Friday, October 28, 2011

'लाश' खाने के शौक़ीन हैं आप ?




जब खाने के लिए प्रकृति ने भाँती-भाँती की वनस्पतियाँ, फल और अनाज उपलब्ध करा दिए हों तो हिंसक पशुओं के समान 'लाश' के टुकड़े खाने की क्या आवश्यकता है ?


कम से कम उन पशुओं से ही कुछ सीखिए जिनके मृत शवों को आप खाते हैं। बेचारे बेजुबान पशु (गाय, ऊंट, बकरी, सुवर , मुर्गी आदि) तो शाक भाजी ही खाते हैं , लेकिन आप जैसे दरिन्दे इनके मांस का भक्षण करते हैं।

एक बकरीद आने की देर है , करोड़ों की संख्या में बेजुबान पशु हलाल कर दिए जायेंगे। बेदर्द और हिंसक आदमजात बैठकर इनकी लाश की दावत करेगी।

धिक्कार है ऐसी आदमीयत पर जिसमें मानवीयता का अभाव हो। लाश का सेवन करने वालों से मानवीय संवेदनाओं को समझ सकने की अपेक्षा व्यर्थ है।

ऐसे लोग हिंसक होते हैं तथा समाज में हिंसा और आतंकवाद को ही बढ़ावा देते हैं।

हमारी सरकार को चाहिए की भारत देश में पशुओं के हलाल पर पूर्णतया पाबंदी लगा दे। जिसे अपनी जबान के चटोरेपन पर नियंत्रण न हो वे तुर्किस्तान अथवा पाकिस्तान में जाकर निवास करें ।

हिंदुस्तान को सात्विक ही रहने दें।

Zeal

86 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

आपकी बात से सहमत हूँ इंसान होकर भी जो मांसाहार करे वो राक्षस प्राणी से कम नहीं है। बकरा, मुर्गी, सुअर, ऊँट, गाय, भैंस, कुत्ते, सांप, और ना जाने क्या-क्या खा जाते है लोग।

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut sahi kaha ...laikin yaha kuch meloN me abhi bhi bhson kee bali dee jaati hai... mujhe bhi khed hai.. in harkato par..

अरुण चन्द्र रॉय said...

सच कह रही हैं आप. हम शाकाहारी हैं. किन्तु सब शाकाहारी हो जायेंगे तो प्रकृति का खाद्य चक्र प्रभावित होगा.

Kailash C Sharma said...

बहुत सच कहा है...हिंसा किसी भी रूप में सराहनीय नहीं कही जा सकती..

प्रवीण पाण्डेय said...

सर्वे भवन्तु सुखिनः..

nilesh mathur said...

प्रणाम, सबसे पहले तो बता दूँ की मैं दरिंदा नहीं हूँ, शाकाहारी हूँ , लेकिन मेरे ज़्यादातर परिचित मांसाहारी हैं और मानवीय संवेदनाओं को मुझ से और आप से ज्यादा समझते हैं , मैं आपसे बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ, हाँ आप ये कह सकती हैं की जहां तक हो मांसाहार को त्याग करना ठीक है, लेकिन मांसाहारी लोग दरिंदे होते हैं ये तो मैंने आप से ही सुना है। माफ कीजिएगा अगर बुरा लगे।

Mukesh Kumar Sinha said...

nilesh jee se purntaya sahmat!

Luv said...

On one hand you say don't be like pashu, on another you say learn something from them.

That's a beautiful argument that no one can ever refute.

lekin men janana chahunga ki kya purushottam Raam shakhahari the?

Luv said...

waise cheen ya amreeka jaane men kuchh khas dikat hai kya?

ZEAL said...

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@ Neelesh Mathur-- We all have our views, so there is no point feeling bad about anything.

You are a vegan but strangely you are advocating non-vegetarians.

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ZEAL said...

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@ Mukesh Sinha-- In past 18 months there is no single post on my blog where you have agreed with me....smiles...carry on dude.

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ZEAL said...

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@ Luv-- For your question regarding Purushottam Rama , I suggest you to go through our sacred text Ramayana or Google it on net like other youngsters do ....smiles...

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IRFANUDDIN said...

well,...i respect you as a blogger and with all due respect i would like to say that i have hundreds of friends who are non-vegeterian and they don't follow ISLAM so never celebrate Baqr-eid too butttt through out the year they consume non-veg food but thankfully no one of them is violent(हिंसक) and niether they encourage violence or terrorist activities in the society.....by saying this all i mean to say is that simply eating such food doesn't make anyone terrorist......and just to let you know that i too prefer vegeterian food, so one should not hav an opinion that all the people who follow Islam can't survive without such food......

regards,
irfan.

mahendra verma said...

मांसाहारी जीवों के दांत और आंत की रचना विशिष्ट प्रकार की होती है। मनुष्यों की ऐसी नहीं होती। प्रकृति ने मनुष्य को शाकाहारी शरीर रचना दी है।
शाकाहार करने वाले जीव, जैसे- गाय, बकरी, तोता आदि का स्वभाव सात्विक होता है जबकि मांसाहारी जीव स्वभाव से हिंसक और तामसिक प्रवृत्ति के होते हैं।
‘जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन‘- शाकाहार का संबंध सात्विक प्रवृत्ति से और मांसाहार का संबंध तामसिक प्रवृत्ति से है।

ZEAL said...

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@ Irfanuddin-- By the way you were absent on many of my previous posts and suddenly you appeared on this particular post . Why so ?

Did I mention Islam anywhere ?

But there is no doubt that this cruelty is more common in Islam and Muslims are more violent .

Be it Afganistaan, Gaddafi, Taimoorlang, Aurangzeb, Saddam, Osama, Afzal Kasab...or Pakistani.....

Thanks for your visit.

regards,

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ZEAL said...

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@--‘जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन"...

Very well said Mahendra ji.

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चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

ज़रा सोचो....जब सब शाकहारी हो जाएंगे तो सारे जानवरों के लिए चारा कहां से आएगा और मनुष्य क्या चरेगा:) प्रकृति का नियम है बडी मछली छोटी मछली को खाती है, उद्योगपति मज़दूर का खून चूसता है... और यह सिलसिला जारी रहेगा... हमारी सोच के साथ॥

ZEAL said...

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चंद्रमौलेश्वर जी -- इन बड़ी मछलियों को आइना दिखाना भी तो ज़रूरी है न। क्यूँ बना जाए इनका चारा। प्रकृति का संतुलन बना रहे इसलिए लोग खुद तो शाकाहार होने का दम भरते हैं , लेकिन अन्यों के मांसाहार होने की वकालत करते हैं। ...वाह रे स्वार्थ !

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JC said...

हमारे वर्तमान ज्ञानियों की दृष्टि में हमारे मूर्ख पूर्वज मानव जीवन के सत्य अथवा सार ऐसे शब्दों में कह गए, "हरि अनंत / हरि कथा अनंता / कहहि, सुनही बहु विधि सब संता"... अर्थात, जितने मुंह उतनी बातें...किन्तु हमारे पूर्वज शिव को संहार कर्ता भी कह गए, और "सत्यम शिवम् सुन्दरम" भी... बहुत रहस्यमय / रहस्यवाद प्रिय प्रकृति के थे 'प्राचीन हिन्दू'...

आपको कम से कम भागवदगीता का ग्यारहवां अध्याय स्वयं पढना चाहिए, पूरी गीता भले ही नहीं पढो...

उसमें से मैं केवल अर्जुन के कथन, तथाकथित २७ वें श्लोक, का हिंदी रूपांतर उद्घृत कर रहा हूँ -

"धृतराष्ट्र के सारे पुत्र अपने समस्त सहायक राजाओं सहित तथा भीष्म, द्रोण, कर्ण एवं हमारे योद्धा भी आपके विकराल मुख में प्रवेश कर रहे हैं/ उनमें से कुछ के शिरों को तो मैं आपके दांतों के बीच चूर्णित हुआ देख रहा हूँ //...

इस प्रकार अर्जुन ने तो द्वापर युग में कृष्ण से दिव्य चक्षु पा विष्णु को भी कुमाऊं के नरभक्षी बाघों समान मानव-भक्षी पाया!
(और हाल ही में उत्तर प्रदेश के नॉयडा शहर में दो व्यक्ति ऐसी ही प्रकृति के मीडिया में काफी दिनों तक बने रहे थे)...
इस देश में वर्तमान कलियुग में २६ प्रतिशित लोग तो गरीबी रेखा के नीचे माने जाते हैं, और यह प्रतिशत भी वास्तव में शायद इस से अधिक हो सकता है... 'वर्तमान ज्ञानी' मानते हैं की ३२ रुपये में एक व्यक्ति एक दिन की अपनी सब आवश्यकता पूरी कर सकता है शहर में और २७ रुपये में गाँव में !... इत्यादि इत्यादि)...

Rakesh Kumar said...

जब अंत:करण स्वच्छ,निर्मल व सात्विक होता है तभी शाकाहार का महत्व समझ में आता है.

वर्ना जीभ के स्वाद के लिए या अन्य कारणों से
(विशेषकर प्रोटीन की कमी होने का डर)माँसाहार की
वकालत करने में लगा हुआ है.फिर चाहे हिन्दू हो या
मुसलमान,या कोई अन्य धर्मी.

कहीं बकरीद तो कहीं देवी की बलि आदि आदि.
'हिंसा' में भी 'अहिंसा' ही नजर आती है.

मनोज कुमार said...

प्रश्न वाजिब है। लोगों को शाकाहार के महत्व को समझना चाहिए।

सुज्ञ said...

जीवों के प्रति इस करूणामय पोस्ट के लिए अनंत आभार!!

सुज्ञ said...

निलेश माथुर जी,

'मांसाहारी पशुओं' को ही दरिंदा कहा जाता है।

जीव का प्राण हर के उसको भक्षण बना लेने की क्रिया और सोच में सम्वेदना शून्य हो जाना आम बात है।

कईं रिति-नीति परिवेश से मांसाहारी भी मांसाहार इसलिए नहीं कर पाते कि किसी जीव को जान देकर भोजन बनना पडता है, और इस बात मात्र से उनमें भी जगुप्सा पैदा होती है। और वे मांसाहार नहीं करते। सम्वेदनाएं इस तरह जाग जाय तो!!

ZEAL said...

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@ JC जी ,

गीता पढने का क्या लाभ यदि उसमें वर्णित तथ्यों और ज्ञान को तोड़-मरोड़कर "मांसाहार" की वकालत करने में उपयोग किया जाए।

जिस सन्दर्भ में मुख में प्रवेश का जिक्र किया गया है, उसे आपने हिंसा से जोड़कर दर्शाया है , जो अनुचित प्रतीत होता है।

हमारे धर्म में जब दैत्यों और असुरों का प्रादुर्भाव हुआ है तो देवों ने उनका संहार किया है। यदि ऐसा न होता तो उत्पन्न होने वाली अराजकता और पृथ्वी के विनाश का अनुमान लगाया जा सकता है। इस संहार को हिंसा से जोड़ना बड़ा अजीब लग रहा है।

आज ओसामा और कसाब , गद्दाफी आदि तो मारना तो पुण्य का काम है।

लेकिन बिचारे निरीह पशुओं का वध , सिर्फ जबान के चटोरेपन के लिए करना बहुत शर्मनाक बात है।

फिर तो काम-वासना पर संयम न होने की स्थिति में बलात्कार भी justified हो जाएगा ?

किसी भी स्थिति में इश्वर के नाम पर पशु-वध को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रणाम।

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ZEAL said...

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@ राकेश जी ,

बहुत सही कहा। जब तक मन निर्मल नहीं होगा। लोगों को शाकाहार की महिमा समझ नहीं आएगी।

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सुज्ञ said...

अरुण चन्द्र रॉय जी,
चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी,

सभी के शाकाहारी हो जाने से न तो प्रकृति का खाद्य चक्र प्रभावित होगा.
न सारे जानवरों के लिए चारे में कोई कमी आएगी।
यह लिंक देखें……
निरामिष: भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस उद्योग।
निरामिष: यदि अखिल विश्व शाकाहारी हो जाय तो………???

कुश्वंश said...

"बकरी पाती खात है ताकि काढी खाल
जे नर बकरी खात है तिनको कौन हवाल"

मैं शाकाहारी हूँ. सौ प्रतिशत शाकाहारी . शाकाहारी बनिए, अपील ठीक है, माननी भी चाहिए. मगर " दरिंदा" शब्द प्रयोग ठीक नहीं, ऐसी भाषा से बचना चाहिए. और भी है कहने के रास्ते. दिव्या जी कृपया इसे अन्यथा न ले. शुभकामनाओं के सहित

सुज्ञ said...

लुव जी,

पशुओं को चाहना तो है ही, किन्तु दरिंदो को चाहा नहीं जा सकता। पर यदि किसी पशु के पास सद्गुण है तो उस एक सद्गुण को अवश्य सीखा जाना चाहिए।
रावण को मारकर भी राम नें लक्षमण को रावण के पास अन्तिम शिक्षा ग्रहण करने भेजा ही था।

ZEAL said...

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@ कुश्वंश जी ,

अन्यथा नहीं लिया। लेकिन अपनी बात भी स्पष्ट कर दूं। "दरिंदा" शब्द हिंदी शब्दकोष का है। मुझे उचित लगा इसलिए सही परिपेक्ष्य में प्रयुक्त किया।

भाषा का चुनाव बहुत सोच समझ कर करती हूँ। आलेख की डिमांड है इस शब्द का चुनाव।

आभार।

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सुज्ञ said...

इरफ़ानुद्दीन साहब,

जो भी अपने तुच्छ प्रयोजन से जीव हिंसा करता है, हिंसक ही है। जो कोइ भी धर्म या श्रेष्ठ धर्म, बहुसंख्या धर्म या अन्तिम धर्म, अगर उसके उपदेशकों को जीवों के प्रति करूणा न आयी तो कैसा जगत कल्याणकारी धर्म? हिंसा चाहे किसी भी तरह से,किसी भी काल में, या किसी भी स्थान पर हो, हिंसा में धर्म नहीं होता।

हिंसक हिंसक ही होता है, उसका कोई धर्म ही नहीं होता फिर चाहे नाम 'धर्म' ही क्यों न धारण कर ले।

कितने भी तर्कों से हिंसा को प्रोत्साहित और महिमामण्डित करने वाले और अहिंसा को कायरता आदि कहकर हतोत्साहित करने वाले कभी भी शान्ति के साधक नहीं हो सकते।

Atul Shrivastava said...

शाकाहार के लिए प्रेरित करता लेख.....
पर जो मांसाहार भी करते हैं उनको दरिंदा कह देना यह मुझे नहीं जंचा।
मैं मांसाहार से परहेज नहीं करता..... अवसर विशेष पर खाता हूं पर शाकाहार को पहले प्राथमिकता देता हूं......
और हां, मुझमें दरिंदे के लक्षण होने का अहसास तो मुझे अब तक नहीं हुआ..... आपकी पोस्‍ट पढकर भी नहीं....

Human said...

दिव्या जी हर बार की तरह बेहतरीन विषय।आपको बधाई! धृष्टता लगे तो माफ कीजिएगा पर पोस्ट और गंभीर व संयत हो सकती थी क्योँकि जाने अंजाने व्यक्ति,वर्ग,संप्रदाय को केंद्र मेँ रखने से इतना महत्वपूर्णँ मुद्दा लघुता को प्राप्त हो सकता या एक ही दिशा मेँ पड़कर भटक सकता है। मैँ इस बात पर सहमत हूँ कि व्यक्ति को शाकाहारी होना चाहिये। परंतु शाकाहारी व्यक्ति तामसी नहीँ होता इससे असहमत हूँ क्योँकि व्यक्ति के अंदर तामस गुण का संवर्धन मात्र अन्न से ही नहीँ होता। और भी बहुत से कारक है जिनमेँ प्रमुख हैँ रहन-सहन,संगति,परिवेश,नैतिक मूल्योँ पर अमल,प्राथमिकताएँ,संवेदनशीलता,मानवता,समानता की सोच,अहम,नजरिया,धन बल या मान का स्वार्थ इत्यादि।क्योँकि शाकाहारी बुद्धिजीवी वर्ग ने भी संसार, समाज व देश मेँ शांति,सौहार्द लाने का कम प्रयास जो कि हिँसा ही है। बल्कि कई जगह उनके द्वारा हिँसा हुई है।हिँसा के प्रकार भी अलग होते हैँ और रूप भी। हिँसा मानसिक भी होती है और खून खराबे की जगह सरकार का जनता का शोषण करना,मेंहगाई देना,लोकपाल बिल पास न करना,बेईमानी के खिलाफ आवाज उठाने वालो को ही भ्रष्ट घोषित करना अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करना भी हिँसा है और सरकार मेँ ऐसा करने वालोँ मेँ शाकाहारी भी हैं।इनमेँ प्रमुख कारण वस्तुवादिता हम पाएँगे। सिक्के के दोनो पहलू आवश्यक हैँ।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

शानदार
दिव्या दीदी
वनस्पतियों को छोड़कर लाश के टुकड़े खाने में कहीं से भी मनुष्यता नहीं लगती|

दीपावली पर पटाखे न छोड़ने का उपदेश बांटने वाले अनेकों सेक्युलर मिल जाएंगे, किन्तु किसी में इतना दम नहीं कि बकरीद के दिन मुसलामानों से बकरा हलाल न करने की बात कहे|
अनेकों बेगुनाह बकरों को गले पर छूरा रगड़ रगड़ कर, तड़पाते हुए मारा जाता है और सोचते हैं अल्लाह खुश हुआ| हमारी कुर्बानी क़ुबूल कर ली| अरे कुर्बानी ही देनी है तो अपने बच्चों की दो न|

निश्चित रूप से ऐसे लोगों को तुर्किस्तान अथवा पाकिस्तान ही चले जाना चाहिए|

नीलेश माथुर जी, कुश्वंश जी
निश्चित रूप से ऐसे लोगों को दरिंदा ही कहा जाएगा| जो केवल अपने एंजोयमेंट के लिए किसी जीव की हत्या जैसा पाप कर दे, उसे दरिंदा न कहें तो क्या कहें? जो निर्दोष जीवों के गले छूरा रगड़ कर उन्हें दर्द की सीमा टूटने तक तड़पाए उसे दरिंदा न कहें तो क्या कहें?

JC said...

दिव्या जी, मेरा उद्देश्य आपको मांसाहारी बनाने का कदापि नहीं है, अथवा न तो मांसाहारी को ही केवल सही मानने का...
यह तो शायद हर व्यक्ति जानता है कि वो शाकाहारी हो अथवा मांसाहारी, उसके पास धरा पर, किसी एक स्थान और परिवार में जन्म ले, केवल १०० (+/-) वर्ष ही हैं, और वर्तमान में पोथियाँ पढ़ पढ़ चिकित्सक बने व्यक्ति कितना भी जोर लगालें, गोली खिला खिला आपकी जेब में सेंध लगा आयु आपकी बढ़ा भी दें, किन्तु ज्ञान आपका नहीं बढ़ा सकते... और भले ही कितना जोर लगालें आपको अमृत प्रदान नहीं कर सकते, भले ही इस गलत धारणा में अज्ञानियों द्वारा उनको रख कि वो 'भगवान्' हैं...

प्राचीन ज्ञानी केवल सत्य ही नहीं अपितु परम सत्य को पृथ्वी पर अपने सीमित जीवन काल में जानने को ही मानव का उद्देश्य बता गए... और यह भी कह गए कि यदि आप जान गए हैं कि आप स्वयं शिव हैं तो औरों को भी बताएं...
क्यूंकि ज्ञान बांटने से ही बढ़ता है... जबकि करोड़ों रुपया क्यूँ न हो आपके पास, सभी में कर्ण समान बांटने से भी हरेक के पास थोडा थोडा ही पहुँच सकता है, और वो शीघ्र समाप्त भी हो जाता है क्यूंकि जंगल में लगी आग समान ग्रहण करने वाले व्यक्ति में और और पाने कि इच्छाएं भी फ़ैल जाती हैं ... किन्तु व्यक्ति को फिर अपने आप उसे पाने का ज्ञान भी पाना संभव नहीं हो पाता, और वो केवल उसका असंतोष ही बढाता है... जबकि यदि सही ज्ञान अर्जित हो तो प्रत्येक संतोषी व्यक्ति स्वावलंबी बन, शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर सकता है... हम स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व क्या थोड़े में ही नहीं कर रहे थे?

परम्परानुसार मानव को सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है क्यूंकि उसको कर्ता ने अन्य प्राणीयों की अपेक्षा मस्तिष्क में अनंत तक पहुँचने की क्षमता दी है ... किन्तु सब को पता भी है कि हर एक व्यक्ति की अपनी अपनी सीमा भी निर्धारित कर दी गयी है, (पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं हैं}... इसे अनादि काल से चले आ रहे किसी एक अजन्मे और अनंत परमज्ञानी जीव द्वारा रचा गया जाना गया है... और ज्ञानी उसे शून्य काल और स्थान से सम्बन्धित, तथाकथित 'महाकाल', द्वारा अनंत काल-चक्र द्वारा निर्धारित भी कह गए... और उसकी प्रकृति जान उसे, अर्थात सम्पूर्ण ज्ञान को, अभ्यास द्वारा 'अंतर्मुखी' हो, मानव शरीर में भंडारित भी जान गए... किन्तु, यह भी कह गए कि प्रत्येक व्यक्ति को उसे पाने हेतु प्रकृति / गुरुओं से ही सीखना आवश्यक है...

और कोई भी गुरु, अर्थात किसी व्यक्ति विशेष से अधिक ज्ञानी अथवा अनुभवी, उसके मस्तिष्क में सम्पूर्ण ज्ञान वैसे ही नहीं लोड कर सकता, अर्थात भर सकता है, जैसे हम और आप गाडी में पैट्रोल भरते हैं, अथवा मानव संसार द्वारा निर्मित कंप्यूटर में कुछ सूचना अथवा कोई सोफ्टवेयर आदि...

मेरा उद्देश्य केवल आपको एक सिस्टम एनालिस्ट समान पृथ्वी के सत्य और स्वयं अपने सत्य को जानने का प्रयास करने का है... आप भारत में ही घूम लीजिये तो पाएंगे, उदाहरणतया, नागालैंड में कीड़े मकौड़े के साथ साथ कुत्ते का मांस भी चाव से खाते हैं, दक्षिण में कई जन जातियां हैं जो किसानों के लिए चूहे पकड़ते हैं और उन्हें खा अपनी जठराग्नि शांत करते हैं, जबकि राजस्थान में करणी माँ के मंदिर में उन्हें पूजा जाता है!... इत्यादि इत्यादि

बहुत से ग्रन्थ हैं, गीता केवल इस लिए कहा था क्यूंकि आप जन्म से 'हिन्दू' हो... नहीं तो कुरआन, गुरु ग्रन्थ, बाइबल पढने को कहता...

खैर, कहावत भी है, "सीख उसी को दीजिये, जाको सीख सुहाए"...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

विचारणीय!

vishwajeetsingh said...

मांसाहारी पशुओं को दरिंदा कहा जाता है , तो जो मानव पशुओं की हत्या कर प्राप्त कर प्राप्त की गई लाश को या मांसाहारीयों की सभ्य भाषा में मांस को खाता है तो उसे दरिंदा क्यों न कहा जाये ?
मानवता को समर्पित इस करूणामय पोस्ट के लिए सादर आभार ।

ZEAL said...

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@ Human --

हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपना बेस्ट करता है। मैं अपनी प्रत्येक पोस्ट में आपनी तरफ से बेस्ट ही करने की कोशिश करती हूँ। सफल भी रहती हूँ। अपनी बात लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ, और वह पहुँचती भी है।

जिन्हें मेरी भाषा से आपत्ति है । उसका खेद है। मैं ऐसी ही हूँ। बहुत प्रयासों के बाद खुद को ऐसा बना सकी हूँ। सत्य और स्पष्ट लिखने की ताकत पैदा की है। ताकि गोल-मोल जलेबीदार न लिखूं ।

आपने अपनी टिप्पणी में लिखी धृष्टता की माफ़ी मांगी है। तो हमने माफ़ किया। हर किसी को अपना लिखा हुआ ही सही लगता है। दूसरों की भाषा असंयत लगती है। अतः आप वैसा ही लिखिए जैसा आप सोचते हैं। मुझे बुरा लगेगा इसकी चिंता छोड़ दीजिये।

जैसे मैं इस बात की चिंता नहीं करती की कौन बुरा मानकर मेरे आलेखों पर टिप्पणी करना छोड़ देगा। मेरा उद्देश्य है अपनी बात को लिखना और बहुत से पाठकों पर उसका सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है।

अब किसी वर्ग विशेष को बुरा लगता है तो उनकी खातिर सच को लिखने से परहेज क्यूँ करूँ ? किसी की चापलूसी के लिए तो आलेख नहीं लिखती हूँ न।

मक्खन-मलाई वाली भाषा से तो ब्लौगजगत भरा पड़ा हैं। अच्छे लोगों की संख्या हमेशा ज्यादा ही रहती है। और है भी हिदी ब्लौगिंग में भी। एक दो लोग मेरे जैसे अशिष्ट हो भी जायेंगे, तो क्या बिगड़ेगा।

मुझे प्रवचन करना अच्छा नहीं लगता। विषय पर स्पष्ट आलेख लिखती हूँ और विषय प्रधान आलेखों पर सकारात्मक टिप्पणी भी लिखती हूँ।

जो लोग मुझसे द्वेष रखते हुए अथवा बुरा मानकर ZEAL ब्लौग से पलायन कर गए। उनकी सुविधा के लिए मैंने भी उनका त्याग कर दिया। क्यूंकि जियो और जीने दो में विश्वास रखती हूँ।

टिप्पणीकारों की अनुपस्थिति में भी लेखन जारी रहेगा, क्यूंकि लेखन पाठकों के लिए होता है , टिप्पणीकारों के लिए नहीं।

भाषा का चुनाव सोच समझ कर ही करती हूँ , अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार। कभी संत बनने और प्रवचन करने की कोशिश नहीं की। क्यूंकि हमारे देश में जो बहुतायत में उपलब्ध हैं, वे हैं प्रवचनकर्ता।

इस आलेख का उद्देश्य है शाकाहार की महत्ता पर बल देना और निरीह पशुशों को "हलाल" करने की हिंसक प्रवृत्ति से लोगों को बचाना। न की भाषा पर विमर्श।

इस आलेख से प्रेरित होकर यदि 'एक' व्यक्ति भी मांसाहार करना छोड़ दे तो लिखना सफल है।

जो पाठक आलेख में छिपे सन्देश को ग्रहण कर रहे हैं उनका आभार।

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ZEAL said...

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@--खैर, कहावत भी है, "सीख उसी को दीजिये, जाको सीख सुहाए"..

JC ji , thanks for the certificate. Your message has been conveyed fuully. Regards,

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Rakesh Kumar said...

आज से कई सौ बरस पहले सन्त कबीरदास जी,जिनका सम्मान हिन्दू
मुस्लिम सभी करते थे,जिनकी वाणी गुरुग्रंथ साहिब में भी संकलित है,ने कहा है:-

काटा कूटी जे करै, ते पाखण्ड का भेष
निश्चय राम न जानही,कहैं कबीर सन्देश

कबीर जी यह सन्देश कहते हैं कि जो जीव हत्या करते हैं वे पाखण्ड
वेशधारी हैं.निश्चित रूप से वे 'राम' को नही जानते.

मुलना तुझे करीम का, कब आया फरमान
दया भाव हिरदै नही ,जबह करई हैवान

हे मौलवी साहब! मेहरबान अल्लाह तआला का कब तुझे
फरमान आया कि 'कुर्बानी कर!'(जीव हत्या कर),अरे
हैवान तेरे जिगर में दर्द नही है,जो लाचार मूक प्राणियों
की हत्या करता है.

शाकाहार का सम्बन्ध दिल और दिमाग दोनों से है.स्वामी
विवेकानंद जी भी कभी मांसाहारी थे.लेकिन उन्होंने भी लिखा
है कि जैसे जैसे हृदय अध्यात्म से पोषित हो निर्मलता
और स्वछता ग्रहण करता जाता है,स्वयं ही शाकाहार अच्छा
लगता है,माँसाहार से घृणा होती है.शाकाहारी होना मनुष्य के
आध्यात्मिक विकास की ओर एक कदम है.

अज्ञानी शाकाहारी हो सकता है तमो गुण से ग्रस्त हो जाये,हिंसा भी करता हो,लेकिन जैसे ही सद् ग्यान का अंकुर उसके हृदय में पल्लवित होगा,वह तेजी से अध्यात्म में विकास करेगा.परन्तु,माँसाहारी को इसके लिए एक न एक दीं माँसाहार छोडना ही पड़ेगा.वर्ना ईश्वर को जानना और अनुभव करना नामुमकिन ही है.

JC said...

'मैं' कौन हूँ अभी पूरी तरह से जानना शेष है, यद्यपि मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि मैं भी शिव ही हूँ, अर्थात मेरे भीतर भी शिव का निवास है... मैंने तो केवल अपने पूर्वजों के द्वारा कहे गए सार को दोहराया था... क्यूंकि मेरा यह भी मानना है, "करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान / रसरी आवत जात पर सिल पर पडत निशान"!
राजा विश्वामित्र भी अंततोगत्वा महर्षि बन गए! वाल्मिकी डाकू भी, जिन्होंने संस्कृत में रामायण लिखी और एक मान्यता यह भी है कि उसे उन्होंने राम के जन्म से पहले ही लिख लिया था - ज्योतिष ज्ञान के आधार पर! इत्यादि इत्यादि...अनंत तक :)

रविकर said...

रवि को रविकर दे सजा, चर्चित चर्चा मंच

चाभी लेकर बाचिये, आकर्षक की-बंच ||

रविवार चर्चा-मंच 681

S.N SHUKLA said...

सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति , बधाई.

निर्मला कपिला said...

चलो शुक्र है हम मास नही खाते । कम से कम खुद को इन्सान तो कह सकते हैं। शुभका.

DUSK-DRIZZLE said...

SAMJH MAIN NAHI ATA MANUSYA PET KO KABRISTAN KYO BANANA CHAHATA HAI

ZEAL said...

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@ JC जी ,

इस संसार में जो भी घटता है , वह सब हरी इच्छा से ही होता है। हम सब तो मात्र रंग मंच के कलाकार हैं। भगवान् ने जितनी बुद्धि से नवाजा है , बस उतना ही सोच पाती हूँ और लिख पाती हैं।

हे ईश्वर- तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा....

साधारण मनुष्य अपने-अपने तराजू में नित्य मुझे तोलता है , लेकिन मेरे कर्मों का असली लेखा-जोखा तो सदा शिव ही रखते हैं। पाप और पुण्य का फैसला उसी सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता के द्वारा होगा।

फिरहाल तो ईश्वरीय इच्छा से लेखन जारी है। बाधाएं तो बहुत आयीं , लेकिन तोड़ नहीं सकीं।

हर हर महादेव !

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ZEAL said...

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addressing a well wisher ---

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प्रियवर मेरे तुमने मुझको , आशीर्वाद दिया था बढ़ने का
पावन अपनी लेखनी से , नया-नया कुछ गढ़ने का
धारदार हो कलम हमारी , आशीर्वाद तुम्हीं से पाया है
क्यूँ फटकार दिया तुमने, सब व्यर्थ हुआ , सब जाया है।

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रचना said...

good post

ashish said...

मै तो घास -फूस भक्षक हूँ . बढ़िया सीख देता आलेख .

सुज्ञ said...

जे सी + साहब,

@अर्जुन के कथन, तथाकथित २७ वें श्लोक………

जे सी + साहब,

कृष्ण मुख में सभी का जाना, अच्छे बुरे सभी के गति-विलय का प्रतीक है। उपरोक्त घटना कृष्ण के आहार से सम्बंधित नहीं है, जो उसे आप आहार प्रयोजन के सन्दर्भ में जोड़कर देखें।

@मेरा उद्देश्य केवल आपको एक सिस्टम एनालिस्ट समान पृथ्वी के सत्य और स्वयं अपने सत्य को जानने का प्रयास करने का है... आप भारत में ही घूम लीजिये तो पाएंगे, उदाहरणतया, नागालैंड में कीड़े मकौड़े के साथ साथ कुत्ते का मांस भी चाव से खाते हैं, दक्षिण में कई जन जातियां हैं जो किसानों के लिए चूहे पकड़ते हैं और उन्हें खा अपनी जठराग्नि शांत करते हैं, जबकि राजस्थान में करणी माँ के मंदिर में उन्हें पूजा जाता है!.

जे सी + साहब,

साहब, यह धरा कभी भी माँसाहारियों से रहित नहीं रही, इस सत्य को हम भी जानते है। वेद काल में भी मांसाहारी तो रहे ही होंगे, तभी तो हिंसा से बचने के उपदेश दिए गए!!

प्राकृतिक प्रबंध में मांस मानव का आहार नहीं रहा, पर एक विकृति के रूप में उसके आहार में सम्मलित है। मानव ने विकास के साथ साथ अपनी आहार आदतों का भी ऐसा ‘विकास’ कर लिया कि वह कुछ भी खा पचा सकता है। यहां तक कि हम कई विचित्रताएं देखते है, मानवों को कांच पत्थर मिट्टी खाते, चबाते और पचाते देखते है। यदि लोग अपने जठर को इसके अनुकूल बना भी ले तो उसका यह अर्थ नहीं हो जाता कि निम्न वस्तुएं मानव आहार है।

मांसाहार, समाज की एक सच्चाई है किन्तु तजनीय। और विकृति कुरीति के निकंदन के इसी उद्देश्य से दिव्या जी का यह लेख यहां है।

उसी तरह यदि बहुसंख्य लोग भी किसी विकृत-आहार के अभ्यस्त हो तो किसी भी दृष्टि से उसे योग्य नहीं कहा जा सकता। अर्थात् बहुसंख्य द्वारा प्रयोग अथवा किसी रीति का प्रवर्तमान होना, उस रीति को अनुकरणीय नहीं बना देता।

Luv said...

@sujya ji,

Bilkul sarji, aakhir pashuon ke bhi apne vichaar hote hain, we bhi soch-samajh kar hi faisle lete hain.

waise saaf kar dun ki main bhi shakhahaari hone ka samarthak hun. main ye bhi manata hun ki agar hamen doodh ki aawashyakta hoti to prakrati ne kuchh aisa kiya hota ki sthanon men umra bhar doodh hota.

main umeed karta hun ki aap sab bhi pashuon ka doodh peene ke khilaaf honge. khaastaur par mahendra verma ji, theek kaha na maine?

@zeal

bilkul yahan Islam ki baat nahin ho rahi - bakreed se aapka matlab Thanksgiving se bhi ho sakta tha aur durga pooja se bhi. sahi kaha na maine?

And, correlation always implies causation, isn't that so?

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

सरकार ने इस विषय पर संवैधानिक सहमति दे रखी है यदि आप हिंदू हैं और धार्मिक कृत्य की आड़ में किसी मंदिर या अपने घर में निरीह पशु की बलि दे देते हैं तो आपको दंड का पात्र माना जाएगा लेकिन यदि आप मुस्लिम हैं तो आपके "नागरिक अधिकार" बदल जाते हैं। हमारा भारत देश एक कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है परन्तु संविधान ही हमें इस तरह बाँट रहा है। कुछ महातार्किक शरीफ़ विद्वान तो ये कह रहे हैं ब्लॉगिंग में कि दूध भी तो खेती से प्राप्त नहीं होता वह भी तो "एनिमल प्रोडक्ट" है तो इन जड़बुद्धि उदरपरायणों को एक ही उत्तर की माँ का खून पीने और दूध पीने में अंतर समझ लो तो तुम भी राक्षसों से अलग दिखने लगोगे हम इन्सानों की तरह।
"पशु क्रूरता विरोधी अधिनियम" के विषय में जब मैंने मेनका बाई गांधी से बात करी जो कि इस मामले की ठेकेदार हैं और सरकारी पैसा अपने एन.जी.ओ. के द्वारा बेरोक टोक डकार रही हैं तो उन्होंने चिरचुप्पी साध ली।
जो भी लोग प्रकृति के भोजन चक्र का संदर्भ लेकर ये कहते हैं कि यदि मनुष्य शाकाहार या दुग्धाहार अपना ले तो वह असंतुलित हो जाएगा तो ऐसे तर्क करने वाले कदाचित ये मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण-संतुलन ईश्वर नहीं बल्कि मनुष्य कर रहे हैं। प्रकृति स्वयं संतुलन कर लेती है इतना तो किसी जड़बुद्धि को भी आप समझा सकती हैं लेकिन दुराग्रही को नहीं। एक बंदे ने तो इसे इस्लाम पर हमला मान कर आपको प्रवचन दे डाला उससे निवेदन है कि वह मुझसे मुखातिब होकर इस्लाम की चर्चा करे। शायद वो महाशय इरफ़ान डॉ.ज़ाकिर नाइक की बेवकूफ़ियों से प्रभावित हैं जो कि कहता है कि हलाल होते समय पशु दर्द महसूस करने की बजाए आनंद का एहसास करता है मैं चाहता हूँ कि एक बार मौका लगे तो इसे प्रायोगिक तौर पर समझाऊं कि दर्द और आनंद क्या होता है।
कोई माने न माने पर जब गाय, बैल, भैंस, मुर्गा, बकरा आदि खा खा कर तमाम बीमारियों से पीड़ित मरीज़ मेरे पास आते हैं और मात्र आहार संयम व कुछ आयुर्वेदिक औषधियों से सहज ही स्वस्थ हो जाते हैं तो सारे तर्क भूल जाते हैं क्योंकि कोई पित्त वृद्धि से होने वाली भयंकर बीमारियों से तिलतिल कर मरना नहीं चाहता है, उच्च रक्तचाप, अल्सर आदि के मरीजों में अक्सर मुझे माँसाहारी मिले हैं आहार तालिका के अनुसार।
भइया

aarkay said...

विशुद्ध शाकाहारी हूँ, तथा आपकी बात का पूर्णतय : समर्थन करता हूँ. प्रख्यात आयरिश नाटककार बर्नार्ड शौ , जो स्वयं शाकाहारी थे , का कहना था " मेरा पेट , पेट है, कब्रिस्तान नहीं " . हिंसा किसी भी रूप में मान्य नहीं. परन्तु सब शाकाहारी बन जाएँ , यह भी संभव प्रतीत नहीं होता. वध किया जाना ही शायद इन निरीह पशुओं की नियति है .
विचारणीय विषय पर एक सार्थक आलेख, बधाई !

ZEAL said...

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@Luv --

आपकी बेशर्मी भरी टिप्पणी यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ , ताकि लोगों को आपकी पहचान हो जाए।

आप इस दरिंदगी के समर्थक हैं तो रहिये। रोका किसने है आपको , करिए मांस-मदिरा भक्षण। आपका आहार आपकी पहचान है।

लेकिन ज्यादा व्यंगात्माक और बदबूदार टिप्पणी करने की ज़रुरत नहीं है। विषय पर अपने विचार रखिये और शराफत से विमर्श का हिस्सा बनिए। अनावश्यक विवाद करने की ज़रुरत नहीं है। विवाद करने के लिए और मांसाहार को बढ़ावा देने के लिए अपने ब्लॉग -स्पेस का उपयोग कीजिये। यहाँ कुरुक्षेत्र बनाने की ज़रुरत नहीं है।

इससे विषय के आगे बढ़ने में व्यवधान उत्पन्न होता है। आशा है आपकी समझ में बात आ गयी होगी।


लेख के tag में "बकरीद" शब्द है क्यूंकि बकरीद पर सबसे ज्यादा animal slaughter होता है। धर्म के नाम पर ऊंट, और गाय काटते हैं । शर्म भी नहीं आती इनको। भारत देश में रहकर हमारे ही देश की सभ्यता को नकारते हैं । गाय जिन्हें हम पूजते हैं , उनका वध करते हैं ये निराधम पशुवृत्ति वाले मुसलमान।

सरकार के दोहरे चरित्र वाली नीति के कारण ही ये लोग इस कुकृत्य को खुलेआम अंजाम देते हैं।

अरे त्यौहार ही मानना है तो मेवे-मिष्ठान , सिवयीं और पकवान के साथ मनाओ ...बेचारे बेजुबान पशु को मारकर कौन सा पुण्य कमाते हैं ये लोग।

साकार को चाहिए की वो मुसलामानों को अल्पसंख्यक का आरक्षण न दे, बल्कि , विलुप्त हो रहे निरीह पशुं को संरक्षण दे।

ये बेजबान पशु विभिन्न प्रकार से हमारी सेवा करते हैं और 'नर' के वेश में राक्षस बने इनको हलाल करते हैं। धिक्कार है।

जो लोग हिंसक हैं और हलाल करते हैं उन्हें चाहिए की वे हिंसक पशुओं को हलाल करें और खाएं जैसे बाघ, चीता आदि । एक बार ये लोग ऐसा कर के तो देखें , या तो बाघ ही इन्हें निपटा देगा या फिर सरकार "बाघ बचाओ" अभियान बंद कर देगी, ताकि हिंसा पनपती रहे।

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रही बात हिन्दुओं के मासाहारी होने की तो यह आलेख मुख्यतः उन्हीं के लिए है। अपने हिन्दू भाई बहनों से निवेदन है की मांसाहार न करें । पशुओं की निर्मम हत्या का कारण न बनें। अंध विश्वास के चलते पशु बलि न दें।

एक पढ़ा-लिखा हिन्दू अंध विश्वास के तहत पशु-बलि नहीं देता , लेकिन इस्लाम में पशु-बलि युगों से अनवरत जारी है। शिक्षा इनके मन में दया और चेतना नहीं जगा पाती।

पशुओं की लाश खाकर इंसानियत को शर्मसार न करें।

जब जागें तभी सवेरा। यदि आप मांस भक्षण करते हैं तो अबसे छोड़ दें। सात्विक खाएं और निर्मल मन रखें।

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ZEAL said...

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@ aarkay Sir ,

Nothing is impossible on this earth. "Where there is will , there is a way"

regards,

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प्रदीप श्रीवास्तव said...

bahut sahi likha hae aap ne,

iske liye aap sadhuvad kii patr haen

ZEAL said...

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आजकल KFC का फैशन आ गया है। विदेशों से चलकर ये नासूर अब भारत की सात्विक भूमि को दूषित कर रहा है। KFC जाकर चिकन खाने वालों को शायद ये नहीं मालूम की इन मासूम मुर्गों को कितनी बेरहमी से छील कर , इनके पंख उखाड़कर इनको बड़ा किया जाता है , इन्हें इंजेक्शन दिया जाता है , ताकि ज्यादा से ज्यादा मांस हो सके इनके शरीर में और दरिन्दे इस मांस द्वारा ज्यादा से ज्यादा पैसा कम सकें।

हे भारतभूमि के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों, ...सदी-गली लाशें और बीमार पशुओं का सेवन बंद करो । स्वयं को बचाओ, शारीरिक और मानसिक व्याधियों से।

मत करो हलाल उनको ,जिनका खून भी लाल है हमारी तरह।

पशुओं के हलाल से इंसानियत शर्मसार होती है।

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सञ्जय झा said...

yadi is baat ko 'dharm/jati/nasla' se pare manusyata ke star par dekha jai to 'mansahar'.....
nikhidd mana jata hai/jata rahega.......

padhe likhe logon ko itna 'advantage' to milta hi
hai ke o nakartmak pravrittiyon ko bhi sakaratmak
roop se bhashit kare.........

pranam.

JC said...

@ हंसराज जी 'सुज्ञ', मेरा भी यही मानना है कि हमारे कथा कहानियों को लाइन के बीच पढने की आवश्यकता है...
यदि नाद बिंदु, परमात्मा, विष्णु/ शिव, शून्य काल से सम्बंधित है तो इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि और उसका संहार भी शून्य काल ही में हो जाना वास्तविकता है...

तो फिर ईश्वर की तथाकथित 'माया' का वो अर्थ भी संभव है जैसा 'मायावी फिल्म जगत' के माध्यम से रुपहले पर्दे पर दीखता प्रतीत होता है... अर्थात प्रकाश पुंज के एक स्रोत से निकलती किरणों के सामने निर्धारित गति से घूमती, पहले से ही लिखी कहानी के आधार पर नकली पात्रों द्वारा अभिनय कर फिल्माई रील से गुजर पर्दे पर अंधकारमय हौल में हाथ पर हाथ धरे दर्शकों को दुःख-सुख आदि अनुभूति होने पर रोना अथवा प्रसन्न होना आदि आदि... जिसका दर्शक स्वयं शिव / विष्णु ही है जिसके चारों ओर तथाकथित आँख और मुंह हैं... और जिसका मॉडेल अथवा प्रतिरूप मानव है और रोम-कूप उसके आँख-मुंह जिसमें शक्ति रुपी आत्मा का प्रवेश हो रहा है...

कुश्वंश said...

दिव्या जी आभार, आपकी भाषा शैली और उठाये गए विषय की गंभीरता के लिए मैं सदैव आपके लेखन का कायल हूँ और आशा भी करता हूँ की आप निरंतर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे लेखों से निरंतर समाज को जाग्रत करेंगी. इस लेख से शाकाहारी बनो का सन्देश फैले मई भी इस अभियान में आपके साथ हूँ. मांसाहार निश्चित रूप से निंदनीय है और हमारी पावन सभ्यता के लिए एक कलंक. निरीह जीवों को खाने के लिए मारना निश्चित रूप से अशोभनीय कार्य है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए. "दरिंदा" हालाँकि बेहद उचित शब्द था वर्णित अमानवीय कृत्य के लिए मगर आपके ब्लॉग पर पुनः अपशब्द आरोप प्रत्यारोप नहीं देखना चाहता था ..बस मेरा इतना सा मंतव्य था . दिव्या जी आप यूं ही बेबाक लिखती रहे शुभकामनाये.

यशवंतसिंह शेखावत said...

आपका यह सन्देश अच्छा है | शाहकार भोजन किया जाना और स्वस्थ बने रहना_सात्विकता है |

सामान्य व्यक्ति को जीवन में शाहकार भोजन किया जाना ही उतम है

*

व्यक्ति को अपने स्वभाव को जानते हुए किस तरफ क्या और कैसे करना है या क्या कर सकता है__उसके शारीर के अन्दर किन रशायनों का प्रभाव अधिक या कम है__रशायनों के अधिक या कम के प्रभाव द्रष्टिगत और व्यवहारिक रूप से किये जाने वाले कर्म के द्वारा सरलता से सफलता प्राप्त करने के लिए आहार से संतुलित किया जाना आवश्यकता का अंग भी मानी हो सकता है |

*

विशेष मज़बूरी में किसी भी प्रकार का भोजन धर्मसंगत माना जा सकता है | विशेष मज़बूरी में एक ऋषि ने भी कुते का मांस भक्षण किया था |

*

दूध से निर्मित दही का सेवन शाकाहारी व्यक्ति भी करते है जबकि उसमें भी जीवाणु होते है |

*

आयुर्वेद में लगभग १८ प्रकार के खाद्द योग्य मांस का वर्णन किया हुआ है | "आह जिन्दगी" में इस क्रम में ४-५ वर्ष पहले एक लेख (विनोद वर्मा का) लेख भी छपा था |

*

सामान्य-जन के जीवन को मांसाहार के विषय से जोड़कर नहीं देखना चाहिए | वेदों के ज्ञान की तरफ जायेगें तो ज्ञात होगा कि किसी विषय, किसी समय, किसी क्रिया, क्यूँ, क्या, किन्तु, परन्तु आदि जोड़कर नहीं चला जाना चाहिए |

*

मेरा व्यक्तिगत मत है कि कुछ विषयों को संवाद का विषय नहीं बनाना उचित रहता है |

सुज्ञ said...

लुव साहब,

मित्र व्यंग्य भी करो तो जरा ढंग से ही कर लिया करो…
आपके हिसाब से पशुओं में सोचने समझने की शक्ति नहीं होती? तो तुलना कुत्ते से ही करलो, मालिक के प्रति वफादार होता है, क्या बिना सोचे समझे ही वफादार हुआ जा सकता है।

पशु आहार पाने की आशा में पालतु बनते है। आज्ञा का पालन करते है। वे सोचते है, सम्वेदनशील भी होते है इसिलिए मात्र खाने के एवज में गुलाम बन जाते है।
वैसे आप होंगे शाकाहारी, पर शाकाहारी होना और अहिंसावादी, जीवदयावादी होना दोनों अलग अलग बातें है। अहिंसा मनसा, वाचा, कर्मणा पाली जाती है। यदि आपके किन्ही वचनों से हिंसा को प्रोत्साहन मिला तो आपकी अहिंसा निर्थक हो जाएगी।
रही बात स्तनों में सर्वदा दूध की बात तो मित्र! यदि दूध ही मात्र मानवीय आहार होता तो प्रकृति निश्चित ही सदैव दूध उपलब्ध करवाती। नवजात की वृद्धि के लिए इतना दुग्धाहार काल जरूरी है, मिलता ही है।
दूध अपने आपमें सम्पूर्ण आहार होते हुए भी पोषण के लिए पोषण तत्व अन्य शाकाहार में उपलब्ध है। व्यस्क शरीर अन्य शाकाहारी पदार्थों से पर्याप्त मात्रा में केल्शीयम,प्रोटीन और वसा पा सकता है।

और पोषण के लिए दूध पाना अहिंसक है। जबकि मांसाहार से उसकी तुलना निर्थक है।

Rajesh Kumari said...

divya mere man ki baat likhi hai kahi baahar jaane ke karan pichli post nahi padh paai.sabhi padhne ki koshish karungi.is post me aapko bahut tark vitark karne vaale log milenge sab tippani baad me padhungi.abhi apne man ke bhaav rakh rahi hoon main bhi poorntah vegeterian hoon.is liye maasahaar ko galat thahraati hoon.par kya karen sabki apni apni soch apna swaad logo ka bas chale to insaano ko bhi markar kha jayen.you tube me china ke logon ko aborted fetus ka soop bhi peete dekha.kya yese logon ko insaan kahna uchit hoga??

सुज्ञ said...

@विशेष मज़बूरी में किसी भी प्रकार का भोजन धर्मसंगत माना जा सकता है | विशेष मज़बूरी में एक ऋषि ने भी कुते का मांस भक्षण किया था |

यशवंतसिंह जी,

मज़बूरीवश, मनोबल की कमी, और मिथ्याधारणा का आगमन तो कभी भी कहीं भी हो सकता है, ऋषि भी इसके अपवाद नहीं है। लेकिन कहीं भी यह निर्दिष्ट नहीं है कि पतन का अनुगमन जरूरी हो।

दूध से निर्मित दही का सेवन शाकाहारी व्यक्ति भी करते है जबकि उसमें भी जीवाणु होते है |

यशवंतसिंह जी,

वैज्ञानिकों नें कहा दही बैकटेरिया से बनता है। बैकटेरिया कहीं भी नहीं बताया कि बैकटेरिया जीव होते है। जिवाणु, बैकटेरिया के लिए हिन्दी का प्रयुक्त शब्द है। विज्ञान को अवसर देना होगा कि बैकटेरिया में जीवन(प्राण) साबित हो।

सदा said...

बेहद सार्थक व सटीक लेखन ...।

सुज्ञ said...

मांसाहारी शाकाहारी और सम्वेदनाएँ

सम्वेदनाओं की बात करें तो माँसभक्षी भी जब माँसाहार करता है, एक क्षण के लिए ही सहीं, एक विचार तो कौंधता ही है कि यह जो मेरा भोजन है यह किसी जीव की जान लेकर प्राप्त हुआ है। यही क्षण सम्वेदना महसुस करने का होता है। लेकिन हमनें अपनी सम्वेदनाओं को बार बार हिंसा से और हिंसक विचारों से इतना कुंद कर दिया होता है कि जैसे ही वे सम्वेदनाएं सिर उठाने को होती है हम उस विचारमनन को इग्नोर करके, उस परप्राणी वेदना को अकाल ही कुचल देते है। इसी कारण व इसी तरह सम्वेदनाओं का क्षरण होता है।

वैज्ञानिकों का यह स्पष्ट अभिमत है कि हमारी भावनाओं आवेगों आवेशों को कोई न कोई काया-रसायन सक्रिय करते है। जिन्हें हम हर्मोन्स कहते है। हमारे अतिशय क्रोध में रक्त दबाव का बढना, शरीर का कांपना, मस्तिक्ष का कुंद हो जाना आदि क्रियाएं देखी जाती है। जो रसायन सक्रियता से होता है। हमें आवेशित करने वाले रसायन का स्राव यदि हमारी स्रावग्रंथियो से न हो तो हमारे व्यवहार में आक्रोश कम दिखाई देता है। यदि ज्यादा हो तो आक्रोश भी ज्यादा। जिसे हम सामान्य भाषा में ‘खून में उबाल आना’ कह सकते है। वस्तुतः वह हमारे खून में मिले, आवेश को उक्साने वाले हार्मोन की मात्रा होती है।

अब बात करते है आहार से इन हार्मोन प्रभाव की। मांस प्राप्त करने के लिए जब प्राणी की हत्या की जाती है। निसहाय पशु मरणांतक संघर्ष करता है। जैसे भय, विवशता, दुख, हर्ष, विषाद, तनाव के समय प्रत्येक जीव के शरीर में उन भावनाओं को सहने योग्य अथवा प्रतिकार करने योग्य रसायनों का स्राव होता है। उसी प्रकार प्राणी भी मरने से पहले भयभीत होता है, जीवन बचाने की जिजीविषा में संघर्ष करता है। तड़पता है। उसके शरीर में भी उसी तरह के हार्मोन्स का स्राव होता है जो खून की सहायता से क्षण मात्र में मांस में शोष लिया जाता है। उन हार्मोन्स का कार्य है आवेश क्रोध आदि पैदा करना है। इस प्रकार कत्ल हुए प्राणी का मांस जब आहार द्वारा मनुष्य शरीर में पहुँचाता है। वे पशु उपार्जित हार्मोन्स भी सक्रिय होते है। और मांसाहारी विभिन्न आवेशों को महसुस करता है। वे आवेश एक क्षण के लिए उसे नशे की तरह स्फूर्तिवर्धक लगते है। उसी तरह उन हार्मोन प्रभाव से मानवीय सम्वेदनाओं में कमी आना और आवेश आक्रोश में वृद्धि होना तर्कसंगत प्रतीत होता है।

अन्य कारणों में, आहार के स्रोत का चिंतन, क्रूरता व निर्दयता के विचार, मांसाहारी के शरीर में भी उसी प्रकार के हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाएगा ही। और उसका प्रभाव व्यवहार वर्तन में प्रकट होना अवश्यम्भावी है।

अहिंसा : सहजीवन सरोकार, विवेकी सम्वेदनाएं और संयम ही संस्कृति है

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

शाकाहार सर्वोत्तम आहार है , इसमें दो राय नहीं |

ZEAL said...

A letter written by Ashoo Mongia--

Subject: An appeal to ensure the complete prohibition upon Cow Slaughter abiding by the existing rules and regulation in force in different states in India along with the strict direction of Hon’ble Supreme Court of India.

Madam/Sir,

Under the laws enforced in this land with a wide view to natural justice to all creatures, honoring the Sanatani tradition of venerated Cow progeny even as non hittable (aghna), respecting the Cow as Go-Mata in highest esteem in the traditional scriptures, contemplating the importance of Cow progeny in Indian agriculture, health, medicines and economics based upon its blessings upon us and obviously to be humane by resisting the animal cruelty, most of the states have been formulated its own rules and acts in favor of banning Cow Slaughter even in Bakri Idd.
But, very unfortunately going to the utter contradiction to the above, in most of the cases Cow progeny are being slaughtered very cruelly in a disgusting gruesome way, sometimes with the help of local administration and politics, only to appease a minority section hurting the majority by violating all the norms so framed by the states very illegally, unreasonably and undemocratically. Though all the Hindu, Sikh, Jain, Buddhists, Arya Samajists and the Sanatani and Vedic followers want a total ban on cow slaughter in Bharat, as a matter of humiliation of all Bharat Dharma, the rampant cow slaughter is going on violating all the norms in force.
As an example, the state of West Bengal, now Paschimbanga had given permission in the last year to slaughter Cows in Bakri Idd under the section 12 of the WB Animal Slaughter Control Act 1950, very intrigue-fully going against the verdicts of Hon’ble Calcutta High Court and the Hon’ble Supreme Court of India.
It is a wide known fact that being aggrieved Sri Kedar Nath Brahmachari and 26 others filed a petition against the State of West Bengal and 20 others for which Hon’ble Calcutta High Court passed an order to ban cow slaughter even in Bakar Idd, vide 1982(2) Kokata, HN dated 20.8.1982.
The State of West Bengal filed an appeal in Supreme Court of India against the above order of Calcutta High Court vide CA 6790/1983 – State of West Bengal & Others. –vs– Ashutosh Lahiri & Others. for which the Hon’ble Supreme Court maintained the order of Calcutta High court to prohibit the Cow slaughter in Bakri Idd as such slaughters being unconstitutional and directed the State to take measures to stop such illegalities.

Continued...

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ZEAL said...

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Despite of that in West Bengal and other States at least 30 lakhs (5 lakhs in West Bengal) healthy, milky, cultivating and capable Cow progeny are slaughtered very unfortunately within a political nexus of Chairman, Sabhapati of Panchayet Samity and the official authorities in various departments.
As aggrieved by the gross violation of the Slaughter Control Act enforced in different States time and again and felt detrimental to the majority Hindu sentiment in general, various forums filled many petitions in the designated Courts for getting justice to stop cruelty upon animal and especially mentionable the petitions filed in the Honb’le Calcutta High Court by Akhil Bharat Krishi Go Seva Sangha, Arya Pratinidhi Sabha, Sri K K Singhania, Sri Abhijit Das & Enamul Haque and others.
It is also mentionable that the esteemed Islamic Institution “Darul-Uloon-Deoband” also declared a Fatwa describing not mandatory to slaughter cows in Bakri Idd and requested not to do such accordingly. The extract of the Fatwa can be obtained from the news published in Dainik Jagran dt. 13.06.2006.
But unfortunately, the chain of illegal slaughter is in vehemently increasing, killing healthy, capable and milking cows, while the children of the poor families are dying do to malnutrition and don’t get a single drop of cow milk in this land of “Gopal”. As per report of the UNICEF entitling “World Children Status Report-2008”, every day 5000 children are dying in India due to malnutrition.
It is well established that the Cow progeny is the foundation of our agriculture, health, conventional & renewable energy source and the all round development of this Sanatani Land with a highest veneration to Go Mata and Go Palak (Cow Savers). And butchering these very calm and pretty animals hitting the religious sentiments of Hindus must attract the provisions of Section 153 and 295 of Indian Penal Court.

Again, a Seven Judges Bench in the Honb’le Supreme Court of India gave the verdict in CA No.4937-4940 of 1998 being the case of State of Gujrat & Others Vs. Mirajapur Moti Kureshi Kasab & Others. [2005/ SCCL.Com-735] propounding the importance of Oxen over the age of sixteen years for their utility in case of agricultural manure and recycling energy production from its dung and urine and consequently prohibited oxen slaughter even over 16 years of age of it.
Cow slaughter is completely prohibited without any discrimination of age or condition in Delhi, Haryana, Punjab, Himachal Pradesh, Jammu & Kashmir, Rajasthan, Madhya Pradesh, Chattishgarh, Bihar, Jharkhand, Uttarakhand, Gujarat etc., but the total prohibition of Holy Cow progeny in the length and breadth of this Holy Land is still awaited within a suitable Constitutional amendment. On the other hand the violation of existing slaughter prohibitory rules and regulations are inciting the Hindu sentiments by some communal elements finding the loop holes of the police and administrations by the way.

Continued....

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ZEAL said...

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In this context, these are our earnest requests to the effect that:

A. Please maintain and give full protection to the Prohibitory Acts on Cow Slaughter on Bakri Idd this year on 7th November, 2011 and to extend full cooperation and security to all forums to restrain these illegal slaughters in their activities to help the police and administration on spot of occurrence of illegal slaughters in every state, especially in West Bengal.

B. Please form a task force in each level comprising Govt. officials and the related NGOs to restrain illegal cow slaughter in every place, especially in West Bengal. Please stop all Cow markets set up for Bakri Idd and ban interstate import-export of cow progeny for slaughter as a mandatory measure.

C. Please apply the provisions of National Security Act (NSA) against the perpetrators for the violation of Animal slaughter Control Acts.

D. Please set a high strategy team for banning all type of Cow progeny slaughter under illegality and to monitor the prohibition and utilization through videography in surface and even through helicopter in the disturbed area due to cow slaughter.

E. Please start legal proceedings against BDO (Block Development Officer) and the Officer-In-Charge of the Police Station of the respective Block and the police station where the cases of illegal cow slaughter may occur violating the existing rules and regulations.

F. Please construct the Cow Rehabilitation Center in each district to maintain the rescued Cows and Oxen from illegal slaughter with a coordination of the various “Gosewa Goraksha Sangathan” (Cow Rehabilitation & Protection Organizations) for a sustainable development of Indian agriculture, health, economy, energy, traditional medicines and ecology.

Vande Go Mataram ! Vande Mataram !! Jai Hind !!!

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Ratan Singh Shekhawat said...

इस लेख से असहमत!

सुज्ञ said...

राकेश जी,

आपकी टिप्पणी सर्वाधिक स्पष्ट और मननीय है, साधुवाद!!
करूणा सदैव हृदय से बहती है।

Rakesh Kumar said...

दिव्या जी,
निरामिष ब्लॉग पर की गई अपनी एक टिपण्णी को यहाँ भी दोहरा रहा हूँ,

जिनके हृदय में सहज प्रेम,दया और करुणा है वे कैसे माँसाहार का अनुमोदन कर सकतें हैं,यह मेरी समझ के बाहर है.प्रेम,दया और करुणा के भाव ही तो सभी जीव मात्र से सहानभूति की चेतना प्रदान करते हैं.यदि ये केवल मनुष्य मनुष्य के बीच ही हों और अन्य जीवों के प्रति न हों तो अपूर्ण और बनावटी ही हैं.इसी प्रकार यदि जानवरों के प्रति ही हों और मनुष्य मनुष्य के प्रति न हों तो भी अपूर्ण और बनावटी ही जान पड़ते हैं मुझे.

Rakesh Kumar said...

निरामिष ब्लॉग पर ही मेरी एक और टिपण्णी के सारांश को भी मैं यहाँ दोहराना चाहूँगा.

" हिंसा किसी भी प्रयोजन से की जाय कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकती। हिंसक दृश्य और क्रूर सोच हमारी मानसिकता पर दुष्प्रभाव डालते है। हमारी सम्वेदनाएं शिथिल होती जाती है एवं हिंसा हमारे अवचेतन में, हमारी विचार,वाणी स्वभाव में समाहित हो जाती है। अन्ततः वह हमारे व्यवहार व वर्तन में प्रकट होने लगती है।"

काश! जुबान के स्वाद के मोह से बाहर आ पायें और ह्रदय में करुणा का संचार कर हिंसा की विभत्सता का सूक्ष्म अनुभव कर पायें.
ईश्वर के नाम पर या अन्य कुतर्को के आधार पर जीव हिंसा का कोई अधिकार हमे नहीं मिल सकता.रामकृष्ण परमहंस जी से एक बार पुछा गया कि महाकाली तो बलि मांगती है.उन्होंने कहा हाँ मांगती है बकरे या भैसे की नहीं बल्कि 'मै' की.वास्तव में अहंकार या 'मै' को ही प्रतीकरूप में महिसासुर माना गया है.महाकाली के हाथ में कटा मुंड और गले में मुंडो की माला भी 'मै'यानि सिर के रूप में दर्शित है .
कबीरदास जी ने इसे सुंदर रूप से इस प्रकार व्यक्त किया है

सर राखे सर जात है ,सर काटे सर होत
जैसे बाती दीप की , जले उजालो होत

हम जब जब अपने अहंकार को रखने कि कोशिश करते है ,तो समाज/ प्रकृति द्वारा उसका हनन किया जाता है और जब अपने अहंकार को मिटाते है तो प्रकृति /समाज द्वारा सम्मानित होते हैं.अत:चाहे हिंदू हो मुस्लिम या अन्य धर्मी , 'अहंकार' या मै की बलि ही प्यारी है और वही चाहिए ईश्वर/अल्लाह को.अहंकार के गलते जाने से ही हृदय में उजाला संभव है.

ZEAL said...

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@ महा-देशभक्त अनवर जमाल -

तुम्हारी विज्ञापन देती टिप्पणी प्रकाशित नहीं की टो इतना तिलमिला क्यूँ गए । हलाल करना छोड़ोगे नहीं धर्म के नाम पर तो आलेखों से डरते क्यूँ हो । मनाओ बकरीद, करो हिंसा। करो हलाल बिना मलाल के। खाओ लाश , करो दरिंदगी , रोका किसने है।

लिखते रहो वाहियात आलेख मेरे ऊपर । कभी किलर झपटा बनकर , कभी पोपटलाल बनकर।

दया आती है मुझे तुम्हारे ऊपर , की पूरा 'इस्लाम' छोटा पड़ गया तुम्हारे लिए आलेख लिखने को । दिव्या के सिवा कोई बचा ही नहीं जिस पर तुम कुछ लिख सको । एम आय राईट ?...Smiles...

जाने कितने ईर्ष्यालू आये और मिट गए मुझे मिटाने के फेर में।

खैर तुम भी मेरे नाम पर अपनी उजडती दूकान चलाते रहो...


गौ हत्या बंद करो।
निरीह पशुओं की हत्या बंद करो

सत्यमेव जयते।
भारत माता की जय।
वन्दे-गो-मातरम् !
वन्देमातरम !

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ZEAL said...

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आलेख पर एक चित्र जोड़ा गया है। इस आलेख से असहमत लोग एक दृष्टि डालें कृपया। शायद इंसानियत जग जाए , इनके अन्दर भी। धन्यवाद।

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Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी, ब्लॉगजगत में होने वाली कुछ गतिविधियों को देखते हुए मन में कुछ विचार आने लगे| बकरीद के मौके पर इस भीषण हिंसा का समर्थन करने वाली जमात आजकल आपसे आतंकित है| आज तो ये लोग यहाँ वहां आपको गालियाँ दे रहे हैं, किन्तु भविष्य में मुझे कुछ और ही दिखाई दे रहा है| आज तो कम गालियाँ पद रही हैं, अभी तो देखिये आगे होता है क्या? जब जब ये लोग उन कटे हुए बकरों, ऊंटों, गायों की लाश को निवाले के रूप में अपने मूंह तक लाएंगे, तब तब इन्हें आपके लेख याद आएँगे और इन्हें अपने दरिंदा होने का अहसास होगा| किन्तु जीभ के स्वाद के चलते आपको और भी अधिक गालियाँ देंगे| आखिर आपने इनको दरिंदा जो सिद्ध कर दिया|
आपके लेखों का असर समाज में बदलाव जरुर लाएगा|

रोहित कुमार 'हैप्पी', न्यूज़ीलैंड said...

परिचर्चा ज्ञानवर्धक है, साधुवाद!

shakil.A.Hanif said...

Diya ji waise ek baat samajh me nahi aati ki aap kahati hain ki mansh kahne wale darinde hai
iska matlab vedas aur unishan likhane wale ki baat to aap nahi kar rahin hain jisme ashwa medha, narmedha, ya aajameda ki baat kahi gayi hai
ya aap mahabharat ke bare me khyal jahir kiya hai kair jiske bhi bare me aap kahen
agar aap ped paudho ko nirjiv manti hai to aap hatya se ruki huii hai aur han agar aap ke shakahari hone se hindustani aapko desh chod kar jane ko nahin kahate to aap upnishad aur puran walon ko pakistan aur turkistan jane ko kaise kah sakti hai
agar aap koi naya dharm chala rahi hai to kaayde se kare achhi baat hai hindustan me aap ke is dharm ka swagat hai
aur han jahan tak gau bhakshan ka sawal hai is ke regard me aap kolenel Tod a Historian from Rajstan ki kuch kitaben padhen aap ki jankari me aur bhi ijafa hoga

Anonymous said...

agar janvaron ko khane se fayda hota hai ,to muslmanon ke bachchon ko khana chahiye jo adhk fayademand hoga ,hinsa ja jawab hinsa se hona chahiye msahariyon ko janvaron ke kasht ka pata chalega , jo dharm ke nam par janvaron ko marta hai unka allah rakkshashai

ZEAL said...

शकील जी ,
जिन नामों का आपने नाम गिनाया है उन्हें औषधियों की तरह उपयोग के लिए कहा गया है , जबान के चटोरेपन के लिए नहीं ! और वैसे भी उस समय लिखी गयीं ये बातें आज प्रक्टिस में नहीं हैं ! कोई नहीं अजमेदा आदि का सेवन करता है ! समय के साथ बदलना चाहिए! सही गलत को तार्किक बुद्धि के साथ तौलना चाहिए और जो अनुचित लगे उसे त्यागते रहना चाहिए !

ATUL NAUTIYAL ALLAHABAD said...

Asur ka dharm hae asurta failana aur sur ka dharm hae guno ko badana ved upnishad sabhi jagah kaha hae
bade bhag manus tan pawa
daya daan daman

ATUL NAUTIYAL ALLAHABAD said...

True

ATUL NAUTIYAL ALLAHABAD said...

Asur ka dharm hae asurta failana aur sur ka dharm hae guno ko badana ved upnishad sabhi jagah kaha hae
bade bhag manus tan pawa
daya daan daman

मदन शर्मा said...

बहुत सुन्दर पोस्ट किया है आपने ..आपके उठाये गए प्रश्नों का जबाब किसी के पास नहीं है सिवा अनर्गल प्रलाप के ...मुर्दा खाने के शौकीनों को दरिंदा वा पिशाच ना कहा जाय तो और क्या कहा जाय ...गलत बात गलत ही होती है उसका किसी भी रूप में समर्थन नहीं किया जा लकता ....मनु जी महाराज ने तो आठ कसाई लिखे हैं --सम्मति देने वाला, अंग काटने वाला, मारने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला, खाने वाले – ये सब घातक हैं...और जहां तक अनवर जमाल कि बात है उनसे बहस करना ही बेकार है ....उन्हें सिर्फ दूसरे पर ऊँगली उठाना आता है किन्तु उन्हें अपनी गंदगी नहीं दिखाई पड़ती, सत्य सुनने कि साहस नहीं है ....

Anonymous said...

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Anonymous said...

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