नोबेल पुरस्कार विजेता 'अमर्त्य सेन ' ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है - " The argumentative Indian "। इस पुस्तक में लेखक ने भारत के इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया है । अपने निबंधों में उन्होंने भारत में लोकतंत्र , धर्मनिरपेक्षता की वकालत की है । उन्होंने धर्म , जाति , लिंग तथा समुदाय के आधार पर भेद-भाव का विरोध किया है । तथा उपमहाद्वीपीय शान्ति का आह्वान किया है ।
इस पुस्तक में श्री सेन ने भारत के बेहतरीन पहलुओं कों उजाकर किया है । अपने तर्कों द्वारा इन पक्षों कों पूरे विश्व के सामने सही परिपेक्ष्य में रखा । James Mills जैसे लेखकों , जिन्होंने " History of British India " लिखा तथा उसमें भारत के उजले पक्षों कों तोड़-मरोड़कर विकृत करके प्रस्तुत किया , उनके द्वारा प्रस्तुत पक्षों का भी श्री अमर्त्य सेन ने अपने तर्कों द्वारा ख़ूबसूरती से खंडन किया । अपनी इसी तार्किक शक्ति के लिए ही वो देश विदेश में एक बुद्धिजीवी की तरह जाने गए ।
मुझे आपत्ति है , पुस्तक के टैग " argumentative Indian " से । क्यूंकि देश विदेश में चर्चित ये पुस्तक एक आम भारतीय की पहचान बन गयी । एक छोटे वर्ग कों यदि छोड़ दिया जाये जो किसी के तर्क एवं बुद्धि का सम्मान करते हैं , तो शेष बड़ा समुदाय तार्किक , rational और logical लोगों कों बहसी ( argumentative ) कह देता है ।और यह एक नकारात्मक कमेन्ट है किसी के लिए भी । इसलिए इस पुस्तक का शीर्षक यदि " argumentative Indian की जगह " Logical Indian " होता , तो हम भारतीयों पर बहसी होने का टैग नहीं लगता ।
आजकल जिसने ये पुस्तक पढ़ी भी नहीं है और जो अमर्त्य सेन जैसे तार्किक एवं logical बुद्धिजीवी कों भली प्रकार जानता भी नहीं है , वो भी किसी के तर्कों के आगे जब हारने लगता है तो उसे " argumentative Indian " की उपाधि देकर अपनी भड़ास निकालता है । पुस्तक के इस शीर्षक के कारण आज एक आम भारतीय की पहचान " argumentative Indian " की हो गयी है ।
मेरे विचार से लोगों कों इस शीर्षक कों एक सही परिपेक्ष्य में लेने की ज़रुरत है । बहस करने के लिए तर्कों की ज़रुरत होती है और तर्कों कों सामने रखने के लिए वृहत ज्ञान की ज़रुरत होती है। विभिन्न भाषाओं , संस्कृतियों एवं विषयों की जानकारी रखने वाला ही अपनी बात कों तर्क-सम्मत तरीके से प्रस्तुत कर सकता है । इसलिए किसी logical व्यक्ति के तर्कों से विचलित होकर उसे 'argumentative' की उपाधि दे देना अनुचित प्रतीत होता है ।कोशिश करनी चाहिए की हम तार्किक लोगों के सानिध्य से ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित हो सके ।
आज कितने ही देश हैं , जहाँ के निवासियों में न धैर्य है , न ही धीरज । वो तो बन्दूक की गोलियों से बात करना पसंद करते हैं । वो न तो समझते हैं , न ही समझा सकने की काबिलियत रखते हैं। लेकिन भारतीय संवेदनशील हैं , धैर्यवान हैं , अपनी बात कों तर्कों द्वारा तथा संवाद द्वारा कहते और प्रस्तुत करते हैं। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार , बलात्कार , आतंकवाद , गरीबी , असंवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर एक भारतीय व्यथित होता है , इस पर चर्चा करना चाहता है , इपने वक्तव्यों कों कहकर और लिखकर तर्कों द्वारा प्रस्तुत करता है . क्या इसे बहसी होना कहा जाएगा या फिर समाज और परिवेश से सरोकार रखने वाला एक संवेदनशील भारतीय ?
भारतीय तार्किक है , क्यूंकि उनके पास ज्ञान है और ज्ञान ही तर्कों का सहयोगी है । भारतीयों का व्यक्तित्व अनुकरणीय है । अपने इसी व्यक्तित्व के कारण ही भारतीय देश-विदेश में अपना परचम लहरा रहे हैं। इसलिए गर्व के साथ कहिये की आप ' logical Indian ' हैं , 'argumentative Indian ' नहीं ।
आभार ।
इस पुस्तक में श्री सेन ने भारत के बेहतरीन पहलुओं कों उजाकर किया है । अपने तर्कों द्वारा इन पक्षों कों पूरे विश्व के सामने सही परिपेक्ष्य में रखा । James Mills जैसे लेखकों , जिन्होंने " History of British India " लिखा तथा उसमें भारत के उजले पक्षों कों तोड़-मरोड़कर विकृत करके प्रस्तुत किया , उनके द्वारा प्रस्तुत पक्षों का भी श्री अमर्त्य सेन ने अपने तर्कों द्वारा ख़ूबसूरती से खंडन किया । अपनी इसी तार्किक शक्ति के लिए ही वो देश विदेश में एक बुद्धिजीवी की तरह जाने गए ।
मुझे आपत्ति है , पुस्तक के टैग " argumentative Indian " से । क्यूंकि देश विदेश में चर्चित ये पुस्तक एक आम भारतीय की पहचान बन गयी । एक छोटे वर्ग कों यदि छोड़ दिया जाये जो किसी के तर्क एवं बुद्धि का सम्मान करते हैं , तो शेष बड़ा समुदाय तार्किक , rational और logical लोगों कों बहसी ( argumentative ) कह देता है ।और यह एक नकारात्मक कमेन्ट है किसी के लिए भी । इसलिए इस पुस्तक का शीर्षक यदि " argumentative Indian की जगह " Logical Indian " होता , तो हम भारतीयों पर बहसी होने का टैग नहीं लगता ।
आजकल जिसने ये पुस्तक पढ़ी भी नहीं है और जो अमर्त्य सेन जैसे तार्किक एवं logical बुद्धिजीवी कों भली प्रकार जानता भी नहीं है , वो भी किसी के तर्कों के आगे जब हारने लगता है तो उसे " argumentative Indian " की उपाधि देकर अपनी भड़ास निकालता है । पुस्तक के इस शीर्षक के कारण आज एक आम भारतीय की पहचान " argumentative Indian " की हो गयी है ।
मेरे विचार से लोगों कों इस शीर्षक कों एक सही परिपेक्ष्य में लेने की ज़रुरत है । बहस करने के लिए तर्कों की ज़रुरत होती है और तर्कों कों सामने रखने के लिए वृहत ज्ञान की ज़रुरत होती है। विभिन्न भाषाओं , संस्कृतियों एवं विषयों की जानकारी रखने वाला ही अपनी बात कों तर्क-सम्मत तरीके से प्रस्तुत कर सकता है । इसलिए किसी logical व्यक्ति के तर्कों से विचलित होकर उसे 'argumentative' की उपाधि दे देना अनुचित प्रतीत होता है ।कोशिश करनी चाहिए की हम तार्किक लोगों के सानिध्य से ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित हो सके ।
आज कितने ही देश हैं , जहाँ के निवासियों में न धैर्य है , न ही धीरज । वो तो बन्दूक की गोलियों से बात करना पसंद करते हैं । वो न तो समझते हैं , न ही समझा सकने की काबिलियत रखते हैं। लेकिन भारतीय संवेदनशील हैं , धैर्यवान हैं , अपनी बात कों तर्कों द्वारा तथा संवाद द्वारा कहते और प्रस्तुत करते हैं। आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार , बलात्कार , आतंकवाद , गरीबी , असंवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर एक भारतीय व्यथित होता है , इस पर चर्चा करना चाहता है , इपने वक्तव्यों कों कहकर और लिखकर तर्कों द्वारा प्रस्तुत करता है . क्या इसे बहसी होना कहा जाएगा या फिर समाज और परिवेश से सरोकार रखने वाला एक संवेदनशील भारतीय ?
भारतीय तार्किक है , क्यूंकि उनके पास ज्ञान है और ज्ञान ही तर्कों का सहयोगी है । भारतीयों का व्यक्तित्व अनुकरणीय है । अपने इसी व्यक्तित्व के कारण ही भारतीय देश-विदेश में अपना परचम लहरा रहे हैं। इसलिए गर्व के साथ कहिये की आप ' logical Indian ' हैं , 'argumentative Indian ' नहीं ।
आभार ।