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Sunday, November 4, 2012

ब्लोगिंग और फेसबुक को बदनाम करते लोग


कुछ लोग अंतरजाल पर हुयी तरक्की को नकारात्मक मानते हैं !  विज्ञान की इतनी बड़ी देन को वरदान न मानकर उसका अपमान करते हैं !  लोगों का कहना है की अंतरजाल और फेसबुक का उपयोग करने वाले संवादहीनता रखने लगते हैं ! इसे बड़ी भ्रान्ति और क्या हो सकती है भला?

  • टेक्नोलोजी और इंटरनेट के उपयोग से पिछले एक दशक में समाज में हर क्षेत्र में क्रान्ति की लहर दौड़ गयी है
  • कविता कहानी लिखने वालों को एक मंच मिल गया है
  • लोगों का संपर्क संसाधन बढ़ा है , अपने स्वभाव और रूचि के अनुरूप मित्र एवं संपर्क बनते हैं
  • एक नयी और इमानदार मीडिया का इजाद हुआ है !
  • आम आदमी की आवाज़ बुलंद हुयी है !
  • फेसबुक ने तो लडखडाते लोकतंत्र को ही थाम रखा है !
  • कहीं भी कोई अनियमितता हुयी नहीं कि जंगल में आग की तरह फेसबुक पर जनता की आवाज़ बुलंद हो जाती है !
  • सत्ताधारी तानाशाह भी डर-डर कर थोडा अनुशासन में रहने को बाध्य हुए हैं !
  • गृहणियों की भी आवाज़ मुखर हुयी है , व्यर्थ प्रपंच से बेहतर उन्होंने लिखना समझा
  • लेखकों में ज्ञान और विश्वास बढ़ा !
  • जानकारियों से ओत-प्रोत इस  अंतरजाल ने लोगों का बौद्धिक स्तर ऊपर किया है !
  • लोगों के व्यक्तित्व का विकास हुआ है !
  • हमारा सामान्य ज्ञान समृद्ध हुआ है !

अतः निवेदन है व्यर्थ ही अंतरजाल के उपयोग , ब्लौगिंग और फेसबुक अपडेट्स को बदनाम मत कीजिये !
मैं तो टेक्नोलोजी के इस अद्भुत वरदान के लिए स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझती हूँ ! शुक्रगुजार हूँ कि मैं इस  सुविधा का उपयोग कर रही हूँ!

Zeal

Friday, August 24, 2012

इस मनचले ब्लॉगर का आभार


कल एक मनचले ब्लॉगर की पोस्ट पर एक टिप्पणी पढ़ी। अब ये न पूछियेगा किसकी टिप्पणी थी। अरे उसी मनचले ब्लॉगर की टिप्पणी थी जिसके ब्लॉग पर लिखी थी। बस उसका शौक है की अपने ही ब्लॉग पर 'बेनामी' बनकर खुद ही टिप्पणी करता है....Smiles...

खैर टिप्पणी में लिखा क्या था ?

लिखा था-- " दिव्या ने अपने ब्लॉग पर ३० साल पुरानी तस्वीर लगा रखी है , पता नहीं किसको आकर्षित करने के लिए"

पढ़कर मन में यही ख़याल आया की ये इतना बुज़ुर्ग हो गया है, लेकिन महिलाओं की तस्वीरों में ही उलझा हुआ है अभी तक। ब्लॉगर तो बुद्धिजीवी वर्ग में आते हैं, लेकिन ये तो किसी के विचार नहीं पढता, बल्कि तसवीरें ही देखता है।

लेकिन फिर सोचा , बात तो सही कह रहा है बेचारा। इतनी पुरानी तस्वीर लगाने क्या फायदा। चलो कोई बुढापे वाली शानदार तस्वीर लगाई जाए। कुछ तो डरेगा ये मुझसे। बस फिर क्या था , ढूंढना शुरू किया एक अदद तस्वीर को , जिसने पैसठ (६५) बसंत देख लिए हों।

वो कहते हैं ना-- जहाँ चाह , वहां राह......मिल गयी ना आखिर एक अदद तस्वीर श्रीमती दिव्या श्रीवास्तव की।

नोट- दोनों तस्वीरों में परिधान एक ही है (वही तीस साल पुराना), सर्फ़ एक्सेल का कमाल है !!


Hey ! Thanks Mr मनचले !

Zeal

Thursday, September 15, 2011

प्यार ताकत देता है या फिर कमज़ोर करता है ?

सभी ने अपने जीवन में प्यार का अनुभव तो किया ही होगा कभी कभी या फिर हमेशा ही किसी किसी के द्वारा। धनवान रही हूँ हमेशा से क्यूंकि "प्यार" जैसी बेशुमार दौलत को सदा ही पाया है। इतना प्यार मिलता है इसीलिए लुटाने के लिए भी मेरे पास प्रचुर मात्रा में रहता है।

किन्तु एक प्रश्न मन को उलझन में ड़ाल रहा है की प्रेम व्यक्ति को मज़बूत बनाता है या फिर कमज़ोर। मैंने लेखन छोड़ देने का जो निर्णय लिया था उसपर दृढ नहीं रह सकी क्यूंकि प्रेम करने वाले स्नेहीजनों की स्नेह्वर्षा से मैंने अपना निर्णय बदल दिया। तो क्या स्नेह ने कमज़ोर करके मुझसे मेरी दृढ़ता छीन ली। या फिर उठ खड़े होकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की ताकत दे दी ?

मुझे लगता है प्रेम में पिघला देने की ताकत होती है, बड़े-बड़े फौलाद को जो पिघला दे वह सिर्फ "निश्छल" प्रेम ही हो सकता है।

Zeal

Monday, September 12, 2011

हिंदी भाषा के साथ अन्याय करते चंद हिंदी ब्लॉगर.

हम देश-विदेश के मुद्दों पर अटकें रहे और अपने ब्लॉगजगत में क्या हो रहा है , इसको नज़रंदाज़ करते चलें तो "चिराग तले अँधेरा" वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी। जहाँ देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता ने एकजुटता दिखाई वहीँ हिंदी-ब्लौगिंग में व्याप्त अभद्रता के खिलाफ एकता क्यूँ नहीं है। क्या डर है लेखकों को कि वे एक टिप्पणीकार खो देंगे और इसी डर से वे अभद्रता और अशिष्टता के खिलाफ आवाज़ उठाने से कतराते हैं। देश का भ्रष्टाचार तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक प्रत्येक इकाई स्वयं को नहीं सुधारेगी। महिलाओं को उनका हक मात्र महिला दिवस मनाने से नहीं मिलेगा अपितु उन्हें भी अपने समान ही भावनाओं एवं संवेदनाओं से युक्त इंसान समझने कि आवश्यकता है। इसी तरह हिंदी भाषा भी अपमानित होती रहेगी जब तक स्वयं हिंदी भाषी ही इसका दुरुपयोग करना बंद नहीं करेंगे।

हिंदी पत्र-पत्रिकाओं से इतर यदि हिंदी-भाषा का कहीं सर्वाधिक प्रयोग हो रहा है तो वह है हिंदी-ब्लॉगिंग। जहाँ कुछ ब्लॉगर साहित्य सृजन कर रहे तो कुछ लोग विभिन्न मुद्दों और विषयों पर लिखने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय एवं मिठास-युक्त हिंदी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस तो यह है कि चंद ब्लॉग्स पर हिंदी जैसी पवित्र भाषा का उपयोग स्त्रियों को गाली देने के लिए किया जा रहा है और इसी अभद्रता और अशालीनता के ज़रिये ये लोग खुद को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।

और सबसे ज्यादा अफ़सोस तो तब होता है जब स्थापित , वरिष्ठ एवं उम्रदराज ब्लॉगर (Arvind Mishra) इस तरह कि घिनौनी हरकत करते हैं। पराई-स्त्री को अपनी बपौती समझ गाली देकर ये स्वयं को जन्म देने वाली कोख का अपमान करते हैं। कैसे मुंह दिखाते हैं ये अपनी संतानों को और कैसे आँख मिलाते होंगे अपने घर कि लक्ष्मी से। यदि इनकी बातों का विरोध करो तो अनेकों लोगों का तुर्रा ये होता है कि बड़ों का सम्मान नहीं हो रहा।

बड़ों को सम्मान तब मिलता है जब वे छोटों के लिए आदर्श स्थापित करते हैं। छोटों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं , उनसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखते और छोटों के प्रति स्नेह दृष्टि रखते हैं। ना कि जहाँ देखी स्त्री , वहीँ अपमानित करने के लिए उपस्थित हो गए। इन लोगों को ब्लॉगजगत के अन्य वरिष्ठ एवं बुज़ुर्ग ब्लॉगर्स से भी कुछ सीखना चाहिए। बिना दूसरों को मान दिए कोई भी सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता। प्यार और सम्मान माँगा नहीं जाता अर्जित किया जाता है।

अभद्रता का एक नमूना यहाँ देखिये-

"...... हम गाँव गिराव के आदमी बिच विच नहीं जानते -हम परेशां करने वाली कुतिया का दो रूप जानते हैं -एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही दोनों हो .. ...मुझे तो लगता है ऐसे ज्यादातर मामलों में कुत्ते कुत्तियाँ इन मनुष्यों से बेहतर हैं और जग जानता है वे वफादार भी ज्यादा है ....."

अब देखिये Arvind Mishra, के विचार देखिये स्त्रियों के बारे में। यदि इनके हाथ कोई स्त्री नहीं आई तो वह कटही आदि बना दी जायेगी। और इनसे कोई पूछे कि पशु ही बेहतर हैं तो ब्लॉगिंग क्यूँ कर रहे हैं ? वफादार प्राणी तो इन्हें पढ़ नहीं रहे। और इनके परिवार कि स्त्रियों को किस श्रेणी में रखा जाए? खेद होता है इन्हें शिक्षित कहते हुए।

उपरोक्त भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर्स। उस पर आपत्ति जताने वाले तो कोई नहीं दिखे अपितु उनकी भाषा शैली कि प्रशंसा करते बहुतेरे नज़र आये। धन्य हैं ऐसे चाटुकार मित्र।

हाँ एक वरिष्ठ ब्लॉगर (श्री अनूप शुक्ल) ऐसे भी मिले जिसने परिवेश में फैली गन्दगी के खिलाफ आवाज़ निडर होकर उठायी -- ----
"....................एक खौरही कुतिया और एक कटही कुतिया और सबसे खराब जो कटही और खौरही किसके लिये आप कह रहे हैं यह आप भले न जानते हों लेकिन ब्लागजगत में जो आपको पढ़ता रहा है वह जानता है कि आपने किसके लिये यह कहा! जिसके लिये कहा कभी आप उसकी मानसिक क्षमताओं के प्रशंसक हुआ करते थे। आपसे बहुत छोटी उमर की उस महिला के लिये यह सब कहकर आप पता नहीं कौन ऊंचाई हासिल कर रहे हैं। यह निहायत खराब बात है। घटिया घराने की। निम्नकोटि की। मिसिरजी, सोचिये क्या करते हैं आप! सुधर जाइये! बड़े बनिये। उदार बनिये। "

कुछ हिंदी-भाषा के विद्वान् तो दूसरों के ब्लॉग से सामग्री चुराकर उस पर अश्लील साहित्य रचकर बड़ा बनना चाहते हैं। स्त्रियों को अपमानित करना कोई इस हिंदी-सेवी के ब्लॉग पर जाकर देखे। शर्म आती है इनके परिवार में माँ-बहन नहीं है क्या ? और हिन्दी-भाषा को कलंकित ही करना था तो हिंदी में स्नातक क्यूँ किया ?

हिन्दी-ब्लॉगिंग में ऐसी अभद्रता और अश्लीलता के खिलाफ आवाज़ न उठाना हमारी मानसिक नपुंसकता का दोत्तक है। रक्त जम चुका है, आत्मा सो चुकी है, नैतिकता मर चुकी है। होने दो अपमानित यदि होती है नारी और हमारी राष्ट्रभाषा तो । रोने दो भारत-माता को। उनके बेटे ही कपूत बनकर , उनकी बेटियों का अपमान कर रहे हैं तो कौन रक्षा करेगा भला।

चल रही है गुटबाजी , खेमेबाजी , हमारी अपनी हिन्दी-ब्लॉगिंग में। मठाधीशों का ही वर्चस्व है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। हिन्दी-ब्लॉगिंग भी अब आजाद नहीं। गुलामी में जकड ये सिसकने लगे इससे पहले इसे बचाना होगा।

दुयोधनों कि महासभाएं अब भी होती हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी विराजते भी हैं लेकिन बलि-वेदी पर चढ़ती स्त्री को बचाने अब कृष्ण अवतरित नहीं होते क्यूंकि मानसिकता नपुंसकता व्यक्ति को पुरुषार्थ करने से रोकती है। दुर्जन अपनी जात भले ही न छोडें लेकिन सज्जनों को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। कभी-कभी देश के प्रति , स्त्री के प्रति , राष्ट्र-भाषा के प्रति भी उदारता दिखानी चाहिए। ये हमारा नैतिक दायित्व भी है।

तटस्थ रहने वालों से बड़ा गुनाहगार कोई नहीं है।

Zeal

Tuesday, September 6, 2011

क्या स्पष्टीकरण की ज़रुरत पड़ती है ?

जब कोई किसी को अनायास ही गलत समझ लेता है तो वह व्यक्ति अपनी स्थिति को स्पष्ट करने की चेष्टा करता है। लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी अवस्था में स्पष्टीकरण कि आवश्यकता नहीं होती। क्यूंकि जिनका हमपर स्नेह एवं विश्वास होता है वे हमें गलत कभी समझते नहीं। और यदि गलती से गलत समझ भी लेते हैं तो खुद बखुद समय के साथ समझ भी जाते हैं। लेकिन जो मन में द्वेष रखते हैं , कान के कच्चे होते हैं , दूसरी के दिए गए तथ्यों पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं और अपनी ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करने से परहेज़ करते हैं , वे ही दूसरों द्वारा प्रस्तुत किये गए तथ्यों पर यकीन करके किसी को अनायास ही गलत समझने कि गलती करते हैं। ऐसे लोगों को स्पष्टीकरण देने का कोई लाभ भी नहीं होता क्यूंकि - " दुश्मनों को स्पष्टीकरण समझ नहीं आता , जबकि अपनों को स्पष्टीकरण देने कि ज़रुरत ही नहीं पड़ती"

"Friends do not need explanation while foes do not understand explanation"

ऐसा करके वे कुछ अच्छे और कुछ सच्चे लोगों को खो देते हैं। इसलिए किसी के बारे में राय बनाने से पहले पूरे सच कि जान लेने कि कोशिश अवश्य करनी चाहिए। वरना "कव्वा कान लेकर भागा" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।

सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर लेना आपके कान कच्चे होने के परिचायक हैं, जिसके बारे में राय बनायीं है , उसकी कमजोरी के नहीं। इसलिए दूसरों के बारे में गलत राय निर्धारण से पहले अपने व्यक्तित्व को दृढ करने कि ज्यादा आवश्यकता है।

खतावार समझेगी दुनिया तुझे...
अब इतनी जियादा सफाई ना दे..

Zeal

Monday, September 5, 2011

प्रेम के साँचे

प्रेम तो एक ही है। किसी भी व्यक्ति में किसी के भी लिए ह्रदय में जो प्रेम है वह एक ही है। प्रेम का स्वरुप बदल जाता है उसके नामकरण के साथ, किन्तु प्रेम वही रहता है। जैसे पानी तो वही है , किन्तु किस पात्र में उसे एकत्र करते वह उसी का आकार ग्रहण कर लेता है। यथा कटोरी में आने पर उसका आकार गिलास में उसके आकार से पृथक होगा लेकिन जल तो वही है , कल-कल, पारदर्शी , निर्मल और शीतल।

विज्ञान की यदि बात करें तो ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार , सृष्टि में ऊर्जा एक ही है , सिर्फ यह अपनी परिस्थिति के अनुसार अपना स्वरुप बदलकर स्थितिज (potential), गतिज (kinetic), ऊष्मा (heat), ध्वनि (sound) आदि स्वरुप को प्राप्त होती है लेकिन इनका ह्रास नहीं होता अपितु यह संरक्षित रहती हैं सृष्टि में अपने किसी किसी स्वरुप में।

उपरोक्त उदाहरणों का इस्तेमाल किया है प्रेम को समझने में। मेरे विचार से प्रेम सिर्फ एक ही है। जब एक स्त्री अपना प्यार अपनी संतान को देती है तो "वात्सल्य" , जब पिता को देती है तो वही प्रेम पुत्री-प्रेम कहलाता है , फिर वही प्रेम पत्नी-प्रेम, बहन का प्रेम , भाभी का प्रेम , मित्र का प्रेम , देश-प्रेम आदि नामों से अलंकृत हो जाता है। यहाँ प्रेम करने वाली स्त्री अथवा पुरुष तो एक ही है और उसके पास जो प्रेम है वह भी एक ही प्रकार का है किन्तु जिसे दिया गया और जिसने ग्रहण किया उसकी वय और समझ के अनुसार प्रेम उसी साँचे का स्वरुप ले लेता है।

चूँकि मनुष्य के अन्दर एक ह्रदय विद्यमान है और उसमें अनेक भावनाओं का निरंतर संचरण होता रहता है अतः एक दुसरे के प्रति प्रेम का उत्पन्न होना अत्यंत स्वाभाविक है। हाँ , प्रेम का उत्पन्न होना हमें 'पादप' की श्रेणी में ला देता है। लेकिन आवश्यकता है इस प्रेम को सही साँचे में ढालकर देने की और सही साँचे में ग्रहण करने की। प्रेम के इस लेन-देन में एक-दुसरे की वय और वैवाहिक अवस्था ( marital status) का ध्यान रखना अति आवश्यक है। हमारी छोटी से छोटी भूल भी किसी निर्दोष का सुखी जीवन बर्बाद कर सकती है।

कभी-कभी देने वाला तो निस्वार्थ प्रेम लुटा रहा होता है लेकिन लेने वाला उसे मनमाने साँचे में एकत्र करके उसे "वीभत्स' स्वरुप देकर स्नेह लुटाने वाले को अपमानित करता है। अतः स्नेह देते एवं लेते समय स्वयं को अनुशासित एवं मर्यादित रखना अति-आवश्यक है।

प्रेम का हर स्वरुप ( यथा- वात्सल्य, करुणा, सहानुभूति) स्वीकार्य है लेकिन किसी भी परिस्थिति में पर-स्त्री और पर-पुरुष के लिए ह्रदय में श्रृंगार के भाव नहीं आने देना चाहिए।

प्रेम के स्थायी एवं शाश्वत स्वरुप को समझा एवं निभाया जाए।

Zeal

Tuesday, August 30, 2011

शहीद अरुण दास को विनम्र श्रद्धांजलि

भ्रष्टाचार के खिलाफ आजादी की इस लड़ाई में शहीद होने वाले , भारत माता के वीर सुपुत्र श्री अरुण दास जी को विनम्र श्रद्धांजली। सेनापति की सफलता पर बधाई लेकिन सेना के शहीदों को भुलाया नहीं जा सकता। कोई भी आजादी बिना बलिदान लिए नहीं मिलती। इतना व्यस्त भी क्या होना की जाने वाले के लिए दो पल न निकाले जा सकें उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए। जिनकी आज हर तरफ जय जयकार हो रही है , उनका भी नैतिक दायित्व है की अपने साथ अनशन पर बैठे लोगों को और शहीद हो जाने वालों को बीच-बीच में याद कर लें।

एक अफ़सोस है की हमारे देश में मीडिया सिर्फ आसमान में चमकने वालों पर ज्यादा केन्द्रित रहता है। आम-जन जिस जज्बे को लेकर क्रान्ति की आंच को बढ़ता है , उसकी कोई गणना नहीं। स्वामी निगमानंद शहीद हो गए , अरुण दास शहीद हो गए , न मीडिया ने इसको दिखाना जरूरी समझ , न ही सरकार इन बलिदानों के प्रति स्वयं को जिम्मेदार समझती है।

कहाँ मिलेंगे ऐसे अनमोल हीरे हमारे भारत को ? अत्यंत दुःख के साथ भारत के अनमोल रत्नों को विनम्र श्रद्धांजलि।

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हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !

अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !

अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !

नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !

एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !

सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !

नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?

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चर्चा अपने क़त्ल का अब दुश्मनों के दिल में है,
देखना है ये तमाशा कौन सी मंजिल में है ?

कौम पर कुर्बान होना सीख लो ऐ हिन्दियो !
ज़िन्दगी का राज़े-मुज्मिर खंजरे-क़ातिल में है !

साहिले-मक़सूद पर ले चल खुदारा नाखुदा !
आज हिन्दुस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है !

दूर हो अब हिन्द से तारीकि-ए-बुग्जो-हसद ,
अब यही हसरत यही अरमाँ हमारे दिल में है !

बामे-रफअत पर चढ़ा दो देश पर होकर फना ,
'बिस्मिल' अब इतनी हविश बाकी हमारे दिल में है !-

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मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या !
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या !

मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल ,
उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !

ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में ,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !

काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते ,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या !

आख़िरी शब दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प ,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !

उपरोक्त ओजस्वी कवितायें , अमर शहीद 'राम प्रसाद बिस्मिल' की लिखी हुयी है। इन को हम तक पहुंचाने के लिए डॉ क्रांत वर्मा का हार्दिक आभार।

Zeal

Thursday, August 25, 2011

हमारी सबसे बड़ी दौलत , हमारे बुज़ुर्ग

कहते हैं मित्र में ही सारे रिश्ते नज़र आते हैं मेरे सारे मित्र अत्यंत बुज़ुर्ग हैं। और उन्हीं में मुझे माता-पिता नज़र आते हैं। और माता-पिता के समान दूजा कोई मित्र नहीं होता।

बचपन से बुजुर्गों के साथ देर तक बैठना और उनकी बातें सुनना , फिर प्रश्न करना और फिर अकेले में उनकी बातों पर मनन करना और गूढार्थ समझ ज्ञान लाभ करना अच्छा लगता है । जिसने इतनी लम्बी जिंदगी के अनेक उतार चढ़ाव देखे हों औए बचपन से बुढापे तक सारे पड़ाव भी देख लिए हों , उनका जीवन तो स्वयं एक दर्शन बन जाता है। शिक्षा से परे , हज़ारों अनुभवों से उनके ज्ञान का जो विस्तार होता है , उसे हम उनके सानिध्य में रहकर आसानी से प्राप्त कर लेते हैं

अक्सर देखा है की जो हमारे बुज़ुर्ग हैं , वे हमारी ज्यादा चिंता करते हैं , जबकि इस उम्र में उन्हें पूरी देख-भाल, प्यार-दुलार और अपनेपन की ज़रुरत होती है। वे हमारे बारे में ज्यादा चिंतित रहते हैं , जबकि हम अपनी व्यस्तताओं के मध्य अपने बुजुर्गों को समुचित समय नहीं दे पाते हैं, जिसका मन में खेद रहता है।

अपने पिताजी के साथ अक्सर देर तक बातें करती हूँ। अनके अर्जित ज्ञान का शतांश लाभ भी मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए। पिछले हफ्ते वे तीर्थ यात्रा पर थे। तीन दिन की यात्रा में tourism वालों ने आठ-आठ लोगों का ग्रुप बना दिया था। पिताजी का नियम से फोन आता था अपने चारों बच्चों को यात्रा का अपडेट देते रहते थे। हम लोग भी निश्चिन्त होकर उनकी ख़ुशी में शामिल थे वे फोन पर अपने साथियों को बताते थे , बिटिया से बात कर रहे हैं-- मैं कहती थी सभी से मेरा नमस्ते कहियेगा। फिर फोन पर आठों लोगों की समवेत स्वर में आशीर्वाद देने की आवाजें आती थीं। कानों में वह अमृत-ध्वनि हमेशा गूंजती रहती है।

ब्लौग पर अनेक बुज़ुर्ग अपनी यथाशक्ति , निस्वार्थ रूप से उत्कृष्ट योगदान कर रहे हैं। उनके अनुभवों का लाभ हमें मिलता रहता है इसके लिए पोस्ट के माध्यम उन सभी का आभार व्यक्त कर रही हूँ, जिनके अनुभवों और आशीर्वाद से हमारा जीवन खुशहाल बना रहता है अनेक ब्लॉग्स पर साहित्य और लालित्य की वर्षा होती है , जहाँ ज्ञान के मोती चुनने में अपार आनंद आता है। ऐसे सभी ब्लॉगर्स ( बहुत से-किसका नाम लिखूं किसका छोड़ दूँ) और टिप्पणीकार ( JC जी , विश्वनाथ जी ) को नमन।

मेरी पडोसी श्रीमती कमल , जिनकी आयु ७५ वर्ष है, उनके पास सप्ताह में एक बार जाने का नियम बना रखा है। वे आश्चर्य चकित होकर कहती हैं की-तुम्हारी उम्र का तो कोई, ख़ास मुझसे मिलने आता ही नहीं। लेकिन उन्हें क्या पता की मैं उनके पास आकर अति-सुकून पाती हूँ और उनके अनुभवों से ज्ञान लाभ करती हूँ। वे पहले सिंधिया-विद्यालय में लेक्चरर थीं जब भी उनसे मिलने जाती हूँ, वे कुछ कुछ पढ़ती ही रहती हैं और कुछ नोट्स भी बनाती रहती हैं। मेरे पहुँचते ही वे जो पढ़ती थीं वह मुझे बताने लगती हैं। मैंने अनुभव किया है की उनका ज्ञान बहुत विस्तृत है अपने बुजुर्गों के ज्ञान का लाभ हम उनके साथ वक़्त गुज़ार कर ले सकते हैं उनकी सबसे अच्छी बात ये है की हर २० मिनट पर अपने हाथों का बनाया हुआ कुछ खाने के लिए भी ले आती हैं उनके हाथ के स्वादिष्ट व्यंजन अमृत-तुल्य लगते हैं। चलते समय जब उनका चरण स्पर्श करती हूँ तो वे आशीर्वादों की झड़ी लगा देती हैं। मैं मूढ़-अज्ञानी , केवल दुलार, ज्ञान और आशीर्वाद लूटने वहां नियम से जाती हूँ। और वे निस्वार्थ होकर अक्षय-पात्र की तरह देती भी रहती हैं।

मेरी ईश्वर से प्रार्थना है , पृथ्वी के सारे बुज़ुर्ग स्वस्थ रहे और दीर्घायु हों। वे ज्ञान के भण्डार हैं और उनका स्नेह अमृत है। हमारे जीवन का सबसे बड़ा खज़ाना बुजुर्गों से मिलने वाला आशीर्वाद है

हमारे बुज़ुर्ग सिर्फ देते ही हैं, लेते कुछ नहीं।

Zeal


Sunday, August 21, 2011

व्यक्ति बड़ा है या मुद्दा ?

आज जब सारा देश भ्रष्टाचार के दानव से जूझ रहा है तो ऐसे में अन्ना जैसे भारतीय इसके खिलाफ लड़ने के लिए मैदान में गए हैं। इस उम्र में इतने कड़े विरोधों को झेलना और निरंतर अपनी बात पर डटे रहने कोई मामूली बात तो नहीं आखिर वे ये कर क्यूँ रहे हैं ? वे निस्वार्थ भाव से देश के लिए ही कर रहे हैं , इसमें उनका कोई निजी स्वार्थ तो है नहीं। फिर देश के लिए लड़ी जाने वाली लडाई में कुछ लोग उनका इतना विरोध क्यूँ कर कर रहे हैं? क्या हासिल होगा इससे?

देश की जनता जो उनके साथ है वो इसलिए क्यूंकि वे जिस बात के लिए लड़ रहे हैं वह हम सभी की समस्या है। जनता मुद्दे के साथ है , किसी व्यक्ति के साथ नहीं। ही आज की जनता इतनी इतनी भोली है की गलत व्यक्ति को यूँ ही अपना समर्थन दे देगी। इसलिए अनायास ही अन्ना का विरोध करके अपनी ऊर्जा का व्यर्थ मत कीजिये ही मुद्दे से भटकाईये मुद्दा बड़ा है , व्यक्ति नहीं इसलिए अपनी ऊर्जा को एकजुट होकर समर्थन जैसे सकारात्मक कार्य में लगाइए।

अन्ना और बाबा की अनावश्यक तुलना करने से बचिए दोनों ही देश और आम जनता के लिए समर्पित हैं , दोनों ही निस्वार्थ देश के हित में लड़ाई लड़ रहे हैं। बस हर किसी के लड़ने का अपना अंदाज़ अलग होता है, इतना ही अंतर है। आज़ादी की लड़ाई में गरम दल और नरम दल में भी तो अंतर था , लेकिन लड़ तो सभी देश के लिए ही रहे थे , बस तरीके अलग थे। और सभी का नाम आज हम सम्मान के साथ वीर शहीद देशभक्तों के रूप में लेते हैं। अतः अन्ना और रामदेव में अनावश्यक भेद मत कीजिये। दोनों ही देश के लिए दो बड़ी सकारात्मक ताकतें हैं जो आम जनता के हित में ही सोच रही हैं।

इतने लोगों के समर्थन के बाद और इतनी बड़ी जिम्मेदारी होने पर कोई गलत दिशा में सोच भी नहीं सकता अपने आप मन मस्तिष्क में नैतिकता और जिम्मेदारी बढ़ने लगती है। करोड़ों जोड़ी आँखें आज उन पर लगी हुयी है फिर उनके मंतव्यों पर संशय करना एक दुराग्रह जैसा लगता है। विरोध ही करना है तो उन हस्तियों की करिए जो बड़े-बड़े मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है।

आखिर विरोधों से लाभ क्या है ? सरकार करे तो करे लेकिन आम जनता का कुछ प्रतिशत विरोध क्यूँ कर रहा है ? यदि अन्ना भी अन्य सामान्य व्यक्तियों की तरह अपना आन्दोलन छोड़ दें और घर बैठ कर सामान्य चर्या अपना लें तो विरोधियों को क्या हासिल होगा। कौन लडेगा इस लड़ाई को ? देश के लिए स्वयं को आहुत करने वालों का विरोध हमारी तुच्छ एवं नकारात्मक सोच को परिलक्षित करता है।

जन आन्दोलों की आंधी में हम यदि एकजुट होकर अपना समर्थन दें और अनावश्यक निंदा से बचें और सकारात्मक सोच रखें तभी यह लड़ाई जीती जा सकती है।

Unity is strength ! ( एकता में ही बल है , विरोधों में नहीं)

Zeal


Saturday, August 20, 2011

नेह निमंत्रण इकलौता

ajit gupta said...

............................लेकिन मैं इतना जरूर चाहूंगी कि तुम जब भी भारत आओ तो कम से कम मुझसे मिलकर जरूर जाओ। वैसे मिलने के बाद कुछ लोग और अच्‍छे लगने लग जाते हैं और कुछ लोगों के बारे में बना हुआ भ्रम टूट जाता है। मुझे भी डर ही लगता है कि कहीं थेडी बहुत बनी हुई छवि समाप्‍त ही ना हो जाए।

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अक्सर ब्लॉगर्स मीट के बारे में पढ़ती रहती हूँ। भाग्यशाली लोगों को एक दुसरे से मिलने का सौभाग्य प्राप्त होता है। पता ही नहीं चलता कब आयोजित हुयी , कब संपन्न हो गयी। सिर्फ ब्लॉग्स पर पढ़कर ही पता चलता है। लेकिन अब मुझे भी एक आत्मीय निमंत्रण मिला है। लगा तो की कोई मुझे भी मिलने के लायक समझता है। म्रत्यु के उपरान्त ईश्वर के समक्ष ये कसम खा सकती हूँ अब की हाँ मुझे भी किसी ने याद किया था।

प्रिय अजीत जी , नहीं जानती मिलना कब होगा , लेकिन मिलन प्रतीक्षित है। आपके स्नेह-निमंत्रण से मन को एक सुखानुभव हुआ , जिसे यहाँ व्यक्त कर रही हूँ। हृदय में आपके लिए आभार के भाव हैं।

Zeal

Wednesday, August 17, 2011

७३ साल के सत्याग्रही से डरी सरकार

मारो , पीटो , बंदी बनाओ - यही है भारतीय सरकार की रणनीति ! कुचल दो , दमन कर दो , बुझा दो लोगों के दिलों में धधकती आग को , दबा दो जागरूक होती आवाजों को - यही है पहचान , भारतीय लोकतंत्र की !

कितने अन्ना और रामदेव को मारोगे, जिन्होंने अपने जैसे करोड़ों तैयार कर दिए हैं भारत-भूमि , देशभक्तों , सत्याग्रहियों , अहिंसावादियों , सत्यवादियों और स्पष्ट्वादियों से अभी खाली नहीं हुयी है आन्दोलन जारी रहेगा। दमन की नीति कारगर नहीं हो सकेगी लोकतंत्र सही अर्थों में बहाल होगा

गरीब जनता बढती महंगाई और भूखमरी से त्रस्त होकर आत्महत्या का विकल्प चुन रही है , जिसके लिए सरकार जिम्मेदार है। हमारी सरकार तानाशाही की मिसाल कायम कर रही है। छोटे से लेकर बड़े , हर स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। ऐसे में अन्ना की मांग जायज है और बहुत जरूरी भी है। जनता की हर इकाई की यही मांग है। लोकपाल बिल के दायरे में सभी को होना चाहिए। आखिर डर किस बात का ? डर तो सिर्फ चोरों को लगना चाहिए। जो सही है उसे भय किस बात का?

वैसे हमारी सरकार इतनी भी कमज़ोर नहीं। आजादी के ६४ वर्षों में बड़ी उस्तादी से कुर्सी बचाए हुए है। एक अरब जनता को मूर्ख बनाना कोई मामूली काम नहीं है। अन्ना , रामदेव और उनके साथ उठती लाखों आवाजों का दमन करना कोई हमारी सरकार से सीखे।

लोगों का कहना है कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ एक सी ही हैं , सरकार बदलने से कोई लाभ नहीं यदि यह सच है तो भी तख्ता पलटना चाहिए और यह सिलसिला तब तक जारी रहना चाहिए जब तक हम पर शासन करने वाली सरकारें अपनी जनता के हित में सोचना सीख जाएँ

हमारे बेशकीमती मतों का लाभ स्वार्थी सरकार आराम से ले रही है। हमारी सरकार कमज़ोर है, डरपोक भी। स्वार्थी और अलोकतांत्रिक भी। भ्रष्ट भी और असंवेदनशील भी। जो जनता कि आवाज़ का दमन करे , वह असंवैधानिक और अनैतिक भी है।

Zeal

Thursday, August 11, 2011

"मन का मीत" -- Soulmate

हर मन को एक - "मन के मीत" की तलाश रहती है , जो दुर्भाग्य से उन्हें मिलता नहीं मिलेगा कैसे , उनके मन में इतना ठहराव तो है ही नहीं की मिलने वाले प्यार को महसूस कर सकें और आत्मिक रूप से जुड़ सकें

किसी के साथ यदि आत्माओं का मिलन नहीं है तो वह सम्बन्ध अधूरा है विचारों का मिलना तथा किसी के सानिध्य में आनंद की प्राप्ति होना ही आत्माओं का एकाकार होना है। एकाकार होने की अवधी कुछ क्षणों से लेकर कुछ वर्षों या फिर जीवन पर्यंत हो सकती है

आत्मा का मिलन एक से या फिर अनेक से हो सकता है , एक ही काल में विभिन्न देश काल आदि परिस्थियों में भिन्न भिन्न लोगों से मिलना होता है। कभी कभी तो कोई अजनबी इतना अच्छा लगता है की ह्रदय कह उठता है - मेरा तुझसे है पहले का नाता कोई ...

जैसे आत्माएं अपनी इच्छानुसार शरीर धारण करती हैं और जब उनका मन भर जाता है तो वे उस शरीर का त्याग कर देती है और वह शरीर निष्प्राण हो जाता है उसी प्रकार किसी भी रिश्ते में , किसी अजनबी के साथ अथवा मित्र के साथ आत्माओं का संयोग और वियोग चलता रहता है संयोग की स्थिति में सत-चित-आनंद रहता है और वियोग की स्थिति में हर रिश्ता निष्प्राण हो जाता है

जहाँ आत्माओं का मिलन होता है वहां संवाद बिना कुछ कहे ही सपन्न हो जाता है "मन का मीत" अनकहा भी सुन लेता है और बिना लिखा हुआ भी पढ़ लेता है

कुछ पंक्तियाँ समर्पित हैं मन के मीत को ....

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है
लबों पे नगमे मचल रहे हैं , नज़र में मस्ती छलक रही है

कभी जो थे प्यार की ज़मानत , वो हाथ हैं गैर की अमानत,
जो कसमें खाते थे चाहतों की , उन्हीं की नियत बहक रही है ,
हमारी साँसों में...

किसी से कोई गिला नहीं है , नसीब ही में वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना , हिना वहीँ पे महक रही है
हमारी साँसों में ...

वो जिनकी खातिर ग़ज़ल कही थी , वो जिनकी खातिर लिखे थे नगमे
उन्हीं के आगे सवाल बनकर , ग़ज़ल की झांझर झनक रही है

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है
लबों पे नगमे मचल रहे हैं , नज़र से मस्ती छलक रही है


Zeal

Tuesday, August 9, 2011

विरक्ति

दिव्या दीदी पिछले कुछ समय से देख रहा हूँ कि आप अपने लेखों पर आने वाली टिप्पणियों का जवाब नहीं दे रही हैं| क्या कोई विशेष कारण है?
यह आपकी व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है, किन्तु हम चाहते हैं कि आपके जवाब मिलें...क्योंकि कुछ टिप्पणीकार लेख की आड़ में व्यक्तिगत रूप से धावा बोलते हैं| इन्हें जवाब देना आवश्यक है| पहल हम में से कोई करेगा तो गुटबाजी का आरोप भी मढ़ सकते हैं|
आशा है आप समझ रही होंगी...
सादर....
दिवस...



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दिवस जी ,

अब जवाब इसलिए नहीं देती क्यूंकि मन में एक "विरक्ति" पैदा हो गयी है !

ये विरक्ति एक दिन में पैदा नहीं हुयी , एक कारण से पैदा नहीं हुयी बल्कि एक लम्बी अवधि , कई कारणों और लोगों का रुख देखने के बाद ही बाद ही पैदा हुयी है ! कुछ लोग बहुत aggressive हैं , वे वाद के स्थान पर विवाद करने लगते हैं , जिससे मन खिन्न हो जाता है ! ऐसे लोगों से वाद करके समय नष्ट करने से लाभ नहीं !

आपका जिस तरफ इशारा है , उससे अच्छी तरह समझ रही हूँ लेकिन उनसे भी ज्यादा व्यक्तिगत धावा कुछ अन्य लोग बोलते हैं , जिधर आपका ध्यान नहीं गया है।

मेरे आलेख हमेशा एक बड़े वर्ग से संबोधित होते हैं , लेकिन निराश होकर किसी को भी जवाब न देने का निर्णय मेरे स्वयं के मानसिक सुकून के लिए है ! लोगों के triggers विचलित न कर सकें यही प्रयास रहेगा।

इस "विरक्ति" के आने से थोडा सा सिमट गयी हूँ खुद में.... शायद मेरे लिए यही बेहतर है ! फिर भी यही कोशिश रहेगी की अपने आलेखों और दुसरे ब्लौग पर की गयी टिप्पणियों में इमानदार रह सकूँ !

It is wise to bend rather than to break. Those who change will get spiritual wisdom. Conversely, those who have wisdom will decide to change. Change is the first law of Nature।

मेरे निराशाजन्य निर्णय से बहुतों को निराशा हुयी है , जिसका मुझे खेद है , लेकिन संभव है इसका कोई बेहतर परिणाम आये !

Just trying to maintain a very low profile.

कमेन्ट आप्शन बंद है !

Zeal

Monday, August 8, 2011

ज्ञान और वैराग

एक ऐसा ग्रन्थ जिसका महात्म्य सर्वविदित है , वह है भगवद गीता! बहुत बार मन किया इसे पढूं , लेकिन पढ़ नहीं सकी क्यूंकि मन में एक संशय था की गीता पढने से मन में वैराग उत्पन्न हो जाता है ! ऐसा कहीं सुना था ! पहले से ही वैरागी मन थोडा सा अनुराग और थोडा सा अज्ञान ढूंढता है ताकि मन , घर संसार में रमा रह सके!

तार्किक मन ये बात नहीं मानता , उसका कहना है की - "गीता पढने से वैराग नहीं, ज्ञान आता है ! इस पर तार्किक मन पुनः बोल उठा -" ज्ञान से ही वैराग आता है , अन्यथा ये मोह-माया का बंधन तो अज्ञानता के कारण ही है ! एक बार यदि ज्ञान हो जाए तो किसी भी प्रकार के मोह में पड़ना संभव ही नहीं है !

परिजनों के मोह में जकड़े अर्जुन को ज्ञान देकर और मोह दूर करके ही उन्हें उनके कर्तव्य पथ पर लाया गया! वैसे गीता तो बहुतों ने पढ़ी होगी , लेकिन यदि कोई उसमें लिखे उपदेशों को पूरी तरह समझकर आत्मसात नहीं करेगा , तब तक उसे न ही ज्ञान होगा , न ही वैराग !

विद्वान् पाठक कृपया अपने विचार रखकर मेरा संशय दूर करें !



Saturday, August 6, 2011

राज भी विदेश पर और इलाज भी विदेश में !

राज करने के लिए भारत से अच्छा देश कौन सा मिलेगा भला ! गरीबी के नीचे बसर कर रही 40 % जनता को बहलाना कोई मुश्किल काम नहीं ! बाकी बचे अल्पसंख्यकों को रंगीन सपने दिखाकर पिछले ६४ वर्षों से बखूबी बहलाया जा रहा है ! अतः निष्कंटक राज करने के लिए भारत से बेहतर भूमि दूजी कोई न होगी ! अंग्रेज हों या मुग़ल , इटालियन हों या फिर जापानी , भारत देश सबका स्वागत करता है - "अतिथि देवो भव"

चलिए राज कर लीजिये लेकिन जिस देश पर बरसों से राज कर रहे हैं , कम से कम उसकी चिकित्सा व्यवस्था में आस्था तो रखिये ! इलाज के लिए विदेश मत जाइए , भारत भूमि पर श्रेष्ठ चिकित्सकों का अकाल नहीं है ! अमेरिका में इलाज कारायेंगे तो स्वार्थपरक अमेरिकी नीतियों का विरोध कैसे करेंगे ? झुकने और मानने के लिए बाध्य होना ही पड़ेगा ! कुछ तो आस्था रखिये अपने ही राज में !

हमारे देश के अमीर नेता यदि विदेशों में इलाज करायेंगे तो देश का सफ़ेद धन अनायास ही देश से बाहर जाता रहेगा !

खैर देश के सभी ऐश्वर्यवान नेताओं को स्वास्थ्य लाभ की शुभकामनाएं !



Friday, August 5, 2011

दिलों में सम्मान क्या मुलाक़ात के बाद उपजता है ?


आजकल ब्लॉगर्स एक दुसरे से मुलाक़ात कर रहे हैं ! देश-विदेश, शहरों और राज्यों की दूरियां छोटी हो रही हैं ! दिल मिल रहे हैं ! परस्पर प्रेम वर्षा हो रही है और मुलाकातियों के हृदयों में एक-दूजे के लिय सम्मान उफान पर है ! उनके ब्लौग पर आलेख आ रहे हैं एक दुसरे की शान में ! प्रसन्नता की बात है , लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे जो लोग मुलाकातों से वंचित रह जाते हैं उनका अस्तित्व ही नहीं ! मुलाकातियों का गुट बन जाता है , जिसमें अन्य ब्लॉगर्स उपेक्षित रहते हैं ! उनके लेखन का कोई सम्मान नहीं और उनसे किंचित द्वेषपूर्ण व्यवहार भी होता है !

  • प्रश्न यह है की क्या सम्मान लेखन को मिलना चाहिए या व्यक्ति को ?
  • आत्मीयता सिर्फ मुलाकातों पर निर्भर है क्या ?
  • क्या यह गुटबाजी को तो बढ़ावा नहीं दे रहा ?
  • क्या यह अन्य ब्लॉगर्स की उपेक्षा का कारण तो नहीं बन रहा ?
  • क्या इसके कारण लेखक का फोकस बेहतर विषयों से हटकर गैर जरूरी सोशल-नेटवर्किंग पर तो नहीं केन्द्रित हो रहा ?

ऐसी मुलाकातों से ब्लॉगर्स की स्वतंत्रता छिन जाती है , वे एक दुसरे की प्रशंसा करने को बाध्य हो जाते हैं ! टिप्पणियों और आलेखों से इमानदारी लुप्त हो जाती है ! प्रायः वे एक दुसरे को महिमामंडित करते हुए दिखाई देते हैं ! समझ भी नहीं आता की ऐसे आलेखों पर टिपण्णी क्या लिखी जाए !

मुझे लगता है , मेल-मिलाप हो, प्रेम रहे , सम्मान रहे लेकिन अन्य ब्लॉगर्स को उपेक्षित होने का अहसास न करायें , गुटबाजी न करें और बेहतर लेखन के लिए सम्मान बना रहे!

ब्लॉगर्स मीट में हिंदी ब्लौगिंग के विकास और स्थापना से जुड़े विषयों पर चर्चा होनी चाहिए और उसके क्या परिणाम और सुझाव आये इनकी चर्चा होनी चाहिए आलेखों पर !

Zeal

Wednesday, August 3, 2011

मंहगाई की सुनामी में धधकता पेट्रोल


अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री के राज में मंहगाई इतनी तेजी से बढ़ रही है लेकिन सरकार उसे रोक पाने में असफल है , ये दुखद है और हैरान करने वाला भी ! वैसे प्रधानमन्त्री स्वयं एक विद्वान् हैं और जानते हैं की किन प्रयासों द्वारा इस मुद्रा-स्फीति पर नियंत्रण पाया जा सकता है , लेकिन अफ़सोस है की सरकार का पूरा ध्यान नकारात्मक ऊर्जा के रूप में व्यय हो रहा है जैसे रामदेव से कैसे बचें और बालकृष्ण को कैसे उखाड़ फेंके आदि ! इस कारण से मुद्दे पर से उनका ध्यान सदैव हटा ही रहता है और उचित निर्णयों का अभाव सा दीखता है !

साढ़े छः करोड़ टन खाद्यान्न गोदामों में सड़ रहा है , इसके पीछे सरकार की क्या रणनीति हो सकती है भला ? राजकोष में घाटा बढ़ता जा रहा है , जिसे नियंत्रित करने के लिए खाद्यान के दाम ऊंचे कर दिए , जिसके खरीददार ही नहीं मिल रहे ! क्या इससे inflation कम हो जाएगा ! एक ओर भूखमरी, दूसरी अनाज की बर्बादी और तीसरी बढती मंहगाई ! आखिर ये किस अर्थशास्त्र की नीति है ?

मंहगाई की आग में पेट्रोल और डीज़ल भी भभक रहे हैं और सरकार ने इसे बुझाने की जिम्मेदारी RBI को सौंप दी है , जिसने पिछले दो वर्षों में ग्यारह बार ब्याज दरें बढा दी हैं ! क्या इससे रुकेगी मुद्रा-स्फीति ?

उद्योगपति अपना धन विदेशों में निवेश कर रहे हैं ! २७ अरब डॉलर घर आया तो बदले में ४४ अरब डॉलर का निवेश विदेशों में हुआ ! विदेशों में निवेश से मंहगाई बढ़ेगी या घटेगी ? "वालमार्ट" जैसी कम्पनियाँ यदि हमारे देश में आयेंगी तो छोटे-छोटे दुकानदार और किसान तो बर्बाद हो जायेंगे ! अमेरिका के दबाव में आकर और उनके सुझाव मानकर पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है , अब वालमार्ट आदि में निवेश से आम जनता का कोई भला नहीं होने वाला! आखिर सरकार की मंशा क्या है -आम जनता को आबाद करना या फिर बर्बाद करना ? वही आम आदमी जो इन्हें चुनाव जिताकर कुर्सी पर बैठाता है ! लेकिन ऊँचे सिंहासन पर विराजने के बाद इन्हें न ही जनता की आवाज़ सुनाई देती है , न ही उसकी भुखमरी और न ही बढती मंहगाई से त्रस्त आदमी से कोई सरोकार दिखता है !

वैसे जो लोग इस सरकार को दुबारा चुनेंगे क्या उनपर इस बढती मंहगाई की मार नहीं या फिर वे सरकार को जिम्मेदार नहीं मानते ?


Monday, August 1, 2011

पुरुषों की व्यथा

पुरुषों के कष्ट भी असीमित हैं ! उनके कष्टों का परिमाण इसलिए और भी बढ़ जाता है क्यूंकि वे अपने कष्ट किसी से नहीं कहते हैं , मन में ही रखते हैं और घुलते रहते हैं ! जबकि स्त्रियाँ अपने मन की बात अपनी माँ , बहन , मित्र और पति से कहकर अपने मन को हल्का कर लेती हैं !

  • पुरुषों पर आफिस के कार्यों का अत्यधिक बोझ रहता है जिसके कारण वे तनावग्रस्त रहते हैं , घर आने पर भी आफिस की परेशानियाँ पीछा नहीं छोड़तीं ! चाहकर भी पत्नी अथवा बच्चों को समुचित प्यार और समय नहीं दे पाता ! बच्चों के साथ समय बिताना चाहता है , उन्हें पढाना चाहता है , बहुत कुछ नया सिखाना चाहता है , लेकिन समयाभाव उसे ऐसा करने नहीं देता ! इससे परिवार में असंतोष पनपता रहता है और उसकी जडें गहरी होती जाती हैं !
  • सास और बहू की अनबन में तो बेचारा घुन की तरह पिसता ही रहता है !
  • पुरुष वर्ग ज्यादा लोगों के संपर्क में रहता है ! कभी-कभी अनायास ही उसमें inferiority complex पैदा हो जाता है ! कारण कुछ भी हो सकता है ! यथा - आर्थिक , सामाजिक , साथियों की तरक्की अथवा कुछ कर पाने की असमर्थता आदि ! ऐसे में एक समझदार पत्नी ही उसका मनोबल बनाए रख सकती है अथवा स्थिति अति विकट हो जाती है !
  • कई बात लगातार असफलताओं को झेलते हुए एक पुरुष का स्वभाव अति-कटु हो जाता है , जिसे एक पत्नी को समझना आवश्यक है और कोशिश करनी चाहिए की पति पर अतिरिक्त दबाव न डाले!
  • कभी अनजाने ही कोई बड़ा आर्थिक नुकसान हो जाए तो वह उसे अकेले ही वहन करने की कोशिश करता है , अपनी पत्नी से नहीं कहता क्यूंकि वह उसे परेशान नहीं देखना चाहता !
  • प्राइवेट नौकरियों में बढ़ता दबाव और आगे निकलने की होड़ में लोग अपना दूना समय और सामर्थ्य दे रहे हैं , तब कहीं नौकरी सुरक्षित रह पा रही है ! ( सरकारी नौकरी वालों को थोड़ी राहत है यहाँ ) ! ऐसी स्थिति में वे परिवार को समय नहीं दे पाते , फलस्वरूप दोहरा तनाव झेलते हैं !
  • अक्सर पत्नियों का लगातार शिकायती रवैय्या पुरुषों को निराशाजनक सोच दे देता है और वे अनायास ही परिवार क प्रति उदासीन हो जाते हैं ! स्थितियां सुधरने के बजाये बिगड़ने लगती हैं !
  • पुरुष अपने परिवार की ख़ुशी के लिए उन्हें बाहर घुमाने ले जाते हैं , खिलाते हैं , लेकिन स्वयं वे घर के बने स्नेहयुक्त भोजन की अभिलाषा रखते हैं , जो अक्सर पूरी न होने पर उनमें एक अनजाना असंतोष पैदा करता है ! कुछ स्त्रियाँ स्वयं में इतनी व्यस्त रहती हैं या फिर आलस्यवश वे इस महवपूर्ण कार्य को अनुशासन के साथ नहीं करतीं ! .देरी हो जाने पर कुछ शोर्ट-कट बनाकर काम चलाती हैं ! पति इस बात पर चुप ही रहता है लेकिन एक असंतोष रहता है !
  • कभी कभी स्त्रियाँ अपने सामान्य स्नेहपूर्ण व्यवहार की जगह , अति रूखा व्यवहार करती हैं ! वे बार-बार उसे उसकी कमतरी का एहसास दिलाती हैं और उनका मनोबल तोडती हैं ! उनकी संवेदनहीनता पुरुषों को अति निराश करती है और अपनी अपेक्षाओं के पूरा न हो पाने की स्थिति में वे तनावग्रस्त रहने लगते हैं !

पुरुषों की व्यथा भी अनंत हैं ! ऐसे में यदि पत्नी का सहयोग न मिले तो यही व्यथा अंतहीन हो जाती हैं !

Thursday, July 28, 2011

क्या स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ते तलाक का कारण है ?

कई बार सुनने को मिलता है की स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता घरों को तोड़ रही है आखिर कैसे ? यदि पुरुषों की आर्थिक स्वतंत्रता घरों को नहीं तोड़ रही तो स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता परिवारों को कैसे तोड़ सकती है भला ?

मैंने तो आज तक यही देखा और सुना है की स्त्री परिवारों को सदैव जोडती है और रिश्तों को बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाती है फिर वह परिवारों के टूटने का सबब कैसे हो सकती है ?

  • स्त्रियाँ यदि नौकरी करती हैं तो पति आर्थिक जिम्मेदारियों को भी साझा करती हैं , जिससे पति पर अनावश्यक बोझ नहीं रहता ।
  • नौकरी करने वाली स्त्रियाँ घर से बाहर निकलती हैं , जिससे उनमें आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है । वे घर के काम काज के अतिरिक्त अन्य बहुत से कार्यालय सम्बन्धी कार्यों और बारीकियों को समझने लगती हैं , जिससे वे पति की अन्य बाहरी जिम्मेदारियों का भी सहजता से वहां कर लेती हैं ।
  • सुन्दर पत्नी किस पति को नहीं अच्छी लगती । नौकरी करने वाली स्त्रियाँ स्वयं तो maintained और आकर्षक रखती हैं , अन्यथा वे अपनी परवाह कम करती हैं ।
  • बाहर निकलने से उनका exposure बढ़ता है तथा बाहर की दुनिया की समझ बढती है ! इससे उनमें जागरूकता आती है , और आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है । जो परिवार में एक स्वस्थ्य वातावरण को उपस्थित करता है।
  • स्त्री पुरुष में समानता आती है और आपसी द्वेष ख़तम होते हैं । कुंठा मिटती है और एक-दुसरे के लिए परस्पर सम्मान बढ़ता है ।
  • वह खुश रहती है ! उसे अपनी शिक्षा और जीवन दोनों सफल लगने लगते हैं । मन की ख़ुशी उसे परवार के ज्यादा करीब लाते हैं । बच्चे एवं पति उस पर गर्व करते हैं ।
  • उसकी भी तरक्की होती है । Promotion मिलता है । उसके कार्यों की सराहना होती है जो उसके self esteem को बढ़ाता है । उसे अपनी सम्पूर्णता का एहसास होता है। पति के साथ वह भी अपनी उपलब्धियों को साझा करती है ! दोनों की आपसी ख़ुशी बढती है ! समाज को भी अधिक योगदानकर्ता मिलते हैं ।
  • पति का अपनी पत्नी की योग्यता पर विश्वास बढ़ता है । पत्नी के लिए ह्रदय में प्यार तो पहले से रहता है , अब सम्मान भी बढ़ जाता है , अन्यथा घर की खेती साग बराबर ही रहती है ।
  • पति अपनी पत्नी को बेहतर understand करता है । उसके वर्क-लोड को कम करने के लिए घरेलु कामों में भी उसकी सहायता करता है । दोनों सच्चे अर्थों में एक दुसरे के जीवन साथी बन जाते हैं ।
  • इसके अतिरिक्त यदि एक गृहणी को उसका पति आर्थिक स्वतंत्रता देता है , तो वह कुंठाग्रस्त नहीं रहती , प्रसन्नचित्त रहती हैपति उसका ध्यान रखता है , इस बात से अभिभूत रहती है और दूरियां घटती हैं

आजकल तो पुरुष स्वयं ही अपने लिए समकक्ष योग्यता और नौकरी करने वाली पत्नी चाहते हैं , जो सही अर्थों में उनके दुःख सुख की भागीदार बने पति गर्व के साथ अपनी पत्नी की उपलब्धियों की चर्चा अपने मित्रों से करता है। ऐसे बहुत से लोगों को जानती हूँ जहाँ पति- पत्नी दोनों आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर हैं और परिवार में खुशहाली है। मेरी समझ से परिवारों का टूटना , झूठे दंभ , दहेज़ प्रथा , लालच, अज्ञानता और रूढ़िवादिता के कारण होता है आर्थिक स्वतंत्रता के कारण नहीं।

फिर भी पाठकों से निवेदन है मेरा भ्रम दूर करें !

Zeal

Tuesday, July 26, 2011

असमर्थ बेटी -- कहानी !

असह्य कष्ट से छटपटाती माँ , जनरल वार्ड में भर्ती थी ! स्थिति बिगडती चली जा रही थी ! दुसरे शहरों में रह रही दोनों बेटियों का परिवार वहां पहुँच चुका था ! चंचल ने जल्दी-जल्दी अपनी जमा पूँजी समेटी और अगली ही गाडी से माँ से मिलने निकल पड़ी ! मन अनेक आशंकाओं से घिरा हुआ था ! पूरा दिन सफ़र के बाद रात दस बजे जब चंचल अस्पताल पहुंची तो माँ की हालत बहुत बिगड़ चुकी थी ! डाक्टरों का कहना था की इन्हें तुरंत ICU में भर्ती करना होगा ! ICU में भर्ती करने के लिए सबसे पहले दस हज़ार की फीस भरनी थी ! उस समय किसी के पास इतना पैसा नहीं था ! चंचल ने तत्परता से दस हज़ार रूपए जमा करके माँ को फ़ौरन ICU में भर्ती करवाया ! जीवन में पहली बार उसे मुट्ठी भर संतोष मिला था ! वो खुश थी की उसकी छोटी सी जमा-पूँजी , माँ की तकलीफ में काम सकी !


फिर सिलसिला शुरू हुआ ICU में होने वाले डाक्टरी इलाज का ! प्रतिदिन का खर्च तकरीबन २०-३० हज़ार ! डाक्टर के प्रत्येक राउंड के बाद नर्स , जांचों , दवाइयों और इंजेक्शंस का परचा थमा जाती थी और चंचल की दोनों बहनें लग जाती थीं माँ की हर आवश्यकता पूरी करने में ! दोनों ही आत्म निर्भर थीं और तन-मन-धन से माँ की सेवा कर रही थीं ! चंचल को गर्व हो रहा था अपनी बहनों पर ! ईश्वर उसकी बहनों जैसी बेटियां, हर माँ को दें !

चंचल असहाय थी ! वो कोई आर्थिक मदद नहीं कर पा रही थी ! सारा भार उसकी बहनों पर ही था ! उसे अफ़सोस था की माँ ने तो अपनी तीनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर सामान रूप से लायक बनाया था लेकिन चंचल आज आर्थिक रूप से इतनी अशक्त थी की वह अपनी बीमार माँ के लिए कुछ नहीं कर सकती थी ! चाहती थी पति उसके मन की उलझन समझ ले लेकिन पति ने अपनी तरफ से कोई तत्परता नहीं दिखाई तो सकोचवश वह अपनी माँ के इलाज के लिए पैसे नहीं मांग सकी उनसे !


रात्री के दुसरे पहर में जब ICU के बाहर जब मरीजों के परिजन फर्श पर चादर बिछाए बेखबर सो रहे थे तब अपनी असमर्थता और लाचारी पर बिना आहट किये वह सिसक रही थी ! बगल में सो रही छोटी बहन की अचानक नींद खुली ! चंचल को सुबकते देख उससे कारण पूछा ! लाख पूछने पर भी चंचल ने अपनी मन की व्यथा छोटी बहन को नहीं बताई ! लेकिन बहन ने चंचल के आंसुओं को पढ़ लिया ! सुबह होते ही उसने दस हज़ार रूपए ATM से निकाले और चंचल के हाथ पर रख दिए ! चंचल आँख मिला सकी !

उसी दिन दोपहर दो बजे माँ इस संसार को छोड़कर विदा हो गयी ! उसी के साथ ख़तम हो गयी सब उधेड़बुन और ज़रूरतें !


मृत्यु के छः महीने बाद जब वृद्ध पिता ने कुछ पैसों का इन्तेजाम किया तो लाख मना करने के बावजूद , सबसे पहले उसी असमर्थ बेटी का पैसा चुका दिया गया ! चंचल को उस छोटे से योगदान से जो मुट्ठी भर संतोष मिला था , वो भी जाता रहा .......

Zeal