अकसर लोगों की ज़बान पर एक जुमला चढ़ा रहता है - "महिलाएं पश्चिम का अन्धानुकरण कर रही हैं , वस्त्र पहनने के मामले में मान मर्यादा का ध्यान नहीं रख रही हैं। "
और भी गन्दी भाषा में लोग इस बात को कहते और विभिन्न ब्लॉग्स पर लिखते हैं। लेकिन क्या ये सच है ? कुछ प्रश्न मन में आ रहे है -
अब बात करते हैं उस वर्ग की जहाँ वास्तव में अभद्रता दिखाई देती है । वो है मोडलिंग अथवा फिल्म जगत। यहाँ पर चंद कलाकार अश्लीलता और फूहड़ता का प्रदर्शन करते हैं , जिसके कारण आम जनता को भी उसी श्रेणी में खड़ा कर देना सर्वथा अनुचित है।
इसलिए ये व्यापक कथन कहना की "महिलाएं वस्त्र धारण में पश्चिम का अन्धानुकरण कर रही हैं" , थोडा आपत्तिजनक लगता है। दो-चार बिपाशा , राखी और मल्लिका को छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाएं अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा को बखूबी समझती हैं और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए क्या ज़रूरी है , ये भी बेहतर जानती हैं।
यदि साड़ी को सबसे गरिमामय मानें तो कुछ लोगों का ये प्रश्न है की -"आधा पेट खुला क्यूँ रहता है ? साडी navel के नीचे क्यूँ बंधी है ? और माशा अल्ला क्या खूब आधुनिक ब्लाउज हैं, पीठ पर मात्र दो इंच की पट्टी । क्या ये डिजाईन भी पश्चिम से आई है ? फिर पश्चिम का दोष क्यूँ ?
गन्दगी लोगों के दिमाग में होती है। जिसके पास संस्कार है , वो कोई भी परिधान पहने , शोभनीय और अशोभनीय का ख़याल हमेशा रखता ही है। जिसके पास संस्कार ही न हो अथवा लज्जा ही न हो तो उससे क्या उम्मीद रखना । लेकिन फिल्म जगत की अभद्रता की सजा आम स्त्री को उपरोक्त जुमले से नहीं मिलनी चाहिए।
आभार।
और भी गन्दी भाषा में लोग इस बात को कहते और विभिन्न ब्लॉग्स पर लिखते हैं। लेकिन क्या ये सच है ? कुछ प्रश्न मन में आ रहे है -
- क्या ये वास्तव में पश्चिम का ही अन्धानुकरण है ?
- क्या पश्चिम का प्रभाव महिलाओं पर ज्यादा है ? पुरुष कितने ही वर्ष विदेशों में क्यूँ न रह लें , वे शरीफ ही रहते हैं ? पश्चिम का कोई भी दुष्प्रभाव पुरुषों पर नहीं होता ?
- यदि पुरुष पश्चिमी दुष्प्रभावों से मुक्त हैं तो उनकी माँ , पत्नी और बेटी कैसे संस्कारों को भूल गयी ?
- भारतीय स्कूलों में शिक्षिकाओं को , अस्पातालों में डाक्टर्स को , कार्यालयों में महिला कर्मचारियों को , घरों में दादी , नानी , चाची , मौसी , बुआ , सभी को सभ्रांत वस्त्रों में ही पाया आज तक । क्या आपके घर की महिलाएं या आस-पास महिलाएं अभद्र वस्त्रों में दिखती हैं?
- मोहल्ले में या बाज़ार में , रेलवे स्टेशन पर या एअरपोर्ट पर , सभी जगह भारतीय महिलाओं को मर्यादित ही पाया है आज तक , फिर पश्चिम का अन्धानुकरण कहाँ है ?
- क्या साड़ी पहनने में ही एक महिला मर्यादित है ? अन्य किसी भी परिधान में अमर्यादित ?
- समय के साथ स्त्री यदि सुविधानुसार सलवार कमीज़ अथवा जींस-टॉप पहनती है तो क्या यह अभद्र और अश्लील की श्रेणी में गिना जाएगा ?
- पहले महिलाएं न स्कूटर चलाती थीं, न गाडी , न प्लेन उडाती थीं । पहले नौकरी के लिए भागते हुए लोकल ट्रेनें और बस नहीं पकडनी होती थी । पहले स्पोर्ट्स में भी इतनी शिरकत नहीं होती थी महिलाओं की । तो क्या ज़रुरत के अनुसार यदि परिधान बदलते गए तो उसे अभद्र , अश्लील और पश्चिम का अन्धानुकरण कहेंगे?
- सुविधानुसार इंसान साइकिल से स्कूटर, फिर कार आदि को अपनाता गया , लेकिन सुविधानुसार यदि एक स्त्री अपने लिए परिधान का चुनाव करती है तो वो समाज के ठेकेदारों को खटकने लगता है।
- पुरुषों का पहनावा ऐसा होता है , जो सुविधाजनक होता है तथा एक्टिव बने रहने में मदद करता है । तो यदि महिलाएं आज भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में अपनी सुविधानुसार सलवार कमीज़ अथवा जींस टॉप को प्राथमिकता देती हैं तो क्या यह अभद्र है , जो आज ज्यादातर बच्चियां , बहुएं , सासें , अमीर और गरीब दोनों तबका पहन रहा है।
अब बात करते हैं उस वर्ग की जहाँ वास्तव में अभद्रता दिखाई देती है । वो है मोडलिंग अथवा फिल्म जगत। यहाँ पर चंद कलाकार अश्लीलता और फूहड़ता का प्रदर्शन करते हैं , जिसके कारण आम जनता को भी उसी श्रेणी में खड़ा कर देना सर्वथा अनुचित है।
इसलिए ये व्यापक कथन कहना की "महिलाएं वस्त्र धारण में पश्चिम का अन्धानुकरण कर रही हैं" , थोडा आपत्तिजनक लगता है। दो-चार बिपाशा , राखी और मल्लिका को छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाएं अपने तन पर वस्त्रों की गरिमा को बखूबी समझती हैं और अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए क्या ज़रूरी है , ये भी बेहतर जानती हैं।
यदि साड़ी को सबसे गरिमामय मानें तो कुछ लोगों का ये प्रश्न है की -"आधा पेट खुला क्यूँ रहता है ? साडी navel के नीचे क्यूँ बंधी है ? और माशा अल्ला क्या खूब आधुनिक ब्लाउज हैं, पीठ पर मात्र दो इंच की पट्टी । क्या ये डिजाईन भी पश्चिम से आई है ? फिर पश्चिम का दोष क्यूँ ?
गन्दगी लोगों के दिमाग में होती है। जिसके पास संस्कार है , वो कोई भी परिधान पहने , शोभनीय और अशोभनीय का ख़याल हमेशा रखता ही है। जिसके पास संस्कार ही न हो अथवा लज्जा ही न हो तो उससे क्या उम्मीद रखना । लेकिन फिल्म जगत की अभद्रता की सजा आम स्त्री को उपरोक्त जुमले से नहीं मिलनी चाहिए।
आभार।