बच्चों का क्रोध जिद्द होता है, यदि नहीं करेंगे तो उन्हें इच्छित वस्तु नहीं मिलेगी। कहीं प्यार भरा क्रोध होता है (माता-पिता और शिक्षकों का क्रोध)। कहीं आपस में द्वेश्जनित क्रोध होता है। कहीं अहंकार के स्वरुप अनायास ही मन में क्रोध अपना स्थान बना लेता है। कहीं ईर्ष्या क्रोध का कारण होता है जैसे पाकिस्तानी आतंवादियों का क्रोध। समाज में फैली कुरीतियों पर, दीन हीन पर हो रहे अन्याय को देखकर, भ्रष्ट आचरण को देखकर और अपने ऊपर हो रहे शोषण को देखकर भी क्रोध न करना नपुंसकता है। .
लेकिन एक क्रोध पवित्र भी होता है , जहाँ क्रोध की अग्नि में भस्म होकर समस्त दैत्य और दानवों का विनाश होता है, क्रोध करने वाले का नहीं। जब-जब जगत में दत्यों और पापियों का प्रादुर्भाव बढ़ा है, तब-तब देवों, संतों और वीरों ने क्रोध करके ही दुष्टों का संहार किया है।
चंड , मुंड, शुम्भ, निशुम्भ, और रक्तबीज जैसे दैत्यों का मर्दन करने के लिए देवी अम्बिका को क्रोध करना पड़ा। रावण की भूल के लिए राम को युद्ध और कौरवों की दृष्टता के लिए महाभारत हुयी।
अतः असुरों के विनाश के लिए और आम जनता की रक्षा के लिए संतों को क्रोध करना ही पड़ता है , कोई अन्य विकल्प नहीं है। क्रोध वीरता का भी प्रमाण है और मनुष्य के अन्दर संचारी भावों का दोत्तक भी है। देशभक्तों में देश की रक्षा के लिए जो अग्नि जलती है , वही गद्दारों को पहचान करके उनसे युद्ध करके देश की रक्षा करती है। यह आक्रोश है । देशभक्ति का जज्बा है। जो अनुकरणीय है । यह क्रोध वीरों का आभूषण है। यदि यह जज्बा नहीं होगा तो धरती वीरों से विहीन हो जायेगी। सिर्फ उपदेशक बचेंगे और श्रोता। कर्मठ लोगों का अकाल हो जाएगा।
मन करे सो प्राण दे , जो मन करे तो प्राण ले
वही तो एक सर्वशक्तिमान है
कृष्ण की पुकार है ये भागवत का सार है
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है
कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड हो
जो लड़ सका वही तो बस महान है।
आज भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद और नेताजी जैसे संतों के पवित्र क्रोध , जो वीरता से परिपूर्ण है , की आवश्यकता है। चंड-मुंड , रक्तबीज और महिषासुर जैसे दानवों के विनाश के लिए चामुण्डा, काली और महिषासुरमर्दिनी की ज़रुरत है।
हे देवी सर्वभूतेषु , शक्ति (क्रोध) रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नमः
Zeal
लेकिन एक क्रोध पवित्र भी होता है , जहाँ क्रोध की अग्नि में भस्म होकर समस्त दैत्य और दानवों का विनाश होता है, क्रोध करने वाले का नहीं। जब-जब जगत में दत्यों और पापियों का प्रादुर्भाव बढ़ा है, तब-तब देवों, संतों और वीरों ने क्रोध करके ही दुष्टों का संहार किया है।
चंड , मुंड, शुम्भ, निशुम्भ, और रक्तबीज जैसे दैत्यों का मर्दन करने के लिए देवी अम्बिका को क्रोध करना पड़ा। रावण की भूल के लिए राम को युद्ध और कौरवों की दृष्टता के लिए महाभारत हुयी।
अतः असुरों के विनाश के लिए और आम जनता की रक्षा के लिए संतों को क्रोध करना ही पड़ता है , कोई अन्य विकल्प नहीं है। क्रोध वीरता का भी प्रमाण है और मनुष्य के अन्दर संचारी भावों का दोत्तक भी है। देशभक्तों में देश की रक्षा के लिए जो अग्नि जलती है , वही गद्दारों को पहचान करके उनसे युद्ध करके देश की रक्षा करती है। यह आक्रोश है । देशभक्ति का जज्बा है। जो अनुकरणीय है । यह क्रोध वीरों का आभूषण है। यदि यह जज्बा नहीं होगा तो धरती वीरों से विहीन हो जायेगी। सिर्फ उपदेशक बचेंगे और श्रोता। कर्मठ लोगों का अकाल हो जाएगा।
मन करे सो प्राण दे , जो मन करे तो प्राण ले
वही तो एक सर्वशक्तिमान है
कृष्ण की पुकार है ये भागवत का सार है
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है
कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड हो
जो लड़ सका वही तो बस महान है।
आज भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद और नेताजी जैसे संतों के पवित्र क्रोध , जो वीरता से परिपूर्ण है , की आवश्यकता है। चंड-मुंड , रक्तबीज और महिषासुर जैसे दानवों के विनाश के लिए चामुण्डा, काली और महिषासुरमर्दिनी की ज़रुरत है।
हे देवी सर्वभूतेषु , शक्ति (क्रोध) रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्ये, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नमः
Zeal