Monday, December 19, 2011

कुछ मीठा हो जाए ?--या फिर थोडा सा परोपकार ?-- Philanthropy

परोपकार करना चाहिए, ऐसा सभी कहते मिलेंगे लेकिन इस दिशा में प्रयासरत विरले ही होते हैं ! सभी अपनी-अपनी पूरी ऊर्जा के साथ कमाने में लगे हुए हैं! कोई धन कमा रहा है कोई नाम और शोहरत ! कोई विद्या ही अर्जित किये जा रहा है !

कब तक अर्जित करेंगे! कोई तो सीमा-रेखा होनी चाहिए ! हम कतार से हटेंगे तभी तो दुसरे का नंबर आ सकेगा ! कुछ लोग अरबपति से खरबपति बने जा रहे हैं , लेकिन पेट ही नहीं भर रहा उनका ! कमाए ही जा रहे हैं ! अरे कमा रहे हैं तो खर्च भी कीजिये अपने से कमतर पर ! आखिर क्यूँ कमा रहे हैं इतना ? एक अवस्था के बाद संचय का लोभ संवरण करके उसे कमज़ोर जनता पर व्यय करना चाहिए !

विद्या भी अर्जन के उपरान्त बांटना चाहिए ! जो ज्ञानी, ध्यानी , विद्वान् मनुष्य हैं उन्हें अपनी विद्या से दूसरों को लाभान्वित करना चाहिए ! एक निश्चित उम्र के बाद सीटें मत छेकिये , नयी पीढ़ी कतार में है ! कुछ दिग्भ्रमित भी हैं ! उनका ज्ञानवर्धन एवं मार्गनिर्देशन कौन करेगा ? जो सक्षम हैं वही न करेंगे?

बड़ी बड़ी कंपनी के मालिक एवं कोर्पोरेट दुनिया के अनुभवी धनिक यदि चाहें तो समाज को एक बड़ा योगदान दे सकते हैं ! करोड़ों रूपए के टर्न-ओवर से लाभान्वित होने के बाद उनमें परोपकार की भावना यदि न जन्म ले तो उनका धनार्जन व्यर्थ है ! उन्हें निशुल्क अस्पताल एवं स्कूल खोलने चाहिए ! देश को अच्छे शैक्षणिक संस्थान देने में और आम जनता का जीवन-स्तर उठाने में इनकी महती भूमिका हो सकती है !

मेरे विचार से धन हो अथवा ज्ञान अथवा अनुभव एक निश्चित अवधी के बाद बांटना शुरू कर देना चाहिए ! हर प्रकार के ज़रूरतमंदों की संख्या बहुत है !

लेने वाले बहुत हैं ! हमें बस देना सीखना होगा ! परिवार से हटकर समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी निभाने के लिए ये सबसे सुन्दर मौका होगा !

आधी ज़िन्दगी अपने लिए और शेष आधी "अपनों" के लिए जीनी चाहिए !

वन्दे मातरम् !




43 comments:

Devendra Dutta Mishra said...

यदि जीवन व इसकी कमाई आंशिक रूप से भी दूसरों व समाज के काम व कल्याण में काम आ सके तो इसके बड़ी धन्यता की बात एक मनुष्य को लिये क्या हो सकती है। सुंदर व प्रेरक लेख।

mridula pradhan said...

bahut hi prerit karnewala lekh hai......

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

यदि ऐसे किसी बुद्धिहीन को ज्ञान बांटना चाहे जो ज्ञानी नहीं बनना चाहे तो ‘भैस के आगे बीन’ की बात होगी। इसी प्रकार हम दया करके किसी भिखारी को भीख दें तो वह जाकर अन्न की बजाय ठर्रे में उडा देता है। ज्ञान और दान उसी को देना चाहिए जो उसका सुपात्र हो।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

हां जी! हां जी! हम तैयार हैं। हमें सुगर नहीं है

संतोष कुमार said...

बिलकुल सहमत हूँ आपसे अगर ऐसा होने लगे तो वाकई स्वर्ग धरती पर आ बसेगा !

सुंदर आलेख
आभार !

सदा said...

बहुत ही उत्‍तम बात कही है आपने ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aaderneeya divya jee aaj pratah ham sabhi college ke teachers ke sath is bishay par hee charcha ho rahi thee..charcha ke uprant saubhagya vas seedhe aapne lekh par najar gayee..main aapke bicharon se hamesha ki tarah sahmat hoon..mujhe bhee hamesh lagta hai ke koin na koi seema hona jarur hona chahiye..aadmi hamesh se kahta hai wah tees saal ka ho gay chalis ka ho gaya..main hamesh kahta hoon ab jaane me bees tees saal aaur hain..aur jab sab kuch tyagna hai to kyon na dheere dheere tyag karne ka abhyas shuru kar dena chahiye..sadar badhayee ke sath

कुश्वंश said...

धार्मिक साहित्य में "चाहिए" से हज़ारों पन्ने भरे पड़े है मगर आदमी वही का वही तनिक भी परिवर्तन नहीं हुआ. "चाहिए" को "किया" में परिवर्तित करने के लिए सरकारे बनी मगर उन्होंने भी सिर्फ "चाहिए" को अपनाया बाकी सब विपक्ष की गलती मान ली . प्रगति, केचुए सी रेंगती रही और हम बढ़ते रहे सुनहरे कल की ओर. आपकी पोस्ट कुछ जाग्रति पैदा करे यही शुभकामनाये.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक समय के बाद तो समेटना प्रारम्भ कर देना चाहिये।

kshama said...

Dena bhee ek hunar hai...bahut badhiya baat kahee aapne is aalekh me!

Sunil Kumar said...

जरूरतमंद को बाँटना से अच्छा काम कुछ नहीं हैं सार्थक पोस्ट आभार

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

पूरी तरह सहमत हूँ|
सबसे पहले तो शीर्षक की बात कहना चाहता हूँ| सार्थकता के पैमाने पर एक बेहतरीन एवं सार्थक शीर्षक ढूँढा है आपने|
आलेख से भी सार्थकता झलकती है| धन, दौलत, शोहरत, नाम, विद्या जिसे जो कमाना है कमाए, किन्तु इनकी आड़ में अपने कर्तव्यों से मूंह न मोड़ें| जो परोपकार करना है, वही सबसे बड़ा कर्त्तव्य है| आखिर अपने लिए ही कब तक जीते रहेंगे?
औरों को भी नंबर लगाने दो, यह भी सही है| यदि पढने लिखने का भी शौक है तो अपने काम के साथ घर बैठे ही पढ़ते रहो, जबरदस्ती की सीटें रोकने से तो नयी पीडी के लिए विकल्प हीखत्म हो जाएंगे|
जहाँ तक प्रश्न है अर्थव्यवस्था का, तो इस समय दुनिया में जो पाश्चात्य अर्थव्यवस्था का बोलबाला है, उससे केवल ध्रुवीकरण ही पनपता है| किसी के पास इतना धन है की कई कई देशों को खरीद ले तो कोई ऐसा भी है दो जून की रोटी का भी जुगाड़ नहीं कर पाता और भूखा ही सो रहा है| खरबों कमा लिए, अब काहे की भूख? मरते वख्त तो शरीर भी साथ छोड़ देगा, फिर ये कमाया धमाया क्या काम का?
निश्चित रूप से धन एवं ज्ञान एक निश्चित अवधि के बाद बांटना शुरू कर देना चाहिए| ऐसा भी किया जा सकता है की चाहे जब तक कमाओ, किन्तु साथ ही साथ बांटते भी चलो|

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जायेगी! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कुछ नहीं तो बिल गेट्स से सीख ले लें. वारेन बफेट के बारे में भी सुना है. दक्षिण भारत के एक उद्योगपति के बारे में भी पढ़ा था जो अपनी आमदनी का एक निश्चित प्रतिशत दान करते हैं.
यद्यपि विज्ञापनों में खूब आता है कि इसे खरीदो एक रूपया फला प्रोजेक्ट में दिया जाएगा.

Kunwar Kusumesh said...

quite motivational.
I liked.

ZEAL said...

.

@- भारतीय नागरिक जी , क्यूँ न हमारे अपने प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी को याद किया जाए जो अपने वेतन का २५ प्रतिशत संस्कृत के विद्यार्थियों को देते थे ! उनका कहना था की उनका वेतन उनकी ज़रूरतों से कहीं ज्यादा है ! अपने योगदान द्वारा वे विद्यार्थियों और संस्कृत भाषा दोनों का उद्धार कर रहे थे ! उनके अतिरिक्त किसी भी भारतवासी को अपने वेतन का कुछ प्रतिशत मानवता के हित में लगाते नहीं देखा !

जब सभी शिक्षित हों और सारा कुटुंब भरे-पेट सोया हो तभी राष्ट्र खुशहाल हो सकता है

.

dheerendra said...

पर हित सरस धरम नहि भाई
पर पीड़ा सम नहि अधमाई,...तुलसी दास जी ने
रामायण में लिखा है,परोपकार से बढ़कर जीवन में कोई दूसरा धर्म नहीं है,..सार्थक सुंदर पोस्ट,....

मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

आफिस में क्लर्क का, व्यापार में संपर्क का.
जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का,
कवि में बिहारी का, कथा में तिवारी का,
सभा में दरवारी का,भोजन में तरकारी का.
महत्व है,...
पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलिमे click करे

Bikramjit said...

paropakaar karte hain kuch log , but problem is they show off too and sometimes do it for wrong reasons and TO wrong people ..

these days there is a ghapla in that toooo :)

Bikram's

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

एक बार कोई बाँट कर तो देखे, बाँटने का सुख पाने के सुख से कई गुना ज्यादा होता है.बहुत अच्छी ,प्रेरणा देती हुई पोस्ट.

mahendra verma said...

ज्ञान और अनुभव दूसरों को बांटने से और बढ़ता ही है। फिर बांटने में झिझक कैसी ?
धन यदि जरूरतमंदों को दिया जाए तो उनकी दुआओं से धन भी बढ़ता है।

रहीम का एक दोहा है-
पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम,
दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।

अनुकरणीय और प्रेरक संदेशों से युक्त अच्छा आलेख।

Latest Bollywood News said...

Very Nice post our team like it thanks for sharing

Nisheeth said...

I too believe in your philosophy..Chanakaya has said it rightly that "One should never be satisfied with charity"

Atul Shrivastava said...

सहमत आपकी बातों से...

मनोज कुमार said...

प्रेरक और अनुकरणीय बातें।

अरूण साथी said...

सुंदर विचार, काश की इसे लोग अपनाऐं भी?

Rajesh Kumari said...

prernadayak ek uttam post.

Sawai Singh Rajpurohit said...

सहमत हूँ आपसे

Suresh kumar said...

vicharniya baat hai ji .

Maheshwari kaneri said...

प्रेरणा देती बहुत सुन्दर और सार्थक पोस्ट..

ZEAL said...

.

एक लम्बे समय से इस विषय पर लिखना चाहती थी , लेकिन बेहद अफ़सोस है की इस आलेख में विषय के साथ न्याय नहीं कर सकी ! जो कहना चाहती थी वो आलेख में उभर कर नहीं आ पाया है !

इसमें परोपकार करने के लिए प्रवचन नहीं बल्कि philanthropy के लिए क्रियान्वित होने का निवेदन है ...

विषय पर अपने विचारों को ठीक से अभिव्यक्त न कर पाने का खेद है ! कुछ टिप्पणियों ने सार्थकता बढ़ाई है विषय की , उनका आभार !

.

Pahal A milestone said...

dena agar sbhi ko aa jaye to kahne ki baat hi kya kiyonki yhi to vo vidya he jo aapko aur apke naam ko duniya me mashhur karta he. prerna se bhara lekh likh he aapne . bahut khub

AK said...

परोपकार काफी लोग करते हैं.
परन्तु , हमारी संस्कृति में जो मान्यता है - दान ऐसा करो कि बाएं हाथ को पता न लगे की दाहिने हाथ ने क्या दिया . काफी लोग ऐसा करते भी हैं परन्तु ( इसी कारण ) उनके बारे में अत्यंत ही कम लोगों को पता चल पता है . शाहजहाँ और मुमताज़ के प्रेम के बारे में प्रेम की याद स्वरुप ताजमहल के कारण पूरी दुनिया जानती है क्योंकि ये उनकी प्यार का इश्तेहार था , पर बहुत सारे लोगों ने उन दोनों से ज्यादे मोहब्बत की है पर रहे बेनाम गुमनाम क्योंकि प्रेम उनके लिए इश्तेहार नहीं था .
आज भी काफी विश्वविद्यालय किसी के द्वारा दान स्वरुप प्रदत्त जमीन पर है . ज्यादातर मामलों में विश्वविद्यालय या महाविद्यालय का नाम दानकर्ता के ऊपर है पर कुछ अपवादस्वरूप दानकर्ता के नाम पर नहीं है . जितने भी धर्मशाला हैं सब किसी न किसी ने परोपकार हेतु ही बनवाए हैं.
हाँ आजकल ऐसे धर्मशाला नहीं बन रहे हैं . मदिरों में लोग ज्यादा दान कर रहे हैं . Direct remittance to God. पुण्य ज्यादा और सीधे और तुरंत मिलेगा . शायद. सो अमीर मंदिर और अमीर हो रहे हैं और नए मदिर भी त्वरित रफ़्तार से खुल रहे हैं.
और आजकल कैमरा के सामने देने का फैशन ज्यादा है. अब ऐसे दानकर्ता कम हैं या कैमरे कम हैं कि हमे पता नहीं चल पा रहा है , कहना मुश्किल है.
कुछ लोग अभी भी अन्धों के स्कूल में या poor house में जन्मदिन या अन्य खास अवसरों पर बच्चों को खाना खिलाते हैं. उस वक्त उन मासूम बच्चों के चेहरे पर जो हर्षोउल्लास दिखाई पड़ती है - दुनिया की सब से बड़ी खुशी और परमार्थ है.
हम लोगों ने कुछ वर्ष पहले गरीब बच्चों को बैंक और इंजिनीरिंग प्रवेश परीक्षा की मुफ्त कोचिंग दी थी. वो बच्चे आज अच्छे पद पर हैं और गाहे बगाहे हमे याद कर कर , अभी भी हमे अभिप्रेरित करते रहते हैं. सुपर थर्टी के आनंद जिन्होंने सेकडो गरीब बच्चों को IITian बनाया , विद्यादान दिया आज हीरो हैं . हम में से हर कोई कुछ न कुछ दान तो कर ही सकता है .
अर्थ दान , विद्या दान या श्रम दान .
दशरथ मांझी इसके उदाहरण हैं - जिन्होंने अकेले पहाड को छेनी से काटकर सड़क बना दी और दो गांव की दूरी को 75 km से घटाकर 10 km कर दिया . No sponsor , no fund , no machine no engineering. Nothing but Spirit . बस जज्बा की जरुरत है.

Aditya Tikku said...

Uch vichar -Utam prastuti-**

Bharat Bhushan said...

"उन्हें निःशुल्क अस्पताल और स्कूल खोलने चाहिएँ"- इससे बढ़ कर दूसरी समाज सेवा और क्या हो सकती है. आपके इस आलेख को मैं बहुत बढ़िया, विचारोत्तेजक और प्रेरक आलेखों में देख रहा हूँ.

vidha said...

सार्थक और प्रेरक पोस्ट इसकी शुरवात १ जनवरी से.

aarkay said...

फिल्म, 'बादल' का एक गीत याद आ रहा है दिव्या जी, " अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए " परोपकार, दान पुन्य की भावना तो प्राय: लुप्त ही हो गई है. यह अलग बात है की कुछ धर्मों में "दसांध " यानि आय के दस प्रतिशत को दान करने अथवा परोपकार में लगाने की शिक्षा दी गयी है. विद्या दान सबसे उत्तम दान है , क्यों की दान से इस धन में वृद्धि होती है . कहा भी है
" सरस्वती के भंडार की बड़ी अपूर्व बात
ज्यों खर्चे त्यों त्यों बढ़े बिन खर्चे घाट जात. "

हर प्रकार के दान में पात्र -कुपात्र का ध्यान रखना भी आवश्यक है !
एक प्रेरणा दायक आलेख !

प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत कल्याणकारी विचार हैं - यदि व्यवहार में आ जायें !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बहुत ही उपयोगी लेख ..समाज और जीवन के लिए |
काश!ऐसा हो पाता...

P.N. Subramanian said...

असहमति का तो प्रश्न ही नहीं है. इश्वर हम सब को सद्बुद्धि दे.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
आपने एक बेहद सार्थक पोस्ट लिखी है| आप्पने विषय को बहुत बेहतरीन तरीके से उठाया है| मुझे तो इसमें कोई कमी नज़र नहीं आ रही|
फिर भी लेखक को कई बार ऐसा लगता है कि इसे ओऊ अच्छे तरीके के साथ लिखा जा सकता था| हाँ यह सत्य है कि आप इसे ओउर भी खूबसूरती के साथ पेश करतीं|
मुझे तो यह अभी भी बहुत अच्छा लगा|

मदन शर्मा said...

एक अच्छे लेख के लिए आपको बधाई.

मदन शर्मा said...

सत्य वचन है आपका साधू साधू .....परहित धर्म सरस है भाई पर पीड़ा सम नहीं अधमाई .......

Rakesh Kumar said...

सुन्दर सार्थक और सारगर्भित प्रस्तुति है आपकी.

आभार.