सरकार का आदेश हुआ है की जो IAS और PCS आफिसर ठीक से काम नहीं करेंगे उन्हें सेवा-निवृत्त कर दिया जाएगा। लेकिन सरकार का अपने बारे में क्या विचार है ? पिछले ६४ वर्षों से कोढ़ग्रस्त मशीनरी बनी हुयी है सरकार , इनके नेताओं की सेवा निवृत्ति क्यूँ नहीं होती। आजकल खा-पी कर मोटे हो रहे भ्रष्ट नेताओं को दिल का दौरा भी नहीं पड़ता। कितनी भी फजीहत हो जाते ये शर्माते नहीं है। डट कर घोटाले करते हैं , काला धन बटोरते हैं और गर्व के साथ जेल जाकर , वापस आकर चुनाव लड़ते हैं। अब सत्ता भी दागियों, लुटेरों, बेशर्मों और तानाशाहों की बपौती हो गयी है। पढ़ा-लिखा होना देशभक्ति के लिए ज़रूरी अर्ह्यता नहीं है।
Theek kah rahee hain aap...sarkaar besharmon se bharee padee hai!
ReplyDeleteबुड्ढा होगा तेरा बाप का अमिताभ बच्चन का डायलोग याद आ गया " हार्ट अटैक से सिर्फ मर्द मरते हैं, क्योंकि उनके पास दिल होता है !:)
ReplyDelete....lol...Great comment Godiyal Sir.
ReplyDeleteयह आक्रोश यदि हर भारतीय के मन में उत्पन्न हो तब शायद देश की दशा सुधरे !
ReplyDeleteस्थिति तो यथास्थिति बनी हुई है ...
ReplyDeleteहम ही चुन रहे हैं उन्हें बार बार हर बार
ReplyDeleteगंभीर और विचारणीय.
ReplyDeleteनेता कभी रिटायर नहीं होते...
ReplyDeleteबात तो सही है आपकी।
ReplyDeleteगंभीर चिंतन।
ReplyDeleteयह नेताओं का डर्टी माइंड है जो कभी रिटायर नहीं होना चाहता :))
ReplyDeleteबहुत गंभीर विषय है नेताजी तो खुद को इसी तरह पाक दामन बतातें है....
ReplyDeleteपूरी तरह से ढीठ बन चुके इन लोगों को खुद के कुकर्म दिखाई नहीं देते। यदि इनका काम सही तरीके से चला रहे तो IAS और PCS की क्या औकात कि वे कोई गड़बड़ी या भ्रष्टाचार कर सकें?
ReplyDeleteइन्हें दिल का दौरा कैसे पड़ेगा, उसके लिए तो दिल चाहिए।
सेवानिवृति करनी है तो बिना दिल के इन सत्ता के दलालों की करनी चाहिए। अधिकारी व कर्मचारी तो इन्ही के रास्ते पर चलते हैं। जैसा बीज बोया जाएगा, फसल भी वैसी ही होगी। अत: शाखाओं को काटने से अच्छा है, इस भ्रष्ट पेड़ की जड़ें ही खोद डाली जाएं।
yahi shayad hanimari niyati ho gayee hai...hamesha kee tarah chintan k
ReplyDeletevibash karti panktiyan
is vishay par sabki gambheer soch honi chahiye...netaon ki bhi retirement age nishchit honi chahiye.
ReplyDeleteगंभीर यथार्थ कहा आपने...
ReplyDeleteआज तक देस को ईमानदार अधिकारी चला रहे थे। निकृष्ट और बेइमान नेताओं को भी वे अधिक पैर नहीं पसारने देते थे। अब जब से दोनों की मिलीभगत हुई तब से देश रसातल में जा रहा है। यह एक अच्छी पहल ही कही जाएगी॥
ReplyDeleteअभी राजभाषा पर गाँधी जी का एक प्रसंग पद रही थी कि गाँधी जी ने कुरता पहनना भी छोड दिया क्योंकि सारे देशवासियों को तन ढकने को कपडा नहीं था, और आज़ादी के बाद इन ६५ सालों में हम कहाँ पहुँच गए है...
ReplyDeletethere must be service line and retire line.nice lines.
ReplyDeleteनेता भी इंसान ही तो होते है !
ReplyDelete'सामग्री' व्यस्को ही की, हम देख रहे थे !
'कुर्सी' न ही 'माईक' कहीं हम फेंक रहे थे,
'कर-नाटकी' माहौल में रोमांस बड़ा है,
दिल में न था कुछ मैल, 'नयन' सेंक रहे थे,
मालूम न था हम को कि होवेगी फजीहत,
दोहराएंगे अब हम नहीं, 'मोबाइली' हरकत,
'सो' लेते तो होती न 'ख़राब' अपनी तबियत,
बच जाए अगर 'कुर्सी' तो होवेगी गनीमत.
हम सोच रहे थे कि सुरक्षित है, जगह ये,
कानूनों के 'ऊपर' ही तो रहती है जगह ये,
'आयुक्त' या 'अन्ना' की दख़ल होगी नही याँ,
महँगी पड़ी 'बाबाजी' बड़ी हमको जगह ये.
'दिन वेंलेंटाईन' का अब फीका ही रहेगा,
चिंता ये नहीं है कि ज़माना क्या कहेगा,
बदनाम ये मीडिया तो हमें बहुत करेगा,
पर अगले 'इलेक्शन' तक ये किसे याद रहेगा ?
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