Monday, June 20, 2011

चंचल -- कहानी

एक लड़की थी। नाम था 'चंचल' सीधी -साधी लड़की थी , किसी का दिल नहीं दुखाती थी। जहाँ तक बन पड़ता था गैरों के दुःख सुख में शामिल होती थी। बच्चे , बूढ़े , स्त्री-पुरुष सभी की अपनी थी वो कभी बुरा नहीं मानती थी किसी बात का। कोई बात हो भी जाए तो समझने प्रयास करती थी , लेकिन अपने मन में द्वेष नहीं रखती थी , कोशिश करती थी अपनापन बना रहे। धीरज और साहस ही उसकी ताकत थी

उसका एक मित्र था मिहिर मिहिर बुद्धिमान था, विद्वान् था और अन्य भी बहुत से गुणों की खान था। लेकिन अकसर अपने व्यवहार से चंचल को दुःख देता रहता था। चंचल उन बातों का बुरा ना मानकर अपने कामों में व्यस्त रहती थी। वो उसके अवगुणों पर ध्यान देने के बजाये उसके गुणों को ज्यादा सम्मान देती थी। लेकिन मिहिर इस बात से बहुत परेशान रहता था की चंचल को गुस्सा क्यूँ नहीं आता ? इतना शांत कैसे रख पाती है स्वयं को ?

चंचल जितना ही शांत रहती थी , मिहिर उससे नाराज़ करने के प्रपंच रचता रहता था। बार-बार उसके दिल को चोट पहुंचाता था। सफल भी रहता था, लेकिन चंचल हर बार उसे माफ़ कर देती थी। चंचल का माफ़ कर देना ही मिहिर को अपनी पराजय लगता था। वो चाहता था की चंचल उससे झगडा करे। क्यूंकि वो जानता था की जिस दिन वो उससे नाराज़ होकर झगडा करेगी उसी दिन उसकी विजय होगी।

चंचल बखूबी समझती थी उसके अहम् को उसका चुप रहना भी मिहिर के अहंकार को पोषित करता था। मिहिर का तिलमिलाया अहम् चंचल को हर हाल में पराजित देखना चाहता था वो उसके शांत स्वभाव को तोड़ देना चाहता था। ऐसी बातें करता था जिससे उत्तेजित होकर वो अपना धैर्य खो दे और गुस्से में कुछ अनुचित कहे अथवा करे। लेकिन वो हमेशा असफल रहता था।

एक दिन मिहिर ने चंचल का इतना अपमान किया की वो रो दी। चंचल को रोते देखकर मिहिर को अपने विजयी होने का एहसास हुआ। फिर एक बार चंचल ने उसे माफ़ कर दिया।

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मेरा आपसे दो प्रश्न है --

- क्या चंचल को अपमान से तिलमिलाकर मिहिर से नाराज़ हो जाना चाहिए था अथवा रोने के बाद पुनः अपने शांत स्वभाव के कारण मिहिर को माफ़ करके उसने उचित किया ?
Link
- मिहिर जैसे लोग , जो एक अति शांत से व्यक्तित्व को भी दुखी कर देते हैं , जो की किसी भी प्रकार से उसका नुकसान नहीं कर रहे , दुःख नहीं दे रहे , मित्र-धर्म भी निभा रहे हैं , क्यूँ ऐसा करते हैं ? इसके पीछे मिहिर की मानसिकता क्या है ? क्या मिहिर कमज़ोर है जो किसी को रोता देखकर विजयी महसूस करता है? किसी को तोड़ देना ही क्यूँ ध्येय होता है किसी का ?

लोग किसी के शांत स्वाभाव से भी द्वेष क्यूँ रखते हैं। मधुर संबंधों को मधुरता के साथ क्यूँ नहीं जीते ?

Zeal

55 comments:

दर्शन लाल बवेजा said...

वाह ..

ajit gupta said...

व्‍यक्तियों की मानसिकताएं इतनी विचित्र हैं कि उन्‍हें स्‍वरूप देने के लिए शब्‍द ही नहीं है। हम अक्‍सर व्‍यक्ति विशेष के लिए अपने मन में घारणाएं निर्मित कर लेते हैं। कुछ लोगों के लिए ऐसी धारणा बना लेते हैं कि ये व्‍यक्ति हम से कुछ अलग और विशेष है। उसे अपने जैसा ही सिद्ध करने के लिए उसपर अनावश्‍यक वार करते हैं, लेकिन जब उसकी तरफ से कोई प्रत्‍युत्तर नहीं आता तब हमारा अहम् और भी आहत होता है। इसके विपरीत यदि उस व्‍यक्ति ने भी प्रतिक्रिया कर दी तब सामने वाला व्‍यक्ति बड़ा खुश होता है, उसे लगता है कि यह व्‍यक्ति भी मेरे जैसा ही है कोई विशेष नहीं है। मैंने इस बात को अनेक बार अनुभव किया है और प्रत्‍युत्तर ना देने के कारण न जाने कितने दुश्‍मन भी बना लिये हैं। एकाध बार ऐसा भी हुआ कि सामने वाले को उसी की भाषा में उत्तर दे दिया तो वह व्‍यक्ति एकदम खुश हो गया। मैं रात भर चिंतित रही कि मुझे ऐसा व्‍यवहार नहीं करना चाहिए था लेकिन उल्‍टा वह व्‍यक्ति खुश था। तब मुझे लगा कि वह इसलिए खुश था कि अरे मैं तो इन्‍हें विशेष समझ रहा था लेकिन यह तो मेरे जैसी ही हैं। इसलिए यह विशेष व्‍यक्तित्‍व के कारण होता है, इसका कोई कुछ नहीं कर सकता।

वाणी गीत said...

इस पोस्ट पर टिप्पणियों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों का मुझे भी बेसब्री से इतंजार है क्योंकि यही सवाल मेरा भी है ...

रविकर said...

अपने दुःख से कम दूसरे की ख़ुशी से--
ज्यादा दुखी हैं हम |
है बहुतै गम ||
अपने खर्च और दूसरे की कमाई
सभी को अधिक लगते हैं ||
शांति एवं सहनशक्ति का मोल
मिहिर क्या जाने --
कमजोर क्षमा क्या करेगा ?? वो तो बस क्रोध कर सकता है |
माफ़ करना कमजोरी नहीं ||

Bhushan said...

हम जैसे बने हैं, बने हैं. मिहिर मिहिर है, चंचल चंचल है. मेरा विचार है चंचल भी ऐसा ही पात्र है. वह वही देगी जो उसे जीवन में मिला है. मिहिर वैसा ही है जैसा उसे जीवन ने बनाया है.
देर तक मन पर कुछ विचारों का प्रभाव पड़ने से हम सभी कुछ न कुछ बदल सकते हैं.
सुंदर कहानी के माध्यम से विचारों को मथने वाली पोस्ट.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैं हमेशा इस तरह के सवालों में उलझ जाता हूं, यहां आने वाली टिप्पणियों का इन्तजार है.

प्रतुल वशिष्ठ said...

वैसे अजित जी की टिप्पणी में पूरा उत्तर निहित है... फिर भी बात को कुछ विस्तार देता हूँ... हर व्यक्ति अपेक्षित प्रतिक्रिया चाहता है...

— 'क्रोध कुमार' से यदि 'प्रेम कुमार जी' बहस करें तो उन्हें अच्छा नहीं लगेगा.
— 'ईर्ष्या रानी' से यदि 'श्रद्धा देवी' या 'ममता रानी' मिलने आयें तो 'ईर्ष्या रानी' और ऊँचे आसन पर जा बैठेंगी.
— 'मिस्टर आघात' से यदि 'कुमारी शांती' प्रेम करने लगें तो 'आघात' विचलित रहेगा ही.
..... सच्चा प्रेम करने वाले अपने प्रेम की विशेषता हर हाल में बरकरार रखते हैं.

मधुर संबंधों को मधुरता से जीने वाले भी कहीं-न-कहीं होंगे...कुछ का सूत्र भिन्न हो सकता है... जैसे 'ईख को पैरने से ही मीठा रस' निकलता है...कुछ इस सूत्र को आत्मसात किये होते हैं. उनका मानना होता है...कुछ अच्छे लोगों को जितना सतायेंगे उतनी मिठास पायेंगे... वे चुपचाप उस मिठास का पान करके फिर से सताने के उपक्रम में लग जाते हैं.

prerna argal said...

bhagwaan ne har tarah ke insaane banaaye hain alag alag soch,mahole main parvarish hoti hai kahate hain naa jaisi jisaki soch.lekin apanaa self respect rakhanaa chhahiye.kisi ke samne apne ko itanaa mat jhukao ki wo aapko kamjore samajh kar aapka phayadaa uthane lage.self respect her haal main rakhnaa chahiye.bahut achche prasn uthaye aapne.badhaai.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

मिहिर को विद्वान, बुद्धिमान और सर्वगुण सम्पन्न होने के बावजूद उतना सम्मान नहीं मिलता होगा जितना सीधी सरल चंचल को।
यही कारण होगा जिसके वशीभूत हो मिहिर बार-बार उसको नीचा दिखा अपने अहम को शांत करने की चेष्टा करता होगा।
रही बात चंचल की, उसने तो क्षमा करना ही है, यही तो उसका बड़प्पन है।

Arunesh c dave said...

मिहिर जैसे स्त्री पुरूष आपको दुनिया मे हर जगह मिल जायेंगे बाज लोगो को इस तरह का व्यहवार करने से आत्म संतुष्टी मिलती है

ashish said...

मिहिर बाबु परपीड़ा में आनंद पाने वाले लगते है . बात तो सही है की ऐसे लोगों को जबाब नहीं देना चहिये , चाहे वो जो समझे .

जयकृष्ण राय तुषार said...

डॉ० दिव्या जी रहीमदास ने कहा है -कह रहीम कैसे निभे बेर केर के संग /वे डोलत रस आपने उनके फाटत अंग |सज्जन की सज्जनता और दुष्ट लोगों की दुष्टता कभी नहीं जाती है |बधाई

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

मिहिर के बार-बारअकारण ही अपमानित करने पर भी चंचल का शांत रहना...............यह दर्शाता है कि चंचल किसी भी तरह आपसी प्रेम सम्बन्ध को बरकरार रखना चाहती है |
मिहिर द्वारा अधिक अपमानित करने पर चंचल का रो देना ..............यह चंचल क़ी सहनशीलता और धैर्य क़ी पराकाष्ठा है | चंचल मिहिर का अनायास ही झगड़ने का कारण नहीं समझ पाती और यही विवशता उसके आंसू बनकर बाहर आती है |
मिहिर चंचल को एक बार और माफ़ कर देता है................जब चंचल ने कोई गलती ही नहीं क़ी फिर माफ़ी का कोई औचित्य ही नहीं बनता |
सर्वगुण संपन्न होने के बाद भी यदि मिहिर चंचल से इस तरह का व्यव्हार करता है ................तो यह उसका पुरुष होने का अहम् ही है अथवा चंचल क़ी शान्ति में उसे कोई शंका दिखाई देती है |

ऐसी स्थिति में चंचल का इस तरह बर्दास्त करना या रो देना उसकी कमजोरी बनती नज़र आती है जो उसके भविष्य के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो सकती है , मिहिर क़ी आक्रामकता और बढ़ सकती है |

अतः चंचल को अपनी चंचलता का अल्पाभास कराते हुए मिहिर के अनावश्यक उत्पीडन को इस तरह न बर्दास्त करके उसका प्रतिकार करना चाहिए , अपनी गलती मिहिर से पूंछनी चाहिए जिसके कारण वह बार-बार नाराज़ होता है |

aarkay said...

कारण कुछ भी हो सकता है, दिव्या जी . चंचल के शांत स्वभाव से इर्ष्या करता है मिहिर. साथ ही sadist भी है - इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता- या फिर यह भी कि अपने आप तो उसकी तरह बन नहीं सकता, उसे अपने जैसा बनाने पर तुला हुआ है. कहावत भी है , " तुझ जैसा न बन सका , तो तुझे अपना सा तो बना ही दूंगा ".
प्रश्न मानसिकता के भी हैं और मनो वैज्ञानिक भी .
एक विचारणीय विषय पर सार्थक लेख !

रश्मि प्रभा... said...

इतना ही कहूँगी ... क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो....' ऐसे व्यक्ति से दूरी बनाकर रखना ही उचित है

वीना said...

एक चुप सौ को हराता है...लेकिन रोना तो हार मानना है क्षमा करना ठीक है और शांत रहना भी...फिर जानते-बूझते रोकर हार मानना कायरता ही है...और दूसरे को खुली छूट देने जैसा...ऐसे व्यक्तियों को उन्हें उनकी गलती का एहसास कराना जरूरी है वर्ना वो फिर किसी और की कमजोरी का फायदा उठाएंगे...तंग करेंगे...

सम्वेदना के स्वर said...

कहानी अधूरी है आपकी?
ये कैसी दोस्ती है जो बार बार अपमानित कर रही है और फिर भी बरकरार है?
वो तत्व क्या हैं जो इन दोनों को बार बार मिलाते हैं?
मिहिर और चंचल में मित्रता के बारे में और तथ्य देने होगें आपको, तब ही इस "कहानी के खेल" में तीसरा पक्ष अपनी टांग अड़ा सकता है!

rashmi ravija said...

लेकिन अकसर अपने व्यवहार से चंचल को दुःख देता रहता था।

अन्याय का प्रतिकार पहली बार में ही करना चाहिए...वर्ना लोगो की आदत बन जाती है...और फिर एक दिन तो किसी की भी सहनशक्ति जबाब दे जाती है..

ये हमारे ऊपर होता है...कि कोई हमसे कैसा व्यवहार करे....
एक बार..दो बार... तीसरी बार कोई माफ़ी नहीं देनी चाहिए...हमेशा के लिए दूरी बना लेनी चाहिए.

सुज्ञ said...

मिहिर में यदि समता गुण न आया तो क्या खाक़ सर्वगुण सम्पन्न?
और नम्रता न आई तो कैसा विद्वान? खंब विद्वान।

जयकृष्ण राय तुषार जी नें सही कहा, कहो रहिम कैसे बने कैर बैर को संग…

चंचल को नाकारात्मकता के प्रभाव में न आना चाहिए, जब पता है सामना ईगो से है तो ईगो पोषण से परहेज करना चाहिए। उसे निर्मोही बनकर इग्नोर करना चाहिए।

रचना said...

चंचल को दुःख होता तो वो कब की इस सम्बन्ध को ख़तम कर चुकी होती , चंचल को दुःख होता नहीं हां उसको लगता हैं की वो दुखी हैं क्युकी बहुत से लोग दुखी दिखना चाहते हैं . ख़ास कर वो जो सुख रोग से पीड़ित होते हैं . सुख रोग यानी जब किसी के पास सब कुछ हैं और फिर भी वो दुखी हैं .
जो जैसा हैं उसको बिना बदले स्वीकार करना होता हैं अन्यथा अलग होना होता हैं . बदलना अपने को होता हैं जबकि लोग दूसरो को बदलना चाहते हैं

प्रश्न ये भी हैं की चंचल को क्यूँ लगता हैं की मिहिर में अहंकार हैं मुझे तो कहानी पढ़ कर लगा अंहकार मिहिर में नहीं हैं हां चंचल जरुर "attention seeker " हैं . बहुत सी महिला इस रोग से पीड़ित होती हैं जहां वो बार बार पुरुष मित्र बनाती हैं , उनके अहम् को पोषित करती हैं और फिर टेसुये बहा कर अपने को अच्छा , कोमल भावनाओं से ओत प्रोत और देवी स्वरुप दिखती हैं

mridula pradhan said...

मधुर संबंधों को मधुरता के साथ क्यूँ नहीं जीते ?
bahut hi mahatwpoorn sawaal uthayeen hain aap.....mujhe bhi iska jabab kabhi nahin mil pata hai.....

SAJAN.AAWARA said...

BAAR BAAR APMANIT KARNE WALA SACHA DOST NAHI HOTA. OR CHANCHAL KA HAR BAAR CHUP RAHNA USKI KAMJORI BHI HAI SAHANSILTA BHI. CHANCHAL MIHIR SE PUCHNA CHAHIYE KI WO KIS BAT PAR USKO APMANIT KAR RAHA HAI TATHA BHAVISAY ME ESA NA KARE WARNA WO USSE DOSTI NAHI RAKHEGI . AGAR MIHIR SACH ME EK ACHA LADKA HOGA TO WO PHIR KABHI ESA NAHI KAREGA. . . .
IS 21 VI SADI ME CHANCHAL KO 18 VI SADI KI LADKI KI TARAH JYADA SAHANSHIL HONE KI KOI JARURAT NAHI HAI. . .

JAI HIND JAI BHARAT

शालिनी कौशिक said...

mihir ek kamjor vyaktitva hai aur chanchal jaisee shant vyaktitva kee dhani se uska koi mukabla nahi.

इमरान अंसारी said...

पहले सवाल का जवाब है - हाँ सही किया उसने यही उचित था|
दुसरे सवाल का जवाब है - क्योंकि लोग किसी को सुखी नहीं देख सकते.....तुम दूसरे को वही दे सकते हो जो स्वयम तुम्हारे पास है अगर तुम शांत हो तो तुम दूसरे को शांति दोगे.....और अगर क्रोधी हो तो क्रोध |

सदा said...

चंचल जैसा होना ही अच्‍छा है अहम से जितना दूर रह सको उतना ही बेहतर ... बेहतरीन लिखा है आपने दिव्‍या जी ।

ZEAL said...

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मित्र रचना ,

उपरोक्त कहानी में 'मित्र' शब्द एक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसे स्त्री-पुरुष मित्र से जोड़कर लिंग-विभेद का अनावश्यक जामा मत पहनाइए। यदि आपको लगता है की स्त्रियाँ टसुये बहाकर सहानुभूति चाहती हैं तो आपको स्त्रियों के खिलाफ इस विषय पर बिना लाग-लपेट के विमर्श करना चाहिए नारी ब्लॉग पर। अन्यथा नारी ब्लॉग पर तो सिर्फ पुरुषों के खिलाफ विष-वमन ही पढने को मिलता है।

यदि मैं अपने लेख में , पूनम जैसी स्त्री के खिलाफ लिखती हूँ , जो भारतीय खिलाड़ियों के लिए सरेआम निर्वस्त्र होना चाहती है , तो भी आप विवाद करती हैं और यदि मैं कहानी के पात्र में स्त्रियोचित शांत स्वभाव को अभिव्यक्त करना चाहती हूँ तो भी विषयांतर करके विवाद उपस्थित करना चाहती हैं।

कहानीकार कहानी में जिस भाव को उभारना चाहता है , उसे देखिये और जो प्रश्न उपस्थित किया है , उसका उत्तर दीजिये। आनावाश्यक विषयांतर क्यूँ ? यहाँ प्रश्न एक विशेष प्रकार की मानसिकता पर है जिसमें आपका लिंग विभेद करना अनुचित लग रहा है।

आप चाहें तो कहानी के पात्रों को उलट दीजिये और जवाब दीजिये की शांत मिहिर को चंचल क्यूँ सताती है ?

वैसे तो मिहिर एक कल्पित चरित्र है लेकिन यदि मैं मिहिर के स्थान पर -" मित्र " रचना को कहानी में रख कर देखूं तो आपकी टिप्पणी क्या होगी ? .....कहीं आप ये तो नहीं लिखेंगी की --- "स्त्रियाँ ही स्त्रियों की दुश्मन होती हैं "

आपसे निवेदन है कृपया कहानी को कहानी की तरह पढ़ें और पूछे गए प्रश्न पर ही अपने विचार रखें । आनावश्यक रंग देकर विषयांतर न करें । यही कहानीकार ने एक कहानी लिखी तो आप लेखिका की कहानी को उलटना क्यूँ चाहती हैं ।

वैसे आपकी टिप्पणी पढ़कर मेरे मन में एक विचार आया की... " मित्र "...रचना मेरे ब्लौग पर होने वाले विमर्शों पर कभी नहीं आती लेकिन कुछ एक लेखों पर अचानक आकर इतनी आक्रामक क्यूँ हो जाती है ?

खैर मुझे तो चंचल ही पसंद है , इसलिए मित्र मिहिर हो या मित्र रचना , चंचल की तरह क्षमा कर देना ही उचित है।

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ROHIT said...

मिहिर को दो चाँटे मारने चाहिये. और उससे तब तक के लिये संबध तोड़ लेने चाहिये जब तक उसकी अक्ल ठिकाने न आ जाये.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

mujhe aapki kahani acchi lagi.. lekin ek kahani yad aa gayi.. ek satant pani mein dubte bicchu ko baar baar nikal rahe the aur wah sant ko dank marne ki chesta kar raha tha.. logo ne kaha baba aap is dust ke liye kyon itna prayas kar rahe hain... baba ne kah wo apna kam kar raha hai main apna... jab chanchal se mihir acchi baat nahi seekh pa raha hai to chanchal kyon seekhe.. lekin mihir natmastak hoga hi

कुश्वंश said...

दिव्या है जी ,कहानी में बात अधूरी सी है , यदि मिहिर बुद्धिमान है विद्वान् है तो इतना निकृष्ट क्यों है , शांत चंचल यदि वास्तव में भोली भाली है तो मिहिर का ऐसा व्योहार क्यों. कोई न कोई तथ्य छिपा है इस कहानी में,और यदि कुछ नहीं छिपा तो उत्तर एकदम सीधा चंचल को ऐसे मानसिक रोगी से कोसों दूर रहना चाहिए .

ZEAL said...

कुश्वंश जी ,
गुण-अवगुण तो सभी में होते ही हैं । मिहिर पढ़ा-लिखा है , बहुत से गुण हैं निसंदेह। लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद भी उसकी मानसिकता में कुछ दोष है , जिसे उभारने और जानने की कोशिश की कहानी के माध्यम से।

Pallavi said...

माना कि किसी को माफ कर देना बढ़पन कि निशानी होता है । लकिन मेरे विचार से हर बात कि एक सीमा होती है। और जब कोई व्यक्ति उस सीमा को पार कर जाए तो उसे उस बात का एहसास करना बहुत जरूरु हो जाता है। क्यूंकि हैं तो हम इंसान ही कोई भगवान तो नहीं कि हमको कभी कोई फर्क ही न पड़े और यदि पड़े भी तो हम हमेशा उसे छुपा लिया करें इस से खुद लोग आप को ही कमजोर समझेगे और हमेशा आप के साथ एक सा ही व्यवहार होगा।

गिरधारी खंकरियाल said...

कहानी तो अधूरी ही है , @ रचना जी की बात भी कुछ ठीक लगी . परन्तु इस बार अपने राधिका की जगह चंचल को नायिका बना दिया कहीं चंचल और मिहिर के माध्यम से किसी ब्लॉगर द्वारा सताए जाने का रोष तो नहीं प्रकट कर रही है क्यूंकि लेखक अंत में प्रश्न नहीं करता सब कुछ पाठक के छोड़ देता है

ZEAL said...

गिरधारी लाल जी का कहना है की कहानी लिखने के बाद प्रश्न नहीं पूछे जाते , इसलिए कमेन्ट आप्शन बंद कर रही हूँ क्यूंकि कहानी लिखने के बाद ...." रोचक कहानी" ..."उम्दा कहानी " ....आदि टिप्पणियां मुझे आकर्षित नहीं करतीं।

ZEAL said...

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कहानी के माध्यम से जिन प्रश्नों का उत्तर पाना उद्देश्य था , उसका खून कर दिया गया । जब लेखिका के प्रश्नों का सम्मान नहीं है , तो पाठकों की राय की आवश्यकता क्या है ?

लोग चाहते हैं किसी भी विषय पर नाम लिखकर , निजता का उल्लंघन करके ही विमर्श किया जाये । एक सम्मानित तरीके से भी विमर्श किया जा सकता था। जरूरी नहीं है की किसी ब्लॉगर का नाम लेकर उसका अपमान किया जाए। कल्पित चरित्रों से भी बिना किसी को ठेस पहुंचाए भी प्रयोजन सिद्ध किया जा सकता है।

विवाद ही एकमात्र विकल्प नहीं होता।

अब कहानी में कुछ शेष नहीं है , आप लोग अच्छी कहानियां पढने में अपना बहुमूल्य समय लगायें ।

आपकी असुविधा के लिए खेद है।

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ZEAL said...

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प्रतुल वशिष्ठ said...

'चंचल' कथा पर हो रही बहस पर मेरी राय :
_________________________________
प्रचलित कहानी विधा में बेशक प्रश्न नहीं किये जातो हों.... लेकिन ब्लॉग-लेखन अपने आप में एक नवीन विधा है. इसमें इस तरह के प्रयोग किये जा सकते हैं.
असल में ब्लॉग-लेखन किसे कहते हैं.. और ब्लॉग लेखन द्वारा टिप्पणीकारों को कैसे जोड़ा जाता है.. यहाँ देखने को मिलता है.
इसलिये मेरा मानना है कि पुरानी परिभाषाओं के खोल से बाहर आना होगा.
कृपया ध्यान दें ये ब्लॉग-लेखन है... किसी अन्य विधा की तरह एकांत में किया लेखन नहीं.... यहाँ लेखन का तुरंत रेस्पोंस मिलता है.
June 20, 2011 6:06 PM

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ZEAL said...

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Bikramjit Mann to me

show details 9:34 PM (52 minutes ago)

Hi

I read your comment that you have closed the comment section, that is not good , why would you let someone dictate to you what you want ..

I can understand what you are saying

Anyway I feel that friendship is a pure relation, I believe in it a lot and Miheer is wrong no friend would make a friend cry , simple rule i follow .. friends are there to make your life comfortale and happy and not spoil it and make it sad

it was a good story ...

Please dont let anyone change your ways .. is all i will say .

Take care.

--
Bikramjit Singh Mann

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ZEAL said...

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Diwas Gaur to me

show details 9:08 PM (1 hour ago)

आदरणीय दीदी
नमस्कार...

मैं अभी आपके ब्लॉग पर आया था...आपकी नयी पोस्ट चंचल-कहानी देखी| उस पर
आने वाली टिप्पणियां भी देखीं| मैंने देखा बहुत सी बुद्धूजीवी टिप्पणियां
भी आई हैं| मेरा भी मन था टिपण्णी करने का, किन्तु आपने कमेन्ट ऑप्शन बंद
कर दिया है| खैर मैं तो बस आपकी कहानी पर अपने विचार रखना चाहता था, अत:
मेल कर रहा हूँ| आप चाहें इसे ब्लॉग पर लगाएं या न लगाएं आपकी इच्छा|

वैसे मैं अजित गुप्ता जी, प्रतुल भाई, हंसराज भाई व आशीष जी से सहमती
रखता हूँ| मिहिर यदि विद्वान् है तो इस प्रकार के आचरण से वह अपने ज्ञान
का नाश ही कर रहा है| विद्वान् होने के बाद भी वह उस ज्ञान को न पा सका
जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है| समाज में रहने के लिए विनम्र होना आवश्यक
है किन्तु मिहिर को अपनी दोस्त चंचल को दुःख देने में ही आनंद आता है|
मैं तो इसमें मिहिर की ही अधिक गलती मानता हूँ| चंचल एक विनम्र लड़की है|
वह मिहिर से दोस्ती नहीं तोडना चाहती| वैसे इसमें गलत कुछ नहीं है,
किन्तु मिहिर को भी सुधारना आवश्यक है|

रचना जी व गिरधारी जी की टिप्पणियाँ विषय से भटक गयी लगती हैं| इसकी आप
चिंता न करें| अपना कारवां आगे बढ़ाती चलें|

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mahendra verma said...

अपने बीच के किसी व्यक्ति की उपेक्षा करना उस व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी सजा है।

मिहिर की कड़वी कड़वी बातों को चंचल चुपचाप सहती रही। मिहिर ने समझा कि चंचल उसकी उपेक्षा कर रही है। मिहिर के अहम् को इससे चोट पहुंची। वह किसी भी तरह से चंचल की प्रतिक्रिया चाहने लगा। इसके लिए मिहिर ने चंचल को और कष्ट देना जारी रखा। सीधी-सादी चंचल रोकर ही प्रतिक्रिया दे सकती थी।
मिहिर यही चाहता था। उसके अहम् को संतुष्टि मिल गई

Gopal Mishra said...

Bahut hi achcha likha hai aapne....Arthpurna.

सुशील बाकलीवाल said...

मानव समुदाय में जितनी भिन्न व्यकितयों की शक्ल और हथेली की रेखाएँ होती हैं उतने ही भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यक्तित्व भी प्रायः सामने आते रहते हैं । निष्कर्ष निकालने बैठें भी तो बहुत मुमकिन है कि वो निष्कर्ष आधा-अधूरा ही साबित हो ।

बाबुषा said...

प्रिय दिव्या ,
कथा के अंत में तुम्हारे प्रश्न ने विक्रम और बेताल की याद दिला दी और मुझे लगा कि मैं उत्तर न दूँ तो मेरा सर टुकड़े -टुकड़े हो सकता है ! कथाकार दिव्या की यह बात बहुत पसंद आयी. अब बात करें कथा की - मिहिर कुछ sadist सा जान पड़ता है . उसका चित्त चंचल है ..जबकि चंचल गंभीर है . मिहिर की समझ महज किताबी लगती है . उसे चंचल की गहराई का अनुमान नहीं हो पाया अंत तक ..उसकी हरक़तें बाल सुलभ हैं ..उसे बड़ा होना होगा वर्ना वो जीवन के कई सुख चूकेगा ..चंचल निसंदेह एक सुन्दर पात्र है . चंचल को देख के अंग्रेजी की वो सूक्ति याद आ रही है मुझे कि Mercy is the noblest form of revenge. हालांकि चंचल तो ये भी नहीं सोचा ..क्षमा उसका स्वभाव है .

कुश्वंश said...

दिव्या जी आप लेखन में हमेशा ज्वलंत प्रश्न उठाती हैं यही तो है ब्लॉग लेखन की उत्कृष्ट परिणति.आम कहानी में न प्रश्न उठते है और न ही कोई टिप्पणी कहानीकार को रुचिकर लगती है. मैं जब से आपका ब्लॉग पढ़ रहा हूँ आपकी बात को समझ रहा हूँ, आपको भी . कुछ कतिपय टिप्पणीकारों की अनर्गल प्रवंचना से बिना विचलित हुए बात कहें और धड़ल्ले से डंके की चोटपर लिखे .अपनी स्म्रध्शाली लेखनी को किसी के उद्देलित करने पर शिथिल न होने दे .आपको और साहस और बल मिले , इन्ही शुभकामनाओ के साथ आपकी एक और बेहतरीन पोस्ट के इंतज़ार में, एक बात और प्रतितिप्पनी जरूर दे और पिछली घोषणा रद्द करने की बात लिखे.

Vivek Jain said...

बहुत सुंदर है ये कहानी
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

ऐसे चरित्र चाहें मिहिर हो या चंचल समाज में अनेकों हैं. पुरुष इस तरह के व्यवहार को अपना हक समझता है, वहीँ स्त्री इसे अपनी नियति.

Rakesh Kumar said...

उस साधू की कहानी याद आती है जो नदी में बहते हुए बिच्छु को बार बार बचाने की कोशिश कर रहा था और बिच्छु डंक मार मार उसके हाथ से छिंटक कर पानी में फिर फिर बह रहा था.दोनो अपने अपने स्वाभाव से मजबूर हैं.परन्तु असली विद्वता तो इसी बात में है कि अपने स्वाभाव और दूसरे के स्वाभाव को समझा जाये और आपसी ताल मेल को बनाते हुए 'सर्वजन सुखाय,सर्वजन हिताय' की नीति को अपनाया जाये.
वर्ना 'छाडी मन हरी विमुखन को संग,जाके संग कुबुद्धि उपजत पडत भजन में भंग,छाडी मन हरी विमुखन को संग.'

sm said...

good questions,
as its human life anything is possible, but M may be doing it so C will become strong.
M may be getting bad type of pleasure by troubling girl.
girl needs to become strong when M is wrong she should tell him his fault and forgive him.

To forgive someone again and again is very difficult task thus Girl is far superior than M,
M knows this understands this and which he can not do it when he sees Girl is doing it he becomes angree and want to make her like him.

veerubhai said...

अपने स्वभाव में स्थिर रहना एक विलक्षण गुण हैं जिनमे होता है उन्हें कोई डिगा नहीं सकता .

vandana said...

ऊँचाइयों पर बने रहना अपने आप में एक विलक्षण गुण है मिहिर चाहे जैसा हो पर चंचल को आत्मसम्मान को बनाये रखने के लिए एक सीमा निर्धारित कर विरोध भी दर्शाना चाहिए दिल से माफ करके भविष्य के लिए चेतावनी तो देनी चाहिए क्योंकि बार बार नकारात्मक व्यवहार से पीड़ित होते रहने से व्यक्ति आत्मसम्मान खोते खोते अपना अस्तित्व ही खो देता है ऐसा मनोविज्ञान मानता है ( फिल्म ख़ामोशी )
गांधी जी क्षमा को महत्व देते थे और विरोध भी सख्ती से दर्ज करते थे

ZEAL said...

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कुश्वंश जी ,

कल रचना जी के अनावश्यक रूप से आक्रामक हो जाने पर तथा उनके अनर्गल प्रलापों द्वारा मन कुछ अस्वस्थ हो गया था। इसीलिए शान्ति की तलाश में कमेन्ट आप्शन बंद कर दिया था। लेकिन पाठक अपना विचार रखना चाहते थे तथा मेल से प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं तो पुनः कमेन्ट आप्शन खोल दिया। आप में समय के साथ आया अनुभव है , एक परिपक्वता है , और लोगों को सही परिपेक्ष्य में समझने की कोशिश आपके स्वर्ण जैसे ह्रदय को दर्शाता है। आपका concern समय-समय पर देखने को मिलता है, जो अत्यंत ह्रदय स्पर्शी है । मन से आपका आभार।

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ZEAL said...

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कहानी में मिहिर तो एक कल्पित नाम है , लेकिन अब यथार्थ का एक सटीक उदाहरण भी मिल गया है। और वो नाम है ब्लॉगर रचना।

रचना के लिए भी 'मित्र' शब्द का इस्तेमाल कर रही हूँ , क्यूंकि इन्होने मित्र शब्द की व्यापकता पर गौर नहीं किया। अन्य कोई दूसरा शिष्ट संबोधन मैं जानती नहीं जिसे प्रयोग कर सकूँ। मित्र को , पुरुष-मित्र कहकर अर्थ का अनर्थ जैसा किया इन्होने।

रचना जी को पिछले एक वर्ष से परिचित हूँ। रचना जी मेरे लेखों पर नहीं आतीं , लेकिन जब इनका मूड होता है तो अचानक आकर आक्रामक रूप से नकारात्मक टिप्पणी लिखकर अनावश्यक विवाद उपस्थित करती हैं , जिससे अच्छा-खासा आलेख बर्बाद हो जाता है। लोगों का mind आलेख से हटकर विवाद पर केन्द्रित हो जाता है। और विवाद करना ही रचना जी का मंतव्य होता है । यही इनकी खुराक है , और विवाद करे बगैर रचना जी का हाजमा सही नहीं रहता।

रचना जी ऐसा केवल मेरे ब्लौग पर नहीं करतीं , अपितु अनेक महिला एवं पुरुष ब्लॉगर के आलेख पर जाकर अनावश्यक विवाद उपस्थित करके , लेख का सत्यानाश कर देती हैं और अपने प्रयोजन में सफल हो जाती हैं ।

ऐसी मानसिकता वालों को sadist कहते हैं । ऐसे लोगों को sadistic pleasure मिलता है दूसरों को यातना देने में।

रचना जी ने मुझसे निवेदन किया था की मैं उनके 'नारी ब्लौग' पर अपने आलेख पोस्ट करूँ । मैंने उनसे कहा था की जब "ZEAL" ब्लॉग से मन भर जाएगा तब 'नारी' ब्लौग पर लेख पोस्ट कर दूँगी , फिरहाल तो ZEAL पर ही पोस्ट करना अच्छा लगता है । मुझे अपना-अपना सा महसूस होता है । तबसे रचना जी मुझसे चिढ़ी हुयी है , और मेरे अनेक आलेखों पर आक्रामक होकर अपनी भड़ास निकालती हैं।

रचना जी को चाहिए की वे अपने मन की कडवाहट को थोडा कम करें अन्यथा उनका जीवन उन्हीं पर भार हो जाएगा । इतना मीठा भी नहीं होना चाहिए की कोई निगल ले और इतना कड़वा भी नहीं होना चाहिए की कोई थूक दे।

रचना जी को एक वर्ष तक बहुत बर्दाश्त किया है। अब मेरी सहनशक्ति की पराकाष्ठ हो गयी है । रचना जी से निवदन है की वे मुझसे पर्याप्त दूरी बना कर रखें। मैं उनकी तरह विवाद-पसंद नहीं हूँ। इसलिए बेहतर है वे अन्य ब्लौगों पर भड़ास निकालें , लेकिन मुझे क्षमा करें ।

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यदि मिहिर के स्थान पर किसी स्त्री का कल्पित नाम होता तो ५० प्रतिशत कमेन्ट में लोग बिना विचारे यही लिखते की स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है । अतः काफी विचार करने बाद कहानी के तौर पर संक्षेप में सारगर्भित बात लिखकर विमर्श आमंत्रित किया। उपन्यास लिखना और कहानी के माध्यम से मनोरंजन करना इस कहानी का प्रयोजन नहीं था।

मिहिर जो इस कहानी को पढ़ रहा होगा , उससे उम्मीद है वह स्वयं को सुधारेगा । यहाँ आये पाठकों के विचारों से मिहिर सबक लेगा , आत्मावलोकन करेगा और किसी की सहनशक्ति का इम्तिहान नहीं लेगा।

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ZEAL said...

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ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है । ये एक incurable मानसिक विकार है ।
इन्द्रिय निग्रहण --- ईर्ष्‍या एक घातक मानसिक विकार --- Jealousy-A malignant cancer !

http://zealzen.blogspot.com/2010/10/jealousy-malignant-cancer.html

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ZEAL said...

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नकारात्मक ऊर्जा वालों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

जिंदगियों में उगते खर-पतवार - [Art of weeding]

http://zealzen.blogspot.com/2011/05/art-of-weeding.html

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JC said...

दिव्या जी, अपने जीवन काल के सात दशक से ऊपर समय में जो 'हमने' अनुभव किये उसके आधार पर पाया कि "सत्य कटु होता है", यानी सही कह गए हमारे 'ज्ञानी-ध्यानी' पूर्वज, जिसमें से जो सबसे पुराने हैं - जो अनादि काल से अनंत निराकार ब्रह्म अनंत अस्थायी साकार के मूल हैं - वो 'हम ज्ञानी' ('प्रकृति' को प्रतिबिंबित करती नित्य परिवर्तनशील मानव द्वारा रचित व्यवस्था में परीक्षा में +/- १००% अंक लाने वाले), अथवा निपट अज्ञानी (०% अंक लाने वाले, और 'मध्य मार्ग' में जैसे चलते औसत नंबर से पास होने वाले) साकार मानव शरीर में कैद आत्मा के दुर्भाग्य से शून्य काल और स्थान से सम्बंधित अजन्मे और अनंत परमात्मा हैं... और उनके अनुसार जिसे 'हम' सत्य समझ रहे होते हैं, वो वास्तव में असत्य है, 'प्रभु' (जो भू अथवा भूमि से पहले से शक्ति रूप में शून्य में उपस्थित था), उसकी 'माया' अथवा 'योगमाया' है, जिससे पार पाना 'आम आदमी' अथवा 'आम आत्मा' के बस में साधारणतया केवल 'सतयुग' में ही है... कलियुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग में बहुत ही कठिन है उसका आभास होना, वो भी कठिन तपस्या के बाद (और यदि जैसे स्वयं माँ यशोदा और पिता नन्द का आश्रय पा भाग्यवान 'कृष्ण' की भी कृपा हो जाए, जैसे उन्होंने अर्जुन पर द्वापर में की)...

इसे 'हम' अपना दुर्भाग्य कहें या प्रभु की इच्छा कहें, 'हमें' अनंत (+/-) मॉडेल देखने को मिल जाते हैं, कलियुग में और भी अधिक, क्यूंकि, जैसे प्रकृति को संकेत करते 'हम' देखते हैं, धरती की सतह पर जल ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है, उसी प्रकार काल सतयुग से कलियुग की ओर चलते जाता है कह गए ज्ञानी-ध्यानी, किन्तु दूसरी ओर यदि कोई बूँद विशेष सागर तक पहुँच भी जाए, प्राकृतिक शक्तियां उसे फिर से बादल बन बरसने को मजबूर कर सकती हैं :)

मुझे लगता है दोनों पात्रों को अभी बहुत कुछ सीखना शेष है...

प्रतिभा सक्सेना said...

अति सर्वत्र वर्जयेत्.
स्वस्थ संबंधों के लिये स्वस्थ मानसिकता का होना आवश्यक है.
मिहिर का व्यक्तित्व कुंठाओं से युक्त लगता है .चंचल को आपनी बात मिहिर से कह कर स्पष्ट कर लेनी चाहिये.

Helping Hands said...

सत्य की हमेशा विजय होती है। आदमी विशेष का अपना स्वभाव होता है। और सच्चाई यही है कि अपने स्वच्छ गुणों को पल्लवित होने दें। व्यर्थ की बातों से खुद को बचाएं।