Saturday, July 23, 2011

अर्धांगिनी के लिए अर्थव्यवस्था

विवाह के उपरान्त एक पत्नी अर्थात एक अर्धांगिनी मिलती है पति को , जिसका वो सहज ही पूरा ख़याल रखता है ! उसकी छोटी-बड़ी हर इच्छा को भी पूरा करना चाहता है ! लेकिन एक पत्नी जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है , क्या उसके मन की सभी अभिलाषाएं पूरी हो पाती है ? यदि उस स्त्री के पास महीने के खर्चे का पूरा धन हो भी तो क्या वह उस धन को अपनी निजी ख़ुशी के लिए अधिकार के साथ इस्तेमाल कर पाएगी ? पति के धन को अपनी ख़ुशी के लिए कहीं खर्च करने से पहले उसे पहले अपने पति की अनुमति लेनी होगी ! यदि वह बिना बताये चुप-चाप उस धन को खर्च करती है तो उसके मन पर एक अनजाना सा बोझ रहता है !


तो फिर इसका विकल्प क्या है ? यदि कोई पत्नी एक छोटी सी धनराशी अपनी निजी ख़ुशी के लिए इस्तेमाल करना चाहती है , जिसका उल्लेख वह अपने पति से करना गैरजरूरी समझती है , तथा निजता की रक्षा के लिए अनुमति लेना असहज करता हो तो यह कैसे संभव है ? पत्नी काफी दुविधा से गुजरती है ! बिना बताये पति के धन का इस्तेमाल करने में अपराधबोध से ग्रस्त होती है ! तथा निजता की रक्षा हेतु अनुमति लेने का विकल्प भी उसे असहज करता है . अंततः वह अपनी छोटी-बड़ी कुछ अभिलाषाओं का दमन कर देती है और अपने पर्सनल स्पेस का गला घोंटकर खुद को परिवार की ज़रूरतों तक ही सीमित कर लेती है !

यह समस्या आर्थिक रूप से स्वतंत्र पत्नी को नहीं झेलनी पड़ती !चूँकि वह स्वयं कमाती है इसलिए अपनी खुशियों की पूर्ती के लिए उसे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता , न ही पति से बिल पास कराना पड़ता है !

दो ही विकल्प नज़र आते हैं ! स्वाभिमान के साथ जीने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए ! स्त्रियाँ यदि नौकरी कर रही हैं तो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं , कांफिडेंट होती हैं , परिवार का सहयोग भी करती हैं और अपने कमाए हुए धन को अपनी मर्जी के अनुसार खर्च करके अपना पर्सनल स्पेस भी सुरक्षित रखती हैं !

लेकिन एक स्त्री जो अर्थोपार्जन नहीं कर रही है , उसके पति की जिम्मेदारी है की वो अपनी पत्नी को आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य दे ! अपनी पत्नी के साथ जोइंट अकाउंट तो सभी खुलवाते हैं लेकिन आवश्यकता है की पत्नी के नाम एक separate खाता खुलवाना चाहिए , जिसमें अर्धांगिनी के लिए अपनी कमाई का आधा हिस्सा डालना चाहिए ! यदि आधा कुछ ज्यादा लगे तो अर्धांगिनी पर जितना भरोसा हो उसके अनुसार एक निश्चित राशि डालनी चाहिए , जिस पर सिर्फ पत्नी का अधिकार हो तथा जिसे वह बिना पति की अनुमति लिए इस्तेमाल कर सके और पति भी इस धन पर अनावाश्रक रूप से अपनी निगाह न रखे !

क्या एक गृहणी जो पति पर आर्थिक रूप से निर्भर है , इस आर्थिक स्वतंत्रता की अधिकारिणी है ? क्या पति अपनी पत्नी पर इतना भरोसा करता है की वह अपनी पत्नी को हर महीने एक निश्चित रकम देकर भूल जाये और पत्नी को यह एहसास दिलाये की उसका पति उसे प्यार के साथ-साथ उस पर भरोसा भी करता है और उसके निजी स्पेस का सम्मान भी करता है !

88 comments:

Rajesh Kumari said...

bahut achche vishay par likha hai Divya.is aur kisi ka dhyaan nahi jata kamse kam purushon ka to nahi.aur yah samasya nokri na karne vaali sabhi striyon ki hogi.yaani kahani ghar ghar ki.bahut achcha aapke lekh ko padhkar kuch logon ko to samajh aa hi jaayegi.varna striyan patiyon ki jeb hi kaatengi aur kya???

सदा said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने ..सटीक एवं सार्थक प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आपके लेखों में हमेशा एक सार्थक विमर्श होता है !
स्त्री मन का सटीक विश्लेषण किया है आपने !
आपके बताये उपाय से निश्चय ही आपस का प्रेम प्रगाढ़ होगा और विश्वास बढेगा !
आभार !

प्रतुल वशिष्ठ said...

आपका इस बार का लेख न केवल मुझे मत्नी को भी काफी अच्छा लगा. और हमने विमर्श किया. विमर्श की चर्चा फिर करूँगा...

shilpa mehta said...

असहमत | ....... :)

बात कमाने की या ना कमाने के नहीं है | बात आपसी समझ बूझ की है | जैसे मैं यदि कमा भी रही हूँ, तो भी मैं और मेरे पति साझा ही खर्चा करते हैं | बल्कि कमाने वाली स्त्री को कई बार तो समय ही नहीं होता कि वह अकेली कुछ शोपिंग वगैरह करने जाए - अक्सर पति पत्नी दोनों साथ ही निकल पाते हैं शाम के वक़्त - क्योंकि ऑफिस आर्स में तो दोनों ही बिजी होते हैं | तो पर्सनल स्पेस और भी कम है | जबकि जो स्त्रियाँ नौकरी नहीं करती हैं (मैं उनकी पूरी इज्ज़त करती हूँ - कृपया कोई मेरी बात को अन्य रूप में ना लें ) उनके पास समय होता है दिन के समय जब पति ऑफिस गया हो तब एक निजी जीवन जी सकें, शोपिंग आदि कर सकें | और यह "अनुमति लेने" वाली जो बात है - तो जो पति "अनुमति" के दृष्टिकोण वाले हैं (शायद बहुत ही कम होंगे - पता नहीं) - वे तो पत्नी अर्निंग हो या नहीं दोनों ही केसेस में वही करते हैं| और जो समझदार और पत्नी के सच्चे दोस्त हैं - वे दोनों ही केसेस में ऐसा नहीं करते | जैसे हमारे घर में - मेरी फाइनेंशियल समझ बहुत काम है, और मेरे पति इस मामले में बहुत समझदार हैं - तो फाइनेंस सम्बंधित डिसिशन वही लेते हैं, परन्तु यह रिश्ता अपनेपन का है - इसमें अनुमति जैसी कोई बात मुझे कभी नहीं लगती |

यदि पति पत्नी में आपसी समझ है - तो दोनों केसेस में पर्सनल स्पेस रहेगी और जिस सम्बन्ध में सिर्फ कमाना इसलिए हो कि "मेरा पैसा " अलग होगा और "मैं उसे अपने हिसाब से खर्च करूंगी" - तो वहां मैं पति को नहीं बल्कि पत्नी को गलत समझती हूँ (यह मेरा निजी दृष्टिकोण है) - इसका अर्थ है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से यह कह रही हैं कि जो पत्नियाँ नहीं कमा रही हैं उन्हें अपने हिसाब से खर्च करने का अधिकार नहीं है !!!

यह धारणा रिश्तों को कमज़ोर बनाती है कि "यह मेरा पैसा है क्योंकि यह मैंने कमाया है" - यदि इसे माना जाए तो हिंदुस्तान की जितनी भी स्त्रियाँ नहीं कमा रहीं उनके अधिकारों का हम हनन कर रहे हैं | हम यह कह रहे हैं कि उनका अपना कोई पैसा नहीं है , कोई वजूद नहीं है |

जयकृष्ण राय तुषार said...

सुन्दर वैचारिक लेख बहुत बहुत बधाई |जो भी हो कम से कम पत्नी की अर्थव्यवस्था में घोटाले तो नहीं हैं |

Dr (Miss) Sharad Singh said...

आप की बातों से सहमत हूं.
लेख बहुत ही प्रेरणा दायक है.

Poorviya said...

vichaar aacchha hai....

hamne yeh bahut pahele se kar rakhaa hai.....

jai baba banaras....

रविकर said...

एक परिवार ऐसा भी ||
जेब-खर्च भी पत्नी से मांगे पति |
कभी कोई हिसाब नहीं ||
घर का सारा प्रबंधन पत्नी के हाथ ||
मिलना चाहें तो आयें ||


अच्छी भावाभिव्यक्ति ||

बधाई डाक्टर साहिबा ||

कुश्वंश said...

अर्धांगिनी का अर्थ मात्र तुम पर मेरा आधा अधिकार नहीं है हम पर भी उनका आधा अघिकार से है और यह सही अर्थों में विस्तृत सोच बदलने से ही होगा. आप की बात सही है की गृहणी अपना संपूर्ण घर को समर्पित कर देती है और खुद पर खर्च करने के लिए देखती है किसी और की तरफ. अर्धांगिनी की सही परिभाषा होनी चाहिए न की शब्दार्थ . प्रश्न सोच से जुड़ा है और समझ से भी

chirag said...

nice post
man should respect woman and understand her situation and feeling
as i can't comment much on this becauase iam unmarried.not enough mature to comment much on this
but it was a good post

ZEAL said...

.

@ शिल्पा मेहता -

आपने लेख के भाव को समझा ही नहीं ! यहाँ एक गैरकमासुत स्त्री को थोड़ी सी आर्थिक स्वतंत्रता की बात कही गयी है ..... मेरा और तेरा पैसा की नहीं. ....आपसे आग्रह है की आप पुनः इस आलेख को एक बार बारीकी से पढ़ें ..

.

SAJAN.AAWARA said...

Dekho istri ke kya din aaye,
ghar wale usse kitna kam kraye?
Pati dev jo kahe use ardhangni,
phir bhi aadhi kamayi na use de paye.

Ye line to bas ese hi likh di hain, koi inka galat matlab na nikale.

Agar pati patni me apsi samaj hain or ek dusre par pura viswas hai to unhe koi samsya nahi hogi.


Wese bhi mere khyal se sadi se pahle ladka apne gharwalon ke hath me tankhwa rakhta hai or sadi ke baad gharwali ke hath me. Bechara apni jindgi to ji nahi pata. Ha ha ha ha:D(mam ise ek joke he samjha jaye)

SAJAN.AAWARA said...

This is a serious matter,
aakhir house wife ki bhi to apni jarurte hai, apne armaan hai.
Jai hind jai bharat

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर विवेचना, मिलजुल कर रहने के कोई न कोई तरीके निकल ही आते हैं।

Suman said...

सहमत हूँ दिव्या आपसे पर, पति कभी न कभी जता ही देता है की,
पत्नी उस पर आर्थिक रूप से डिपेंड है ! इसी लिये मेरा तो मानना यही है की जितना हो सके आज महिलाये आर्थिक रूपसे
सक्षम बने !

Ratan Singh Shekhawat said...

कोई भी कमाए ये सब आपसी समझ पर निर्भर करता है,गांवों में आपको ज्यादातर परिवार ऐसे मिलंगे जिनमे आदमी घर से दूर रहकर कमाते है घर का सारा दायित्व पत्नी के पास होता है अपनी आर्थिक हैसियत और पारिवारिक जरूरतों के हिसाब से ऐसे परिवारों में पत्नियाँ ही खर्च करती है बेशक कमाने वाले पति ही क्यों न हो|
पर सब जगह ऐसा नहीं होता|

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आपका सुझाव क्रांतिकारी है और विषय अति-जटिल। दो-तीन बार टिप्पणी लिखना शुरू किया, लेकिन हर बार अपनी बात ठीक से कह पाने में अक्षमता महसूस हुई। समस्या यही है कि जिन्हें सम्बन्ध की समझ है वहाँ ऐसे कदम की ज़रूरत नहीं है और जहाँ ज़रूरत है वहाँ इतनी समझ होती तो ज़रूरत पडती ही क्यों? विवाह-सम्बन्ध के लिये बहुत परिपक्वता की ज़रूरत होती है, चाहे इसे जन्मों का बन्धन माना जाये या अस्थाई रिश्ता। घुघूती जी ने अभी विवाह-विच्छेद सम्बन्धी एक प्रविष्टि लिखी थी जिस पर मुझे ध्यान आया कि भारतीय विवाह तंत्र में तलाक़ जैसी किसी चीज़ की व्याख्या नहीं है जबकि आज हम उसकी आवश्यकता को स्पष्ट देख पाते हैं। त्याग को परम मानने वाली उस अहंकार-विहीन उच्च संस्कृति में उनका विचार विच्छेद जैसी बात तक शायद पहुँच ही नहीं सकता था परंतु आज जहाँ मैं की प्रधानता है वहाँ इस प्रकार के सुधारों की बात अवश्य होनी चाहिये सामान्य लोगों को भले ही उसकी आवश्यकता कभी न पडे पर जहाँ आवश्यकता हो वहाँ इस दिशा में विचार आगे बढाने में कम से कम इस समय मुझे कोई बुराई नहीं दिखती है। मनन करने पर शायद कुछ अन्य आस्पेक्ट सामने आयें।

शिल्पा जी की बात भी अपनी जगह सही है परंतु सब लोग एक से नहीं हो सकते।

संत कबीर की बात याद आती है:
प्रेम गली अति साँकरी जा में दो न समाय

दर्शन सिंह जी महाराज ने कहा है:
इश्क करना है मात खा जाना, इसमें जीता हुआ भी हारा है!

कुल मिलाकर, यह विचार सोचने को बाध्य अवश्य कर रहा है।

Bhushan said...

जहाँ तक घर में आर्थिक व्यवहार का प्रश्न है, अकसर पति अपनी पत्नी को पूरी आय के बारे में नहीं बताते हैं (बुरी बात लेकिन सच्ची). पत्नी की जेब खर्ची से कुछ अधिक आर्थिक स्वतंत्रता (जिसे निजि स्पेस कहा गया है) ज़रूरी है. मैंने उन घरों की व्यवस्था बेहतर देखी है जहाँ पत्नियाँ कमाती तो नहीं है परंतु पति के वेतन का बड़ा हिस्सा वे प्राप्त करती हैं और घर-बार की व्यवस्था कुशलतापूर्वक करती हैं.
गृहणी की आर्थिक स्वतंत्रता भविष्य की भारी आवश्यकता है.

मनोज कुमार said...

स्वाभिमान के साथ जीने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए ! स्त्रियाँ यदि नौकरी कर रही हैं तो आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं , कांफिडेंट होती हैं , परिवार का सहयोग भी करती हैं और अपने कमाए हुए धन को अपनी मर्जी के अनुसार खर्च करके अपना पर्सनल स्पेस भी सुरक्षित रखती हैं !
सहमत।
हम तो अपना पूरा पैसा उनके हाथों में रख कर खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं।

mahendra verma said...

अर्थोपार्जन न करने वाली महिलाओं के पतियों की जिम्मेदारी और कर्तव्य के संबंध में आपने जो सुझाव दिए हैं वह बहुत अच्छा लगा। यह उचित है। पतियों को ऐसा करना चाहिए। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पतियों को अपनी अर्धांगिनी पर इतना भरोसा तो करना ही चाहिए।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

अलग-अलग समाज और अलग-अलग परिवारों में भिन्न-भिन्न व्यवस्थायें हैं.न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक स्वतंत्रता भी उन्हीं व्यवस्थाओं के अनुरूप भिन्न-भिन्न हैं.तथापि यह सर्व-मान्य सत्य है कि आर्थिक स्वतंत्रता होनी ही चाहिये.

Vivek Jain said...

पत्नी को आर्थिक स्वतंत्रता देना सबसे जरुरी है, बेहतर होगा पूरा पैसा ही पत्नी को सौंप दिया जाये,
बहुत सुंदर आलेख,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

नारी की व्यथा का सहज चित्रण किया है आपने इस आलेख में!

रश्मि प्रभा... said...

sahi vishay, sahi vichar

सुबीर रावत said...

सार्थक व रचनात्मक पोस्ट. House wives के लिए आपकी चिंता जायज है. परन्तु कई मामले में पति चाहे कितने भी विश्वास के साथ पत्नी को पूरी स्वतंत्रता दे किन्तु पत्नी की झिझक बनी ही रहती है,ताउम्र!
आपसे इतनी गुज़ारिश जरूर है कि House Husbands की स्थिति पर भी प्रकाश डालें.

kshama said...

क्या पति अपनी पत्नी पर इतना भरोसा करता है की वह अपनी पत्नी को हर महीने एक निश्चित रकम देकर भूल जाये और पत्नी को यह एहसास दिलाये की उसका पति उसे प्यार के साथ-साथ उस पर भरोसा भी करता है और उसके निजी स्पेस का सम्मान भी करता है !
Nahee bhoolte ye pati!
Aapne bahut dinon baad likha hai....bahut achha likha hai,hameshakee tarah,ye kahnekee zaroorat hee nahee!

Kailash C Sharma said...

आप की बात से सहमत हूँ. लेकिन आपसी समझबूझ जहां है वहाँ यह समस्या कम ही आती है. मैं तो सब पैसा पत्नी के पास ही रखता हूँ और अपने खर्चे के लिये भी उसी से मांगता हूँ, और उसके द्वारा कोई खर्च करने पर कोई प्रश्न नहीं करता क्यों कि मुझे पता है कि वह अपने पर कोई अनावश्यक खर्च नहीं करतीं. पैसे का खर्च पत्नी पर छोड़ देना बेहतर होता है. लेकिन मुख्य बात दोनों के विचारों के सामंजस्य और समझ बूझ पर निर्भर है.

S.N SHUKLA said...

उपयुक्त विषय, उपयुक्त विचार , आभार

ashish said...

हम स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर है .

Dilbag Virk said...

prasangik vishay

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मैं आज आपके लेख से सहमत भी हूँ और कुछ तथ्यों से असहमत भी. इसी प्रकार अब तक आई टिप्पणियों से भी. खासतौर उनसे असहमत हूँ जिन्होंने बिना कोई तर्क रखे ही. आपके लेख का समर्थन किया है. अनेक टिप्पणियाँ प्रभावित करती हैं. सब का नाम संभव नहीं लेकिन एक-आध नाम शिल्पा महेता, श्री रतन, स्मार्ट इंडियन आदि है.
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आपसे बहुत नाराज हूँ आप किसी भी टिप्पणी को ध्यान से नहीं पढ़ती है. मैं महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूँ.मगर पता नहीं आप किस डर से अपना ईमेल का पता ब्लॉग पर नहीं दे रखा है. मुझे कुछ आपकी गलतियों का आपको अहसास कराना है. अगर दो दिन आपकी ईमेल मुझे नहीं मिलती हैं.तब मजबूरन अपनी बात सार्वजनिक रूप से टिप्पणी बॉक्स में लिखनी पड़ेगी.अब देखता हूँ आप खुद कितनी हिम्मत वाली है और सच्ची है. हमने आपकी पोस्ट "क्या हमारी मीडिया भटक गयी है?" की और आपकी तारीफ ही तो की थी कोई जुर्म तो नहीं किया था. आपने फिर भी हमें "नीचा" दिखाने का अच्छा खासा इंतजाम किया.यहाँ इतनी बातें भी आपकी खुद की कमियों के कारण लिखनी पड़ रही है.अगर मेरे पास ईमेल होता तब आपको सारी बातें ईमेल ही करता.
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सभी पाठक देखें और विचार व्यक्त करें. जरुर देखे."प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया को आईना दिखाती एक पोस्ट"
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मैं पहले भी कहता आया हूँ और आज ब्लॉग जगत पर कह रहा हूँ कि-मुझे मरना मंजूर है,बिकना मंजूर नहीं.जो मुझे खरीद सकें, वो चांदी के कागज अब तक बनें नहीं. दोस्तों-गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे
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जरुर देखे."लड़कियों की पीड़ा दर्शाती दो पोस्ट" http://hbfint.blogspot.com/2011/07/blog-post_23.html
सभी पाठक देखें और विचार व्यक्त करें. जरुर देखे "शकुन्तला प्रेस का पुस्तकालय" ब्लॉग की मूल भावना"

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

दिव्या जी... मुझे नहीं लगता की शादी के बाद कोई खर्चा पति पत्नी छुप कर करते हो याँ इसकी आवश्यकता पड़ती हो... क्यूंकि दोनों घर को चलाते हैं इस लिए दोनों की प्राथमिकता एक होती है... बाकी आपसी सहमति और समझदारी ...
पर यह बात सत्य है कि कामकाजी महिला भी अपने द्वारा कमाए गए पैसों को खुद का कमाया कह पाए या कहे तो पति द्वारा उस पैसे को उतने ही सम्मान से देखा जाए ..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले... कोई कितनी ख्वाहिशें पूरी कर सकता/ती है, भले ही दोनों काम कर रहे हों?

रेखा said...

पति और पत्नी दोनों को ही आर्थिक स्वतंत्रता होनी ही चाहिए . परिवार में तो दोनों साथ होते है लेकिन व्यक्तिगत इच्छाए तो होती ही है. यदि एक ही व्यक्ति काम रहा है तो उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है.

दर्शन लाल बवेजा said...

बहुत सुंदर आलेख

upendra shukla said...

बहुत ही अच्छे विषय पर् आपने चर्चा की है अपनी इस पोस्ट में

Dorothy said...

प्रासंगिक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैं तो हमेशा अपनी पत्नी जी से ही पैसे मांगता हूं. और यह भी सत्य है कि कभी कभी कुछ कहासुनी हो जाती है.. लेकिन वह मेरा पूरा ख्याल रखती हैं और मैं उनसे मना ही करता हूं कि मेरे लिये यह न लाया करें, वह न लाया करें. बस उन्हें मेरी कंजूसी से चिढ़ है... जहां पत्नी आर्थिक रूप से निर्भर है, वहां उस के लिये अलग व्यवस्था तो होना ही चाहिये. क्योंकि इच्छायें क्या केवल स्वयं कमाने वाले की ही हो सकती हैं...

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
जितना अधिकार पति का पत्नी पर है उतना ही पत्नी का पति पर भी है| ऐसे में धन पर दोनों का अधिकार होना चाहिए, चाहे कमाने वाला कोई भी हो| यदि पति कमा कर ला रहा है तो पत्नी भी घर चला रही है| ऐसे में दोनों का योगदान बराबर है| वहीँ यदि पत्नी भी कमाने वाली हो तो इसका मतलब यह नहीं कि घर की जिम्मेदारी भी उसी की है| इसमें पति को भी साथ देना होगा|
यह बात सही है कि जो स्त्री अर्थोपार्जन नहीं कर रही, उसके पति को चाहिए कि वह उसे आर्थिक स्वतंत्रता दे| एक घरेलु स्त्री इस स्वतंत्रता की अधिकारिणी है| घरेलु स्त्रियाँ भी आत्मविश्वासी हो सकती हैं यह आवश्यक नहीं कि केवल नौकरी करने वाली महिलाएं ही कॉन्फिडेंट हों|
अब पति अपनी पत्नी पर कितना भरोसा करता है यह बताना मेरे लिए असंभव है| मेरा कोई अनुभव नहीं है, और न ही ऐसा अनुभव पाना चाहता हूँ| किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूँ कि पति को भी अपनी पत्नी पर विश्वास करना होगा और उसके निजी स्पेस का सम्मान करना चाहिए|

सहमत हूँ आपसे...

JC said...

दिव्या जी, हरेक व्यक्ति की अपनी अपनी भिन्न भिन्न मान्यताएं बन जाती हैं,,, जो कई बातों पर निर्भर करती हैं... जैसे कि जो संस्कार वो अपने माता-पिता आदि के द्वारा प्राप्त करता है... जो हमारे परिवार में अनादि काल से चला आ रहा है वो तुम्हारे लिए भी सही है... किन्तु क्यूंकि प्रकृति परिवर्तनशील है, शायद इस कारण किसी व्यक्ति विशेष की प्रकृति भी कभी कभी अचानक बदलती दिख जाती है (?)...

अब, मान लो, कोई लंगड़ा हो तो क्या वो दौड़ पायेगा? और यदि 'तारे ज़मीन पर', अथवा 'पा' जैसा कोइ यदि जन्म से हो, यानि यदि वो एक 'नॉर्मल' व्यक्ति समान न हो तो फिर भी क्या उससे 'हम' वो ही अपेक्षा करें तो वो 'सही' होगा?
और क्या सभी 'नोर्मल' दिखने या कहलाये जाने वाले सभी व्यक्ति एक सा व्यवहार करते हैं? 'हम' आम तौर पर सुनते हैं किसी किसी को कहते हुए कि तुम से तो ऐसा अपेक्षित नहीं था?
एक ही परिवार के चार सदस्यों का, जो उसी वातावरण में रहते है और खान पान एक सा है, क्या उन की प्रकृति में कुछ समानता होते हुए भी कुछ क्षेत्रों में भिन्न भिन्न नहीं दिखती? उदाहरणतया संगीत में सभी की रूचि हो, किन्तु एक सितार/ गिटार में रूचि रखता हो तो संभव है एक अन्य की रूचि तबला/ ढोलक बजाने में हो,,, आदि आदि...

'मेरा' कहने का तात्पर्य है की जैसी 'प्रकृति' में भिन्न भिन्न रूप और उनकी अलग अलग प्रकृति दिखाई देती है ऐसे ही मानव, परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति, में भी दिखाई पड़ती है,,, जिस कारण आपको अनेकानेक रोल मॉडल दिख जायेंगे... एक लेखक ने लिखा था कि कई व्यक्ति जिस समय रेलवे स्टेशन पहुँचते हैं, उन्हें गाडी खड़ी मिलती है और उनके बैठते ही चल भी पड़ती है; कुछ ऐसे होते हैं जो पाते हैं कि गाड़ी कई घंटे लेट चल रही है; और कई ऐसे भी होते हैं कि जब वो पहुँचते हैं तो पता चलता है कि बस अभी अभी एक मिनट पहले ही गाडी चली गयी! आदि आदि... शायद इन्ही तीन संभावनावों के कारण 'हिनू' ब्रह्मा-विष्णु-महेश की तिगडी (ॐ) की कल्पना कर बैठे :)

udaya veer singh said...

स्त्री -विमर्श पर यह आलेख अनमोल सा लगता है ,मैंने देर से पढ़ा , पर जब पढ़ा तो विस्मृत नहीं कर पाया ,बिसरी यादों को ,जिनको भ्रमण के दौरान मैंने महसूस किया ,संयोग /दुर्योग से मेरे जन्म की तारीख में प्रकाशित यह लेख , मेरा सगा [स्त्री- विमर्श ] लगा .. क्या हम दे पाए हैं . शिर्फ़ छल के हम .... / अंतर्मन को आवाज देता लेख को बहुत सम्मान जी /

सुज्ञ said...

आज तो आपके लेख के विवेचन को पढना और टिप्पणी विमर्श पढ कर मानव व्यवहार के इस पक्ष को समझने का ही प्रयास कर रहा हूँ।

देखते है क्या क्या तथ्य उभरते है। एक सार्थक विमर्श!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विचारणीय विषय उठाया है ...

कई बार यह भी देखने में आता है की स्त्रियां जो कामकाजी हैं और खुद आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं वो अपना कमाया हुआ पैसा भी अपनी मन मर्ज़ी से खर्च नहीं कर पातीं .. उस पैसे को खर्च करने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है .. या स्पष्टीकरण देना पड़ता है ... और कहीं कहीं स्त्रियां धनोपार्जन नहीं करतीं तब भी अपनी मर्ज़ी से पैसे खर्च कर पाती हैं .. यह अलग अलग व्यक्ति की सोच पर निर्भर करता है ..पर हाँ जब वो आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित होती हैं तो स्थिति ज्यादा विकट होती है ..

Maheshwari kaneri said...

प्रासंगिक विचारणीय, और सटीक अभिव्यक्ति. आभार....

mridula pradhan said...

sab kuch pati-patni ke apsi taal-mel par nirbhar karta hai.....alag-alag soch ke log alag nirnay lete hain.

अजय कुमार said...

अपने घर में तो ये है कि पैसा पत्नी के पास रहता है और जब मुझे जरूरत होती है मांग लेता हूं । वैसे मुझे मांगना नहीं पड़ता है ,वो खुद ही मेरे पर्स का वजन ठीक रखती है ।

Arunesh c dave said...

भाई अपने राम तो बीबी के गुलाम एटीम से लेकर सब कुछ श्रीमति ही संभालती हैं अपन ठहरे मस्त मौला हाथ मे आये पैसा तो किधर गया पता नही वैसे बात सही है कि जहां पत्नी निर्भर हो तो उसे कुछ धन राशी देनी/मिलनी ही चाहिये पर ऐसी स्थितियां तभी होती है जब आपसी सामंजस्य न हो

aarkay said...

मामला कमाने या न कमाने का हो कर आपसी समझ बूझ का भी है , साथ ही पति की कमाई व परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है । बहुत बरस पूर्व एक कहानी पढ़ी थी , जिसमे पति अपनी पत्नी से कहता है – मैं इक्नोमिक्स में एम . ए . हो कर छ: सौ रुपए कमाता हूँ , तुम साहित्य में एम . ए . हो कर कमाई का हिसाब भी नहीं रख सकतीं – परंतु अब स्थिति वैसी नहीं रही । कुछ पत्नियाँ अपना अधिकार छीन कर लेना भी जानती हैं । हाँ , पति की ओर से कोई रोक टोक न हो, तो भी पत्नी को अपनी सीमाएं तय करनी होती हैं – देखा देखी या क्षमता से अधिक किया गया खर्च , पारिवारिक कलह का ही कारण बनेगा ।
विषय विचारणीय है , आलेख भी सुंदर बन पड़ा है ।
बधाई !

shilpa mehta said...

जी जील जी :) ---- मैं लेख की भावना समझ रही हूँ, और यह बहुत अच्छी बात है कि पत्नी के निजी जीवन की ज़रुरत को आपने समझा भी और उसे एन्श्युर करने का आपने एक तरीका भी सुझाया | मैं उस बात से सहमत भी हूँ | ------- किन्तु मेरे विचार में यह तरीका एक शोर्ट टर्म सोल्यूशन है - लॉन्ग टर्म में यह परिवार को और तोड़ेगा | यह ऐसा है कि यदि मेरे नाखून टूट रहे हैं - तो मैं नेल पोलिश लगा कर क्रैक्स को छुपा तो सकती हूँ, किन्तु दीर्घ काल में यह नाखूनों को और अधिक नुक्सान करेगा - ज़रुरत है कि मैं कैल्शियम आदि खाऊँ और नाखूनों को मजबूत बनाऊं |

किन्तु मैं अपनी बात ठीक से समझा नहीं पायी , यह मेरे शब्दों और अभिव्यक्ति की कमी है | मैं यह कह रही थी कि मेरे हिसाब से पति पत्नी के रिश्ते में इतना प्यार , विश्वास, अपनापन और आपसी समझ होनी चाहिए कि ऐसी ज़रुरत ही न पड़े | यह " यदि वह बिना बताये चुप-चाप उस धन को खर्च करती है तो उसके मन पर एक अनजाना सा बोझ रहता है " - ऐसा इसलिए है कि पति नहीं बलिक पत्नी इस पैसे को "हमारा" ना मान कर"इनका" मान रही है | कहीं अचेतन में उसे यह भावना है कि हम एक इकाई नहीं बल्कि दो व्यक्ति हैं | यह स्थिति होनी ही नहीं चाहिए पति पत्नी के बीच, ऐसा मेरा मानना है | ------मैं आपकी बात मान रही हूँ कि भले ही ऐसा "होना नहीं चाहिए" लेकिन "ऐसा होता है" --- और इसके लिए मैं ज़िम्मेदार समझती हूँ हमारी इस नयी सोच को जिसने पति पत्नी को "हम " से बदल कर "तुम और मैं" बना दिया है |

मेरे हिसाब से यह अलग बैंक अकाउंट का ऑप्शन शायद शोर्ट टर्म में फायदेमंद हो किन्तु लॉन्ग टर्म में यह जीवन के इस अहम् रिश्ते को नुकसान ही पहुंचाएगा | कुछ दिन बाद क्या हम बच्चों के निजी जीवन के लिए उनके अकाउंट की भी बात करें ? इस का कोई अंत नहीं | और जो पति अपनी पत्नी के लिए अकाउंट खुलवायेंगे - वे पहले से ही उसको अपना निजी जीवन की आजादी देते रहे होंगे | और जो नहीं देते रहे होंगे, वे अकाउंट खुलवाएंगे ही नहीं|

मैं यह मानती हूँ कि पत्नी बाहर नौकरी करती हो या नहीं, पैसे कमाती हो या नहीं - इससे उसकी आर्थिक या किसी और तरह की आज़ादी में फर्क आना ही नहीं चाहिए - और इस तथा कथित "महिला मुक्ति" से पहले ऐसा था भी नहीं | हमारी दादी नानी नौकरियां भी नहीं करती थीं, उनके अलग अकाउंट भी नहीं होते थे - किन्तु उन्हें यह भावना भी नहीं होती थी कि यह "पति का पैसा " है और मुझे "अनुमति" लेनी है आदि (अपवादों को छोड़ दें - वह तब भी थे और अब भी हैं ) | यह जो मेरा तेरा की भावना आजकल पनपने लगी है - यह लॉन्ग टर्म में परिवार को बहुत नुक्सान पहुंचाएगी ऐसा मेरा मानना है |

यदि मेरी बातों से आपको ठेस लगी तो मैं माफ़ी मांगती हूँ, किन्तु मेरे जो विचार थे वह मैंने बहे , आशा है समझा सकी होउंगी जो मैं कहना चाह रही थी |

दिगम्बर नासवा said...

सामाज में अभी पूर्ण रूप से परिपक्वता आनी है इस दिशा में ... पर आपसी सूझ ही इसका सही माध्यम है ... हर पतिपत्नी के रिश्ते में ऐसा हो ये जरूरी नहीं ...

आशा said...

यह तो आपसी ताल मेल से ही संभव होपाता है की घर की अर्थ व्यवस्था कैसे चलेकभी पति इतना व्यस्त होता है की पत्नी ही सारा
घर सम्हालती है और कभी इसका उलटा भी हो सकता है |
अच्छा सोच बधाई
आशा

वन्दना said...

स्त्री मन का सटीक विश्लेषण किया है आपने !

G.N.SHAW said...

कुछ हद तक सुझाव अच्छे है , पर मनमुटाव ज्यादा उत्पन्न करेंगे ! यहाँ पति / पत्नी कमाऊ है या बेकार , दोनों में अति प्यार हो तो इस तरह के मंसूबो की जरुरत नहीं पड़ती ! प्यार १००% भी छीन सकता है ! एकाउंट या खाते दिल को बाँटेंगे और दिल बटा, तो टूट नजदीक ! वैसे पत्नी या पति एक गहरे प्रेम के सूचक है ! इनके बीच बाहरी चीजो की दखलंदाजी ठीक नहीं ! चाहे जिस किसी रूप में क्यों न हो ! वैसे आप की कल्पना और यह लेख कुछ सोंचने पर वाध्य कराती है !

प्रतुल वशिष्ठ said...

दिव्या जी,
क्या एक अन्य स्थिति पर भी साथ ही साथ विचार किया जा सकता है ? :
— हर महीने पति अपनी पूरी तनख्वा पत्नी के सुपुर्द कर दे. लेकिन कुछ अतिरिक्त मेहनत के द्वारा या कोई पुरस्कार के रूप में एक अच्छी खासी रकम मिले और वह उसे किसी के लिये उपहार खरीद ले और पत्नी को बिना बताये अपनी किसी अनन्य महिला मित्र या प्रिय बहिन अथवा भतीजी-भतीजे को भेंट कर दे.... या फिर दोस्तों के बीच पार्टी में उस रकम को उड़ा दे... ऐसे में पत्नी द्वारा आपत्ति करना क्या उचित ठहराया जायेगा?
यदि पत्नी की आपत्ति यहाँ उचित है तो पति के द्वारा पत्नी के निजी व्यय पर भी आपत्ति करना उचित ही है.
— दूसरी स्थिति..... पत्नी अपने निजी व्यय से पति के लिये ही गुपचुप कोई फिजूल का उपहार खरीद कर अपने प्रेम का प्रदर्शन करे .... उस उपहार वाली रकम से जबकि परिवार की किसी अन्य आवश्यक जरूरत को पूरा किया जा सकता था ... लेकिन इस कारण पति के क्रोध का शिकार पत्नी हुई .... उसकी भावुक नासमझी से दोनों के बीच मनमुटाव हुआ ....तब ऐसे में क्या दोनों का व्यय से पूर्व परामर्श करना उचित नहीं होता?

प्रतुल वशिष्ठ said...

sudhaar kar padhen :

... कोई पुरस्कार के रूप में एक अच्छी खासी रकम मिले और वह उससे किसी के लिये उपहार खरीद ले

Dr Varsha Singh said...

remarkable post....

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

पांचों अंगुली बराबर नहीं होती है।

अनामिका की सदायें ...... said...

sangeeta ji ne jo kaha sthiti vaisi hi hai. sateek vishay chuna hai. sabke halaat alag alag hain chahe vo kamaati hon tab bhi swatantr nahi hain.

मनोज भारती said...

शिल्पा मेहत्ता ने जो विचार व्यक्त किए हैं...मैं उन्हें सही मानता हूँ!!!

"हमारी दादी नानी नौकरियां भी नहीं करती थीं, उनके अलग अकाउंट भी नहीं होते थे - किन्तु उन्हें यह भावना भी नहीं होती थी कि यह "पति का पैसा " है और मुझे "अनुमति" लेनी है आदि (अपवादों को छोड़ दें - वह तब भी थे और अब भी हैं ) | यह जो मेरा तेरा की भावना आजकल पनपने लगी है - यह लॉन्ग टर्म में परिवार को बहुत नुक्सान पहुंचाएगी ऐसा मेरा मानना है |"

मैं समझता हूँ कि अहम भाव ही रिश्तों को खंडित करता है। फिर उनका यह तर्क भी अच्छा लगा कि "कुछ दिन बाद क्या हम बच्चों के निजी जीवन के लिए उनके अकाउंट की भी बात करें ? इस का कोई अंत नहीं | और जो पति अपनी पत्नी के लिए अकाउंट खुलवायेंगे - वे पहले से ही उसको अपना निजी जीवन की आजादी देते रहे होंगे | और जो नहीं देते रहे होंगे, वे अकाउंट खुलवाएंगे ही नहीं|"

ZEAL said...

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मैंने तो बात एक ग्गृहणी की आर्थिक स्वतंत्रता की उठायी है ! लोग दादी नानी के ज़माने के बात करने लगे . हमारी दादी नानी तो , भेड़ बकरी की तरह जीवन गुज़ार कर चली गयीं . एक लम्बे अरसे से स्त्रियों को शादी के दौरान गहने देकर पूरी जिंदगी घर संभालने की एक मशीन समझकर ही रखा गया. वे अपने बारे में सोच सकें , इस लायक ही उन्हें नहीं छोड़ा जाता था. परिवारों का टूटना किसी प्रकार से भी स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता से सम्बंधित नहीं है ! यदि आर्थिक स्वतंत्रता परिवारों को तोडती है तो तलाक का जिम्मेदार , नौकरी करने वाला पुरुष ही होना चाहिए , स्त्री नहीं !

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ZEAL said...

@ रमेश सिरफिरा जी ,
आपको मुझसे जो भी शिकायतें हैं उसे बेहिचक सार्वजनिक तौर पर लिखिए ! पूरी पारदर्शिता के साथ ! मेरी कमियां सबको पता होनी चाहिए !

ZEAL said...

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@- शिल्पा जी-

आप गृहणियों की आर्थिक स्वतंत्रता के खिलाफ हैं , यह बात आप की पहली टिपण्णी से भी स्पष्ट है , इसलिए चिंता न करें , आप अपनी बात अच्छी प्रकार से अभिव्यक्त कर पा रही हैं !

मेरे बुरा मानने की चिंता न करें , यदि मैं बुरा मानूंगी तो समाज की बहुत सी लड़ियाँ अधूरी रह जायेंगी ! मौन-मूक और दबी-सहमी हुयी महिलाओं के लिए अभी लम्बी लड़ाई लड़नी है मुझे !

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ZEAL said...

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प्रतुल जी ,

आपकी टिपण्णी से बहुत निराशा हुयी ! पुरुष या स्त्री अपनी मर्जी से कुछ खर्चा यदि करना चाहते हैं तो वे केवल , चोरी छुपे बनाये गए प्रेमी-प्रेमिका के लिए नहीं करते हैं ! निजी इच्छा कुछ भी हो सकती है ! हो सकता है एक गृहणी अपने दूर-देस बैठे भाई , बूढी माँ या पिता से बात करना चाहती हो , हो सकता है , किसी गरीब मित्र की मदद करना चाहती हो ? हो सकता है परोपकार में दान करना चाहती , हो सकता है कोई साडी लेने को ही दिल मचल जाए , हो सकता अपने मायके वालों की मदद करना चाहती हो जिसके लिए पति से कहने में संकोच हो ?

यदि उसके पास आर्थिक स्वतंत्रता होगी तो वह अपने पास जमा छोटी सी धनराशी को अपनी छोटी-छोटी खुशियों पर खर्च कर सकेगी और जीवन में संतोष का अनुभव कर सकेगी ! छोटे-छोटे लम्हों को जी पाना ही तो जीवन है ! पत्नी पत्नी एक दुसरे के पूरक होते हैं , लेकिन दोनों की खुशियों सौ प्रतिशत एक नहीं होतीं ! कुछ खुशियाँ और अरमान पति-पत्नी के एक दुसरे से अलग भी होते हैं !

आर्थिक स्वतंत्रता एक गृहणी के संकोच की बेड़ियों को काटता है , उसे एक छोटा सा खुला आसमान देता है , छोटी सी उड़ान के लिए.

उड़ने दीजिये !

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ZEAL said...

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लोगों ने आपसी समझदारी की बात कही है ! पहली समझदारी तो इसी में है की अपनी पत्नी को हर प्रकार की स्वतंत्रता दी जाए , जिसमें आर्थक स्वतंत्रता सबसे अहम् है ! जो पति अपनी पत्नी पर भरोसा करता है , केवल वही अपनी पत्नी को आर्थिक स्वतंत्रता दे सकता है , वरना उसको यही डर लगा रहेगा की पता नहीं कहाँ लुटा देगी मेरी मेहनत की कमाई को ! कहीं मेरी मेहनत की कमाई लेकर भाग तो नहीं जायेगी !

जो पत्नी एक-एक पैसा बचा कर घर संभालती है , पति के मेहनत के पैसों का पूरा सम्मान करती है और कम से कम खर्च में घर को चलने की कोशिश करती है , वही स्त्री थोड़ी सी आर्थिक स्वतंत्रता मिलने पर उसका दुरुपयोग करने लगेगी ? घर टूट जायेंगे ? ...कैसे ? ...क्या स्त्रियों की नैतिकता इतनी उथली है ? लोगों की इस भय से बाहर आना होगा की आर्थिक स्वतंत्रता मिलने पर एक स्त्री अपने नैतिक और पारिवारिक दायित्वों को भुला देगी !

क्या आर्थिक स्वतंत्रता देने वाले पति समझदार नहीं होते ? होते हैं ! वे ज्यादा समझदार और संवेदनशील होते है . ! वे अपनी पत्नी को न सिर्फ प्यार करते हैं , अपितु उस पर अटूट विश्वास भी करते हैं ! ऐसे पति-पत्नी में आपसी विश्वास अधिक प्रगाढ़ होता है और कई गुना better understanding होती है !

घर टूटने के डर से जो पति अपनी पत्नी को आर्थिक स्वतंत्रता से वंचित रखते हैं , वे पति अति-स्वार्थी की श्रेणी में रखे जायेंगे. !

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पी.एस .भाकुनी said...

क्या पति अपनी पत्नी पर इतना भरोसा करता है की वह अपनी पत्नी को हर महीने एक निश्चित रकम देकर भूल जाये.............
अक्सर नहीं बल्कि अधिकाँश घरों में ऐसा ही होता है , हालाँकि यह बात स्पष्ट नहीं हो पाई है की उपरोक्त रकम किस लिए ? दूसरी बात ! पति-पत्नी के बीच में नीजता ( व्यक्तिगत ) खासकर आर्थिक मामलों में क्या हो सकती है ? यह प्रश्न अभी भी अनुतरित है,विचारणीय पोस्ट हेतु आभार.......................

ZEAL said...

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भाकुनी जी ,

निजी इच्छाएं कुछ भी हो सकती है !...करोड़ व्यक्ति और इच्छाएं अनंत ( छोटी-छोटी खुशियाँ ) ...इसको स्पष्ट किया है ऊपर कुछ टिप्पणियों में , यदि आप उसे पढ़ें तो आपका प्रश्न अनुत्तरित नहीं रहेगा !

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प्रतुल वशिष्ठ said...

हो सकता है एक गृहणी अपने दूर-देस बैठे भाई, बूढी माँ या पिता से बात करना चाहती हो,
हो सकता है किसी गरीब मित्र की मदद करना चाहती हो ?
हो सकता है परोपकार में दान करना चाहती,
हो सकता है कोई साडी लेने को ही दिल मचल जाए,
हो सकता अपने मायके वालों की मदद करना चाहती हो जिसके लिए पति से कहने में संकोच हो?

@ दिव्या जी,
आपने जितने भी कारण गिनाये हैं ये सभी पत्नी द्वारा गुप्त रीति से किये जाने पर पति को अधिक दुःख पहुँचा सकते हैं. जबकि पारदर्शिता से किये जाने पर पति को गर्व की अनुभूति देंगे.

'पत्नी द्वारा किये गये गुप्त व्यय' पति को बुरे तब लगते हैं जब पत्नी 'भरे हुए को ही भरती हैं' ....... मैं तो ऐसे में विरोध करता हूँ.. कहा सुनी तक हो जाती है.
जरूरत मंद की मदद तो सभी को अच्छी लगनी चाहिए... और लगनी भी चाहिए.

एक अन्य स्थिति पर विचार करें :
मेरा छोटा भाई है... वह अत्यंत सामाजिक है... किसी का दुःख नहीं देख सकता ....मित्र-जाल व्यापक है, 'रक्त-दान' का बेहद शौक है.. 'तीन महीने के अन्दर दो-दो बार रक्त दे देता है... घर में नहीं बताता... शरीर को खामियाजा भी हुआ है... फिर भी खून देने का लती है... सभी के दुःख उसके अपने होते हैं.... माता-पिता और पत्नी के मना करने पर भी वह गुपचुप 'रक्तदान' कर ही देता है.
जिस स्वास्थ्य को 'पत्नी' पति को प्रदान करती है या ......... जो रक्त शरीर में बहता है.. उस पर केवल क्या 'उस शरीर वाले' का अधिकार है...जो 'रक्त-दाता' बना हुआ है.. बिना अनुमति और परामर्श के रक्त को व्यय किये दे रहा है.

मुझे स्त्री के निजी खर्च कुछ इसी तरह के प्रतीत हो रहे हैं... जैसे मेरा भाई 'रक्त-दान' को निजी-निर्णय मानता है.

___________________________
आपने अपने इस लेख से मुझे और मेरी पत्नी को दो खेमों में बाँट दिया.. पत्नी को आपकी कही बातें सही लगती हैं. और मुझे तर्क से माननी हैं आपकी बातें.... इसलिये उलझा हुआ हूँ. मेरी बातों से निराश न होना... आप चाहें तो 'पक्ष में भी बहुत बढ़िया बातें कर सकता हूँ... लेकिन तब चर्चा-सुख जाता रहेगा.

प्रतुल वशिष्ठ said...

sudhaar :

जरूरत मंद की मदद तो सभी को अच्छी लगनी चाहिए... और लगती भी होगी.

पी.एस .भाकुनी said...

चंद मिनटों का फर्क रहा मेरी टिपण्णी और उपरोक्त कुछ प्रति टिप्पणियों के प्रकाशन में, कुछ बाते स्पष्ट हुई, कुछ अनुतरित प्रश्न अब अनुत्तरित नहीं रहे,
वैसे किसी भी मामले में चाहे वे मामले निजी ही क्यों न हो यदि पति-पत्नी आपस में विचार-विमर्श करें या फिर अपनी प्लानिंग को आपस में साझा करते है तो इससे यकीनन दोनों के बीच में सौहार्द एवं बिश्वास को बढ़ावा मिलता है और कहीं पर भी किसी भी प्रकार का संदेह नहीं रह जाता है,
आभार .............

veerubhai said...

सब के अपने अपने अनुभव हैं .कोई सामान्य करण नहीं किया जा सकता .सब कुछ पति के व्यक्तित्व पर निर्भर है .वह पत्नी के पूर्ण नियंत्रण में रहना सुरक्षित मानता है या उसे अधीनस्थ बनाए रखना चाहता .भारतीय समाज आज भी जड़ता की स्थिति में है ,ज़रूरी नहीं है आर्थिक रूप से स्वतंत्र नारी को उस परिवार में वह अधिकार हासिल हो जहां उसका कमाया पैसा आंशिक या पूर्ण रूपेण उसे खर्चने का हक़ हासिल हो .ऐसी भी पत्नियां हैं जिनके लल्लू पतियों को आज तक उनकी तनखा कितनी है ये भी इल्म नहीं .अनुभवों का दायरा विस्तृत है .

shilpa mehta said...

जी जील जी - पूरे आदर के साथ - मैं यहाँ भी असहमत हूँ |मैं बिल्कुल भी आर्थिक स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं हूँ, कृपया मुझे जाने बिना मुझ पर ऐसे इलज़ाम न लगायें | .... और बुरा मानना और होता है , बुरा लगना और होता है ........| जैसे मुझे यह इलज़ाम बुरा लगा, पर मैंने बुरा माना नहीं, क्योंकि आप अपने दृष्टिकोण से सोच रही हैं और मैं मेरे ...| :) कृपया नाराज़ ना होकर , मेरे पूरे कमेंट्स (तीनों) को दोबारा पूरा पढ़ें, सरसरी तौर पर नहीं, और देखें कि मैं कह क्या रही थी |

अब आप प्लीज़ अनवरत ब्लॉग की तरह मुझे मत कहें कि - "आप मेरे ब्लॉग पर आई थी, मैं वहां नहीं ... " , ...... :) .....क्योंकि मुझे आपके ब्लॉग पर आना , पढना और आपके उठाये इशुज़ बहुत अच्छे लगते हैं, अधिकतर मैं सहमत भी हूँ, पर इस बारे में नहीं | ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि मैं पढ़ कर चुप चाप चली जाऊंगी, अपनी बात कहूँगी नहीं, पर शायद आप भी यह नहीं चाहेंगी, क्योंकि यहाँ बहुत ही हेल्थी चर्चाएं इनिशिएट करती हैं आप | जो लड़ाई आप लड़ रही हैं, वह मैं भी लड़ रही हूँ, हाँ हो सकता है मैं आपके जितना न कंट्रीब्युट कर रही हूँ, किन्तु मैं भी स्त्री हूँ, तो यह लड़ाई हम सब की है | इसमें हम में से एक यदि दूसरे की वैचारिक स्वतंत्रता पर रोक लगाने लगे, इलज़ाम लगाए, तो हम आगे कैसे बढ़ेंगे ?

और "गृहणियों" की आर्थिक स्वतंत्रता को क्या आप "नौकरीपेशा स्त्रियों" की आर्थिक स्वतंत्रता से अलग समझती हैं? क्या जो स्त्रियाँ नौकरी कर रही हैं , उनकी इच्छाओं का या उनकी निजता का महत्व इसलिए कम हो जाता है क्योंकि वे "अर्निंग" हैं? मैंने कहा यह था कि ------ पति और पत्नी दोनों ही , मिलकर या अलग अलग , जो भी कमायें ------- वह ***बराबरी से दोनों का है , "मेरा और तेरा" नहीं "हमारा" है ***| - आप मेरी बात समझ ही नहीं पायीं, और समझाना मुश्किल है यदि आप मुझ पर इस तरह के इलज़ाम लगायें और मुझे अपनी बात कहने ही न दें |

मैंने ऊपर इसीलिए नेलपॉलिश का उदाहरण दिया था - कि यदि आपसी समझ की कमी से तकलीफ हो रही है - तो दोनों को, सिर्फ स्त्री को ही नहीं | उसका इलाज़ कौन्सेलिंग वगैरह, या सोसाइटी में एजुकेशनल रिफोर्म्स हो सकते हैं, और ज्यादा अलगाव नहीं | यदि मेरे हाथ में घाव हो तो मैं उसे फुल स्लीव्स पहन कर छुपा सकती हूँ, पर वह और बिगड़ेगा - उसे छुपाने की नहीं, ठीक करने की ज़रुरत है | यदि मेरे नाखून क्रेक हो रहे हैं , तो नेलपॉलिश से छुपा सकती हूँ, पर यह इस समस्या को और बढ़ाएगा, मुझे अपना खान पण सुधारने की ज़रुरत है | यदि मुझे बुखार है, तो मुझे अपने अन्दर के बुखार के कारण को पता करने और उसका इलाज़ करने की ज़रुरत है, पैरासिटेमोल खा लूं तो बुखार तो अभी के लिए उतर जाएगा किन्तु अन्दर जो इन्फेक्शन है, वह बढ़ता ही जाएगा , यह इलाज़ नहीं है, यह ढांकना या छुपाना है|

मैं यह कह रही हूँ कि यदि जोइंट अकाउंट है , तो पति और पत्नी दोनों ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, दोनों में से किसी को भी एक दूसरे से अनुमति लेने की ज़रुरत नहीं है | यदि पत्नी को झिझक है - तो यह झिझक पति को भी है - क्योंकि जो भी धन है, वह दोनों का है | यह झिझक अमुनती नहीं अपनेपन तक ही होनी चाहिए |

shilpa mehta said...

ऊपर "अमुनती " नहीं, अनुमति पढ़ा जाए | ..................." यह झिझक अनुमति नहीं अपनेपन तक ही होनी चाहिए" |

और एक बात - कि मेरी पहली टिप्पणी पर आपने कहा था कि आप "थोड़ी सी" आर्थिक स्वतन्त्रता की बात कह रही हैं , तो मैं यह कहने की कोशिश कर रही हूँ , कि यह "थोड़ी सी" नहीं, बल्कि "पूरी " आर्थिक स्वतंत्रता हो, जो दूरी बढाने से नहीं, बल्कि अपनापन बढाने से आएगी | यह "अलग" और "मेरे" अकाउंट से नहीं, बलिक "एकजुट" और "हमारे" अकाउंट से होगी |

ZEAL said...

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@ दिव्या जी,
आपने जितने भी कारण गिनाये हैं ये सभी पत्नी द्वारा गुप्त रीति से किये जाने पर पति को अधिक दुःख पहुँचा सकते हैं. जबकि पारदर्शिता से किये जाने पर पति को गर्व की अनुभूति देंगे....

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@--प्रतुल जी ,

गुप्त रूप से चोरी से करने की बात कौन कर रहा है ? यदि पत्नी के पास थोड़ी आर्थिक स्वतंत्रता होगी तो वह अपनी खुशियों और अरमानों को भी पूरा कर सकेगी ! पति पत्नी के ख्वाब और खुशियाँ सब एक जैसे नहीं होते ! अक्सर उनकी कुछ खुशियों पर एक दुसरे की असहमति भी होती है ! ऐसी स्थिति में थोड़ी सी आर्थिक स्वतंत्रता की दरकार है ! इसी को मैंने "निजी स्पेस" का नाम दिया है !

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ZEAL said...

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@ शिल्पा जी ,

नया कुछ नहीं कहना !
आभार !

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ZEAL said...

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@-___________________________
आपने अपने इस लेख से मुझे और मेरी पत्नी को दो खेमों में बाँट दिया.. पत्नी को आपकी कही बातें सही लगती हैं. ....

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आपकी ही नहीं , ज्यादातर पत्नियाँ को ये बातें सही लगेंगी ! क्यूंकि स्त्रियों अपने मन की व्यथा न किसी से कह पाती हैं , न ही कहीं लिख पाती हैं ! पति होने का यह अर्थ नहीं की वह अपनी पत्नी को भली प्रकार समझ ही रहा है ! अक्सर वह अपने उसूलों, सिधान्तों और विचार को अपनी पत्नी पर थोपता है ! लेकिन विरले ही पति ऐसे होते हैं , जो अपनी पत्नी की अनकही इच्छाओं को समझ पाते हैं ! ज्यादर तो यही सोचते हैं की यह मेरी earning को गुप्त रूप से जाने कहाँ लुटा रही hai ! जैसे पत्नी न हुयी लुटेरा हो गयी !

पति अपने कमाए धन को अपनी पत्नी , अपने बच्चे , अपने माता-पिता और अपने मित्र पर स्वत्रता के साथ खर्च करता है , लेकिन पत्नी से अपेक्षा करता है की वह उस धन को सिर्फ बच्चों और परिवार के लिए ही खर्चे , अपने माता-पिता और मित्रों पर न खर्च करे पति की कमाई को !

क्या विवाह के बाद , पति पर निर्भर स्त्री अपने माता पिता को बिलकुल भुला दे ? उन पर कैसी भी विपन्नता हो वो चुपचाप तमाशा देखे ? क्यूंकि वो पराया धन है ?

पति के माता-पिता की जिम्मेदारी तो पत्नी निभाये , लेकिन पत्नी के माता-पिता की जिम्मेदारी पति अपने ऊपर bilkul नहीं समझता ! ऐसी परिस्थिति में ही थोड़ी सी सामाजिक और थोड़ी सी आर्थिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है , ताकि पत्नी को पति की असहमति होने पर अपनी भावनाओं का गला न घोंटना पड़े !

विवाह स्त्री के साथ किया जाता है , लेकिन उसके सपनों और भावनाओं का सौदा नहीं किया जा सकता ! स्वतंत्रता का अधिकार छीनना सबसे बड़ा जुर्म है !

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ZEAL said...

@--मेरी बातों से निराश न होना... आप चाहें तो 'पक्ष में भी बहुत बढ़िया बातें कर सकता हूँ... ....

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प्रतुल जी ,

निराशा आपकी असहमति से नहीं बल्कि आपके एक ख़ास तर्क से हुयी थी , जिसका उत्तर अपनी पूर्व टिपण्णी में दे चुकी हूँ . ...

किसी भी विमर्श में असहमति और सहमती दोनों होती है ! यदि सभी मुझसे सहमत हो जायेंगे तो विमर्शों की आवश्यकता ही ख़तम हो जायेगी और पूरा समाज सतयुग जैसा हो जाएगा जहाँ स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था , और उन्ही भावनाओं और इच्छाओं का भी सम्मान किया जाता था !

सभी पाठक , ब्लौगर और टिप्पणीकार असहमत होने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं और उनके विचारों का स्वागत है ! जबरदस्ती सहमत होकर बढ़िया बातें करने की ज़रुरत नहीं है !

Thanks.

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ZEAL said...

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@---सब के अपने अपने अनुभव हैं .कोई सामान्य करण नहीं किया जा सकता .सब कुछ पति के व्यक्तित्व पर निर्भर है .वह पत्नी के पूर्ण नियंत्रण में रहना सुरक्षित मानता है या उसे अधीनस्थ बनाए रखना चाहता .भारतीय समाज आज भी जड़ता की स्थिति में है....

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वीरुभाई जी की टिपण्णी आज के समाज का आइना है ! बेहद प्रसन्नता होती है जब कोई इतने सुलझे विचारों और सु-स्पष्ट दृष्टि के साथ परिस्थियों को देखता है ! जो पुरुष होने के बावजूद स्त्री मन , उसकी परिस्थिति और समाज में उसकी दुर्दशा को भी समझता है ! और स्त्री-उद्धार में अपने रूढ़िवादी परम्पराओं को थोपता नहीं है !

लेकिन अफ़सोस तो तब होता है जब कुछ स्त्रियाँ स्वयं तो उठ जाती हैं , समाज में आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर खुशहाल जिंदगी बसर करती हैं , लेकिन बदतर हालात में जीवन-यापन कर रही स्त्रियों के प्रति सहानुभूति की दृष्टि नहीं रखतीं !

जो स्त्रियाँ एक बेहतर जीवन जी रही हैं , उन्हें सदैव ही अपने से कमज़ोर स्त्रियों की परिस्थितियां बेहतर बनाने के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए !

आज की नारी बहुत सी परम्पराएं , जो पुरुष प्रधान समाज ने अपने सुविधानुसार बनाई hain , उसी में जकड़ी हुयी hain ! बहुत सी सामाजिक और आर्थिक बेड़ियों को काटना है ! किसी को भी अपने अधीनस्थ रखकर उसकी स्वतंत्रता छीनना हमारा स्वार्थ होगा !

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ZEAL said...

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पत्नियों को तनख्वाह थमा दो लेकिन उसको स्वतंत्रta मत दो . वे मात्र एक मुंशी की तरह आपकी अकाउंट'स मैनेजर बनी रहेंगी , जो बही-खता तो कुशलता से संभालेंगी लेकिन अधिकारपूर्वक दो पैसा अपनी ख़ुशी पर व्यय करने के लिए स्वतत्र नहीं हैं !

पति की असहमतियां उन्हें सहमा हुआ रखता है , और उन्हें मौन रहने पर मजबूर करता है ! परिवार की शान्ति बनाये रखने के लिए एक स्त्री ता-उम्र अपनी आवाज़ को दबा देती है और परिवार को पालने में ही गुज़ार देती है! मुक्त आकाश में उड़ान , और सपनों को पूरा होते हुए सिर्फ आर्थिक रूप से स्वतंत्र पुरुष और स्त्री ही देख पाते हैं !

आर्थिक रूप से निर्भर पत्नी एक उम्र के बाद यह भी भूल जाती है की वो भी कुछ स्वतंत्र सपने देख सकती है !

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अमित जैन (जोक्पीडिया ) said...

लगता है आप पति पत्नी जों एक इकाई के रूप में काम करती है उसे अलग अलग कर के देखना चाहती है , आज समाज को परिवार को एकरूप करने की आवश्यकता है , न की इस तरह के व्यथ में विवाद पैदा करने की , आप की बात सुनने में पढ़ने में बढिया भले ही लगे , पर क्या आप इन बातो को आपने बेटे की शादी के बाद करना पसंद करेगी , अपने परिवार म इस तरह की छोटी मोटी बातों पर तकरार करना पसंद करेगी

अमित जैन (जोक्पीडिया ) said...

क्या खुशी सिर्फ पैसे से ही मिलती है

ZEAL said...

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@---लगता है आप पति पत्नी जों एक इकाई के रूप में काम करती है उसे अलग अलग कर के देखना चाहती है , आज समाज को परिवार को एकरूप करने की आवश्यकता है , न की इस तरह के व्यथ में विवाद पैदा करने की , आप की बात सुनने में पढ़ने में बढिया भले ही लगे , पर क्या आप इन बातो को आपने बेटे की शादी के बाद करना पसंद करेगी , अपने परिवार म इस तरह की छोटी मोटी बातों पर तकरार करना पसंद करेगी?....


अमित जी ,

दुनिया का हर व्यक्ति एक पृथक इकाई है ! विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है , शरीर पृथक ही रहते हैं ! परिवार की जिम्मेदारियां एक होती हैं हैं लेकिन कुछ अरमान पृथक ही रहते है ! विवाह हो जाने के उपरान्त , पत्नी अपने माता पिता पिता को नहीं भुला सकती ! पति के मित्रों के साथ सामाजिकता निभा सकती है लेकिन अपनी सखियों को नहीं भुला पाती ! पति की अच्छी नौकरी पर गर्व करती है लेकिन अपनी रूचि की शिक्षा को तिलांजलि नहीं दे पाती !

जब भाई बहन , पिता-पुत्र, माता पुत्री अनेक विषयों पर एक राय नहीं होते तो फिर पति पत्नी , दोनों एकमत होंगे हमेशा ये कैसे हो सकता है ?

हर व्यक्ति स्वतंत्र इकाई ही है !

आपको स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता विवाद का विषय लग रहा है ? ...किसलिए ? ....क्या पुरुष स्त्री की स्वतंत्रता से भयभीत है ?

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ZEAL said...

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अमित जैन (जोक्पीडिया ) said...

@---क्या खुशी सिर्फ पैसे से ही मिलती है

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@--दुनिया की हज़ारों खुशियाँ पैसे पैसे से मिलती हैं ! इस बात में कोई दो राय नहीं है !

किसी की आर्थिक मदद पैसों से ही होती है और ख़ुशी ,मिलती है !
किसी को उपहार से ख़ुशी मिलती है ! बिना पैसों के संभव नहीं !
शिक्षा भी पैसों से मिलत है ! सुविधाएं भी पैसों से ही मिलती हैं !
बचे को दो रूपए की टाफी भी पैसों से मिलती है जिसमें उसकी खूशी निहित है !

ब्लौगिंग करने करने में जो ख़ुशी मिलती है उसके लिए भी पैसे की ज़रुरत होती है !

बिना पैसों के सिर्फ हिमालय पर तपस्या होती है और कुछ नहीं होता !

कुछ और उदाहरण दूँ या इतने काफी हैं ?

वैसे ऊपर लिखी टिप्पणियां आपने पढ़ी होतीं तो मुझे इतना न लिखना पड़ता !



आर्थिक रूप से निर्भर होने की कुंठा आप तभी समझेंगे जब आप स्वयं भुक्त-भोगी होंगे ! और विपन्नता में तथा निर्भर होने पर कैसा महसूस होता है , ये भी आप तभी समझेंगे !

But Alas ! Unfortunately men do not go through such circumstances. !


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ZEAL said...

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@---पर क्या आप इन बातो को आपने बेटे की शादी के बाद करना पसंद करेगी ?....

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अमित जी ,

मेरी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता !

मेरी बहु तो , मेरे बेटे की तरह ही पूरे शौक और गर्व के साथ नौकरी करेगी ! उसकी सफलता और आत्म-निर्भरता पर उसके माता-पिता और पति के साथ उसकी सास 'दिव्या' भी गर्व करेगी !

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लेकिन अमित जी आपसे निवेदन है की आप अपनी पत्नी को थोड़ी आर्थिक स्वतंत्रता दें और अपनी बेटी के लिए थोडा broad minded दामाद ढूँढें !

शुभकामनाएं !

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Tarun Sharma said...

दिव्या जी,
आपने अच्छी बात उठाई है, आपसे सहमत हूँ | मूल बात है की शादी के बाद नारी को इतनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए
की वो पूरे आत्मविश्वास के साथ जिए एक इंसान की तरह न की एक वस्तु या
एक स्वचालित रोबोट की तरह जो की दूसरों की इच्छा और आदेश पर ही निर्भर रहे |
आर्थिक स्वतंत्रता इसका एक पहलु है, ये कैसे लागू हो ये पति पत्नी की समझदारी पर निर्भर है,
joint account या individual account केवल इसे लागू करने के दो तरीके हैं, तरीके और भी हो सकते होंगे |
बहुत से लोग कह रहे हैं की वो कभी गलत खर्च करेगी आदि, ये क्यों नहीं सोचते की वो बहुत से सही काम भी तो करेगी |
क्या आर्थिक रूप से स्वतंत्र आदमी कभी कोई गलत काम या कदम नहीं उठाता, ऐसे में क्या वो अपने आपको सजा देता है|
कोई गलत काम हनी पर एक ही रास्ता है , की गलती से सीखो और आगे बढ़ो |
यदि कोई स्त्री धन का दुरूपयोग कभी गलती से कर देती है, तो उसे समझाया जा सकता है, पर इस दर से उसे आर्थिक स्वतंत्रता न देना गलत बात है |

ZEAL said...

तरुण जी ,
बहुत ही सार्थक तरीके से आपने विषय को समझाया है ! मन मुग्ध है !
आभार !

Harshad mehta said...

Love the way this delicate subject is treated here.
I think in most cases when things are going well, it is not even thought of. Question arise only when problems start between the couple.

Such an arrangement must be made part of marriage so that when problems arise between the couple, girl already has something to fall back on.

ZEAL said...

Beautiful suggestion ! Very thoughtful indeed . Thanks Mehta Sir.