Monday, June 14, 2010

" Nari aur Purush "...Mere mann ke Udgaar !

Once I was having a discussion with my elder sister, who is professor in Physics. The discussion went on very interesting as it naturally came to the feelings of men and women. This discussion prompted me to write the following poem. The poem is dedicated to my elder sister.




"Nari aur Purush"


तुम अनंत, मै बिंदू
तुम चांद, मै चकोर
तुम बूंद, मै चातक



मै याचक, तुम निर्मम
मै माया, तुम ज्ञान
मै प्रस्तुत, तुम अलभ्य
मै समर्पण, तुम नियंत्रण

मै प्रवाह, तुम अवरुद्ध
मै राग, तुम वैराग्य
मै अनुराग, तुम तटस्थ
मै भक्ति, तुम तर्क

मै फेन, तुम सत्य
मै संकीर्ण, तुम विस्तृत
मै अपरिष्कृत, तू अभ्यस्त
मै क्षूद्र्, तू विशाल

मै उथली, तुम गहरे
मै समतल, तुम दुर्गम
मै अवांछित्, तुम आगम
मै लिप्त, तुम विर


मै धूल, तू नभ

मै व्यर्थ, तुम सफल
मै उदासी, तुम मुस्कान
मै सरल, तुम प्रबुद्ध
मै अभिव्यक्ति, मै उच्छ्रुंखल, मै स्वच्छंद.... तुम सन्यत

41 comments:

सतीश सक्सेना said...

सही कटाक्ष है ... शुभकामनायें !

Divya said...

Many thanks Sateesh ji

वाणी गीत said...

संकीर्ण, क्षुद्र, धूल, व्यर्थ बिलकुल ही नहीं ....इन पर कोई समझौता नहीं ..
कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें ...

Divya said...

Vani ji,

I have removed 'word-verification' as suggested by you.

@-संकीर्ण, क्षुद्र, धूल, व्यर्थ बिलकुल ही नहीं ....इन पर कोई समझौता नहीं ..

You are right, It's indeed tough to compromise with it.

Arvind Mishra said...

यह तो समर्पण की असीम उदात्तता है अगर यह अभिधा (सीधे शाब्दिक अर्थ में ) है तो .....
सुन्दर अभिव्यक्ति !

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी व्यक्ति विशेष को धोया है कि हम सबको ही लपेट लिया ।
नर और नारी के स्वाभावों का सुन्दर चित्रण ।
आपका ब्लॉग हमारी RSS Feeds में गया ।

ali said...

@ ज़ील
तो आपने ब्लॉग बना ही लिया वो भी एक प्रोफ़ेसर का कहा मानकर :) ... सुस्वागतम ! ... अनंत शुभ कामनायें ! अभिव्यक्त हों ...यशस्वी हों ...सर्वमान्य हों ... निर्विवाद हों ! अशेष मंगल कामनायें !


(१)
हां तो आपकी कविता देखी ...नारी पुरुष के सम्बन्ध में ! अगर यह 'समर्पण' है तो 'असहमत' और अगर यह 'तंज' है तो भी 'असहमत' ...ख्यालाती ग़ैर बराबरी भी हमें मंज़ूर नहीं ! इंसानों को इंसान ही रहने दीजिये ना कोई ज़र्रा ना आफ़ताब !
(२)
आप हिन्दी बहुत अच्छी लिख रही है , प्रविष्टि को एडिट करके फॉण्ट बराबर कीजिये , तुलना बतौर चुने गए गये शब्दों पर भी कुछ कहना था पर अभी नहीं फिर कभी ...

nilesh mathur said...

बहुत सुन्दर! स्वागत है आपका ब्लॉगजगत में!

Divya said...

@-अगर यह अभिधा (सीधे शाब्दिक अर्थ में ) है तो..

Arvind ji, Ye Abhidha hi hai...trust me..

Thanks for telling me the meaning of 'Abhidha'


@-किसी व्यक्ति विशेष को धोया है कि..

Praveen ji, lol...Dohya nahi kisi ko. It came out after pondering a
lot over the same issue. Thanks for keeping in RSS feed.

@-सुस्वागतम ! ... अनंत शुभ कामनायें ! अभिव्यक्त हों ...यशस्वी हों ...सर्वमान्य हों ... निर्विवाद हों ! अशेष मंगल कामनायें !...

Ali ji,

Million thanks for the best wishes. I am really touched.

@-इंसानों को इंसान ही रहने दीजिये ना कोई ज़र्रा ना आफ़ताब !..

I agree completely. But when i sit with peace in heart and mind. I see clearly the most beautiful aspect of a man, which unfortunately goes unnoticed by a woman.

A woman's beauty is described everywhere, but we cannot ignore the wonderful virtues a man possess.

@-तुलना बतौर चुने गए गये शब्दों पर भी कुछ कहना था पर अभी नहीं फिर कभी ...

"Kaal kare so aaj kar, aaj kare so kal,
Pal mein Parlay hoyegi, bahuri karoge kab? "

Don't resist the thoughts crossing your mind.

Varying views are the beauty of any discussion. So Do not deprive me of your valuable opinion about it.

@ Neelesh ji-

Thanks for the warm welcome Sir.

hem pandey said...

एक पंक्ति और जोड़ दें :-

किन्तु मेरे बिना तू अपूर्ण.

डॉ टी एस दराल said...

दिव्या जी , आपने हर बात में पुरुष को ही ऊपर रखा है । क्या पुरुष इस लायक होते हैं ?
ब्लॉग शुरू करने के लिए बधाई और शुभकामनायें ।

Divya said...

@ Hem Pandey ji,

That's indeed a wonderful addition, but don't you think It will reflect a woman's ego?

गिरिजेश राव said...

शुभकामनाएँ आर्ये!
ई ललरौटी वाला टेम्पलेट नेत्रों के लिए कष्टकारी है। इसे ठंडा ठंडा कूल कूल कीजिए।
बाकी हम तो अर्द्धनारीश्वर के अवतार ठहरे। का कहें ? गिरिजेश = गिरिजा+ईश। शरीर के दू हिस्से ऐसी तू तू मैं मैं में गड़बड़ा जाएँगे। स्वास्थ्य के लिए हानिकर। घोर हानिकर !

Divya said...

@-दिव्या जी , आपने हर बात में पुरुष को ही ऊपर रखा है । क्या पुरुष इस लायक होते हैं ?

Dr. Daral,

When we see without the specs of ego, we can see clearly the virtues of men.

I have closely seen few men in my life. My Dad was a bank officer who stayed outstation always but managed his children to get best education by keeping his family in Metro with all luxuries.

My brother has done so much for me.

My Jijaji has always supported my sister in all her endeavors.

Above all my husband takes great pains to give all comforts and happiness to his family.

Apart from family people, i have come across innumerable friends and acquaintances [male], who are always ready to extend their help selflessly.

After knowing so many wonderful men folk, how can i resist praising them ?

Men and women are complementary and are incomplete without each other.

If they do not cry, do not show their emotions when weak, do not share their woes , avoid sharing pains.....Then isn't it our duty to see beneath the tough shell? to see how hard they fight tears? to see how much they desire to withstand the rough weather?

For whom they are doing all this?

-Not for aging mother?
-not for tirelessly and undemanding wife?
-not for chidren?

Don't they deserve our complete love?
Don't they deserve genuine respect from the bottom of our heart?
Don't they deserve praises for which they work tirelessly?
Is it necessary for a woman to hurt a man's ego always?

Dr. Daraal, Yes, Men also deserve praises. They also posses a heart , full of emotions.

Thanks for the warm wishes Sir.

ali said...

@जील
~~Kaal kare so aaj kar, aaj kare so 'kal'~~

इसे सुधार लीजिये ...

~~काल करे सो आज कर आज करे सो 'अब' ~~


"कभी एक बंदिश...एक गीत सुनते हों ...लेकिन बीच में सुर दूसरा लग जाये तो खटकता है... साधारण सी बात है कि एक गीत ... एक राग ...एक सुर / ताल / लय ...कोई व्याघात ( व्यवधान ) नहीं बस इसी तर्ज़ पर आपकी कविता सुन रहा था जिसमे हर पंक्ति मुकम्मल करने कोशिश में आपने व्याघात किये है इसलिए मुझे लगा कि हर पंक्ति अपने आप में मुकम्मल भले ही हुई पर कविता टूटती रही...बस इतनी सी बात , सोचा बाद में कह लूंगा , अभी तो आपने शुरू ही किया है ...
ज़रा एक उदाहरण गौर फरमाइयेगा ...तुम ज्ञान ,तुम तर्क ,तुम सत्य ,वगैरह वगैरह किसी एक पक्ष के लिए संबोधन है फिर वही पक्ष हठात... तुम अवरुद्ध... हो जाता है , आप जिस भी मूड में हों उसकी कंटीन्यूटी ( निरंतरता ) बनी रहना चाहिए ! क्या 'ज्ञान' 'सत्य' और 'तर्क' का 'अवरुद्ध' होना आपको खटकता नहीं ? लगभग ऐसे ही ...मै राग , मैं प्रवाह .मैं अनुराग बनाम मैं व्यर्थ ! तो यूं समझिये हर लाइन अपने आप में मुकम्मल है पर वह कविता को सम्पूर्णता में ( इन टोटलिटी ) एक लय / एक राग / एक बंदिश में बंधने नहीं देती ! "

बात और भी पर इतने से मेरा मंतव्य आप समझ गयी होंगी !
उम्मीद है मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगी !

ethereal_infinia said...

Ek sundar pyaari-si rachnaa
Bilkul tumhaari taraah, ZEAL

Chhoti behl ki yeh rachnaa waise to mahad-ansh samajh mein aa gayee hain par Hindi bhaashaa pe kam prabhutva evam shabd-kosh ki maryaadaa ke aadhin kisi-kisi jagaah arth-ghatan mein thodi kathinaai ho rahi hain.

Parantu, yadi sakaaratmak drishti se dekhaa jaaye to har kathinaai mein ek avsar hotaa hain kuchh nayaa sikhne kaa, kuchh nayaa jaan-ne kaa Ek jharnaa kitni baadhaa-o ko paar karte hue hi ek viraat nadi ban jaati hain. Chalo aapke blog ki utkrusht Hindi ke maadhyam se meraa apni raashtra-bhaashaa kaa bhi gyaan-vardhan ho jaayegaa. Aapkaa aabhaari hoon yeh uphaar ke liye

Is rachnaa ko padhkar man mein vichaar aataa hain ki kyaa yeh ek taarkik anveshan ki prastuti hain yaa fir yeh ek simmilit anubhavo kaa guldastaa hain jisme phool bhi hain aur kaante bhi?

Rachnaakaar ki paripekshtaa se hi is baat kaa sahi avlokan kiyaa jaa saktaa hain

Napoleon Bonaparte ne kahaa hain – Main meri paristhitiyo kaa nishkarsh hoon [I am a consequence of my circumstances]

Hamaare anubhav aur hamaari taarkiktaa kaa sulabh samanvay hi hamaare aachran ki roop-rekhaa nirdhaarit karte hain aur hamaare vyaktitva ko sanwaarte-nikhaarte hain

Ant mein ek mahatvapurn nirikshan aur ek namr vinanti

Aapke blog par koi ‘moderation’-naamak ahankaari hatiyaar kaa nahi honaa bahot hi saraahniy hain.

Blog likhaa hain to har taraah ki tippani ko sthaan milnaa chaahiye, naa ki sirf apni manpasand aur chune hue logo ki yaa chuni huee tippani-o kaa wahaan sthaan ho.

Aise ahankaari hathiyaar ko pratibandhit rakhne kaa ek achchhaa nirnay hain aapkaa. Yeh is liye ki kisiko bhi majbur hokar aur e-mail likhkar aapse puchhne naa aanaa pade – “Meri tippani kyon nahi prakaashit ki gayee hain, abhi tak?!” Khair…Baat niklegi to phir duur talak jaayegi

Aashaa hain aap kisi bhi Mahaashay Ji yaa kisi bhi Mahodayaa Ji ke avirat prayaas ke fal-swaroop yaa unke ati-prabhaavshaali aaghrah se vivash hokar is ahankaari hathiyaar kaa yahaan kabhi bhi upyog nahi karoge.

Meri vinanti aur is tippani ko bhi ek ghazal ke do sher ke saath samaapt kartaa hoon –

Pehle to apne dil ki razaa jaan lijiye
Phir jo kahe nigaah-e-yaar maan lijiye

Kuchh keh rahi aapke sine ki dhadkane
Meraa nahi to dil kaa kahaa maan lijiye


Arth kaa
Nat-mastak, charan sparsh

दीपक 'मशाल' said...

वाह.. अच्छी शुरुआत.. कुछ पंक्तियाँ मेरी तरफ से भी.. ये मेरे एक परिचित वरिष्ठ कवि की हैं..
'यज्ञ तुम हो आहुति मैं..
तुम मलय मैं गंध हूँ
देवता तुम मैं पुजारी
गीत तुम मैं छंद हूँ'

अल्पना वर्मा said...

आप ने ब्लॉग शुरू किया बहुत बहुत बधाई.
कविता तो बेहद खूबसूरत है.
'मै समतल, तुम दुर्गम '
मैं प्रवाह...
-----
एक गीत याद आ गया..'तुम गगन के चन्द्रमा ही मैं धरा की धूल हूँ..'
नारी का स्वभाव ही समर्पण है...:)

Divya said...

@-शरीर के दू हिस्से ऐसी तू तू मैं मैं में गड़बड़ा जाएँगे। स्वास्थ्य के लिए हानिकर। घोर हानिकर !

Do not be so selfish Girijesh ji. For society to be enlightened, do not hesitate in contributing your valuable opinion.

Think of everyone’s health and not just yours.

Divya said...

Ali ji,

@इसे सुधार लीजिये ...~~काल करे सो आज कर आज करे सो 'अब' ~~

Thank you Ali ji, the error is marked and will be corrected soon. I am not computer savvy , so I am learning with a slow pace, how to edit and use other features.

@.तुम ज्ञान ,तुम तर्क ,तुम सत्य ,वगैरह वगैरह किसी एक पक्ष के लिए संबोधन है फिर वही पक्ष हठात... तुम अवरुद्ध... हो जाता है , आप जिस भी मूड में हों उसकी कंटीन्यूटी ( निरंतरता ) बनी रहना चाहिए ! ..

I agree with you that the continuity is broken but I guess it is because of varying emotions influencing the mind at the same time.

After all we are human beings and we do get ‘avruddha’ at some point of life and that is what reflected in the poem. Just another shade [avruddha] of his persona and likewise the ‘pravaah’ and ‘vyarthta’ of a woman.

The virtues and vices are woven fine in a person . A complete surrender seems impossible and unnatural.

Thanks for highlighting the valid points.


@-बात और भी पर इतने से मेरा मंतव्य आप समझ गयी होंगी !

Your very clearly presented your views and I took it in the right perspective and I genuinely appreciate.

@- उम्मीद है मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगी..

I value your opinion. How can I take it otherwise?

Rest assured Ali ji, I see a huge scope in myself to improve. Suggestions and criticism are more than welcome here.

Divya said...

@-Is rachnaa ko padhkar mann mein vichaar ......

You are correct ! Its Indeed an expression of innumerable experiences and emotions . We all, irrespective of gender, constantly fight with contradicting emotions and thoughts. A small portion of it is reflected here.

We are indeed consequence of our circumstances , as it was rightly stated by Napoleon Bonaparte.

@Aapke blog par koi ‘moderation’-naamak ahankaari hatiyaar....

Rest assured, you will never find the moderation thing on my blog here. I am very much against it. Getting filtered comments is a kind of bias. We need to fight the bias.

@-Kuchh keh rahi aapke sine ki dhadkane
Meraa nahi to dil kaa kahaa maan lijiye

I always listen to my heart and I firmly believe in..

“ Khudi ko kar buland itna ,ke khuda bande se pucchhe-Bata teri raza kya hai”

@- Arth kaa
Nat-mastak, charan sparsh

By this beautiful gesture you indeed have proved your generosity.

Mera bhi Sadar-Pranaam sweekaar karein.

Divya said...

Deepak ji,

@ 'यज्ञ तुम हो आहुति मैं..
तुम मलय मैं गंध हूँ
देवता तुम मैं पुजारी
गीत तुम मैं छंद हूँ'..

Thanks for mentioning the beautiful lines. It made my poem more meaningful. Convey my regards to your poet friend.

Thanks.
…………………………………..

-Alpana ji,

@-एक गीत याद आ गया..'तुम गगन के चन्द्रमा ही मैं धरा की धूल हूँ..'

In a somewhat similar frame of mind I wrote this poem.

Thanks for visiting my blog and encouraging me.

Regards,

Arvind Mishra said...

@इस पोस्ट पर चल रहे विचार विमर्श बहुत गहराई ;लिए हुए हैं .....
इत्मीन्बान से पढता हूँ ...कब मुझे मिलेगा इत्मीनान ? ओह !!

dwij said...

यज्ञ तुम हो आहुति मैं..
तुम मलय मैं गंध हूँ
देवता तुम मैं पुजारी
गीत तुम मैं छंद हूँ'

सुन्दर अभिव्यक्ति
के लिए बधाई.

Divya said...

Thanks dwij ji

Divya said...

Ethereal ji,

Your native language is Gujarati, yet you took great pains to type in Hindi.

It's mesmerizing.

Regards,

Jayant Chaudhary said...

What can I say now??

Granted that some of us treat women like that, you might say most of us not just some of us. But I do think that things are changing a lot.
People, like me, treat women with respect and as equals.

One day things will change for even better.

Please read my poem on the similar issue:
http://jayantchaudhary.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html

With respect,
Jayant

Jayant Chaudhary said...

(१)
एक दिन बात नयी होगी,
नारी की कैद ख़तम होगी..
अंधेर दमन का मिटाने को,
समानता की सुबह होगी..

(२)
मौन हैं सब, पर
स्त्रीयता गुहारती है..
माँ के दूध की धार,
सबको दुत्कारती है..

एक ना एक दिन,
टूटेंगी सब बेडियाँ..
उठ, बाहें फड़का,
कि, मानवता पुकारती है...

~जयंत चौधरी
४ अप्रैल २००९

Divya said...

Jayant ji,

Glad to know your beauful thoughts about women. But don't you think that respect , freedom and empowerment of women is confined in books and literature only and covered with dust on book shelves?

फ़िरदौस ख़ान said...

शानदार...
शुभकामनाएं...

Anonymous said...

The paradox and satire are pretty clear . Woman who can boost the male ego by accepting that they are the lesser half are liked is pretty well clear from the discussions
the quaestion how many such woman exist ???? in reality

regds
rachna

Divya said...

Rachna ji,

@- by accepting that they are the lesser half...

By praising the other half, a woman cannot become inferior by any means.

@-the quaestion how many such woman exist ???? in reality

All women at some point of time think in this fashion.

Bitterness spoils every relationship, not just man and woman .

Harash Mahajan said...

Divya ji kitne sunder ahsaason se nawaza hai aapne iss tehreer ko...kitni Gehraayii...lekin ant kitna sugam....ekaaki pan ka strot bana diyaa aapne....bahoot khoob....merii janib se is intekhaab per dhairoN daad qabool farmaayeiN..

Khuda aapko apni parchaahiyoN meiN rakhe...


Harash

(Blog per aane ke liye shukriyaa6h...umeed hai aap aainda bhi apne pur-asar tassiraaat dete rahenge...}

Divya said...

ji shukriya Harash ji, Pyar to baantne se badhta hi hai.

Divya said...

@-Ashish Chandra ji-

Very happy to hear your views.

I seriously feel that by such discussions without any bias can truly help in knowing the other gender in a better way.

By reading a woman's view , men are coming to know how she feels, what she desires, what her dreams are, how she can be more happy and so on.

Likewise by reading the views of different men here, I am also coming to know how they feel, what they expect from women in society and also about their fears.

Everything and all issues can be solved by such genuine interactions.

I pleasingly announce that i always came across the wonderful men in my real life and course here in this discussion also.

Why a man is always seen in negative shade , is beyond my comprehension. In fact i have discovered more than women, men are thinking about women empowerment.

Hats off to such men [GEMS] in the form of our brothers and friends.

Himanshu Mohan said...

बहुत सी बातें तब तक समझ में नहीं आतीं जब तक जिस्म से बढ़कर बात रूह तक न पहुँचे।
रूह तक पहुँचना ज़रूरी है, बात की भी और शख़्स की भी।
ये बात दीगर है कि जिस्मानी तज्रुबों के हिमायती इस सोच को अहमकाना क़रार देते हैं।
अच्छी और ख़ूब है ये रचना - बहुत सट्ल अंदाज़ में - अभिधा में नहीं - व्यञ्जना में, और पश्यन्ती की साधना के बिना देखने पर तो दिखता तक नहीं - समझ आना तो दीगर बात है।
लिखती रहिए…

Divya said...

@-रूह तक पहुँचना ज़रूरी है, बात की भी और शख़्स की भी।

@-साधना के बिना देखने पर तो दिखता तक नहीं - समझ आना तो दीगर बात है।

bahut gehri baat keh di Himanshu ji..

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