अप्रतिम अनुभूति.. एक निज संवेदना..
    प्रेम अपनी मर्यादाएं खुद ही तय करता है.. यह अपने संविधान का रचयिता स्वयं है..
    प्रेम कभी किसी और की सीमओं का उल्लंघन नहीं करता.. और न ही कभी किसी पर कुछ थोपता है.
    यह निस्वार्थ होकर बस देना जानता है.. कभी कोई मांग नहीं करता.. प्रेम में तो देना ही पाने के जैसा है !! और यही इसकी मर्यादा है
    मेरे विचार से प्रेम आत्मिक अनुभूति का विषय है इस कारण इसे समय सीमा में बाधना ग़लत ही है (15 साल से 55 साल तक के लोगों को प्यार में पड़ते देखा है ! ज्योतिषी हूँ अनुभव से कह सकता हूँ प्रेम करने की कोई समय रेखा नहीं होती )
    यदि आप किसी से प्रेम करते है और बिना शर्तो वाला प्रेम ही करते है
    तो ये प्रमाण है की आप में मानवीय संवेदनाएं जीवित है और आप पाषाण- ह्रिदय तो नहीं है
    किसी के लिए भी प्रेम की अनुभूति करना सहज है यह कोई अपराध कैसे हो सकता है ??
    मेरे विचार से आप किसी को प्रेम करते हैं और अभिव्यक्त नहीं करते तो एक प्रकार से आप
    अपराध ही करते है
    प्रेम में अभिव्यक्ति या कहे स्वीकारोक्ति कभी भी किसी मर्यादा का उलंघन नहीं करती...
    यह बस एक सरल सुखद भावाव्यक्ति ही हो सकती है इससे अधिक इसका अर्थ नहीं निकला जाना चाहिए..!!

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  105. अपराध ?
    आतम प्रवन्चना !!!

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  106. .

    काफ़िर जी ,

    आपने प्रेम को बखूबी समझाया है अपनी टिपण्णी में। अक्षरतः मेरे मन की बात लिख दी।

    मुझे आश्चर्य है कुछ लोग बिलकुल सही परिपेक्ष्य में समझ रहे हैं, तो फिर कुछ लोग समझ क्यूँ नहीं पारहे हैं विषय को ?

    मैंने अपनी यथाशक्ति, भरपूर कोशिश की है विषय को स्पष्ट करने की, फिर भी यदि स्पष्ट करने में असमर्थ रही हूँ तो शायद मेरा लेखन त्रुटिपूर्ण है।

    -------------

    डॉ अमर ,

    जिस प्रेम को बार बार मैंने आत्मिक और सात्विक कहा है, जो ह्रदय में ही पलता और पनपता है, वहाँ वासना का क्या कार्य ? शायद आपने प्रेम का कभी अनुभव नहीं किया है, इसलिए आप विषय को सही परिपेक्ष्य में ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं।

    आभार।

    .

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  107. अब क्या कहें । प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो ।

    ReplyDelete
  108. वंदना जी की बता बहोत सही है "आत्मिक प्रेम मे किसी मर्यादा की जरूरत नही होती क्योंकि वो निस्वार्थ होता है मगर आज आत्मिक प्रेम देखने को मिलता ही नही"

    और वैसे दिव्या जी, आपकी बातों से मैं हमेशा सहमत रहता हूँ....अजय भैया ने ठीक कहा....आपका ब्लॉग लेखन का स्टाइल बहुत अच्छा है....

    अब ज्यादा मैं क्या कहूँ...वैसे भी बहोत से लोगों ने कह दिया बहोत कुछ :)

    अंत में बस यही, जो चचा जी ने कहा

    "हमने देखी है इन आँखों की महँकती ख़ुशबू,
    हाथ से छूके इन्हें रिश्तों का इल्ज़ाम न दो,
    सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो,
    प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो!"

    ReplyDelete
  109. ....प्यार एक सुंदर अनुभूति है!...लेकिन इसकी सीमा भी असिम है!...सिर्फ मन की अंधेरी गुफा में इसे कैद करके नही रखना चाहिए!...इसकी अभिव्यक्ति बहुत जरुरी है!...बहुत सुंदर विचारधारा!

    ReplyDelete
  110. .

    किसी के प्यार में हस्ती मिटा देना हंसी है क्या ?
    वही जानेगा जिसने प्यार की गहराइयाँ जी हैं

    .

    ReplyDelete
  111. .

    स्त्रियों को मर्यादा का बोध करने वाले पुरुषों को अक्सर अपने मित्रों के साथ मिलकर मर्यादाओं का चीर हरण करते देखा है।

    .

    ReplyDelete
  112. बहुत कठिन प्रश्न है ...और सभी की कमेंट्स पढकर ..कहीं पर सहज हुआ कहीं पर उलझ गया ..राज जी की रचना भी बहुत सच्ची और अच्छी लगी..मैं खुद को इस लायक नहीं समझती की इस मुश्किल प्रश्न क बारे में कुछ भी कह सकूं ..बस अपने छोटे तजुर्बे से इतना कहना चाहती हूँ. कई चीजे सिमित दायरो में ही जन्म लेती हैं बेहद कोमल बेहद साफ़ लेकिन धीरे धीरे जब बढती हैं तो दायरो से ज्यादा कठोर साबित भी हो जाती है जो मर्यादाओं में रहकर अपनी मर्यादाएं तय कर लेती हैं कठोर इसलिए कहा क्योकि प्यार का एहसास कोमल जरूर होता है मर्यादाएं उसे कठोर भी कर देतीं है.
    लिखते लिखते ख्याल आया ...इंसान कितना कमजोर होता है जरा से दर्द म आंहे भी भरता है चोट लगे तो तकलीफ भी होती है जरा सी खरांच में चींख निकल जाती है लेकिन ये भी आखिर क्या कुछ नहीं सह सकता .एक से एक आपदा जीवन की झेल ही जाता है तब लगता है इससे ज्यादा सायद ही कुछ कठोर हो ...सयद इसी तरह प्यार भी है जो जितना कोमल एहसास है उतना ही मजबूत और दृढ भी /

    ReplyDelete
  113. .

    सुन प्रियतम पदचाप सिहरकर
    कर्णपटों में सन-सन होती थी
    स्वेद बिन्दु झलकते मुख पर
    तीव्र हृदय की धडकन होती थी.

    करतल आवृत्त मुखमन्डल पर
    व्रीडा की अनुपम सुषमा थी.
    लज्जा से थे जो लाल लजा के
    कपोलों की न कोई उपमा थी.

    विद्रुम से कोमल अधरों पर
    मृदु-स्मिति छवि निखरी थी
    प्रिय स्मृति में विहंस-विहंस
    स्वयं सिमट कर सकुची थी.

    .

    ReplyDelete
  114. nirja ji ke shabdon mein prem ki abhivyakti.

    ReplyDelete
  115. .

    nirja ji ke shabdon mein prem ki abhivyakti.
    @ kiske prem kii?

    स्पष्ट नहीं है कवि कौन?
    संज्ञा भी वाक्य में दिखे मौन.

    .

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