भारत में अब क़ानून भी धर्म-आधारित होगा। पता नहीं क्या हो गया है देश के पढ़े-लिखे लोगों को भी। इस्लाम धर्म में अनुमति दे दी १५ साल की बच्चियों को स्वेच्छा से विवाह करने की।
http://navbharattimes.indiatimes.com/muslim-girl-can-marry-at-15-if-she-attains-puberty-hc/articleshow/13853325.कम्स
एक शर्मनाक और गैरजिम्मेदाराना फैसला है ये।
मासिक धर्म तो १२से १३ वर्ष की अवस्था से ही प्रारम्भ हो जाता है, तो क्या इस कच्ची उम्र में विवाह की अनुमति उचित है ?
क्या आमिर खान, इस नयी पनपती कुरीति का शिकार होने वाली हमारी मुस्लिम बहनों की खातिर "सत्यमेव-जयते में कुछ करेंगे ? या केवल हिन्दू-कुप्रथाओं का ही बिगुल बजाते रहेंगे ?
Zeal
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ReplyDeleteCheck the link below--
http://navbharattimes.indiatimes.com/muslim-girl-can-marry-at-15-if-she-attains-puberty-hc/articleshow/13853325.cms
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http://www.bhaskar.com/article/NAT-bride-at-15-muslim-minor-girls-eligible-to-marry-if-attained-puberty-rules-hc-3371455
ReplyDeleteसमाज को इस बारे में स्वयं कोई पहल करनी होगी।
ReplyDeletegenuine voice .....hands must be up
ReplyDeleteagainst inhuman acts ...
— जैसे जंगल का क़ानून केवल जंगल में ही मान्य होता है और नगरों का क़ानून केवल नगर में.... वैसे ही हवसियों का क़ानून केवल हवस में मान्य होता है.
ReplyDelete— 'मासिक' को धर्म कह सकते हैं लेकिन इस्लाम को नहीं ... वह तो मज़हब है. जो स्वतः धारित हो अथवा धारण करने योग्य हो उसे 'धर्म' कहते हैं. लेकिन मज़हब मात्र 'अलग पहचान' का द्योतक है.
— सफाई के समय कुछ पलों को सर पर मैले की टोकरी रखना ... धर्म नहीं .... विवशता है, जरूरत है.
— 'शारीरिक स्राव' स्वतःक्रिया के रूप में लिंग विशेष का धर्म हो सकते हैं....
— स्वास्थ्य की, समाज की उन्नति की दृष्टि से धारणयोग्य बातों के हमेशा आदर्श रूप अपनाए जाने चाहिए. जिन्हें हम 'धर्म' नाम देते हैं.
किसी समय में यदि ९-१० वर्ष में विवाह होना और १३-१४ वर्ष में गौना होना अनुचित नहीं माना जाता था तो उसके कई कारण हो सकते हैं... अशिक्षा, सामाजिक कुरीति और वैचारिक संकीर्णता. [गांधी और कस्तूरबा सन्दर्भ को ध्यान में रखकर कह रहा हूँ.]
मेरा मानना है.... जैसे आपत्तिकाल और अभावकाल में धर्म बदल जाते हैं... और यदि विपरीत स्थितियाँ लम्बे समय तक बनी रहें तो आचार-सहिंतायें उन बदले धर्मों से प्रभावित होती हैं... लेकिन ऐसे में बने 'भंगुर क़ानून' शाश्वत नहीं मानने चाहिए.
आज उचित यही है कि सभी समुदायों के लिये सम्यक क़ानून व्यवस्था हो. मुस्लिम्स के लिये कायदों में ढील देने से या अलग से व्यवस्था देने से समाज में भेदभाव बढ़ेगा, अपराधी मनोवृति वालों को सजा से बचने को तरह-तरह के विकल्प मिलेंगे.
सही कहा दिव्या जी "सत्यमेव-जयते में आमीर खान को मुस्लिम लड़कियों के लिए भी कुछ करना चाहिए..
ReplyDeleteएक खतरनाक फैंसला ...
ReplyDeleteगलत है ऐसा करना ...
not jsut this one but I think the whole of the kanoon is biased and full of loopholes .. a revision needs doing at earliest
ReplyDeleteBikram's
धर्मनिरपेक्ष और समानता का अधिकार वाले इस देश में धर्म और जाति के नाम पर अलग-अलग कानून निर्धारित करना उचित नहीं है।
ReplyDeleteदिव्या जी की बात से सहमत... मुझे तो सबसे अधिक इसी बात से चिढ हैं की एक देश में दो तरह के क़ानून क्यों...? कानून तो मानवमात्र के लिए एक जैसा होना चाहिए....
ReplyDeleteSocieties who outsource their thinking prowess to out of sync antiquated scriptures, do not progress in any walk of life. They are destines to evolve as inward looking races of doom... unfortunately.
ReplyDeleteक़ानून सब के लिये एक होना चाहिये -मज़हब भिन्न होने से मानवता के मानदंड नहीं बदल जाते !
ReplyDeleteजम्मू-कश्मीर के लिए दो-दो संविधान हो सकते हैं तो दो धर्मों के लिए अलग-अलग कानून क्यों नहीं? दरअसल जो हो रहा है वह हमारे शासकवर्ग की सुविधा के लिए है ताकि वे निष्कंटक हो कर शासन कर सकें. उन्हें व्यक्ति की चिंता नहीं व्याप्ती बल्कि वोट बैंक की चिंता व्याप्ती है.
ReplyDeletemasik dharm jaise abhishap ho gaya hai...shuru ho gaya to bachpana khatm ..ek abodh bacchi se sari khusiayn cheen lo.bilkul galat faisla.hai..aise masle ko uthane ke lie aapko dhnyawad
ReplyDeletebhartiya samaj , jati aur dharm ke taane bane se buna hai. भले ही शहरों में rahane wali generation ise sahi nahi maane lekin gaawn में rahane wali 80% janta ki sonch aur vyavhar isi ke anusar chalati hain.. aur iske sabse bada udaharan hai bharati ki jangadana 2011, jise jati aadharit banaya gaya hai.
ReplyDeleteaapki baat se ittefaq nahi mujhe..
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mere blog pe bhi aayega
तरकश
शाबाश , शुक्रिया !
ReplyDeleteआमिर के 'सत्यमेव जयते' का प्रभाव सर्व विदित है ! 'घर याद आता है' वाले अंक में यह समस्या अप्रत्यक्ष रूप में शामिल हो सकती थी ! अब भी अपने 'असर' वाले कार्यक्रम में आमिर यह बात उठा सकते हैं ! काश आपकी आवाज़ वह सुन सकते ! खुश रहिये -- 'भोला' [ अंकल / बाबा ]
यह मुद्दा उठाना आवश्यक है!..मुझे नहीं लगता कि भारत में हर धर्म के लिए अलग से क़ानून बनाए जाए!...क़ानून वही होना चाहिए जो सभी भारतीय नागरिकों पर एक जैसा लागू किया जाए!...हिन्दूओं के लिए अलग मुस्लिमों के लिए अलग, सिखों के लिए अलग...यह ठीक नहीं है!
ReplyDelete...विवाह विषयक क़ानून भी सभी के लिए एक जैसे ही होने चाहिए!,,,आमिर खान अगर इस दिशामें कुछ कर सकतें है बहुत अच्छा रहेगा!
....धन्यवाद झील!...आपने श्रेष्ठ (महिला)टिप्पणीकारों की सूची में मेरा नाम सुझाया है!...पता नहीं कि मैं इस काबिल हूँ या नहीं!...लेकिन आपके लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं भेज रही हूँ!...आप सफलता की और अग्रेसर हो!...run Divya run!
भारत में सभी नागरिकों के लिए समान आचार संहिता होनी चाहिए । अल्पसंख्यक वोटोँ के लालच में राष्ट्रविरोधी कार्य किए जा रहे हैं । देश की एकता और अखण्डता खतरे मेँ पड़ती जा रही है ।
ReplyDeleteअब तो लगता है जैसे हमारा संविधान ही हमारे लिए मजाक बन गया या इन नेताओ ने हमारे संविधान को ही मजाक बना दिया...जिस संविधान के अनुच्छेद २४ और २८ में साफ़ लिखा है की धर्म के आधार पर हम कोई सुविधा नहीं दे सकते हैं...साथ ही एक धर्मनिरपेक्ष देश में हर धर्म के लिए अलग-अलग कानून...ये महानता है बददिमागी या कोई साजिश
ReplyDeleteIt is correct then they have to follo sariyat ruls as cut hand or lags or nose etc.
ReplyDeleteRajendra Sharma