Sunday, December 11, 2011

'जान' हुयी सस्ती- ईमान बिक गया

प्रशासन की गैर जिम्मेदारी ने ली एक सैकड़ा से ज्यादा जानें! स्वस्थ होने आये मरीजों को मौत के मुंह में धकेला अस्पताल प्रशासन ने ! इतना बड़ा अस्पताल और आग बुझाने के सही उपाय भी नहीं किये गए ! सारा समय धन बटोरने की कवायद में लगे रहेंगे तो मरीजों की सुरक्षा के बारे में सोचा ही नहीं होगा ! आंधी आये या आग लगे , इनका क्या जाता है, मरने वाले तो इंसान नहीं कीड़े-मकोड़े हैं इनके लिए !ये जिन्दा रहे बस काफी है, बाकि कोई मरे या जिए क्या फरक पड़ता है!

अस्पताल चलायें या किराने की दूकान , सेवा देते समय अपनी जिम्मेदारी का पूरा एहसास होना चाहिए ! हज़ारों लोग आप पर विश्वास कर रहे हैं! उनकी जिम्मेदारी है आप पर! यदि जिम्मेदारी नहीं उठा सकते इमानदारी के साथ तो अपनी दुकानें बंद रखिये !

ढीली-ढाली सरकारें ज़रा कमर कसें तो बेहतर होगा! जांच न बैठाएं और सफाई न दें ! निरंतर संस्थानों की निगरानी रखें ! सुरक्षा व्यवस्था सबसे ज़रूरी है ! अपनी अकर्मण्यता को छुपायें नहीं! प्रदेश सरकार और अस्पताल प्रशासन की जितनी निंदा की जाए, कम होगी!

Zeal

38 comments:

  1. sahi kaha hai aapne yesi nikammi aur laaparvaah sarkar ko hat jaana chahiye.itna bada haadsa yese hi nahi ho jaata.yadi koi uchch mantri us hospital me admit hota tabhi to jaanch bithate.

    ReplyDelete
  2. दुखद घटना किन्तु विचारणीय पोस्ट आख़िर कब तक अनदेखी होती रहेगी सुरक्षा नियमों की ????

    ReplyDelete
  3. बिलकुल सही बात को सामने रखा है आपने।


    सादर

    ReplyDelete
  4. दुखद घटना, मुआवजा देने या संचालकों पर मुकदमा कर देने से क्या होगा ? क्या देश भर के सारे संस्थानों में सब कुच्छ ठीक हो जायेगा, शायद बिलकुल नहीं, क्योंकि जब तक सही समय पर उचित मानदंड स्थापित नहीं किये जायेंगे, साथ में जोडीये ईमानदारी से, तब तक यूं ही मासूम जाने जायेंगी और सब भूल जायेंगे बस पारिवारिक जन उन जख्मों को, व्यवस्था को कोसते रह जायेंगे. क्या ये काम सरकारों का नहीं की नियम बनाये तो कडाई से पालन भी होने चाहिए न की ले दे कर बस सेर्तिफिकाते प्रदान कर जानों को निर्मूल्य गवाने देने देनी चहिये. सड़ी गली व्यवस्था से क्या उम्मीद करे.

    ReplyDelete
  5. अधिकारयों और नेताओं ने अपने हिसाब से चलना और जीना सीख लिया है जिसमें अब और लोगों के बारे में सोचने और कुछ करने की गुंजाईश ही कम बची है ...
    इस देश की छाती पर बैठ कर मूंग दलने वालों ने इस देश और उसकी अवाम को अपने बाप की जागीर समझ रखा है !इन पर तो यही बात फिट होगी-लातो के भूत बातो से नही मानते................

    ReplyDelete
  6. दुखद और अफसोसनाक घटना।

    ReplyDelete
  7. कल 12/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  8. दिव्या जी ,अन्ना जी, फिर गुहार लगा रहें है ,इन्हें जगाने के लिए
    शुभकामनाएँ अन्ना जी के आंदोलन को ......

    ReplyDelete
  9. Hi..

    Saari jaanche tathya aur apni akarmanyta chhupane ke liye hi to ki jaati hain...

    Dukhad ghatna hai yah..aur us se jyada dukhad sarkaar ki udaseenta....

    Deepak Shukla..

    ReplyDelete
  10. It was shocking and painful to read the news!
    How can the authorities be so mean and irresponsible...

    ReplyDelete
  11. Kya kahun kuchh samajh me nahee aa raha...ghatna behad dukhad thee.

    ReplyDelete
  12. यदि कोई पशु, अथवा व्यक्ति, दलदल में गिर जाए तो उसे निकालने के लिए उसके कोई जानकार शुभ चिन्तक सूखी और स्थिर भूमि पर निकट ही होना आवश्यक होता है... नहीं तो यदि उसे बाहर निकालने की जानकारी न हो तो सभी दर्शक मात्र ही रह उसे नीचे खींचे जाता ही देख पायेंगे - जैसी आज की परिस्थिति दिख रही है... जब मध्य पूर्व और यूरोप के कई देश ही नहीं, अमेरिका भी आज आर्थिक मंदी से लाचार दिखाई पड़ रहा है... यह देख संभवतः माना जा सकता है कि हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे, वे गहराई में गए थे और उनका मानना था कि काल के प्रभाव से मानव की क्षमता सत युग से घटते घटते कलियुग के अंतिम चरण घोर कलियुग में निम्नतम रह जाती है,,,, अर्थात, सरल शब्दों में, 'जो- जो जब- जब होना है, सो- सो तब तब होता है',,, क्यूंकि कर्ता मानव नहीं कोई अदृश्य शक्ति है, जिसको जान पाना 'आम आदमी' के, साधारण बुद्धि वाले के, बस में नहीं है...
    किन्तु, ऐसा भी नहीं है कि 'आम आदमी' 'ख़ास' नहीं हो सकता... उसके लिए सबसे पहले छोटी आयु से ही श्रद्धा और धैर्य का पाठ पढ़ाना होगा, न कि 'पैसा-पैसा' का ही रोना और उनको सही राह नहीं बताना उनके गुरु द्वारा...ऐसे व्यक्ति आज संख्या में घट गए हैं - (काल वश "सब चलता है" मान्यता का होना :)..

    ReplyDelete
  13. दुखद घटना.... पर क्या इसके लिए भी हम सरकार को कोसें!!!! उसकी भी सीमाएं हैं।

    ReplyDelete
  14. जैसी राजा वैसी प्रजा जब सरकार भ्रष्टाचारी है तो उसके मुलाज़िमो को दोष देने से क्या फ़ायदा…………किसी पर कोई असर नही होने वाला दो दिन मे सब भूल जायेंगे और फिर वो ही अपनायेंगे रास्ते।

    ReplyDelete
  15. kitni bhi ninda ki jaye asa logo ke kaan par jhu nahi rengati.dukadh gatna.

    ReplyDelete
  16. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 12-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    ReplyDelete
  17. नैतिकता के घोर पतन की ही परिणिति है. लालच, भाई-भतीजावाद-नाकारापन सब कुछ तो शामिल है.

    ReplyDelete
  18. चन्द्र मोलिश्वर जी !!! हाँ ऐसी घटनाओं के लिए विशेष रूप से सरकार ही जिम्मेद्वार है जो बिना किसी मानक के जांच किये ऐसे लोगों को किसी भी चीज का लाइसेंस दे देती है और लाइसेंस किस तरह मिलता है ये आप भी जानते होंगे !!!!!!!

    ReplyDelete
  19. दिव्या जी मैं समय न मिलने और कुछ व्यक्तिगत कारणों से
    बहुत ही कम लिख पा रहा हूँ!
    आप बहुत अच्छा लिखती है, सटीक लेखन और प्रासंगिक विषय के चयन पर आपको बधाई और मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं...
    आप इसी तरह लिखती रहे और अपने लेखन के आलोक से अज्ञानता और संदेहों को दूर करते रहे............

    ReplyDelete
  20. बहुत ही दुखद घटना है यह। सही कहा है आपने, यह दुकानदारी ही हो रही है।

    ReplyDelete
  21. इस दुखद घटना के असली अपराधी वे लोग है जिन्होने सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण करने वाली विद्या को हटाकर स्वार्थी एकांकी मनुष्य बनाने वाली मैकालेवादी शिक्षा प्रणाली को भारत में लागू किया , इस दूषित शिक्षा व्यवस्था से साक्षरता तो बढ़ी , किन्तु संस्कार कम हो गये । परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार , आतंकवाद , भूखमरी , समय - समय पर होते रहने वाले दुखद हादसे आदि हमारे सामने है ।

    ReplyDelete
  22. दुखदाई घटना है|
    सही कहा है आपने, काम चाहे कुछ भी करें, उसे पूरी ईमानदारी से करना चाहिए| किराने की दूकान हो या अस्तपताल, यहाँ तक की ब्लोगिंग भी|
    मज़बूत इरादों के साथ अपने काम में जुट जाना चाहिए|

    ReplyDelete
  23. Badi dukhad ghatna thi TV par dekh ham logon ka haal bura tha magar jinhone bhoga hoga na jane unka kya haal hua hoga.

    ReplyDelete
  24. स्वास्थ्य और शिक्षा की दूकानों की लग़ातार निगरानी करने की आवश्यकता है. ये लूट के केंद्र बन चुके हैं.

    ReplyDelete
  25. अत्यंत ही दु:खद रहा.जरा सी जागरुकता बड़े हादसों को टल सकती है.
    विचारणीय आलेख.

    ReplyDelete
  26. अब सबक नहीं सीखने पर स्कूल में भी मार पड़ती थी. जिंदगी की पाठशाला में सबक नहीं सीखने पर पड़ जाना होता है मर . विडंबना यही है कि शिक्षकों कि जगह ( स्वास्थ) लाभार्थी मर रहे हैं.
    उपहार में भी एसी ही घटना घटी थी .
    वही बेसमेंट
    वही बेसमेंट में बिखरा वही ज्वलनकारी तेल
    उपहार में ट्रांसफोर्मर का था यहाँ जेनेरटर का था
    वही विद्युत की चिंगारी
    वही शोर्ट सर्किट
    आग लग जाने पर वैसी ही छुपानी की कोशिश
    उपहार में आग लग जाने पर भी फिल्म जारी रही ( हैरतंगेज़ !!!!)
    यहाँ भी किसी को कुछ बताया नहीं गया
    वही अंत समय तक पर्दागिरी
    उपहार में भी अग्नि शमन दस्ते को बाहर वालों नें बुलाया था
    यहाँ भी पडोसी ने.
    वही fire exits की समस्या
    वहाँ fire exits दीप्त नहीं थे सो लोगों को पता ही नहीं चला
    यहाँ शायद थे ही नहीं और थे भी तो दरवाजा बंद कर दिया गया था
    वही smoke detector की समस्या
    वहाँ शायद थे ही नहीं यहाँ थे पर रात्रि पाली के चिकित्सक और कर्मचारी ने सिगरेट की तलब के कारण उन्हें बंद कर दिया था

    और नतीजा ?!!!
    वही

    दिल दहलाने वाला
    मानवता को शर्मसार कर देने वाला

    और यह जान कर हैरत होगी कि DCP licensing ने 14 साल पहले गोपाल टावर्स कि जाँच में जो दस कमियां पाई थीं वो दस कि दस १४ साल बाद उपहार में मौजूद थी.

    और १४ साल बाद AMRI Kolkata में भी शायद ढेर सारी .

    अंतम सत्य यही है . हम सबक नहीं सीखते हैं और न सीखेंगे .

    सो सब अंत.

    जब सब अंत हो ही गया तो अंतत यह उद्हरण(Excerpts) भी पढ़ ही लिजीये.

    "This is really in my view not only a civic issue but also a civilisational issue. We commit a large number of crimes by omission. This is an omission. Can we find any other (place) which is disorderly, disorganised, chaotic, without any regard for rules and regulations? It shows that we are a dehumanised civilisation. We are a civilisation with a closed mind. When we are celebrating the Fiftieth Anniversary of our Independence, let us have a soul searching. How many crimes we have committed without realising that we are committing them? When the man becomes absolutely blind in his mind, he is almost dead. Our minds and eyes have become dead. That is why, all these tragedies are happening."

    — Mr Jagmohan, Member of the Lok Sabha from Delhi, discussion on points arising out of the answer given by the Minister of Home Affairs to starred question No. 32 (July 29, 1997) in the Eleventh Lok Sabha on August 6, 1997 regarding the fire incident in Uphaar Cinema in New Delhi

    ReplyDelete
  27. bahut sundar baat likhi hai,sachhai badi kadwi hoti hai,lekin sach to yahi hai, apni akarmanyata ko ye nahi swikarenge muwabza denge,janch bithayenge aur so jayenge.

    ReplyDelete
  28. बहुत ही दुखद घटना है यह ...बहुत सही कहा है आपने ।

    ReplyDelete
  29. बहुत सुखद घटना है.बहुत सही कहा ,लोग अपनी जिम्मेदारी कहाँ समझते हैं...

    ReplyDelete
  30. You have touched the right chord, Zeal ! Just mishaps are avoidable and can be avoided. The law may take its own course but the persons who have lost their lives cannot be brought back ! Due precautions are urgently needed to avoid such mishaps !

    ReplyDelete
  31. यही भारत का दुर्भाग्य है

    ReplyDelete
  32. बहुत अच्छी प्रस्तुति ,,,, आभार .
    मेरे नये पोस्ट अभिशप्त लोकतंत्र पर आपका स्वागत है

    ReplyDelete
  33. क्या होता है सिर्फ हमारे और आपके कहने और सोंचने से क्या होगा ? जब सारा तंत्र ही भ्रष्ट है ,जान गयी दे दिए मुवावजा के तौर पर कुछ रूपये हो गया हिसाब किताब .........

    ReplyDelete
  34. .

    Mahendra Verma ji's comment--

    ----
    mahendra verma to me
    show details Dec 11 (3 days ago)
    दिव्या,
    स्नेहाशीष
    आज की पोस्ट के लिए टिप्पणी-

    धटना बहुत ही त्रासद है। सरकार, चाहे केंद्र की हो या राज्य की, ऐसी
    घटनाओं के प्रति संवेदनहीन नजर आती है।
    कौन जानता था कि अस्पताल, जहां लोग जीवन की कामना लेकर आते हैं, मौत का
    मुंह बन जाएगा।
    आखिर कब चेतेगी सरकार ?

    mahendra

    .

    ReplyDelete
  35. .

    mahendra verma to me
    show details Dec 12 (2 days ago)
    दिव्या,
    स्नेहाशीष
    कल मैंने टिप्पणी मेल की थी, शायद नहीं पहुंची। कमेंट बाक्स से नहीं हो
    पा रहा है, शायद मेरे लैपटाप में कुछ खराबी है। खैर, टिप्पणी पुनः भेज
    रहा हूं।
    .......................
    जहां लोग जीवन की आशा लेकर जाते हैं वहां मौत से सामना हो...यह तो बहुत
    ही त्रासद है। क्या गुजर रही होगी मृतकों के परिजनों पर, यह तो वे ही
    अनुभव कर रहे होंगे।
    शिक्षा और स्वास्थ्य की दुकानदारी फल-फूल रही है लेकिन इनके संचालक उतने
    ही संवेदनहीन हैं।
    शासन-प्रशासन को सजग रहना चाहिए ताकि ऐसी दुर्घटनाएं न हों।

    mahendra

    .

    ReplyDelete
  36. .

    Mahendra ji , Both of your comments reached my mail which i failed to check in time. I'm sorry for delay in publishing them.

    .

    ReplyDelete