"ब्लॉग जगत में अक्सर हम लोग ईमानदारी से काम नहीं कर पाते,गूगल द्वारा मुफ्त के दिए प्लेटफार्म पर, लेखनी का जौहर दिखाते हम लोग,अपने आपको महान लेखक मानते देर नहीं लगाते हैं और बची खुची कसर टिप्पणियों के बदले आई टिप्पणिया कर देती हैं !खैरात के बदले खैरात में मुफ्त बँटती इन टिप्पणियों के कारण, हम सब, दिन प्रतिदिन अपने प्रभामंडल का विस्तार होते महसूस करते हैं और उस आभासी स्वयंभू प्रभामंडल को आत्मसात कर लेते हैं :-)हार्दिक शुभकामनायें ! "---------------------
उपरोक्त टिपण्णी में टिपण्णीकार का नाम नहीं दिया गया है , क्यूंकि नाम कभी जरूरी नहीं होता । लेकिन इस टिपण्णी में कही गयी बात शायद बहुत से टिप्पणीकारों के मस्तिष्क में शोर करती होगी इसलिए सोचा क्यूँ न इस पर थोडा मनन किया जाए।
उपरोक्त टिपण्णी में क्या झलक रहा है ? -- प्रशंसा ?, चाटुकारिता ? , नफरत ?, द्वेष ?, पूर्वाग्रह ?, ईर्ष्या , भड़ास ? , मन की विषाक्तता ? या फिर कुछ और ?
चूँकि यही टिपण्णी मुझे दो बार दी गयी , इसलिए आत्मावलोकन जरूरी हो गया की -
- क्या मैं ईमानदारी से नहीं लिखती हूँ ?
- क्या गूगल द्वारा मुफ्त में दिए गए प्लेटफार्म का अनुचित प्रयोग कर रही हूँ ?
- क्या अनेक विषयों पर यथाशक्ति मन में आये विचारों को शब्दों में ढालना , अनावश्यक जौहर दिखाना हुआ? रसोईंघर में स्त्रियाँ प्रतिदिन अपना जौहर दिखाती हैं , लेकिन यदि बेलन की जगह कलम भी थाम ली जाए तो वह जबरदस्ती का जौहर कहलायेगा ?
- मुझे तो नहीं लगता कोई ब्लॉगर स्वयं को 'महान लेखक' मान कर आसमान में उड़ने लगता है। सभी अपनी-अपनी यथाशक्ति लिख रहे हैं। अपनी बात औरों तक पहुंचा रहे हैं । इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है भला ? और इसमें जौहर दिखाने जैसी क्या बात है ?
- टिप्पणियों के बदले टिप्पणियां किस प्रकार से कसर पूरा करती हैं ? टिप्पणियां तो विषय पर होती हैं , इसमें कसर पूरा करने, न करने का सवाल ही नहीं पैदा होता। जो लोग 'लेखक' को केंद्र में रखकर टिपण्णी करते हैं , उन्हीं पर यह दोष लगाया जाना चाहिए , हर एक पर नहीं।
- खैरात के बदले खैराती टिप्पणियां ---खैरात भिखारियों को दी जाती है , ब्लॉगर भिखारी नहीं हैं , जिन्हें खैरात में टिपण्णी दी जाए।
- टिप्पणियां विषय से प्रभावित होकर इमानदारी के साथ एक अनजान लेखक के लेख पर भी दी जाती हैं।
- टिप्पणियां आपसी सद्भाव का भी प्रतीक हैं । जहाँ विचार मिलते हैं , वहीँ लोग टिपण्णी करना ज्यादा पसंद करते हैं।
- टिपण्णी के बदले में टिपण्णी करना कोई 'पाप' नहीं है , न ही खैरात की श्रेणी में आता है।
- किसी के आत्मविश्वास को 'आभासी स्वम्भू प्रभामंडल' कहना अनुचित प्रतीत होता है।
- ये टिप्पणीकार अक्सर 'नवोदित ब्लॉगर्स' के लेखों पर ये कहते पाये गए हैं - " आपकी लेखनी में दम है-शुभकामनायें"......अब इनको कौन समझाए की इनकी शुभकामनाएं और 'मिश्री की डली' से नवोदित ब्लॉगर्स प्रोत्साहन और आत्मविश्वास पाकर जब बेहतर लिखने लगते हैं तब इनकी 'आभासी स्वम्भू प्रभामंडल' जैसी टिपण्णी मिलने लगती है ।
ब्लॉग और टिप्पणियों की संख्या - क्यूँ होती है टिप्पणियों की संख्या कहीं ज्यादा कहीं कम?- सर्प्रथम जो अच्छा लिखता है वो उसका फल भी पाता है। खैरात में कुछ नहीं मिलता । न ही खैरात देने वाला दिल रखते हैं लोग। ज्यादातर को बहुत गुना-भाग करते देखा है , टिपण्णी करने से पूर्व।
- टिप्पणियां जितनी आप करेंगे , कमोबेश उतनी ही पायेंगे। कृपणता दिखायेंगे तो खैरात भी नहीं मिलेगी , चाहे लेख कितना भी उम्दा क्यूँ न हो।
- कुछ लोग व्यस्तता के कारण ज्यादा टिपण्णी नहीं करते , न पाते हैं ।
- कुछ लोग द्वेष और ईर्ष्या के चलते टिपण्णी नहीं करते , न पाते हैं ।
- कुछ लोग दुसरे की थाली में रोटी गिनते रह जाते हैं , वही समय सार्थक टिपण्णी अथवा लेख लिखने में कर सकते हैं।
- दूसरों के ब्लॉग पर विष-वमन करने से बेहतर है, विषय पर दो पंक्तियाँ लिखी जाएँ।
- मन की घृणा को वश में रखकर , स्नेह को छलकने देना चाहिए टिप्पणियों में ।
- पुरजोर कोशिश होनी चाहिए की टिप्पणियों से अपमान न होने पाये लेखक का।
- कुछ लोग में passion होता है किसी कार्य को करने का । जो जितनी ज्यादा लगन से किसी कार्य को करता है , उसे उतनी ही ज्यादा सफलता मिलती है । यदि बात टिप्पणियों की संख्या पर भी लागू होती है।
- ज्यादा लोगों को आप मान देंगे , ज्यादा लोग आपको मान देंगे। मुक्त हस्त बाटेंगे , मुक्त हस्त पायेंगे।
- आप आलोचना करेंगे , आलोचना पायेंगे। प्रशंसा करेंगे, प्रशंसा पायेंगे। विषय पर टिपण्णी करेंगे, विषय पर टिपण्णी पायेंगे। जैसा करेंगे , वैसे भरेंगे।
- दिल खोल कर प्यार लुटायेंगे, उतना ही वापस पायेंगे। नया क्या है ?
- व्यक्तिगत आक्षेप करेंगे, लोग दूरी बना लेंगे।
- किसी के विचार हमेशा नहीं मिलते । कभी सहमती तो कभी असहमति होती ही है । लेकिन जो लोग सदैव असहमत ही दिखें तो उनके मंतव्य जाहिर हो जाते हैं।
- सबसे अहम् बात है की विचारों की समानता सदैव आकर्षित करती है । इसलिए सहृदय लोग परस्पर एक-दुसरे से जुड़ते चले जाते हैं और कारवां बनता जाता है ।
लिखने को बहुत कुछ है , लेकिन थक गयी हूँ , आगे आप भी कुछ लिखिए , विषय को आयाम मिलेगा ...
आभार। .