मूर्ख मत बनो , मत लिखो अपने दिल की पीड़ा। भेडियों के शहर में अपने जज़्बात लिखकर मत करो खुद को निर्वस्त्र। सत्याबयानी अच्छी होती है , लेकिन जज्बातों की बयानगी से क्या हासिल? थोड़ी सी सहानुभूति के लिए इतना बड़ा जोखिम? ये प्यार-व्यार और नुमाईश सब बचकानापन है! उसे लिखो मत, कहो मत!...केवल पियो उसे ...
इस तरह पीड़ा को उजागर करके रोना-धोना तुम्हारे कमज़ोर व्यक्तित्व को परिलक्षित कर रहा है! दुःख को पीना सीखो , भावनाओं से लड़ना सीखो!
इस पोस्ट में भले ही आपको सतरंगे शब्दों के इन्द्रधनुषी जाल न मिलें लेकिन प्रेम और दुःख से कातर हुए घुटनों के बल गिरे हुए बंधू बांधवों के लिए पर्याप्त फटकार तो है , शायद काम आ जाए।
कभी मुस्कुरा के मिला करो।।
कभी खिलखिला के हंसा करो
तुम वजह हो मेरे वजूद की
सूरज की तरह दमका करो
Zeal
वहा क्या बात है हर एक शब्द में दर्द वो ऐसा दर्द की रोगटे खड़े कर दे
ReplyDeleteपर आप ऐसा क्यूँ कह रही हो नारी को किसी की दया की जरुरत नहीं है नारी तो खुद एक दवावान है अपने तो सच मैं घायल कर दिया
उत्कर्ष रचना
मेरी नई रचना
फरियाद
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
दिनेश पारीक
वहा क्या बात है हर एक शब्द में दर्द वो ऐसा दर्द की रोगटे खड़े कर दे
ReplyDeleteपर आप ऐसा क्यूँ कह रही हो नारी को किसी की दया की जरुरत नहीं है नारी तो खुद एक दवावान है अपने तो सच मैं घायल कर दिया
उत्कर्ष रचना
मेरी नई रचना
फरियाद
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
दिनेश पारीक
char pangtiyan ant ki badi achchi lagi....
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteलोग आधुनिकता के आगे , अपना सब कुछ खो चुके है |
ReplyDeletesahi salah
ReplyDeleteसुन्दर आलेख |
ReplyDeleteTamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page
सही !!
ReplyDeleteआपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगल वार 19/2/13 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है
ReplyDelete4 लाइनों ने सब कह दिया
ReplyDeleteMost valuable suggestion... thinking about it since morning... aaj samvrdanon me bhi swarth aur chhal ne apna sthan gahraai tk bana liya hai.. yah sahi hai ki abhi bhi achchhe insan bahut hain lekin we mukhr nahin hain... jab tak we mukhr nahin honge hame uphaas hi milega... maine bhi gahraai tak is peeda ko mahsoos kiya hai ... aapne sabhi ko sachet kr bahut hi nek kaary kiya hai... badhai...aur aabhar ..
ReplyDeleteSUNDAR AUR SHASKT PRASTUTI ** NAHI DAYA KI BHIKH CHAHIYE,HAK APNA HAM LAD KAR LENGE,KOKH ME PAL RAHI APNI BETIO KE HATHO ME KHANZAR DENGE,
ReplyDeleteanubhoot pida ki bat .....sacchaai ko bataati hui .....
ReplyDeleteसुन्दर प्रस्तुति .
ReplyDeleteजील बेटा ,अति सार्थक कथन !
ReplyDeleteलगभग २० वर्ष पूर्व मदर्स इंटरनेश्नल के विद्यार्थियों को मैंने [किसी अज्ञेय महा कवि की]यह प्रेरणाप्रद रचना सुनाई थी
अपने सूर्य स्वयम बन जाओ
निर्माता हो तुम निज पथ के, स्वयम विधाता हो तुम कल के
अपने ही पौरुष के बल से अपनी क्षमता स्वयम जगाओ
अपने सूर्य स्वयम बन जाओ
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भविष्य में , सम्भव हुआ तो जैसा बन पायेगा आप सब को भी सुनाउंगा !
बिलकुल सही कह रही हैं आप !
ReplyDeleteअबला नही सबला बनो
ReplyDeleteकंधा ढूंड मत कंधा बनो
वार सहो नही तुम वार करो
हर चुनौती तुम स्वीकार करो
इकदम सही आदरेया -
ReplyDeleteकानाफूसी हो शुरू, खंडित होवे *कानि |
अपना दुखड़ा रोय जो, करता अपनी हानि |
करता अपनी हानि, बुद्धि ना रहे सलामत |
जिसको देती मान, बुलाता वो ही शामत |
पी के अपना दर्द, ख़ुशी का करो बहाना |
खड़े भेड़िया हिस्र, छोड़ हरकत बचकाना ||
*सीख
रहिमन निज मन की ब्यथा, मन ही राखो गोय..
ReplyDeleteबहुत खूब ... कमजोरी दिखाना ठीक नहीं ... सच ही तो है ...
ReplyDeleteचार पंक्तियों में ही सब कुछ कह दिया बहुत खूब कभी कभी तो कमाल की प्रस्तुति दे देती हैं आप.बधाई
ReplyDeleteसत्य उजागर करती भावपूर्ण प्रस्तुति |
ReplyDeleteआशा
बहुत खूब....
ReplyDeleteवाह ,बेहतरीन रचना
ReplyDeletewell said- and very true.
ReplyDeleteit is silly to give people ammunition to attack oneself to get fake sympathy.
one confides in friends expecting sympathy for ones sufferings. but the same people will throw back ones intimately shared secrets in their gatherings....
aisa kya kah diya divya ji ne k sab wah wah kiya ja rahe h. aas see 4 line h, kisi gali k shayare ya kavi kee lagti h.
ReplyDeleteसलीम अख्तर सिद्धीकी , टिप्पणीकारों की वाह-वाही से बड़ी ईर्ष्या हो रही है? तुम्हारे जैसे मुल्ले करते होंगे साहित्य की चोरी , हिन्दू चोरी नहीं करते! इतने जलनखोर हो , आज पता चला!...Smiles.... :) :)
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