Thursday, July 5, 2012

नास्तिकों के चोंचले

मज़ाक तो देखिये-- ब्रम्हाण्ड के कणों को ढूंढ लिया। बोसोन्स से बने हुए हैं। ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं ये, सोच कर खुश हो रहे हैं नास्तिक । गर्भ धारण , संतानोत्पत्ति , फल पुष्प आदि का खिलना कैसे होता है ? नास्तिक जवाब दें। गरीब भूखे मर रहे हैं और अमीरों के चोंचले जारी हैं --कभी ब्रम्हाण्ड का रहस्य जान लेते हैं तो कभी अरबों रूपए बर्बाद करके सृष्टि की उत्पत्ति पर शोध करते हैं।

Zeal

14 comments:

  1. really...........

    its quite confusing and depressing...

    anu

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  2. कुछ लोग पगला गये हैं... मनुष्य के मन में मिलने वाले तत्व को मशीनों में दूंढ़ रहे हैं...

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  3. अभी बहुत कुछ जानना बाकी है इन्सान को छोटी छोटी बातों में गर्वित होकर अपने आप को श्रेष्ठ बताना और किसकी फितरत हो सकती है ।

    आपने टिप्पणी बक्सा वापिस लाकर बहुत अच्छा किया आभार ।

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  4. नास्तिक और आस्तिक का फर्क काल्पनिक है .हैं दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू.नकार में भी तो स्वीकार है .नकार आप किसको रहें हैं .ईश्वर बिग बैंग ही है जो एक साथ सब जगह व्याप्त था .बिग बैंग से पहले भी बाद में भी .तब भी जब समय और अन्तरिक्ष का जन्म भी नहीं हुआ था ईश्वर तब भी था .
    अलबत्ता कार्य कारण सम्बन्ध से वह भी मुक्त नहीं है .बेशक कण कण में उसकी व्याप्ति है .बिग बैंग भी वह आदिम अणु था जो कृष्ण के विराट स्वरूप की तरह सब कुछ को समेटे था .काल से परे ,अन्तरिक्ष से परे .
    विज्ञान का काम है सत्य का अन्वेषण .अलबत्ता सब की अपनी अलग अलग भूख है .कुछ कहतें हैं भूखे भजन न होय गोपाला .कुछ कह सकतें हैं सब भरे पेट के धंधे हैं .

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  5. सही कहा आपने..

    ***
    दादू दुनिया बावली,
    कहे चाम को राम,
    पूंछ मरोड़े बैल की,
    भाई काडे अपना काम
    ***


    तेरे घट विराजे घनश्याम,
    बाहर क्या दूँढता फिरे...
    काटे दरवाजा के चकरी,
    बिना हुकम न खोले,
    बाहर क्या दूँढता फिरे...
    बह रही र गंगा ज्ञान की,
    मैला मैला आज धो ले,
    बाहर क्या दूँढता फिरे...

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  6. उनकी प्रसन्नता पर हम भी खुश हो लेते हैं...

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  7. bilkul sateek likha hai aapne...aabhaar.

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  8. स्वामी विवेकानंद द्वारा , ब्रम्हांड पर दिया गया संभाषण भूल गए क्या ये अँगरेज़ ? हमारे वेदों उपनिषदों में शताब्दियों पूर्व ही इसका उल्लेख है। क्यों ज्यादा खुश होते हैं ये बच्चों की तरह उछलकर , अपनी बचकानी उपलब्धियों पर। पैसा ज्यादा है। लूटमार का धन इनसे पचता नहीं। इसीलिए सृष्टि का विनाश करने वाले न्यूक्लियर हथियार बनाते हैं और फिर सृष्टि की तलाश करते हैं। घोर कलियुग है !

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  9. "बगल में छोरा..." की तर्ज पर; इसे कहेंगे "हर कण में भगवान-मूरख ढूंढ़ रहे ब्रह्माण्ड" | आप मेरे ब्लॉग पर आकर उत्साहवर्धन कर गयीं इसके लिए धन्यवाद | अब ब्लॉग पर सक्रियता कम हो गयी है फेसबुक पर ही सभी ब्लोगर दिख जाते हैं | फिर भी ..... | दोबारा धन्यवाद |

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  10. विरोधाभासों से अटा पड़ा है विज्ञानिकों का ये 'सराहनीय कार्य'

    -- एक तरफ सृष्टि नाश करने के हथियार बनाते हैं... दूसरी तरफ 'सृष्टि' के नियामक तत्व को खोजने में दिन-रात भी बिताते हैं.

    -- ज्ञान के एकमात्र स्रोत 'वेद' को गडरियों का गीत कहते हैं.... दूसरी तरफ 'गोड' पार्टिकल्स की धुन पर झूमते भी हैं.

    -- भूखे-नंगों की मौजूद सृष्टि का कोई खयाल नहीं... तमाम अज्ञात परदों से ढकी सृष्टि का छोटा रूप बनाने के लिये बार-बार की खर्चीली कसरत में लगे हैं.

    दिव्या जी.... आप सभी तरह की चर्चाओं का अच्छा संयोजन कर लेती हैं. साधुवाद.

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  11. ओम जय श्री राधे कृष्ण ,गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अध्याय १० श्लोक ८ में स्पस्ट कहाँ हैं "मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ ,प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उदभुत हैं ,....इसलिए आप उनकी सफलता की सभावना की कामना कीजिये ,,राधे राधे

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  12. कितने टनों को तौड़ कर इक 'कण' को पा लिया है,
    हर्षित है दुनिया वाले, 'जीवन' को पा लिया है !
    कण-कण में था वो पहले, अब 'कण' वो बन गया है,
    भगवन ने भी अब अपने 'भगवन' को पा लिया है !!
    http://aatm-manthan.com

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  13. .

    Mansoor Ali ji,

    मनुष्य का अहंकार जब बढ़ जाता है तो वह पहली गलती यही करता है की ईश्वर को बहुत छोटा ( कण समान) समझ लेता है।

    .

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  14. आस्तिकों के लिए यह प्रयोग भगवान के बारे में खुशी की खबर नहीं लाया क्योंकि ढूँढे गए पार्टिकल का हमारी भगवान संबंधी परंपरागत अवधारणा से कुछ लेना-देना नहीं है. कई बातें भविष्य में और भी स्पष्ट हो पाएँगी. जीव-सृष्टि में चेतन तत्त्व मूल तत्त्व है. यदि कोई शोध उधर जाता है तो उसे आस्तिक और नास्तिक दोनों के महत्व का माना जाएगा.
    आपके तीखे सवाल का कोई उत्तर नहीं.

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