Tuesday, June 21, 2011

लेखन की बेला.

पैदा होते ही कोई लिखना नहीं शुरू कर देता। तो फिर लिखना कब शुरू करता है ? क्या परिस्थितियां बनती हैं जब लेखन शुरू होता है ? और सबसे अहम् प्रश्न है की लिखना कब प्रारम्भ करना चाहिए।

इन प्रश्नों पर मनन के बाद मुझे लगा की जब कहने को बहुत कुछ हो मन में , लेकिन सुनने वाला कोई मिल रहा हो तो लेखन प्रारम्भ कर देना चाहिए। क्यूँ की व्यस्तता भरी इस ज़िन्दगी में हर किसी के पास कहने के लिए तो बहुत कुछ है , लेकिन सुनने वाला कोई नहीं मिलता। सभी चाहते हैं की उनकी बात को बड़े ध्यान से सुना जाए , उस पर प्रश्न भी किये जाएँ , तर्क वितर्क भी हो और उनकी कही गयी बात को मान भी मिले। लेकिन अकसर ऐसा हो नहीं पाता व्यक्ति के पास देने के लिए अनुभव और ज्ञान तो बहुत होता है , लेकिन अफ़सोस ये है की लेने वाले सुपात्र नहीं होते।

कारण है की ज्ञान तो बहुत है , लेकिन लेने वाले की आवश्यकता, क्षमता और समय सीमित है। कोई भी व्यक्ति ज़रुरत और सुविधा के अनुसार उपयोगी सामग्री ही ग्रहण करता है लेकिन ज्ञान बांटने वाले को यह लगता है की कोई उसे तवज्जो नहीं दे रहा है।

ये शिकायत अक्सर बुजुर्गों में देखी गयी है , उन्हें लगता है की बच्चे बड़े हो गए हैं और खुद को ज्यादा काबिल समझने लगे हैं , माता पिता की ज्ञान भरी बातें सुनने के लिए उनके पास वक़्त नहीं है। वे चाहते हैं की लोग उनकी बात मन्त्र-मुग्ध होकर सुनें , फिर सराहें और फिर अगले दिन प्रवचन के अगले एपिसोड के लिए तैयार रहे

लेकिन ऐसा व्यवहारिक नहीं है। गृहस्थ आश्रम में फंसे स्त्री पुरुष पर प्रवचन सुनने के अतिरिक्त भी बहुत जिम्मेदारियां होती हैं वे चाहकर भी बहुत लम्बे समय तक ज्ञान-चर्चा का हिस्सा नहीं बन सकते। यदि वे ऐसा करेंगे तो अपने कर्तव्यों से विमुख हो जायेंगे।

आजकल की भागती-दौड़ती व्यस्त ज़िन्दगी में , हर व्यक्ति अत्यंत संक्षेप में सारगर्भित बात को सुनना, कहना और ग्रहण करना चाहता है। इसलिए अनावश्यक विषयों से व्यक्ति की अरुचि सी होती जा रही है और इन्टरनेट की दुनिया में व्यक्ति अपने पसंद के विषय चुनकर उसे ही पढना चाहता है इसलिए संभावनाओं के इस अति विशाल समुद्र में व्यक्ति बहुत selective हो गया है अतः ज्ञान बांटने वालों को यह सोचकर बुरा नहीं मानना चाहिए की अमुक व्यक्ति मेरी बातों में रूचि नहीं ले रहा है।

ऐसी परिस्थिति में जब आप कहना बहुत कुछ चाहते हों तो लेखन प्रारम्भ कर देना चाहिए जो कहना है उसे शब्दों में उतारकर पोस्ट कर देना चाहिए। जिसे रूचि होगी वह स्वयं ही पढ़ लेगा और आपको भी यह शिकायत नहीं रहेगी की कोई आपको सुन नहीं रहा है।

मैं अपने आस-पास परिवेश में जिन बुज़ुर्ग व्यक्तियों को लेखन में संलग्न देखती हूँ , उनके लिए मन में अपार श्रद्धा है , की वे अपने ज्ञान और बहुमूल्य समय का सदुपयोग कर रहे हैं बिना किसी अपेक्षा के लिख रहे हैं और योगदान दे रहे हैं

अतः लिखिए, जो भी है ह्रदय में लिख डालिए। बिना इस अपेक्षा के कोई मुझे पढ़ेगा , मुझसे प्रश्न करेगा , अथवा मुझे पढने के बाद मेरा भक्त बन जाएगा। आजकल लोग अपने काम की सामग्री लेकर आगे बढ़ जाते हैं , क्यूंकि जो एक लिए उपयोगी अथवा रुचिकर है वही दुसरे के लिए गैरज़रूरी एवं अरुचिकर भी हो सकता है। लेकिन आप लिखते रहिये हम पढ़ रहे हैं

Zeal

60 comments:

PARAM ARYA said...

आपसे सहमत होकर अच्छा लगा ।

डा० अमर कुमार said...

.सत्य वचन !
विचारों करने साझा करने वाले और विचारों को मनवाने की दुराग्रह पालने वालों में फ़र्क होना ही चाहिये !

Kailash C Sharma said...

बहुत सच कहा है. मन की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लेखन से बढ़ कर और कोई उपाय नहीं. आप अपने मन के विचारों को अपनी डायरी में भी अगर लिख लेते हैं तो मन से बहुत बोझ उतर जाता है. लेखन में अपने विचारों को जब व्यक्त कर देते हैं तो आपको एक गहन आत्मसंतुष्टी मिलती है जो अपने आप में एक महत्वपुर्ण उपलब्धि है. आप को यह नहीं लगता कि किसी के पास आप की बात सुनने को समय नहीं, क्यों कि जिसे आपकी बात में रूचि होगी वह अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ लेगा. इस लिये बिना किसी स्वार्थ के आप स्वान्तः सुखाय लिखिये.

बहुत सार्थक आलेख. आभार

Arunesh c dave said...

लेखन खुद के लिये ही करना सही है दूसरो के लिये नही

ashish said...

स्वान्तः सुखाय लिखा हुआ अगर किसी के काम आये तो ये तो कंचन पर सुहागा जैसे हुआ

रविकर said...

आप लिखते रहिये । हम पढ़ रहे हैं ।

प्रतुल वशिष्ठ said...

कभी-कभी हम स्वयं नहीं जानते कि हम कितना और क्या-क्या जानते हैं... इसलिये जब हमसे कोई संवाद करता है तब हमें भी पता चलता है कि हम क्या-क्या और कितना कुछ जानते हैं... इसी तरह जब हमसे कोई बात नहीं करता अथवा हम अपने विचारों को दूसरे तक संपादित रूप में पहुँचाना चाहते हैं... तब-तब लेखन की शरण लेते हैं.

आपको व्यावहारिक बात से समझाता हूँ.....
१] लिखित परीक्षा देते समय हमें स्वयं कई बातों का पता नहीं होता कि हम अमुक प्रश्न का उत्तर क्या देंगे. शुरुआत करते हैं तो मन की अज्ञात परतें खुलती चलती हैं... हमें भी अच्छा लगने लगता है स्वयं के विचार जानकार.
२] आपको टिप्पणी देने का मन था... बस शुरू कर दिया आपसे बात करना... और मन में छिपी बातें उदघाटित होने लगीं. क्योंकि आप दूर हैं. संवाद का सस्ता और सम्पादनयोग्य सर्वश्रेष्ठ तरीका ... यही लेखन है.... सो कर रहा हूँ.
इस तरह 'एक' के बहाने से कई अन्य आत्मीयों से भी संवाद प्रदर्शन हो जाता है.
_____________
'लेखन' मतलब :
— स्वयं के विचारों को जानने का, स्वयं के अंतर को पहचानने का माध्यम.
— दूरी को घटाने का उपक्रम.
— अपने प्रिय के पास आने का अचूक उपाय.
— उदास और थके मन में नवीन स्फूर्ति का संचार कर देने की दवा.
— अपने वैचारिक स्तर और अपने ज्ञान की गुणवत्ता को परखने की कसौटी.

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

एक सार्थक पोस्ट व सारगर्भित ,सामयिक सलाह के लिये आभार व मुबारकबाद।

Dr Varsha Singh said...

आजकल की भागती-दौड़ती व्यस्त ज़िन्दगी में , हर व्यक्ति अत्यंत संक्षेप में सारगर्भित बात को सुनना, कहना और ग्रहण करना चाहता है।
बिलकुल सही कहा आपने!
सारगर्भित पोस्ट.

रश्मि प्रभा... said...

लिखिए, जो भी है ह्रदय में लिख डालिए। बिना इस अपेक्षा के कोई मुझे पढ़ेगा , मुझसे प्रश्न करेगा , अथवा मुझे पढने के बाद मेरा भक्त बन जाएगा। ... dayri likhna , vichaar likhna , kavita likhna , kahani likhna .... dayri ke siwa likhne ke baki aayam me aadmi chahta hai - koi padhe .

शालिनी कौशिक said...

bahut achchhi baten kahi hain aapne aur ye hi sahi bhi hain.

Rajey Sha राजे_शा said...

ढेर सारा लि‍खा ही जा रहा है। तो लि‍खने से पहले उसकी सार्थकता और मौलि‍कता के बारे में अवश्‍य सोचा जाना चाहि‍ये।

IRFANUDDIN said...

"जब कहने को बहुत कुछ हो मन में , लेकिन सुनने वाला कोई न मिल रहा हो तो लेखन प्रारम्भ कर देना चाहिए"......quite interesting and true.....

and whatever you write just pour your heart into it, try to avoid manipulating your thoughts......

अरुण चन्द्र रॉय said...

मन की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लेखन से बढ़ कर और कोई उपाय नहीं.

सदा said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने इस आलेख में ... विचारात्‍मक प्रस्‍तुति ।

NEELANSH said...

ham likhte rahe ,aap likhte rahen ,
chalo ek kitaab banate hain
bhule bichre yaadon se ,
kuch dil se judi baaton se
chalo usko laazababa banate hain

raahbar wahi ,rehnumaa wahi ,wahi baazigar hoga
chalo aaj milkar ek khwaab banaate hain...

arvind said...

अतः लिखिए, जो भी है ह्रदय में लिख डालिए। बिना इस अपेक्षा के कोई मुझे पढ़ेगा , मुझसे प्रश्न करेगा , अथवा मुझे पढने के बाद मेरा भक्त बन जाएगा।...sahi salaah...aapse sahamat hun.

arvind said...

pichhale post me aapne comments ko rok diya tha.......An iron lady ! should not break just as a glass.

Bhushan said...

यह पढ़ कर तो बहुत ही अच्छा लग रहा है कि हमें पढ़ने का एक आश्वासन यहाँ दिया गया है. बूढ़े ब्लॉगर्ज़ के लिए यह पोस्ट अमृत के समान है. लगता है सुबह की सैर बढ़ा देनी चाहिए :))

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बिलकुल सही लिखा है दिव्या जी ...

हर लेखक /रचनाकार के दिल में यह बात जरूर होती है कि उसके विचारों को तरजीह दी जाए किन्तु बिना प्रशंसा अथवा आलोचना की परवाह किये , अपने भावों/विचारों को प्रस्तुत करना ही सही मायने में लेखन है |

अपने भाव/विचार लेख अथवा काव्य द्वारा प्रस्तुत करने वाले को आत्मसुख अथवा आत्मसंतुष्टि अवश्य मिलती है और यही असल प्राप्ति है |

गोस्वामी तुलसीदास जैसे महाकवि ने राम चरित मानस में लिखा ..' स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा '

अब यदि आप कुछ लिखते हैं तो पाठक गण अपनी अभिरुचि के अनुसार ही उसे ग्रहण करेंगे , विद्वत्समाज उसकी अच्छाई और आलोचक उसकी कमियाँ प्रकाश में लायेंगे | इसी तरह से आपके भावों/विचारों का खंडन-मंडन चलता रहेगा | ये सभी बातें हमारे लेखन को पुष्ट ही करेंगी |

कुश्वंश said...

लेखन एक विधा है और ये सिर्फ अच्छे पढने वाले को ही बेहतर रूप से मिल सकती है. कहते है लिखने के लिए बेहतरी से पढना जरूरी होता है.जिसने पढ़ा ही नहीं होगा वो लिखेगा क्या ? कल जब पुस्तके ही थी पढने को तो लिखनेवाले को कितने उद्यम करने होते थे ये किसी से छिपा नहीं है. ब्लॉग्गिंग ने सबकुछ आसान कर दिया . अब लिखने के लिए पढना जरूरी नहीं लगता . बस लिखो. आती हो तो शिल्पकार की तरह न आती हो हो भड़ास की तरह "भड़ास" ब्लॉग की बात कदापि न समझे .बात अनर्गल लेखन से है, स्तरहीन लेखन से है, कतुलेखन से है, इर्ष्या लेखन से है. रही बात बड़े बुजुर्गों के लेखन की है तो ये कम प्रतिशत में ही संभव है . ज्यादातर बुजुर्ग प्रवचन नहीं भावनाए चाहते है ,साथ चाहते है , तुम्हारा अटेंशन चाहते है शायद.जो लिख सकते है उनके लिए ब्लॉग्गिंग अमृत है.

सुज्ञ said...

प्रतुल जी से सहमत!!

लेखन, स्वयं के ज्ञान की गुणवत्ता परखने का उत्तम माध्यम है।
लेखन, विचारों की भ्रांतियां दूर करने का श्रेष्ठ अवसर है।
लेखन, समय रहते विचार परिमार्जन का प्रयोग है।
लेखन, जगत को कुछ प्रदान करने का सन्तोष-सुख है।
लेखन, द्वंद्व के बीच विचार स्थायित्व का आश्रय स्थल है।

aarkay said...

धन्यवादी हैं हम अंतरजाल के कि अपने विचार अधिक से अधिक लोगों तक त्वरित रूप से पहुँचाने में समर्थ हैं . सुखद संकेत है कि अधिक से अधिक संख्या में लोग लेखन की ओर प्रवृत हो रहे हैं. समय के साथ साथ लेखन परिष्कृत हो रहा है और परिपक्व भी. इसमें सुधी पाठकों की भी महत्त्व पूर्ण भूमिका रही है जिनकी सकारात्मक आलोचना एवं टिप्पणियां प्राप्त होती रहती हैं. फिर भी कोई अपेक्षा न रखते हुए निरंतर लिख कर अपने विचारों को व्यक्त करते रहना अपने आप में एक रचनात्मक क्रिया तो है ही !
सुंदर आलेख !

Ratan Singh Shekhawat said...

किसी का भी लिखा हुआ कभी न कभी किसी के काम अवश्य आता है |

Atul Shrivastava said...

किसी और के बजाय खुद के लिए लिखना चाहिए।
खुद को अच्‍छा लगे, दिल की बातें बयां हों, बस

लोग पसंद करेंगे यदि सच्‍ची बातें होंगी,
बहरहाल अच्‍छा विषय
अच्‍छा लेखन

ajit gupta said...

लेखन से हमारे विचार परिष्‍कृत होते हैं, हमें एक दिशा मिलती है। जब उन पर टिप्‍पणी आती है तब मालूम पड़ता है कि समाज किस दिशा में सोच रहा है। मेरा तो मानना है कि हम दूसरों को देने के स्‍थान पर स्‍वयं बहुत कुछ सीखते हैं।

kase kahun?by kavita verma said...

svayam ko janane ka sabse achchha tareeka hai man ke vicharon ko likhana aur is aaine me khud ko dekhana..ek sarthak aalekh...

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

लिखना उस समय से प्रारम्भ करना चाहिए जब आपमें लेखन की क्षमता आ जाती है। अब हमें सत्तर वर्ष में आई है :) इस पर भी कभी टिप्पणी लिखना चाहे तो बक्सा बंद कर दिया जाता है- उसी कहावत की तरह- An early bird catches the moth :)

सुबीर रावत said...

लेखन एक कला है, लेखन एक प्रतिभा है. किसी में यह नैसर्गिक होती है (जैसे आप में है) और कोई बार-बार काट छांट कर लिखता है और लेखक बनना चाहता है (अपने बारे में मै यही सोचता हूँ).लेकिन आपने लेखन की नयी परिभाषा गढ़ दी है तो मानना ही होगा. किन्तु वैसे अपने मन के भावों को लिख डालना लेखन नहीं आत्मकथा है और आपकी आत्मकथा से, आपके अनुभवों से किसी को कुछ मिल सके आवश्यक नहीं है.(यह अलग है कि विजय लक्ष्मी पंडित की 'The Scope of Happiness', अमृता प्रीतम की 'रसीदी टिकट', हरिवंश राय बच्चन के 'क्या भूलूँ क्या याद करूं, नीड़ का निर्माण, दशद्वार से सोपान तक' आदि अनेक पुस्तके आत्मकथा होते हुए भी पाठकों द्वारा चाव से पढ़ी जाती है).
इस सार्थक व रचनात्मक पोस्ट के लिए आभार.

JC said...

बहुत सही सलाह!
और सुन्दर टिप्पणियाँ भी!
पता नहीं क्यूँ, अधिकतर 'ब्लोगर' फिर लिखते हैं "अति सुन्दर!" "मेरे ब्लॉग पर भी आईये"...

पंडित रवि शंकर प्रसिद्द सितारवादक हैं - उनके कई कार्यक्रम में उपस्थित होने का 'मुझे', संयोगवश, मौका मिला है... सबसे पहले रामकृष्ण मिशन दिल्ली में जब वो उदयमान कलाकार के रूप में आरम्भ में उभरे थे...

इसे संयोग ही कहेंगे 'आम आदमी' कि एक शाम अभी उन्होंने आलाप से समा बांधना शुरू किया ही था और फिर कुछ समय पश्चात तबला बजना आरम्भ हुआ ही था कि अचानक स्टेज पर एक दम मौन छा गया! सारे श्रोता आश्चर्यचकित हो उस ओर देखने लग पड़े कि तभी तबला वादक ने तबले का मुख जनता की ओर कर माइक पर कहा "ब्रोकन"!

सब हंस पड़े तो पंडित जी ने माइक सम्हाल लिया और अपने अमेरिका में कुछेक अनुभवों को सुनाना आरम्भ कर दिया (जब तक दूसरा तबला नहीं आ गया)...

उन्होंने बताया कि कैसे भारत में चलन है कि जब वे बजाते हैं तो थोड़ी थोड़ी देर में श्रोतागण "वाह वाह"! करने लग पड़ते हैं, जिससे उन्हें श्रोता का स्तर भी पता चल जाता है, और यदि वो ऊंचा होता है तो कलाकार भी उनकी रूचि के अनुसार और बेहतर बजाने का प्रयास करते हैं... जबकि अमेरिका में श्रोता अंत में ही ताली बजा दर्शाते थे कि उन्हें कार्यक्रम पसंद आया और अक्सर हॉल तालियों कि गडगडाहट से देर तक गुंजायमान हो उठता था...

किन्तु उन्हें तो वाह वाही पाने की आदत है, इसलिए वो तबला वादक की ओर देखते थे और वो अपना सर ख़ुशी से हिला देता था... किन्तु एक कार्यक्रम के पश्चात एक समाचार पत्र के लेखक ने अगले दिन लिखा कि तबला वादक ने कई बार उन्हें सर हिला बस करने को कहा किन्तु पंडित जी सितार बजाते ही चले गए :) ... आदि, आदि कई आनंद दायक अनुभव...

और ऐसे ही हमारे कॉलेज में एक गुस्से बाज़ टीचर थे,,, एक दिन उन्होंने एक विद्यार्थी की ओर, जो ध्यान नहीं दे रहा था, लकड़ी वाला डस्टर फ़ेंक के मारा... वो भाग्यशाली था कि उन का निशाना चूक गया :)

यादें said...

दिव्या , मैंने तो आप का लेख लिखने से पहले ही आप की बात मान ली है ... सही सलाह .

आशीर्वाद!

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दीदी आपकी यह पोस्ट पढ़कर बहुत खुशु हुई|
लेखन से मन तो हल्का होता ही है साथ ही विचारों में भी परिवर्तन आता है| अब यदि लेखक एक संवेदनशील व्यक्ति है तो वह परिवर्तन सकारात्मक ही होगा| यह परिवर्तन समाज में भी आएगा|
किसी भी संवेदनशील लेखक की लेखनी में एक फ़िल्टर लगा होता है जिसमे से केवल अमृत शुद्ध विचार ही छन कर बाहर आते हैं| आपकी लेखनी ने इस फ़िल्टर को धारण कर रखा है|

प्रतुल भाई से सहमत हूँ| बहुत ही सरलता से उन्होंने लेखन की सार्थकता को समझाया है|

आजके भागते दौड़ते जीवन में जब किसी के पास सुनने के लिए समय नहीं है तो ऐसे में लिखना शुरू कर ही देना चाहिए| कुछ लोग पर्सनल डायरी लिखते हैं, जिसे वे किसी अन्य को नहीं पढ़ाते| यह उनकी अपनी इच्छा है किन्तु मुझे लगता है कि जो विचार हमारे मन में हैं उन्हें दूसरों को बताना चाहिए| केवल डायरी में लिख देने से क्या होता है? जब किसी को इनके बारे में पता ही न चले|

ऐसा भी देखा गया है कि बुज़ुर्ग लोग आयु के इस पड़ाव में लिखना शुरू कर देते हैं| मेरे नानाजी जब जीवित थे तो अकेले में वे कवितायेँ लिखते थे| उनकी मृत्यु के बाद मैंने उनकी डायरी की वे सभी कवितायेँ पढ़ीं| पढ़ते समय नानाजी के भीतर छुपा एक अजब संसार देखने को मिला| हालांकि पद्द में मेरा ज्ञान लगभग नगण्य ही है किन्तु फिर भी बहुत अच्छा लगा उनकी कवितायेँ पढ़कर|

लेखन का महत्व सबके लिए भिन्न हो सकता है| मेरे लिए यह एक पवित्र साधन है जिसके द्वारा मैं अपनी बात सबके सामने रख सकता हूँ| एक अच्छा लेखक नहीं हूँ फिर भी कुछ करने के लिए ब्लॉग लेखन में आया| मुझे लगा कि इसके द्वारा धीरे धीरे ही सही किन्तु अपनी बात उन लोगों को भी समझा सकता हूँ जिन्हें मैं जानता भी नहीं, जिन्हें मैंने कभी देखा नहीं, जो संसार में यहाँ वहां बसे हैं| किन्तु इंटरनेट पर लिखने से कुछ ऐसे साथी मिले जिनसे मैं अपने जीवन में जरुर मिलना चाहूँगा| बहुत कुछ सीखना चाहूँगा|
अपने आस पास के लोगों को तो पकड़कर जबरदस्ती भी मैं अपनी बात सुना देता हूँ|

लेखन की सार्थकता व सदउपयोगिता पर आपकी यह पोस्ट सच में बहुत अच्छी लगी|

सादर
आभार

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

bhut achha aalekh...

mere vichar me, kuchh ghatna, sughatna ho ya durghatna, likhna sikha deti hai.....

mahendra verma said...

कब लिखें और क्यों लिखें ? इन प्रश्नों पर आपने सार्थक और उपयोगी विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
विचार भी एक उर्जा है, एक लेखक उसे रूपांतरित कर शब्दों में ढाल देता है। इसे जब कोई पाठक पढ़ता है तो लेखक की वैचारिक उर्जा पाठक में संचरित हो जाती है। कितनी उर्जा संचरित होगी, यह पाठक की ग्रहण क्षमता पर निर्भर करती है।
आभार, दिव्या जी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आज का आपका आलेख तो
बहुत कुछ सिखा गया हमको!

Kunwar Kusumesh said...

अच्छा आलेख.लेखन कभी व्यर्थ नहीं जाता.

वन्दना said...

ये भी बहुत अच्छा उपाय है अपनी बात कहनेका।

मदन शर्मा said...

बहुत सच कहा है. मन की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए लेखन से बढ़ कर और कोई !

मनोज भारती said...

लिखना चाहते हैं तो लिखिए ...कुछ भी लिखिए...हर स्तर के लोग हैं...पढ़ने वालों में हर स्तर के लोग मिल जाएंगें ...

लिखने के लिए लिखिए...विधा की परवाह न कीजिए ...हो सकता है जो आप लिख रहें हैं,वही कल एक लेखन की विधा बन जाए ... बहुत सारी विधाओं का जन्म इस तरह से ही हुआ...

यदि आप पहले विधा में निपुण होने के लिए तैयारी करेंगे और फिर लिखेंगे तब तक उस विधा में बहुत कुछ परिवर्तन आ चुका होगा ...इसलिए लिखिए ...बस जिस भाषा में आप लिख रहें हैं,उसके शब्द भंडार को बढ़ाते जाइए ताकि आप हर तरह के मनोभावों को अच्छे ढ़ग से लिख सकें ...

लिखने वालों के लिए हमारी शुभकामनाएं ...

डॉ टी एस दराल said...

आपके लेखन से यदि अपने अलावा दूसरों को भी सुख मिलता है या उपयोगी साबित होता है , तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है । लेकिन लेखन को दिलचस्प बनाकर लिखना सबके बस का नहीं होता ।

बेशक आपके लेखों को दिलचस्पी से पढ़ा जाता है ।

udaya veer singh said...

लेखन का दर्शन प्रारंभ से द्वि स्तरीय रहा है १- विधा संरक्षण
२- विचार संवहन
हम सभीप्रायः विचार संवहन को ही अनुगमित करते हैं ,लेखन केमाध्यम से अपने विचार को प्रतिस्पर्धनात्मक प्रेरणात्मक सकरात्मक, नकारात्मक ,स्वरूपों में निरुपित करते हैं /मूल कथ्य यह , लेखन का समय क्या है ? तो निश्चित रूप से जब मानस संचयी भाव से मुक्त हो जाता है ,प्रकटीकरण का कार्य आरम्भ होता है ,समय काल देसानुसार / गुणवत्ता निर्भर करती है विकास शीलता की गति पर ...हम सोच सकते है हरा लेखन कैसा व कहाँ है ? आभार जी

Arvind Jangid said...

सुन्दर लेख....आखिर हम सभी हैं तो एक ही, स्वंय के लिए लिखा गया भी उपयोगी होता है......बेशक दूसरों के लिए भी. आभार

अजय कुमार said...

’आप लिखते रहिये । हम पढ़ रहे हैं ”

प्रेरक और ऊर्जा देने वाली बात ।

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

जो मन में आये वो लिखो

Vaanbhatt said...

कुछ तो लोग लिखेंगे...लोगों का काम है लिखना...कुछ लोग पढ़ भी लेंगे...उनका काम है पढना...सो लिखने में कोई हर्ज़ नहीं...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैं नेता न बन सका इसलिये यहां अपने मन की बातें रख देता हूं. नेता बना होता तो जनता को सुनाता. और काफी हद स्वान्त: सुखाय भी है. जो मन में जंचा लिख दिया.
इस पोस्ट के मन्तव्य से सहमत.

वीना said...

जो मन में हो वह कह देना..व्यक्त करना ही अच्छा है...

प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत सार्थक कथन है .लेख,न ही चिन्तन-मनन करने को भी प्रेरित करता है .

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

अच्छा लिखने वालों को कम ही सही,अच्छे पाठक मिल ही जाते हैं.सारगर्भित लेख सदा स्तुत्य ही होता है.आपके विचारों से पूर्ण सहमति.

Vivek Jain said...

आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

vandana said...

सार्थक लेख ,वाकई मन को शांति देता है लेखन बस स्वान्तःसुखाय का सिद्धांत ध्यान में रखना जरूरी है ..वाल्तेयर ने कहा है ...हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं पर आपके विचार प्रकट करने में आपकी सहायता जरूर करूँगा . प्रत्येक लेखक को पढते समय भी दूसरों के विचारों का आदर रखना चाहिए सहमति हो या न हो

Mansoor Ali said...

बहुत खूब दिव्या जी, बिलकुल सही लिखा है,इत्तेफाक से कल ही मैंने भी कुछ 'ज्ञान' बघार दिया है अपने ब्लॉग पर.
http://aatm-manthan.com

पी.एस .भाकुनी said...

.......अतः ज्ञान बांटने वालों को यह सोचकर बुरा नहीं मानना चाहिए की अमुक व्यक्ति मेरी बातों में रूचि नहीं ले रहा है।.....आप लिखते रहिये । हम पढ़ रहे हैं ।
abhaar....

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ों की बातों में उनके अनुभव का निचोड़ होता है, यह हो सकता है कि वह हम पर न लगे पर महत्व तो रखता ही है।

इमरान अंसारी said...

अतः लिखिए, जो भी है ह्रदय में लिख डालिए। बिना इस अपेक्षा के कोई मुझे पढ़ेगा , मुझसे प्रश्न करेगा , अथवा मुझे पढने के बाद मेरा भक्त बन जाएगा। आजकल लोग अपने काम की सामग्री लेकर आगे बढ़ जाते हैं , क्यूंकि जो एक लिए उपयोगी अथवा रुचिकर है वही दुसरे के लिए गैरज़रूरी एवं अरुचिकर भी हो सकता है।

बहुत सही बात है मैं सहमत हूँ आपसे.......लेखन स्वयं संतुष्टि के लिए ही होना चाहिए......हाँ पर इसका ख्याल रखना चाहिए की वो कहीं किसी की भावनाओ को ठेस न लगाये |

Dr.J.P.Tiwari said...

चिन्तक कभी सोता नहीं,
उसकी चिति स्वयं संवेदी होती है,
चिंतन प्रक्रिया स्वप्न में भी विमर्श करती है.
पथ चलते चलते अपना उत्कर्ष करती है.
मौन में भी यह चिंतन धारा सतत प्रदीप्त है,

यह मौन चिन्तक का हो,या संस्कृति का;
अथवा यह हो ब्लैक होल और प्रकृति का.
यही मौन सृजन का पूर्वार्द्ध है;बाकी उत्तरार्द्ध है.
पूर्वार्ध का चिन्तक उत्तरार्द्ध का कवि है;
कवि की वाणी मौन रह नहीं सकती;
मजबूर है वह; चेतना उसकी मर नहीं सकती.
लेखनी इस पीडा को देर तक सह नहीं सकती.

संवेदना विचार श्रृंखला को; विचार शब्दविन्यास को,
और शब्द विन्यास - अर्थ, भावार्थ, निहितार्थ को
जन्म देते है.ये शब्दमय काव्य, रंगमय चित्र,
आकरमय घट, सतरंगी पट; सभी मौन का प्रस्फुटन है;

aarkay said...

You have suggested a nice shortcut to heaven, Zeal ! and are magnanimous enough to expect same people in heaven !
Nice post.

Pankaj Dwivedi said...

hi, aapke lekh ko pad kar laga jaise aapne mere dil ki baat kah di. Akhbar me kaam karne ke bavjood blog par likhne me main abhi tak sahaj nahin ho paya tha. lekin jaise aapne likha apne dil ki suno aur likhna suru kar do. To main bhi ab pehle se jyada actively blogging kar raha hoon. thank you so much for this inspiring article. Pank D

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

आदरणीय डॉ.दिव्या श्रीवास्तव जी, आपके प्रेरणादायक लेख जिस पर हर लेखक की लेखनी टिप्पणी करने के लिए मजबूर हुई. आप सभी भी टिप्पणी लिखते रहिये जिसको रूचि होगी वो सब टिप्पणियाँ जरुर पढ़ ही लेगा. जिसको कुछ लिखना होगा वो जरुर लिखेगा ही किसी के रोके तो रुकने से रहा. हो सकता है धमकी या डर के कारण समाचार पत्र में नहीं तो ब्लॉग पर लिखेगा या फिर अपनी डायरी में लिखेगा. मगर लिखेगा जरुर. किसी का जीवन ही लिखने से चलता है और किसी का जीवन लिखने से खत्म हो जाता है. मगर कोशिश ऐसी होनी चाहिए कि झूठ न लिखकर समाजहित में सत्य लिखना चाहिए. माना सत्य लिखने की सजा मौत है मगर मौत के डर से असत्य भी नहीं लिखना चाहिए.
अब तक 58 व्यक्तियों द्वारा की टिप्पणियाँ पढकर बहुत अच्छा लगा और सभी ने एक से एक बढ़कर गूढता भरी टिप्पणियाँ की है.

प्रतीक माहेश्वरी said...

शायद एक हद तक सही है पर कुछ समय तक अगर कोई नहीं आये पढने और टिप्पणी करने तो मैं आगे नहीं लिखूंगा यह भी सत्य है..
लिखना, गाना, नृत्य करना यह सब एक ही तरह के कला है जिसके रसपान करने वाले होने चहिये अन्यथा वह सोच, वह गीत, वो थाप.. सब व्यर्थ हैं...