Sunday, October 9, 2011

ब्लॉगरीय मानसिकता - (खरी-खरी)

ब्लॉगर होकर ब्लॉगरीय मानसिकता को समझा जाए तो ब्लॉगिंग करना व्यर्थ है। एक वर्ष, चार माह के लेखन के दौरान अनेक अनुभव किये , जिसमें यथार्थ के दर्शन करने का अवसर मिला। सत्य इतनी परतों में दबा-छुपा होता है की उसका अनावरण आसानी से नहीं हो पाता है ऐसे में आवश्यकता है इस बात की ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हों जिनसे भेंड की खाल में छुपे भेड़ियों की पहचान की जा सके।

लेखन कार्य भी समाज का एक आम नागरिक ही करता है। अतः लेखकों और टिप्पणीकारों के विचार ही हमारे समाज का दर्पण हैं। जो चुप रहते हैं और तटस्थ रहते हैं , वे सबसे बड़े अपराधी हैं और तटस्थ रहने का गुनाह अक्षम्य है। वे स्वयं को शांतिप्रिय की श्रेणी में रखते हैं , लेकिन सच तो यह है वे भीरु हैं। सत्य की परख करने की क्षमता ही नहीं है उनमें। सत्य को जान लेने बाद भी किसी को खो देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इनसे भी बना के रखो , उनसे भी बना के रखो कहीं कोई टिप्पणीकार खो जाए, इसी उलझन में रहते हैं।

एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाए

  • ब्लॉगजगत में कुछ लोग विचारों के मिल पाने की दशा में लेखक के साथ व्यक्तिगत द्वेष पाल लेते हैं। अनायास ईर्ष्या करने लगते हैं और अनावश्यक आलोचना में लिप्त हो जाते हैं। ऐसी मानसिकता कमज़ोर चरित्र को इंगित करती है। उनके विष-वमन से उनका ही भेद खुलता है , अन्य किसी की कोई हानि नहीं होती।
  • दुसरे वे जो अपने अन्दर की ईर्ष्या और द्वेष को मार नहीं पाते और निरंतर उसे पोषित करते रहते हैं। जैसे ही कोई मौका मिलता है , सूंघते हुए वहां पहुँच जाते हैं और संचित द्वेष का विष-वमन कर आते हैं ऐसे लोग 'भाड़े के टट्टू' श्रेणी में आते हैं। इनका कोई चरित्र नहीं होता। ऐसे लोग टिप्पणी विषय पर नहीं करते अपितु व्यक्तिगत भड़ास निकालकर अपने अहम् की पुष्टि करते हैं।
  • कुछ महान लेखकों के पास जब विषय चुक जाते हैं तो वे दूसरों के ऊपर आलेख लिखते हैं, जैसे-- " टंकी आरोहण" अथवा बिना सन्दर्भ के दूसरों को तिरस्कृत करने के तुच्छ उद्देश्य से आलेख लिखकर टिप्पणी पाने की लालसा रखते हैं। ऐसे लोग सिर्फ 'मसाला' ढूंढते हैं और औने-पौने में लेख लिखकर instant popularity पा जाना चाहते हैं।
  • कुछ लोग संतों पर लघु कथा अनुवादित करते-करते खुद को ही संत समझ बैठते हैं। प्रवचन करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए बहुत ज़रूरी है की वे इस झूठे भुलावे से बाहर निकलें।
  • कुछ लोग अपनी टिप्पणियों में बेशर्मी से भड़ास निकालते हैं और अपेक्षा रखते हैं की उनकी टिप्पणी प्रकाशित कर दी जाए। ऐसे लोग स्नेह के पात्र ही नहीं होते। सच्चाई सामने आने पर इनसे दूरी बना लेना ही बेहतर विकल्प है।
  • कुछ लोग बेहद छुई-मुई टाइप के होते हैं हर दूसरी पोस्ट के बाद बुरा मानकर नाराज़ हो जाते हैं और आपके आलेखों पर आना बंद कर देते हैं। बस चोरी-चोरी पढ़ते रहते हैं आपको। ऐसे लोगों की संवेदनशीलता का सम्मान किया जाना चाहिए , और उनका नाज़ुक दिल कहीं दुःख जाए , इसलिए उनके आलेखों पर आपको भी अनुपस्थित ही रहना चाहिए। ताकि वे शान्ति से जी सकें।
  • दूल्हा बिकता है बोलो खरीदोगे? -- SORRY , SORRY -- ब्लॉगर बिकता है बोलो खरीदोगे ? ......एक-एक टिप्पणी से ब्लॉगर्स की खरीद-फरोख्त आसानी से की जा सकती है। ( बेहद अफसोसजनक है ये)
  • कुछ उम्रदराज़ ब्लॉगर्स को अनायास ही अपना सिंघासन डोलता हुआ लगता है और वे अपने से कमउम्र लेखकों को लेखन छोड़ने के लिए बाध्य करके अपनी कलुषित मानसिकता को उजागर करते हैं। ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही की थोडा सा बडप्पन लायें खुद में। इनके 'भय' का कोई इलाज नहीं।
  • कुछ लोग पल में तोला , पल में माशा ...क्या कहें ऐसों को ?
  • कुछ लोग ( so called शांतिप्रिय) , इतने confused रहते हैं की कभी सत्य के आस-पास फटकते ही नहीं , उन्हें डर होता है की वे कहीं इस अग्नि में भस्म ही ना हो जाएँ। अजी जनाब , हवन करने में उँगलियाँ तो जलती ही हैं। वे सोचते हैं, टिप्पणी करूँ की करूँ ?अच्छा चलो कोई चाँद -सितारे वाला आलेख आएगा तो टिप्पणी कर देंगे ताकि अमुक ब्लॉगर मेरे आलेखों पर आता रहे। धिक्कार है !...हो सके तो सत्य को पहचान कर अच्छाई की रक्षा के लिए आवाज़ बुलंद कीजिये। किसी को खो देने के फेर में मत पड़िए। कुछ भी शाश्वत नहीं है जन्म देने वाले माता-पिता भी छोड़ कर चले जाते हैं , इस कर्मभूमि पर संघर्षरत रहने के लिए।
  • कुछ लोग एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। आस-पास देश और समाज में क्या घट रहा है इससे कोई सरोकार नहीं होता है उन्हें वे बस लिखे जा रहे हैं ऐसे आलेखों में विचारों की शून्यता होती है। दिल और दिमाग को जो मथ दे , उसका अभाव दिखता है वहां।
  • अंत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सत्य ही बोलते हैं , सत्य ही लिखते हैं और सत्य की पहचान करने में सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्तियों में विशिष्ट चारित्रिक दृढ़ता होती है ऐसे लोग निर्भय और निर्भीक होते हैं ऐसे लोग सत्य के मार्ग पर चलते हुए अच्छाई का ही साथ देते हैं।

सीने में एक आग जलनी चाहिए। ये आग ही हमें मन से , वचन से और कर्म से शुद्द करती है। यदि ह्रदय में कोई आंच ही होगी तो तप कर कुंदन होने का अवसर नहीं मिलेगा। यही आग हमें सत्य के मार्ग पर आगे ले जाती है। यही आग सत्य जैसे कठिनतम मार्ग पर हमारी मुलाक़ात सत्यवादियों से करवाती है।

कमज़ोर पड़ना, व्यथित होना , पलायन के विचारों से घिर जाना आदि मानवीय कमजोरियां हैं यही हमें मनुष्य बने रहने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन ऐसे पलों में हमारे शुभचिंतक और हमारे अराध्य हमारे साथ होते हैं हमें उसी ऊर्जा से वापस बुलाते हैं और अपने बड़प्पन का परिचय देते हैं।

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में ,
जो उठकर खड़ा हो जाए उसे "ब्लॉगर" कहते हैं

Zeal

38 comments:

वन्दना said...

कमाल का आलेख लिखा है सच को उदघाटित करता हुआ साथ ही तीखा वार करता हुआ…………

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

"ब्लॉगरीय मानसिकता", सच में इसे जानना बहुत ज़रूरी है| भाँती भाँती के ब्लॉगर प्रकारों को आपने खूब समझाया है|
कुछ ब्लॉगर कमज़ोर दिल के होते हैं, तो कुछ मजबूत इरादों के, कुछ स्वयं को वरिष्ठ समझते हैं, तो कुछ तो घोषित रूप से एकदम निकृष्ट की श्रेणी में आते हैं|
दिव्या दीदी, आपने सही कहा कि कुछ तो एक टिपण्णी के सौदे में ही बिक जाते हैं| ब्लॉगरों को इतना सस्ता नहीं होना चाहिए|
मज़बूत इरादों के साथ अपने उद्देश्य पर टिके रहना चाहिए| दुष्टों से सावधान रहकर अपने उद्देश्य की पूर्ती करनी चाहिए| किसी के व्यक्तिगत फोन अथवा मेल से भी बहकना नहीं चाहिए| स्वयं की सोच पर विश्वास रखना चाहिए और उसी के अनुसार निर्णय लेना चाहिए|
किसी की मेल पढ़कर भटक जाने वालों को अपनी सोच को मजबूत करना चाहिए|
जो सत्य बोलते हैं, सत्य लिखते हैं, और सत्य की पहचान रखते हैं, ऐसे ही लोग कुछ कर पाते हैं|

"ब्लॉगरीय मानसिकता", एक अच्छा विषय है| इसे समझना ज़रूरी है|
आभार

मनोज भारती said...

किसी भी पोस्ट पर टिप्पणी देने से पूर्व कुछ बातें अवश्य ध्यान में रखी जानी चाहिए::
1)किसी पोस्ट को बिना पढ़े टिप्पणी न दें।
2)पढ़ने के बाद यदि विषय पर विचार-स्पष्ट न हों तो टिप्पणी न दें।
3)विषय पर टिप्पणी दें,न कि व्यक्ति विशेष पर।
4)केवल इस आशय से टिप्पणी न करें कि किसी ब्लॉग पर ट्रफिक बहुत होता है...और आपकी टिप्पणी को पढ़ कर लोग आपके ब्लॉग तक आएंगे।
5)किसी पोस्ट को पढ़ने के बाद मन-मस्तिष्क पर उभरने वाले पहले प्रभाव को टिप्पणी का रूप दें...शब्दों का चयन संयत रखें।
6)किसी भी पोस्ट पर आई पहले की टिप्पणियों से अपनी टिप्पणी न बनाएं...हां,यदि किसी टिप्पणी पर आपको कुछ कहना है तो उसे स्वस्थ ढ़ग से सहमति या असहमति बताते हुए इस तरह व्यक्त करें कि वह विषय को एक नया आयाम दे।
7)देखा गया है कि हल्के-फुल्के ढ़ग से रखी गई पोस्टों पर टिप्पणियां अधिक आती हैं,बनिस्बत किसी गंभीर विषय पर लिखी गई पोस्ट के। इसलिए किसी भी ब्लॉग की विश्वसनीयता उसकी टिप्पणियों से न आंकें बल्कि विषय की गंभीरता को भी देखें। गंभीर विषयों पर लेखन को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि ऐसे ब्लॉग्स पर टिप्पणी अवश्य की जाए...जो किसी नए/पुराने विषय पर तथ्यपरक जानकारी दे रहा है या उसका वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहा है।
7)किसी भी पोस्ट पर अपने ब्लॉग का लिंक चस्पा न किया जाए।
8)टिप्पणी में किसी तरह का पक्षपात न करें...निष्पक्ष टिप्पणी वही हो सकती है जब आप किसी विषय पर अपनी टिप्पणी को उसी रूप में दें,जैसा कि उस पोस्ट को पढ़ने पर आपके मन-मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ा...बहुत बार कोई पोस्ट हमें वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर बहुत प्रभावित करती है...एक अच्छी टिप्पणी में ये विचार और भावनाएं स्पष्ट दिखाई देते हैं।
9) किसी भी ऐसे विषय पर टिप्पणी देने से बचें,जिसके संबंध में जानकारी का अभाव हो।
10) यदि आपकी टिप्पणी विषय के अन्य पक्षों को दिखाती है तो उसे जरूर दें...लेकिन गुटबाजी न करें।

Bhushan said...

अब तक मैंने उन ब्लॉग्स की यात्रा कर ली है जिनके लेखकों से आपको शिकायत है. आपका यह आलेख जिस ओर संकेत करता है अब समझ पाता हूँ. मेरा विचार है कि आपकी शिकायत जायज़ है. जो लोग मन दुखाने का कार्य करते हैं उनके यहाँ जाने से कोई विशेष लाभ नहीं होता. जिनके लिए ब्लॉगिंग केवल 'हा हा ही ही हू हू' है उनसे दूरी बनाए रखना ठीक है, यदि आप किन्हीं मूल्यों का पोषण करना चाहते/चाहती हैं. तब एकाध ढँग की टिप्पणी अधिक संतोष देती है बजाय दस ऊलजलूल टिप्पणियों के.

डा. अरुणा कपूर. said...

विषय बहुत उमदा है!...धन्यवाद शिखा!...यह सही है कि हर ब्लोगर की मानसिकता,सोच,विचार,लेखन पद्धति,प्रस्तुति करण इत्यादि दूसरे ब्लोगर से भिन्न होती ही है!...लेकिन एक बात से सभी ब्लोगर्स सहमत जरुर होंगे कि उनका लिखा हुआ ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े!...इसके लिए ब्लोगर्स कई तरह के अच्छे या गलत हथकंडे अपनाते है!...मै तो कहती हूं कि गलत या भडकाऊ टिप्पणियाँ लिखने के पीछे का उद्देश्य भी यही होता है कि उनका लिखा हुआ ज्यादा से ज्यादा लोग पढे और उनका नाम प्रसिद्द हो!...ऐसे में वे सोचते है कि नाम और बदनाम...दोनों बराबर ही है!

...ब्लोगर्स कई तरह के होते है...आपने बहुत बारीकी से सुन्दर विश्लेषण किया है!...क्षमा चाहती हूं...मै बाहर गई हुई थी; बहुत दिनों बाद मेरी वापसी हुई है..

DUSK-DRIZZLE said...

THIS POST THROWS THE SEARCHLIGHT

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

"निरंतर",जो चलता रहे,पीछे को पीछे छोड़,नए सोच के साथ,बिना थके,आगे बढ़ता रहे,निरंतर कुछ नया करता रहे........... "सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग" रोग मुक्त रहो निरंतर चलते रहो
just do not bother about what people say,let your readers decide.Please do not take this to heart and keep writing fearlessly

Sunil Kumar said...

इस शेर को यूँ पूरा कीजिये
उसे ब्लोगर क्यों कहें जो टिप्पणी से डर जाये |
अच्छा विश्लेषण बधाई की पत्र हैं आप

प्रवीण पाण्डेय said...

रंग बिरंगी यह दुनिया है, वही रंग ब्लॉगिंग में आये।

udaya veer singh said...

ज्ञान का प्रकाश सर्वोपरि है,वांछित है,आवारा बदल आते हैं ,कुछ चिर बाद अस्तित्वहीन हो जाते हैं ,सो उनपर ध्यान देना , मन भटकाना है /अच्छा प्रसंग .हमेशा आगे देखें .../

SAJAN.AAWARA said...

mam bahut dino ke baad blog ko dobaara suru kiya hai kisi karan was vayst tha......

mam aapne bilkul sahi likha or har bloger ke bare me shai paribhasa di hai.....

mere jese bahut se bloger( lekhak kahana uchit nahi hoga kyunki anubhav nahi hai) hindi kawaya ko uncha uthana chahte hai par ye karay aap logo ke sahyoog ke bina samapan nahi ho payega(esa mera vichaar hai)........

jai hind jai bharat

Prem Prakash said...

सच कहना अगर बगावत है तो समझो हम भी BLOGER हैं...! !

Dr.J.P.Tiwari said...

वाह!वाह!
सुदर शब्द, सुन्दर भाव और पवित्रता निश्छल. दायित्व को तर्क पूर्ण ढंग से सोचती, सहेजती, अभिव्यक्त करती और समझने का आग्रह करती एक ऐसी रचना जिसके मंतव्य को समझना बहुत ही जरूरी है, वर्तमान परिवेश में इसकी प्रासंगिकता अत्यधिक है. इस विन्दु पर और भी आलेख्होम की आवश्यकता है. एक महत्वपूर्ण वैचारिक आलेख. बधाई इस सोच और अभिव्यक्ति के लिए..

DR. ANWER JAMAL said...

माशा अल्लाह , थोड़े अर्से में ही काफ़ी तजर्बा हो गया आपको ।

शुभकामनाएं !

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

आपके लेख से पूर्णता सहमत हूँ और आपके लेख को अपने फेसबुक खाते से भी जोड़ दिया है. मुझे काफी समय से आपके आलेख पढ़ने का समय नहीं मिल रहा है. बिना पढ़ें और समझे हम टिप्पणी करना उचित नहीं समझते हैं. मैं आज के ब्लॉग पर पहली बार ऐसा आश्चर्य देख रहा हूँ कि लगभग नौ घंटे पोस्ट को प्रकाशित हुए हो चुके हैं और एक भी टिप्पणी नहीं आई. अक्सर ऐसा होता है आईना दिखती पोस्ट पर कुछ ब्लॉगर एक "मुखौटा" बन लेते हैं. मैंने आपकी अंतिम पोस्ट "क्या हमारी मीडिया भटक गई है ?" पढ़ी थी और उसपर एक टिप्पणी के माध्यम से घोषणा भी की थीं. उसके संदर्भ में आज तक मुझे एक भी ईमेल किसी ने नहीं भेजी है. कहना बहुत आसान है और करना बहुत मुशिकल है. अर्थात जैसी कथनी वैसी करनी के कभी कम ही व्यक्ति होते हैं. ब्लॉग जगत की दुनियाँ में भी कुछ सार्थक करना चाहता हूँ. लेकिन फ़िलहाल मेरी निजी समस्या के कारण परिस्थितियाँ गवाही नहीं दें रही है. शायद फिलहाल में दुबारा यहाँ आऊंगा भी या नहीं मुझे मालूम नहीं. मेरी कुछ निजी समस्या है. जिनसे लड़ना है. मेरी जैन धर्म की तपस्या भी चल रही है और ११ अक्टूबर से जीवन और मौत की आखिर लड़ाई शुरू कर दूँगा. जीवन रहा तब यहाँ जरुर आऊंगा. इसलिए आप यहाँ पर मुझे धन्यवाद ना दें या कोई बात ना कहे. कुछ विचार या बात हो तो हमें ईमेल कर दें.
__________________________________________________
प्रचार सामग्री---दोस्तों, अपनी राजभाषा हिंदी का प्रचार-प्रसार करके जो सुखद अनुभूति होती हॆ-उसे कोई हिंदी-प्रेमी ही अनुभव कर सकता हॆ. वैसे आप भी अपनी फेसबुक की अपनी "वाल" पर प्रचार सामग्री (यहाँ से कॉपी करें) एक बार डाल सकते हैं. इससे उपरोक्त समूह के बारें में आपके दोस्तों को भी जानकारी हो सकती हैं. ताकि अधिक से अधिक लोग जुड सकें. जिससे और भी काफी लोग जुडे जो हिंदी के प्रति चिंतित है.

सूचनार्थ--दोस्तों, क्या आप सोच सकते हैं कि "अनपढ़ और गँवार" लोगों का भी कोई ग्रुप इन्टरनेट की दुनिया पर भी हो सकता है. मैं आपका परिचय एक ऐसे ही ग्रुप से करवा रहा हूँ. जो हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु हिंदी प्रेमी ने बनाया है. जो अपना "नाम" करने पर विश्वास नहीं करता हैं बल्कि अच्छे "कर्म" करने के साथ ही देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर अपने आपको "अनपढ़ और गँवार" की संज्ञा से शोभित कर रहा है.अगर आपको विश्वास नहीं हो रहा, तब आप इस लिंक पर जाकर देख लो. http://www.facebook.com/groups/anpadh/ क्या आप भी उसमें शामिल होना चाहेंगे? फ़िलहाल इसके सदस्य बहुत कम है, मगर बहुत जल्द ही इसमें लोग शामिल होंगे. कृपया शामिल होने से पहले नियम और शर्तों को अवश्य पढ़ लेना आपके लिए हितकारी होगा.एक बार जरुर देखें. अगर किसी करणवश नए/पुराने सदस्य उद्देश्यों और नियमों से अवगत नहीं है. वो सभी उपरोक्त समूह के नीचे लिखे "दस्तावेजों" (Document) पर क्लिक करके एक बार जरुर पढ़ें.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर

अरुण चन्द्र रॉय said...

स्वयं को ढूंढ रहा हूं. मुझे भी एक साल से अधिक हो गए हैं.

सुधीर said...

कहीं आग, कहीं पर पानी
कहीं सुबह का उगता सूरज
कहीं ढल गई शाम सुहानी
कहीं कमल से फूल खिले हैं
कहीं हवा का रुख तूफानी।
ब्लागर तेरी यही कहानी...

अरूण साथी said...

दिव्या जी पता नहीं मैं किस टाइप का हूं?
पर जो हूं सो -बस अपने टाइप का हूं।
अच्छी पोस्ट
खरी खरी
करारी

रविकर said...

सुंदर प्रस्तुति |
बधाई |।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aaderniya divya ji...bada ki sochne ko bibash karta hua aalekh likha hai aapne..bloogar ka itna bada classification hota hai maine kabhi socha bhi nahi tha..bas swantah sukhay me astha ki rah per chalte hue blog jagat join kiya socha ki school jewan se leke aaj tak jo ye kariban hazaar se jyada kritiya bibidh bishayon per likhi thi wo sahaj roop se pathkon tak pahuch jaayeinj..aapke classification ke anusar bibidh patron ke baare me main sochta jarur tha per ise main rikshe train city bas aaur hamsafar jaisa hi maanta tha..per kabhi itni gehrai se nahi socha tha...aapke blog guldaste me taaje bichar phoolon ki khusboo, thare hue paani me rawangi ki soch, suksham bishleshan,sateek prahar,krnati ki alakh jagaate urjaswita le lavrej bichar mujhe aapke hunar ka kayal banate hain..aapne to aatm chintan ke liye vivash kar diya...apna classification jaanne ke liye gahan atam bishleshan karna padega...aapki lekhni ko salam..sadar pranam aaur amantran ke sath

ZEAL said...

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Mahendra Verma ji's comment ---

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mahendra verma has left a new comment on your post "ब्लॉगरीय मानसिकता - (खरी-खरी)":

मानसिकता के आधार पर ब्लाग जगत के प्राणियों का बढि़या वर्गीकरण किया है आपने ।

ब्लाग जगत की विशालता को देखते हुए ऐसे वर्गीकरण उपयोगी सिद्ध होंगे।

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कुमार राधारमण said...

अग्नि,जल,वायु-सभी अपनी जगह सत्य हैं। ब्लॉगर समुदाय भी इन्हीं तत्वों से लैस है। मत-भिन्नता से ही श्रेष्ठता की पहचान होती है और बहुधा,श्रेष्ठता का आकलन कालांतर में ही हो पाता है। "विचार" अल्पजीवी होते हैं,"भाव" उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

“भड़ास” का जिक्र और फ़िक्र शायद मुझे भ्रम पैदा कर देता है कि भइया को चिकोटा(चिकोटी नहीं) ले रही हो । ब्लॉगरीय मानसिकता के विश्लेषण में कोई भी कमी नहीं है । ये वही मानसिकता है जिसने मनीषा दीदी को इस हद तक तोड़ा कि उन्होंने लिखना ही लगभग बंद कर दिया है क्योंकि वे कहती हैं कि जो धूर्त बुद्धिजीवी मुखौटाधारी आसपास रह कर समाज में कुटिल चालें चलते रहते हैं वे ही ब्लॉगिंग में उतर कर अपनी मक्कारी पर नया रंग चढ़ा लेते हैं । प्रतिक्रियात्मक लेखन पीड़ादायक हो जाता है अक्सर इसलिये तो मैं अपना पागलपन खुद के लिये ही रखता हूँ चाहे वह प्रशंसा हो, समीक्षा हो, आलोचना हो या निंदा……. जिसे खुशी हो जुड़े जिसे कष्ट हो दूर हो जाए।

Atul Shrivastava said...

अच्‍छा वर्गीकरण किया है आपने।
काफी कुछ समझने मिला इस दुनिया के बारे में... आभार

मनोज कुमार said...

सुंदर विश्लेषण। खुद को खोजता हूं। कहां हूं?

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने-जंग में
वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चले॥

अब इन तिफ़्लों के पीछे अपना समय क्यों बरबाद करें

Rakesh Kumar said...

सत्य के अन्वेषण के लिए आंतरिक दृष्टि चाहिये.
आन्तरिक दृष्टि मन की निर्मलता के बिना संभव नहीं.
अभी तो मन की मलिनता ही आड़े आ जाती है.
उठ कर खड़ा होने की कोशिश है.
देखते हैं 'ब्लोगर' कब बनना होगा.

JC said...

दिव्या जी, ब्लौगर भी जो आम आदमी इस संसार में रह रहे हैं उन्हीं में से कुछेक छंटे हुए नमूने समान है...
इंद्रजाल आने से पहले भी आम आदमी में से कुछ ख़ास ख़ास पढ़े लिखे ही (महात्मा गांधी समान, कह लो) डायरी लिखते थे - विभिन्न उद्देश्य पूर्ती हेतु - क्यूंकि यह प्राकृतिक है कि हर व्यक्ति को भूलने की आदत होती है...
यह मानव जीवन का सत्य है और कहा जा सकता है कि यह एक 'वैज्ञानिक' तथ्य भी है...

और क्यूंकि मानव 'गलतियों का पुतला' माना गया है - ज्ञानी-ध्यानी गुरुवों द्वारा भी - एवं भूत में घटित अनुभवों के आधार पर ही हर मनुष्य सीख ले अपने भविष्य का मार्ग निर्धारित करने का प्रयास करता है, किन्तु यह भी सत्य है कि वो बार बार गलतियों करता है, और बार बार गलतियों से कुछ नया सीखता चला जाता है... किन्तु कोई भी व्यक्ति आज यह नहीं कह सकता कि अब उसके लिए इन तीनों लोक में कुछ नया पाने अथवा सीखने के लिए नहीं रह गया है, केवल जो कृष्ण के लिए ही संभव जाना गया योगियों द्वारा, और वो कह्गाये कि गलतियों का मूल अज्ञान है...

मानव जाति में 'बुद्धिमान' उसे कहा गया जो अपनी गलतियों से तो सीखता ही है, पर दूसरों की गलतियों से अधिक सीखता है... और हम अपने आपको भाग्यशाली मान सकते हैं कि हमारे देश, भारत में भूत में लिखे गए शिला-लेख हो भले ही ताड़ पत्रों में ही क्यूँ न, सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है इस देश कि मिटटी का इतिहास, राम, कृष्ण आदि महापुरुषों, विभिन्न युग के पुरुषोत्तम कहलाये जाने वाले पात्रों की लीला, 'रामलीला' अथवा 'कृष्णलीला' आदि, जो सरल शब्दों में भी उपलब्ध कराई गयी है आम आदमी के लिए भी, तुलसीदास जी के द्वारा जैसे, उन्हें अमर करते उनके लिखे गए शब्दों द्वारा ...

दिनेश शर्मा said...

हर लेख की तरह प्रभावशाली एवं खरी-खरी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Swarajya karun said...

ब्लॉग-जगत को लोकतंत्र का पाँचवा स्तम्भ माना जा रहा है. मेरे ख्याल से ब्लॉगिंग को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए .

मदन शर्मा said...

वाह दिव्या जी . तमाचा मारा है आपने कडवे सत्य का...
मानना ही पड़ेगा की सत्य कडवा होता है किन्तु हितकर होता है
आपका धन्यवाद...

shilpa mehta said...

जी |

NISHA MAHARANA said...

दुनियाँ में बहुत तरह के लोग होते हैं।
सबकी मानसिकता मैं अंतर होता है।
बस अपने को एक बात ही ध्यान में
रखनी है एक ही साधे सब सधे-----------।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बिलकुल खरी-खरी लिख दिया दिव्या जी !

तथाकथित स्वयंभू ब्लागरों का नकाब नोच डाला , ब्लागगीरी का पोस्ट मार्टम करके रख दिया |

शत प्रतिशत सहमति है आपके विचारों से .....

हमेशा सच का साथ देना चाहिए .....

अज्ञेय जी की पंक्तियाँ याद आ गयीं ;"वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें , अनुभव रस का कटु प्याला है |

वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें , सम्मोहनकारी हाला है |

मैंने विदग्ध हो जान लिया,अंतिम रहस्य पहचान लिया,

मैंने आहुति बनकर देखा, यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है "

ZEAL said...

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@ इमरान अंसारी ,

तुमने अब तक पांच अभद्र टिप्पणी लिखी , और हर टिप्पणी लिखने के बाद तुमने मुझसे माफ़ी मांगी । मैंने तुम्हारी अशिष्ट और द्वेषपूर्ण टिप्पणी मोडरेट कर दी और तुम्हे माफ़ कर दिया, लेकिन तुम बेशर्मों की तरह पीछे ही पड़े हो , आज भी तुमने अभद्र टिप्पणी लिखी । समझ नहीं आता मेरे पीछे क्यूँ पड़े हो । गजलें लिखो और मुझसे दूर रहो। तुम्हारे जैसे आस्तीन के साँपों से मैं कोसों दूर रहती हूँ।

अगर तुम्हारी भड़ास पूरी न निकली हो तो तुम भी भाड़े के टट्टुओं ( अमरेन्द्र, अरविन्द मिश्र, राजेश उत्साही , चला बिहारी ब्लॉगर बनने और अनुराग, संतोष त्रिवेदी और अमित शर्मा , प्रवीण शाह आदि की तरह सूंघ-सूंघ कर हर उस आलेख पर जाना जो दिव्या के खिलाफ हो , उस पर जाकर विष-वमन कर आना।

नामर्दों की पहचान यही है। जो मर्दों के खिलाफ कुछ नहीं कर सकते वे चूड़ियाँ पहनकर महिलाओं के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं।

तुम चाहे लाख कोशिश कर लो , तुम्हा कतई स्वागत नहीं है मेरे ब्लौग पर। अपवित्र नहीं करना मुझे अपना ब्लॉग ईर्ष्यालुओं की टिप्पणियों से।

Just get lost !

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Dr. Braj Kishor said...

मुझे आज मालुम हुआ की हमारे ब्लाग की दुनिया में गृह युद्ध चल रहा है .आप के क्रोध से भी लगा की सारा कुछ अच्छा नही चल रहा है.