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तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो ...
क्या गम है जिसको छुपा रही हो ...
हमने एक सतरंगी टोकरे में इक्यावन बुके सजाये हुए थे और एक ट्रक भर के पचीस हज़ार ब्लॉगर्स के लिए टिशू पेपर की व्यवस्था की थी । पंक्तिबद्ध होकर सभी ब्लॉगर अपने-अपने लिए निर्धारित वस्तुएं ग्रहण करते जा रहे थे और मुझे शिष्टाचारवश धन्यवाद भी दे रहे थे । मैं भावुक नयनों से सभी को भीनी-भीनी विदाई दे रही थी।
तभी कोने में बैठी राधिका पर मेरी नज़र पड़ी । रोने के कारण उसकी नाक सुड-सूड़ कर रही थी पूछा "क्या हुआ ?, कुछ लेती क्यूँ नहीं "। उसने कहा - "एक से मेरा क्या होगा "......हमने कहा - "आप दो लीजिये".....बोली- " इतने ब्लॉग लिखे कि सूख कर छुहारा हो गयी , लेकिन मुझे कोई भी ब्लॉगर-सम्मान नहीं मिला" , मेरे दिल के छालों के लिए एक बरनौल मिल जाये तो कुछ राहत आये"
पाठकों से निवेदन है जाते जाते अपने पैकट से मेरे लिए भी एक टिशू पेपर देते जाइए। न हो तो रुमाल ही दे दीजिये और मेरी सखी राधिका के लिए बरनौल भिजवा दीजियेगा।
फिजां में गाने की धुन बदल चुकी थी ...
मुबारक हो सबको समां ये सुहाना ..
मैं तो दीवाना , दीवाना , दीवाना ..
मैं खुश हूँ मेरे आंसुओं पे न जाना ..
मैं तो दीवाना , दीवाना , दीवाना ...
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आपकी सहेली राधिका से सहानुभूति है मुझे। पर कितनी लम्बी कतार है मेरा नंबर तो अभी आया ही नहीं। कहीं सब खतम हो गया तो मैं किसस् मांगूंगा और राधिका जी जैसे दो-दो की मांग करनेवाले और हो गए तो। यह सच है कि दीवाना ही ब्लॉग लिख सकता है लगातार फिर भले ही सूखकर कांटा क्यों ना हो जाए। एक गुदगुदाती सी रचना।
ReplyDeleteAti utam-****
ReplyDeleteबहुत अच्छा अति सुन्दर बस इसी तरह लगे रहिये
ReplyDeletehttp://vangaydinesh.blogspot.com/
सारगर्भित अभिव्यक्ति!!
ReplyDeletekidhar nishana hai aapka :)
ReplyDeleteअतिसुन्दर ...मै कतार देख कर घबडा गया हूँ ! समझ में नहीं आता क्या करू ? होली मुबारक हो !
ReplyDeleteline me lag liye no. ane par bata dijiyega.............
ReplyDeletepranam...
oh...ho....han radhika ko dekhte rahiyega.
दो से भी मेरा क्या होगा हम कतार में खड़े है प्ल्ज़ मेरे लिए
ReplyDelete.
ReplyDelete@ भारतीय नागरिक -
अभी कुछ न पूछिए , बस शालीनता से अपना टिशू-पेपर का पैकट लीजिये और हमको धन्यवाद ज्ञापित कीजिये कि आपके नेत्र-जल स्राव के लिए हमने समुचित व्यवस्था कि है । वैसे यहाँ सभी मॉल्स में टिशू आउट ऑफ़ स्टॉक हो गया है । आपकी रूमाल कि दरकार है ।
Smiles ...
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समझ गया आप क्या कहना चाहती हैं ....!
ReplyDelete:) :) अच्छा निशाना साधा है ...
ReplyDeleteha haa.... enjoyed the read.....
ReplyDeleteReally a good take on all those awards....
BTW even i need a Burnol..... :)
भाइयों एवं बहनों -
ReplyDeleteकृपया ये मत कहिये कि निशाना साधा है । अपनी आदत है साफ़ साफ़ अभिद्या में लिखना ।
ये लेख सम्मानित ब्लॉगर्स को बधाई एवं शुभकानाएं देने के लिए है तथा राधिका जैसे सौभाग्य से वंचित लोगों के साथ हार्दिक सहानुभूति रखता है ।
कतारबद्ध होकर जाइये अपने bouquet उठाइये अथवा अश्क पोंछने के लिए tissue ले जाइए । जाते समय रुमाल ऑफर करना न भूलियेगा ।
और हाँ धीरेन्द्र जी कि तरह गुदगुदी महसूस हो तो आभार देना मत भूलियेगा ।
इस लेख में एक निर्मल हास्य है, कृपया पढ़िए और मुस्कुराइए।
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ReplyDelete@ सवाई सिंह राज पुरोहित,
कतार में धक्का -मुक्की कि अनुमति नहीं है । आप देर से आयें हैं , इसलिए मेरे पीछे खड़े हो जाइए। मैं टिशू कि कतार में हूँ।
@ केवल राम -
आप सीरियस लग रहे हैं ?
संगीता जी ,
Smiles...
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हा हा हा...... अपना नंबर हमेशा ही पीछे रहेगा .....:)
ReplyDeleteकभी-कभी ऐसे भी गुद-गुदा लेना चाहिए !
ReplyDeleteहो मौसम सुहाना ,तो मुस्करा लेना चाहिए ||
सदा खुश रहें !
अशोक सलूजा
बधाई का तरीका बहुत अच्छा लगा ...पर कुछ लोग घबरा भी सकते हैं या कुछ को यह भी लग सकता है कि आप खिंचाई कर रही हैं ...पर सच तो यही है आपकी तरह बधाई का ख्याल हर एक को कहां आएगा ...शुभकामनाएं इस बेहतरीन लेखन के लिये ...।।
ReplyDeleteराधिका के लिये एक शेर :
ReplyDeleteरस्ते को भी दोष दे आंखे भी कर लाल
चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल
(पोस्ट पढ़कर अब,हम भी होली के मूड में हैं!)
चलो आज मेरे नसीब में भी tissue आ गया ..
ReplyDeleteलेकिन अश्क पोंछने के लिए नहीं रखूँगा ... क्या करूँ कवि ह्रदय जो हूँ..सोच रहा हूँ सजा के रख लूँ..
दिव्या जी और लाइन में खड़े ब्लोगर्स की याद दिलाता रहेगा जब इन्टरनेट कनेक्शन नहीं रहेगा तब भी...
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ReplyDeleteसदा जी ,
अपना काम है लिखना । मैं तो सभी के दुःख सुख में शामिल हूँ। कोई मेरे बारे में क्या सोचता है , इस बारे में मैं सोचती ही नहीं ।
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ReplyDeleteचैतन्य जी ,
मस्त शेर लिखा है आपने । हम भी होली के मूड में आ गए हैं ।
आशुतोष जी ,
गजब का आईडिया है ।
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दिव्या जी, एहतेहातन हमने तो कई बुके डाउनलोड कर लिए हैं क्योंकि queue तो आप तोड़ने देंगी नहीं .
ReplyDeleteउत्तम आलेख !
हँसते हँसते रोना ,या रोते रोते हंसना ? किस गम को छि पाया जा रहा है दिव्याजी ? मुबारकबाद के लिए तो धन्यवाद .लेकिन दीवाने के आंसू तो राज खोलेंगे ही. कहा गया है 'रहिमन असुआ नयन ढरी,जिय दुःख प्रकट करिएँ.'अब आप बताएं तो अच्छा,और न बताएं तो अच्छा ये आपका राज है. लेकिन ,आपका निर्मल बालपन सुहाता है और आ.अशोक सलूजा की वाणी में 'हो मौसम सुहाना ,तो मुस्कुरा लेना चाहिए'. होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
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ReplyDeleteकाश! कोई तो नम्बर मेरा भी होता
ReplyDeleteचाहे 52 वां होता…………
आज हर राधिका की यही कहानी…………
हाथ मे टिशु पेपर
आँखो मे पानी
अब चाहे बरनौल लगाओ
चाहे लगाओ पानी
मैने तो अपनी कह दी
दिल की जली कहानी
हाय हाय!अब कैसे चैन पाऊं
बिन सम्मान न अब मै जी पाऊं
लेखन भी अवरुद्ध हो गया
ख्वाब मेरा भी टूट गया
कोई तो लगा दो
मेरी भी बारी
आज हर राधिका की यही कहानी…………
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ReplyDeleteRK जी ,
ज्यादा चालाकी नहीं , सदा जी के पीछे कतार में स्थान ग्रहण कीजिये ।
राकेश जी ,
चुप चाप कतार में लग जाइये , वर्ना पीछे वाला /वाली आगे हो जायेगी ।
वंदना जी ,
चलिए हम ५३ वें का ख्वाब देख लेते हैं । आपकी कविता में आनंद आ गया ।
Smiles..
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इक्यावन बुके और पच्चीस हज़ार टिशू-पेपर के पैकट,
ReplyDeletebahut na insafi hai ye .............
हम चुप्पी मारे कतार में है .
ReplyDeleteअपने लिए तो अंगूर खट्टे है |
ReplyDeleteशारूख खान जब भी किसी अवार्ड फंक्शन में नाचता है तो उसे अवार्ड जरुर मिलता है |वैसे आजकल नित नये अ वार्ड फंकशन अपनी गरिमा भी खोते जा रहे है |
वैसे नाचना कोई बुरी बात नहीं है पर हर समय ठीक नहीं ?
राधिका के लिए होली पर एक गीत .
शायद बर्नल की कमी न लगे |हा हः हा
टेसू सा रंग हो तुम
मोगरे की खुशबू हो तुम
फागुन के महीने में
ढंडी बयार हो तुम .......
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ReplyDeleteटेसू सा रंग हो तुम
मोगरे की खुशबू हो तुम
फागुन के महीने में
ढंडी बयार हो तुम .......
वाह! वाह ! वाह! ......शोभना जी , सच्ची कसम से ....बरनौल कि भरपाई कर रही है आपकी फागुनी बयार ...मज़ा आ गया ...
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हमें लिखने में ही आनन्द मिलता रहता है, कोई स्नेह दे दे तो बोनस।
ReplyDeleteसही कहा ...लिखने का ही आनंद है असली ...इसीलिए तो ये लेख लिख कर आनंद उठाया जा रहा है फागुन का...
ReplyDeleterumaal aapko de diya to apne aansu kisse ponchenge ?
ReplyDeletenooooooo!
दिव्या जी आपको सपरिवार इन्द्रधनुषी शुभकामनाएं |इलाहाबाद और हिन्दुस्तान का रंग आप पर हमेशा छाया रहे |होली की शुभकामनाएं |आपकी भाषा बहुत दमदार है विषय पर पकड़ भी है इसलिए अगर समय मिले तो एक उपन्यास लिख डालिए|यह एक सार्थक और सृजनात्मक लेखन होगा ,इसका फयदा भी दूरगामी होगा हिन्दी या इंग्लिश किसी भी भाषा में लिखें |नमस्ते
ReplyDeleteहम तो अपने आप को आमिर खान समझते हैं यूँ शाहरुख़ खान की तरह हर एवार्ड बटोरना पसंद नहीं.. :)
ReplyDeleteहम भी कतार में हैं.....
ye kya h....mei bilkul bhi nhi samjha.....
ReplyDeleteदुनिया में कितना ग़म है
ReplyDeleteमेरा ग़म कितना कम है ।
हा हा हा ! दिव्या जी , आप भी हमारी तरह छुटभैये ब्लोगर बन गई ।
वंदना जी की कविता में होली का आनंद आ गया ।
an oblique satire...
ReplyDeleteकहीं फागुन, कहीं सावन ।
ReplyDeletesmiles
क्या करेंगे लाइन में लग कर...लाइन को देख कर जो मज़ा आ रहा है वही काफी है..
ReplyDelete.
ReplyDeleteहा हा हा.. डॉ दाराल ...छुटभैये ब्लॉगर होने में अनजाना सा सुख है ।
वाणी जी ...हम दोनों एक ही रुमाल से काम चला लेंगे । आप सीधी तरफ इस्तेमाल कर लेना , मैं कोने में पोंछ लूंगी। ...Smiles ....
इस लेख पर हर टिप्पणीकार कि टिपण्णी बहुत रोचक है । सबसे बड़ी खासियत ये है कि मैंने जिस हलके-फुल्के मूड में लिखा था , पाठकों ने उसे उसी तरह पढ़ा भी है । जिन लोगों को कभी मुस्कुराते नहीं देखा था...उन्हें भी मुस्कुराते देखकर अच्छा लगा .....
कहीं फागुन , कहीं सावन...... वाह महेंद्र जी .....आनंद ला दिया आपने।
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ReplyDeleteजयकृष्ण तुषार जी ,
आपके अनुरोध पर एक उपन्यास लिखा है जो नायिका प्रधान है , लेकिन स्वप्नों कि उड़ान बहुत ऊंची होती है , अब दिल कर रहा उस उपन्यास पर एक फिल्म बने और उसके निर्देशक आमिर खान हों , लेकिन आमिर जी को मनायेगा कौन ? Three idiots के निर्देशन के बाद उनके रेट बहुत हाई हो गए हैं ...कुछ जुगाड़ कीजिये।
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क्या कहें हम , इतने लोग लाइन में हैं कि हमें लगता है पीछे खड़े होना बेमानी होगा .
ReplyDelete'दरअस्ल कुछ ख़ता तो अपनी भी है ,
हम दौड़ लगा न पाए !'
दौडिए रूप जी , हम हैं न साथ में ...company मिलेगी..Smiles...
ReplyDeleteholi ki fuhar achchhi lgi
ReplyDeletemain to nya hoon , ktar men antim hi rhoonga
अरे अरे रुकिये रुकिये.... मेरे स्टोर से सारे टिशू पेपर बिना पेमंट किये ले आई, ओर ओर यहां लोगो को डांट डांट कर बांट रही हे, अजी कोई लाभ नही, मैने कभी भी, ओर कही भी अपने भारतिया लोगो को लाईन मे लग कर शांति से कोई भी काम करते नही देखा,आप कितना भी डांट ले कोई ना कोई धक मुक्की करेगा ही, लेकिन मुझे क्या यह पकदिये इन टीशू पेपर का बिल एक सप्ताह तक कभी भी भुगतान कर दे, ओर वो इक्यावन बुके वाला भी बाहर खडा हे..:) राम राम
ReplyDeleteI am waiting for my turn standing as a last man in the queue. Thanks for laughter post. I have noting in my hand other than this comment and this may please be treated as handkerchief on my behalf.
ReplyDeleteक्या आपके ही टिश्यू पेपर में से मैं भी शेअर कर लूँ ?
ReplyDeleteअरे बाप रे बाप! पचीस हज़ार टिशु पेपर के पैकेट किन्तु मात्र इक्यावन बुके ! अरे भैया ये तो सरासर ना इंसाफी है. खैर मैं तो शायद सब से जूनियर ब्लोगर हूँ इस लिए बाहर से ही खड़ा हो के धक्का मुक्की का आनंद लूँगा.
ReplyDeleteलगे रहो भाई लाइन में, मैं तब तक अपनी श्रीमती जी के साथ गुझिया पापड़ ही बनवा लेता हूँ . अंत में अगर कुछ टिशु पेपर बच गया तो मेरे काम आ जायेगा.
आपको आपके परिवार को होली की अग्रिम शुभकामनाएं
जी हम भी आ गए कतार में..
ReplyDeleteदेर से आये है कतार लम्बी हो गई है..
पर आशा है की जी हमें भी गमला (मतलब बुके) मिल जायेगा...
नहीं तो सांत्वना-पुरस्कार में टिशु-पेपर तो मिलेगा ही.. ;)
वाह क्या बात है दिव्या जी!
ReplyDeleteहोली की शुभकामनाएँ!
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ReplyDeleteवाह वाह वाह ...इतने मीठे , रसीले , चुटीले कमेंट्स हैं...आनंद आ गया ...अभी तक मुस्कराहट है आप लोगों की शोखी और मस्ती पर।
राज भाटिया जी ...आप को कैसा पता चल गया कि हम आपके स्टोर से टिशू लाये थे ?...खैर अब जान ही गए तो तनिक धीरज धरें ...सब ब्लॉगर से वसूली करके रकम भिजवाते हैं ...
परशुराम जी कि handkerchief बहुत useful रही ...चार-पांच ब्लॉगर ने साझा इस्तेमाल किया ...
मदन शर्मा जी , आप कतार तोड़कर भाभी जी के साथ गुझिया बनवा रहे हैं ...अएं ? ..इ का बात हुई ?...चिंता न कीजिये , हम लोग कम नहीं ....पूरी ट्राफिक ( कतार) , भाभी जी कि गुझिया कि तरफ divert कर दी गयी है ...कम न पड़े ...टिशू तो लोगों ने बाँट लिए , लेकिन अपनी गुझिया कोई न बांटेगा ...पक्का समझिये।
बाकलीवाल जी , अब दुःख कि घडी में अपना ही अपने काम आता है ...जरूर साझा कीजिये टिशू ..दो चार आँसू भी शेयर हो जायेंगे...
आशीष जी और दिलबाग जी तो चुपचाप कतारबद्ध हैं...प्यारे बच्चे हैं... काफ़िर जी का गमला हाजिर है ।
शास्त्री जी , आपको भी होली मुबारक...
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ReplyDeleteDear Amit-Nivedita ,
It was not an oblique satire. There is a subtle difference between satire and humour. It depends on a person how to see the situation (glass as half-full or the glass as half-empty).
It's not a big deal to make a tough situation enjoyable. I tried to add some humour in a particular situation and the commentators made it all the more enjoyable with their purity of thoughts and sense of humour.
Thanks to each and everyone.
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I do see this as a glass full.
ReplyDeleteVery interesting post
ek tissue paper hame bhi do.....kabke line me lage
ReplyDeletethe abhi tak no. nahi aaya baad wale.....age nikal
liye......oon...oon...oon.....
pranam.
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ReplyDeleteChowla ji ,
Many thanks to you .
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