तुम नारी हो , तुम जानो तो
शक्ति को अपनी, पहचानो तो।
हो जननी तुम , ये जानो तो ,
हो सृष्टिकर्ता , पहचानो तो।
तुम्हें मारकर गर्भ में ये,
कर रहे पाप ये बड़े-बड़े।
मानव से दानव बनकर ,
हैं खड़े अहम् के चीड बड़े।
तुम ही से ये जीवन है ,
तुम ही से सारे संसाधन।
तुमसे ही चलता सारा संसार,
तुमसे महके है घर-आँगन।
तुम अगर त्याग दो मन से इनको,
मछली बन तड़पें, बिन जल की।
अस्तित्व तुम्हारा समझाओ,
दुनिया अपने निर्मल मन की।
खुद को पहचानो, जानो खुद को।
निज का भी सम्मान करो
रह कर आश्रित इन पर तुम ,
मत अपना तुम अपमान करो।
नहीं कहीं तुम कमतर हो ,
नारी सृष्टि, तुम श्रेष्ठ हो।
सृजन, कल्पना, राग, शीलता।
हर क्षेत्र में ,ज्येष्ठ हो।
उठो तुम अब जागो तुम,
खुद से मत अब भागो तुम,
गर अन्याय, करे कोई,
सच क्या है, समझा दो तुम।
गयी सदी वो जाने दो,
अब कदम से ताल मिला दो तुम,
ओखल में जब सर दे डाला,
मूसल से मत डरना तुम।
दुर्गा , काली की धरती पर ,
नारी को कमतर जो समझेगा
अधोगति को पाकर वो,
अपने पापों को भुगतेगा।
बन के चंडी तुम , इन दानव का
अस्तित्व यहाँ मिटा देना।
चहुँ दिशा में , अपनी गरिमा का ,
परचम तुम लहरा देना।
नारी ये तेरा आँगन है,
है समस्त सृष्टि पर एहसान तेरा।
ना समझें तो समझा दो तुम,
व्यर्थ न जाए बलिदान तेरा।
गिद्ध सी लोलुप दृष्टि को ,
अब इन्हें मोड़ कर रख देना।
अवनत पलकों से पूजें पैर,
इनको ये सिखला देना।
तुम जननी हो, तुम शिक्षक हो।
क्यों 'सृजन' तुम्हारा बहक रहा,
अपने अन्दर की ममता से ,
वापस लाओ, जो भटक रहा।
कर्तव्य तुम्हारा देखो तुम,
अन्याय नहीं बढ़ने पाये,
हर योजन पर , रक्तबीज यहाँ,
कोई भ्रूण न डसने पाये।
इनको अपनी ममता से ,
संस्कार ज़रा सिखला देना।
गर ना मानें , समझाने से,
रणचंडी बन दिखला देना।
हे नारी , तुम ही सृष्टि हो,
तुमसे सृजन का सार मिला।
हर कण-कण में तेरी खुशबू है,
तीनों लोकों की आधारशिला।
Zeal