ना
देश की परवाह , ना ही प्रकृति की ! फिर मरने वाले श्रद्धालुओं , हिन्दू
धर्म और उनके मंदिरों की क्यों होगी ? पहाड़ों पर पेड़ लगाने के बजाये
डायनामाईट से पहाड़ों को चिटका रहे हैं ! उत्तराखंड में इतनी अधिक संख्या
में बाँध बनेंगे तो वो दिन दूर नहीं पूरा उत्तराखंड ही बह जाएगा , और यही
तो चाहती है कांग्रेस-- धीरे-धीरे करके भारत को समूल नष्ट करना। चाईना से
सावधान रहने की ज़रुरत है। दुश्मन पडोसी मुल्कों से न हाथ मिलाने की ज़रुरत
है , ना ही किसी प्रकार के दबाव में आने की ज़रुरत है। सरकार को अपने
स्वार्थ से परे , धन का लालच छोड़कर , देश के विकास के लिए सोचना होगा।
सही कहा आपने, लेकिन इनकी समझ में आए तब ना..
ReplyDeleteउत्तराखंड त्रासदी : TVस्टेशन ब्लाग पर जरूर पढ़िए " जल समाधि दो ऐसे मुख्यमंत्री को"
http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/blog-post_1.html?showComment=1372748900818#c4686152787921745134
सही कहा है !!
ReplyDeleteप्रकृति के साथ खिलवाड़ और उसका व्यावसायिककरण हमें विनाश की और ढकेल रहा है...
ReplyDeleteसार्थक पोस्ट!
ReplyDeleteहर एक चिंता जायज और सच्ची है!
कुँवर जी,
सही कहा ..लेकिन सरकार को समझ आए तब न..
ReplyDeleteसच है कि किसी को नहीं है "देश" की परवाह
ReplyDeleteमन में सभी नेताओं के है 'चेयर'की ही चाह
पाकेट भरी रहे मेरी कुर्सी न जाए छिन
बस इस उधेड़बुन में ही काटे हैं रातदिन !
हम दूर हैं मजबूर हैं कुछ कर नहीं सकते,
'फुल-जील' से भिड जाइए अय 'यूथ' देश के
बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!
ReplyDeleteआपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (03-07-2013) के .. जीवन के भिन्न भिन्न रूप ..... तुझ पर ही वारेंगे हम .!! चर्चा मंच अंक-1295 पर भी होगी!
सादर...!
शशि पुरवार
बात तो सही है मगर सरकार तो चिकना घड़ा है उनकी समझ में यह बात आए तब न...
ReplyDeleteits true...
ReplyDeleteये उत्तराँचल का विकाश नहीं ये विनाश कर रही है सरकार तीर्थ क्षेत्र में पर्यटन के नाम पर सूरा-सुंदरी परोसना ------ तो प्रकृति का कृत्य यही होगा,
ReplyDeleteहिन्दू धर्म का विरोध ही सार्थक सेकुलरिज्म है जिसका उत्तराँचल पूरी तरह पालन कर रही है
ReplyDeleteबहुत सही और सार्थक कहा आपने
ReplyDeleteबस जागरूकता की कमी है
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई
जीवन बचा हुआ है अभी---------
तबाही के कारणों को अब बच्चा-बच्चा समझ रहा है पर ये शासक और व्यवस्थापक क्यों नही समझते । अब भी समझ जाएं कि स्वार्थ व लापरवाहियों के दण्डस्वरूप ही तो कितनी भयानक नसीहत दी है प्रकृति ने ।
ReplyDelete
ReplyDeleteप्रभावशाली , बहुत बधाई.
BILKUL SAHI LIKHA HAI AAPNE.
ReplyDeleteBILKUL SAHI LIKHA HAI AAPNE.
ReplyDeleteसचमुच चिंतनीय
ReplyDeleteइन्हें बाँध बनाने की बीमारी हो गयी है
ReplyDeleteइनकी बीमारी हमपे भारी हो गयी है
देश की कश्ती को डुबो देंगे सारे नेता
इसे बचाने की अब जिम्मेवारी हमारी है
सादर बधाई के साथ