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Monday, May 2, 2011

लोग तिलमिलाते क्यूँ है ? -- एक विश्लेषण .

नित्य प्रतिदिन आस-पास के परिवेश में लोगों को बात-बात पर तिलमिलाते हुए देखती हूँ , कहीं संसद में विवाद उठ खड़ा होता है और लोग गली गलौज पर उतर आते हैं , कहीं रेल-यात्रा करते समय भड़क उठते हैं और सहयात्री को रेल के बाहर धक्का दे देते हैं , कहीं किसी स्कूल की टीचर अथवा प्रिंसिपल, मासूम बच्चों को कठोर सजा देते हैं तो कहीं तीसरी मंजिल से नीचे धक्का दे देते हैं।

कहीं ससुराल में तिलमिलाई जनता एक स्त्री को आग के हवाले कर देती है। कहीं गुस्से से तमतमाया पति , पत्नी पर हाथ उठा बैठता है। कहीं अति-क्षुब्ध हुयी माता , फूलों से नाज़ुक बच्चों को फटकार देती है , कहीं आफिस में होती साजिश पर तिलमिलाते लोग तो कहीं सत्ता के ठेकेदारों से तिलमिलाई हुयी जनता।

सबसे बढ़कर तिलमिलाना देखा ब्लौगिंग के क्षेत्र में काफी निकट से हस्तियों की तिलमिलाहट देखने को मिली। कहीं तिलमिलाकर लोग अनर्गल प्रलाप करते हैं टिप्पणियों में तो कहीं ऐसे लेख ही लिख डालते हैं जिससे दूसरे की छवि को नुकसान पहुंचे।

इस तरह तिलमिलाकर लेखन कर्म वही लोग करते हैं , जिनके अन्दर अहंकार ज्यादा होता है और वे उस अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख पाते यही अहंकार उनके अनियंत्रित क्रोध का कारण बनता है और इसी क्रोधाग्नि में जलकर कब वे अपना सर्वस्व नष्ट कर लेते हैं , उन्हें पता ही नहीं चलता। इस तरह से तिलमिलाए हुए लोग समाज में उपहास का पात्र भी बन जाते हैं। लोग उनकी तिलमिलाहट का भी भरपूर आनंद उठाते हैं और कुछ ऐसा शगूफा छोड़ देते हैं जिससे तिलमिलाया हुआ व्यक्ति क्रोधवश अपने संस्कारों , शिक्षा, संयम और भाषा पर से नियंत्रण खो बैठता है एक निश्चित स्तर से भी बहुत नीचे गिर जाता है। और अनर्गल प्रलाप करके उपहास का पात्र बनता है।

किसी भी परिस्थिति में यदि विवेक का इस्तेमाल किया जाए तो तिलमिलाहट नहीं होगी। प्रतिद्वंदी तो हर क्षेत्र में होते हैं उनपर विजय पाने के लिए सूझ-बूझ ज्यादा काम आती है , भाषाई निम्नता नहीं।

एक तिलमिलाया हुआ व्यक्ति 'विवेकशून्य' हो जाता है सही गलत का निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है इन विपरीत परिस्थितियों में वह गलत लोगों के साथ गुटबाजी में भी फंस जाता है। उसके कमज़ोर क्षणों में शातिर तत्व आकर उसे भड़काते हैं और व्यक्ति का स्वविवेक समाप्तप्राय हो जाता है। तिलमिलाहट के वशीभूत होकर लोग वाद को विवाद में परिवर्तित कर देते हैं। यदि अहंकार पर नियंत्रण होगा तो विवाद कभी भी उपस्थित नहीं होंगे। चर्चा स्वस्थ होगी एवं सकारात्मक परिणाम आयेंगे।

ईष्या , दोष और मोह को यदि स्वयं पर हावी होने दिया जाए तो तिलमिलाहट कभी नहीं होगी। प्रतिशोध की अग्नि में जलते लोग स्वयं ही अपनी उन्नति में बाधक होते हैं। अपनी सारी ताकत वे दूसरों के विनाश करने में ही लगा देते हैं , इसलिए कोई सृजनात्मक कार्य नहीं कर पाते। ऐसे लोग जो बात-बात पर तिलमिला जाते हैं वे समाज के लिए अनुपयोगी होते हैं।

समाज के हित में लगे हुए लोगों को संयमी , शांतिप्रिय और प्रगतिशील लोगों के सानिद्ध्य में रहना चाहिए। असामाजिक तत्वों की तिलमिलाहट से तटस्थ रहते हुए अपने सुन्दर उद्देश्यों के साथ परहित में सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए।

क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो स्वयं को भस्म करती है स्वयं पर संयम रखकर और विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने अहंकार को जीतकर ही इस तिलमिलाहट से निजात पायी जा सकती है।

आभार