आपा-धापी के संसार में अपने
अस्तित्व को तलाशती माही बहुत निराश थी! बेहद कर्मशील और उद्द्यमी होने
के बावजूद अपना कोई स्थान नहीं बना पा रही थी वो। चौका-बर्तन में ही उलझ कर
रह गयी थी उसकी जिंदगी। बचपन में देखे बड़े-बड़े सपने उसे खुश नहीं रहने दे रहा था इस हाल में। रह रह कर उसके मन में एक हूक सी उठती थी और वो फिर से
उसी निराशा में डूब जाती थी।
एक दशक बीत गया था उसे इसी तरह जीते हुए।
अब वह एक मशीन बन चुकी थी, कोमल भावनाओं ने उसके ह्रदय से अपना स्थान छोड़
दिया था। वो पत्थर बन चुकी थी।
इस उलझन और निराशा भरी ज़िन्दगी में
पता नहीं कब मिहिर उसकी ज़िन्दगी में शामिल हो गया। वो माही का ध्यान रखता,
उसे प्यार करता, उसकी बातों को सुनता और उसे दिलासा देता की वो उसके
अस्तित्व को तलाशने में उसकी मदद करेगा !
दो वर्ष गुज़र गए , माही का
इंतज़ार ख़तम नहीं हुआ , उसकी व्यग्रता बढती ही जा रही थी , उसका जीवन अभी
भी बर्तन-झाडू में उलझा हुआ था, अस्तित्व की पहचान होने की कोई आस नज़र नहीं
आ रही थी। उसका मन पहले से भी ज्यादा शुष्क हो चला था.
दो वर्षों से मिहिर उसे दिलासा दे रहा था , उसके पास भी तो कोई जादू की छड़ी नहीं थी , जिसे घुमाकर वो माही की ज़िन्दगी बदल सकता।
हालात
ने परिस्थितियां इतनी जटिल कर दीं की एक दिन परेशान होकर मिहिर ने उससे
कहा की वो प्रेम से विहीन है, बिलकुल सूखी हुयी है, उसका मन पत्थर के समान
है .... आज के बाद से वो उससे बात भी न करे।
अपने बारे में ये सब तो वो पहले से ही जानती थी , नया क्या था, पत्थर तो वो थी ही। हाँ , कुछ अंकुर ज़रूर फुट पड़े थे ह्रदय में, मिहिर के लिए ..
मिहिर की यादों में खोयी माही जब बेचैन हो गयी तो उसने उससे बात करने की कोशिश की ..
The number you have dialed is not answering..
Zeal
सुन्दर अभिव्यक्ति |
ReplyDeleteआभार आदरेया ||
अच्छी कथा !!
ReplyDeletebahut khoob..
ReplyDeletejai hind
सच में मिहिर जैसों को कद्र ही नहीं प्यार की। उसे चाहिए कि प्रयास करता जाए। जब सफल होगा तब खुश हो लेना और गीलापन पा लेना। तब तक अपना कर्तव्य तो निभाता चले।
ReplyDeleteगहरे तक छू गई आपकी यह लघुकथा ।
ReplyDeleteTHE NUMBER YOU HAVE DIALING IS NOT ANSWERING
ReplyDeleteTHE TRUTH
ReplyDeleteगहरे उतर गई ये पोस्ट ...
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