जब हम किसी से कोई व्यक्तिगत बात करना चाहते हैं , जो ज़रूरी भी है और हम पब्लिक में उसे लिखकर नहीं पूछ सकते , अथवा व्यक्त कर सकते तो हम मेल लिखकर संवाद करते हैं। आवश्यकता महसूस होने पर हम उस व्यक्ति के साथ फोन पर भी बात करते हैं ।
ऐसा तभी होता है , जब हम उस व्यक्ति पर अन्यों की तुलना में अधिक विश्वास करते हैं। तभी हम उसे मेल लिखते हैं अथवा उसके साथ फोन पर बात करते हैं।
लेकिन ऐसा क्यूँ होता है की द्वेष होने की अवस्था में व्यक्ति उसकी मेल को सार्वजनिक करने की धमकी देता है। अथवा ये कहकर धमकाता है की फलाँ का फोन नंबर मेरे पास है और उसने मुझसे फोन पर बात की ।
यदि कोई स्त्री किसी मित्र पर , अथवा आफिस के सहयोगी पर , अथवा आभासी दुनिया के लोगों पर विश्वास करके उससे दूरभाष पर संवाद करती है तो क्या ये गुनाह है ? मर्यादा विरुद्ध है ?
इतनी तेज़ी से विकास की और अग्रसर ज़माने में इस तरह का रूढ़िवादी रवैय्या खेदपूर्ण है । यदि हम किसी पर विश्वास करते हैं तो मित्र को भी उसकी निजता का सम्मान करना चाहिए।
आपके अमूल्य विचारों का स्वागत है।
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ऐसा तभी होता है , जब हम उस व्यक्ति पर अन्यों की तुलना में अधिक विश्वास करते हैं। तभी हम उसे मेल लिखते हैं अथवा उसके साथ फोन पर बात करते हैं।
लेकिन ऐसा क्यूँ होता है की द्वेष होने की अवस्था में व्यक्ति उसकी मेल को सार्वजनिक करने की धमकी देता है। अथवा ये कहकर धमकाता है की फलाँ का फोन नंबर मेरे पास है और उसने मुझसे फोन पर बात की ।
यदि कोई स्त्री किसी मित्र पर , अथवा आफिस के सहयोगी पर , अथवा आभासी दुनिया के लोगों पर विश्वास करके उससे दूरभाष पर संवाद करती है तो क्या ये गुनाह है ? मर्यादा विरुद्ध है ?
इतनी तेज़ी से विकास की और अग्रसर ज़माने में इस तरह का रूढ़िवादी रवैय्या खेदपूर्ण है । यदि हम किसी पर विश्वास करते हैं तो मित्र को भी उसकी निजता का सम्मान करना चाहिए।
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