जिल्लत और दुःख सहते-सहते आँखों के आंसू सूख भी जाते हैं कभी-कभी ! जो रोते नहीं हैं कभी, वे अन्दर से टूटे हुए होते हैं अक्सर ! उन्हें रुलाने की कोशिश न करना क्योंकि उनके आवाज़ की झूठी अकड़ ही उनका एकमात्र सहारा होती है जीने का । उनकी आँख से आंसू तभी गिरता है जब वो अंतिम सहारा भी छिन जाता है ! ज़िन्दगी से हार मान लेता है जब वो।
वाह दिव्या....
ReplyDeleteआज तो दिल में उतर गए आपके लफ्ज़....
वरना दिमाग ठनका देते हैं:-)
सस्नेह
अनु
सही कहा आपने, आपसे सहमत.
ReplyDeleteखुबसूरत अभिवयक्ति.....
ReplyDeleteउन्हें रुलाने की कोशिश न करना....!!!
ReplyDeleteसच कहा आपने, बिना आँसू वाला कभी कहीं अधिक दुखी हो सकता है, संवेदनायें बनाये रहें हम सब।
ReplyDeleteसही कहा।
ReplyDeletewah bahut hi achchha
ReplyDeletebahut achchha
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