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Sunday, May 15, 2011

ऐसा क्यूँ होता है की लोग सुधरे हुए को ही सुधारना चाहते है ?

एक फिल्म देखी थी - "दो आँखें बारह हाथ "....इसमें समाज का हित चाहने वाला जेलर छः कैदियों को सुधारने की कोशिश में अनेक कष्ट झेलता है। अंत तक लड़ता है , सफलता भी मिलती है ।

लेकिन प्रश्न यह है आज कल कौन है जो गुनाहगारों, कातिलों , बलात्कारियों , लुटेरों , भ्रष्टाचारियों और अज्ञानियों को सुधारना चाहता है ? क्यूँ ज्यादातर लोग उनको ही सुधारने की चेष्टा में लगे होते हैं , जो सुधरा हुआ है , जो स्वयं ही एक पवित्र उद्देश्य के तहत समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं ।

यदि अन्ना आगे आयेंगे, तो विद्रोह
यदि रामदेव आवाज़ उठायेंगे , तो विद्रोह
यदि किरण बेदी एक रेफोर्म लाना चाहेंगी , तो उनकी तरक्की पर रोक ।
यदि भूषण-द्वय आगे आयेंगे तो उनके खिलाफ सीडी तैयार।

यह प्रश्न मन में इसलिए आया , क्यूंकि जबसे लिखना शुरू किया , तो उद्देश्य सिर्फ इतना था, जो कुछ आज तक सीखा है या अनुभव किया है , उसे समाज के उस वर्ग तक पहुंचा सकूँ जिसे मेरे लेखों से लाभ मिल सकें । लेकिन अफ़सोस बढ़ता गया ये देखकर की जो मेरे बहुत अपने थे , उन्होंने हर संभव तरीके से मनोबल तोड़ने की कोशिश की । किसी ने कहा - 'ब्लौगिंग बकवास है , खासकर हिंदी ब्लौगिंग" , "इससे कोई बदलाव आना वाला नहीं "

क्या अति निकटता द्वेष को जन्म देती है । क्या वजह है की जिनसे ज्यादा अपेक्षाएं होती हैं वो हमारे सार्थक उद्देश्यों में साथ देने के बजाये हमें हमारे मार्ग से भटकाने में प्रयासरत हो जाते हैं ?

और कुछ लोग जिनसे कभी मुलाक़ात नहीं , और जान पहचान भी नहीं वो धमकी देते हैं , और कहते हैं की शिद्दत से नफरत निभायेंगे और मुझे जीने नहीं देंगे। यदि मैं अपने लेखों में किसी प्रेरणादायी सत्य घटना का उल्लेख करती हूँ तो उसे भी कुछ लोग तोड़-मडोरकर अत्यंत घृणास्पद रूप में अपने ब्लॉग पर कहानी बनाकर लिख देते हैं। आखिर क्यूँ ये सब ? लोग दो कदम साथ तो चल नहीं पाते , फिर दुश्मनी क्यूँ ?

जो करीबी थे , उनसे अनायास ही अपेक्षाएं हो गयीं , उन्होंने भी अच्छा मौक़ा देखकर खूब मनोबल तोडा। और जो अनजान थे , उन्होंने नफरत निभायेंगे , ऐसी धमकी दे डाली । दोनों ही परिस्थितियों ने बहुत असहज कर दिया।

हाँ कुछ लोग ऐसे भी हैं , जो मेरी कमियों [भाषा का अथवा विषय का कम ज्ञान ], के कारण मेरा मज़ाक न बनाकर , मुझे प्रेरणा ही दी । शायद इन्हीं चंद लोगों के कारण हिम्मत अभी भी बची है लिखने की।

मैं जानती हूँ की बहुत अच्छी नहीं , बहुत ज्यादा ज्ञान भी नहीं , बहुत ज्यादा अनुभव भी नहीं , लेकिन क्या इतनी बुरी हूँ की की बात-बात मुझे ही सुधारा जाये ? जिस पवित्र उद्देश्य को लेकर यथा-सामर्थ्य आगे बढ़ रही हूँ उसका कोई अस्तित्व नहीं ?

यदि मुझमें ही सुधार ही इतनी गुंजाइश है तो मन में एक प्रश्न है ..क्या मुझे लिखना छोड़ देना चाहिए ? मेरे लेखों से समाज पर कहीं कोई दुष्प्रभाव तो नहीं ? निसंकोच बताइए , ताकि मैं सही निर्णय ले सकूँ ।