Monday, February 18, 2013

मत करो खुद को निर्वस्त्र।

मूर्ख मत बनो , मत लिखो अपने दिल की पीड़ा। भेडियों के शहर में अपने जज़्बात लिखकर मत करो खुद को निर्वस्त्र। सत्याबयानी अच्छी होती है , लेकिन जज्बातों की बयानगी से क्या हासिल? थोड़ी सी सहानुभूति के लिए इतना बड़ा जोखिम? ये प्यार-व्यार और नुमाईश सब बचकानापन है! उसे लिखो मत, कहो मत!...केवल पियो उसे ...

इस तरह पीड़ा को उजागर करके रोना-धोना तुम्हारे कमज़ोर व्यक्तित्व को परिलक्षित कर रहा है! दुःख  को पीना सीखो , भावनाओं से लड़ना सीखो!

इस  पोस्ट में भले ही आपको सतरंगे शब्दों के इन्द्रधनुषी जाल न मिलें लेकिन प्रेम और दुःख से कातर हुए घुटनों के बल गिरे हुए बंधू बांधवों के लिए पर्याप्त फटकार तो  है , शायद काम आ जाए।

कभी मुस्कुरा के मिला करो।।
कभी खिलखिला के हंसा करो
तुम वजह हो मेरे वजूद की
सूरज की तरह दमका करो

Zeal 

30 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

DINESH PAREEK said...

वहा क्या बात है हर एक शब्द में दर्द वो ऐसा दर्द की रोगटे खड़े कर दे
पर आप ऐसा क्यूँ कह रही हो नारी को किसी की दया की जरुरत नहीं है नारी तो खुद एक दवावान है अपने तो सच मैं घायल कर दिया
उत्कर्ष रचना
मेरी नई रचना
फरियाद
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
दिनेश पारीक

DINESH PAREEK said...

वहा क्या बात है हर एक शब्द में दर्द वो ऐसा दर्द की रोगटे खड़े कर दे
पर आप ऐसा क्यूँ कह रही हो नारी को किसी की दया की जरुरत नहीं है नारी तो खुद एक दवावान है अपने तो सच मैं घायल कर दिया
उत्कर्ष रचना
मेरी नई रचना
फरियाद
एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ
दिनेश पारीक

mridula pradhan said...

char pangtiyan ant ki badi achchi lagi....

Madan Mohan Saxena said...

बहुत खूब

G.N.SHAW said...

लोग आधुनिकता के आगे , अपना सब कुछ खो चुके है |

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी यह प्रविष्टि आज दिनांक 18-02-2013 को चर्चामंच-1159 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

अरुण चन्द्र रॉय said...

sahi salah

Tushar Raj Rastogi said...

सुन्दर आलेख |

Tamasha-E-Zindagi
Tamashaezindagi FB Page

पूरण खण्डेलवाल said...

सही !!

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगल वार 19/2/13 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है

काजल कुमार Kajal Kumar said...

4 लाइनों ने सब कह दिया

Dr.J.P.Tiwari said...

Most valuable suggestion... thinking about it since morning... aaj samvrdanon me bhi swarth aur chhal ne apna sthan gahraai tk bana liya hai.. yah sahi hai ki abhi bhi achchhe insan bahut hain lekin we mukhr nahin hain... jab tak we mukhr nahin honge hame uphaas hi milega... maine bhi gahraai tak is peeda ko mahsoos kiya hai ... aapne sabhi ko sachet kr bahut hi nek kaary kiya hai... badhai...aur aabhar ..

madhu singh said...

SUNDAR AUR SHASKT PRASTUTI ** NAHI DAYA KI BHIKH CHAHIYE,HAK APNA HAM LAD KAR LENGE,KOKH ME PAL RAHI APNI BETIO KE HATHO ME KHANZAR DENGE,

Dr.NISHA MAHARANA said...

anubhoot pida ki bat .....sacchaai ko bataati hui .....

Virendra Kumar Sharma said...

सुन्दर प्रस्तुति .

Bhola-Krishna said...

जील बेटा ,अति सार्थक कथन !

लगभग २० वर्ष पूर्व मदर्स इंटरनेश्नल के विद्यार्थियों को मैंने [किसी अज्ञेय महा कवि की]यह प्रेरणाप्रद रचना सुनाई थी

अपने सूर्य स्वयम बन जाओ

निर्माता हो तुम निज पथ के, स्वयम विधाता हो तुम कल के
अपने ही पौरुष के बल से अपनी क्षमता स्वयम जगाओ

अपने सूर्य स्वयम बन जाओ
--------------------
भविष्य में , सम्भव हुआ तो जैसा बन पायेगा आप सब को भी सुनाउंगा !

प्रतिभा सक्सेना said...

बिलकुल सही कह रही हैं आप !

सरिता भाटिया said...

अबला नही सबला बनो
कंधा ढूंड मत कंधा बनो
वार सहो नही तुम वार करो
हर चुनौती तुम स्वीकार करो

रविकर said...

इकदम सही आदरेया -

कानाफूसी हो शुरू, खंडित होवे *कानि |
अपना दुखड़ा रोय जो, करता अपनी हानि |
करता अपनी हानि, बुद्धि ना रहे सलामत |
जिसको देती मान, बुलाता वो ही शामत |
पी के अपना दर्द, ख़ुशी का करो बहाना |
खड़े भेड़िया हिस्र, छोड़ हरकत बचकाना ||

*सीख

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

प्रवीण पाण्डेय said...

रहिमन निज मन की ब्यथा, मन ही राखो गोय..

दिगम्बर नासवा said...

बहुत खूब ... कमजोरी दिखाना ठीक नहीं ... सच ही तो है ...

dr.mahendrag said...

चार पंक्तियों में ही सब कुछ कह दिया बहुत खूब कभी कभी तो कमाल की प्रस्तुति दे देती हैं आप.बधाई

Asha Saxena said...

सत्य उजागर करती भावपूर्ण प्रस्तुति |
आशा

Pratibha Verma said...

बहुत खूब....

Aditi Poonam said...

वाह ,बेहतरीन रचना

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

well said- and very true.

it is silly to give people ammunition to attack oneself to get fake sympathy.

one confides in friends expecting sympathy for ones sufferings. but the same people will throw back ones intimately shared secrets in their gatherings....

Saleem akhter Siddiqui said...

aisa kya kah diya divya ji ne k sab wah wah kiya ja rahe h. aas see 4 line h, kisi gali k shayare ya kavi kee lagti h.

ZEAL said...

सलीम अख्तर सिद्धीकी , टिप्पणीकारों की वाह-वाही से बड़ी ईर्ष्या हो रही है? तुम्हारे जैसे मुल्ले करते होंगे साहित्य की चोरी , हिन्दू चोरी नहीं करते! इतने जलनखोर हो , आज पता चला!...Smiles.... :) :)