कोई भी लेखक अथवा कवि जब भी कुछ लिखता है तो उसमें उसके अनुभव ही शामिल होते हैं। जो वो महसूस करता है , अथवा आस-पास के परिवेश में , परिवार में , समाज में जो देखता है और सुनता है , उसे ही आपने लेखन में शब्दों का रूप देता है। इसीलिए यदि किसी को लगे की ये उसे इशारा करते हुए लिखा गया है, तो ये अनुचित होगा। जब किसी बात की बार-बार पुनरावृत्ति होती है , तो विचार शब्द बनकर लेखों अथवा कविताओं में ढलते हैं।
आज चर्चा करुँगी स्पष्टवादिता की । स्पष्टवादी लोग नफे-नुकसान के बारे में ज्यादा नहीं सोचते , केवल अपनी बात को स्पष्ट तौर पर कह देते हैं , जिससे समाज का किसी न किसी तरह से भला ही होता है । सुनने वाला नाराज़ हो जाता है , लेकिन वह भी कहीं न कहीं विचारों से परिष्कृत हो जाता है । वो आत्मचिंतन करता है , खुद में सुधार लाता है और कभी-कभी अहम् के चलते दूरी भी बना लेता है ।
लोग कहते हैं स्पष्टवादियों के दुश्मन ज्यादा ज्यादा होते हैं । और उन्हें कम लोग पसंद करते हैं । लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता । मेरे विचार से ईमानदार और सच्चाई पसंद लोग अक्सर स्पष्ट वक्ता ही होते हैं । आनायास झूठ के बोझ और दिखावे को ढोते नहीं हैं। उनके शब्दों में चाशनी भले ही न घुली हो , लेकिन लोगों के विचारों में घुले द्वेष को जड़ से मिटाने में सक्षम होते है।
स्पष्ट कहने सुनने में एक अनजाना सा संतोष मिलता है। स्पष्ट कहकर ऐसा लगता है जैसे मन का बोझ हल्का कर लिया हो और समाज में फैले मानसिक प्रदूषण को भी दशमलव में कम कर दिया हो। स्पष्टवादिता से लोग नाराज़ तो होते हैं , लेकिन परिपक्व मानसिकता वाले लोग नाराज़ नहीं होते बल्कि अहमियत समझते हैं इस गुण की ।
स्पष्टवादिता से किसी का दिल तो दुःख सकता है लेकिन मन में मलिनता नहीं आती । कहीं न कहीं कुछ सार्थकता ही है स्पष्टवादी होने में । फिर कहा भी गया है - "सत्य कटु होता है" -- स्पष्टवादिता एक बड़े समुदाय के हित में होती है । उसमें जो सही है वही कहा जाएगा । दूसरों को मीठा लगे इसकी चिंता नहीं की जाती । अन्यथा स्पष्टवादिता अपना अर्थ खो देगी।
चाणक्य ने कहा है - "Straight trees are cut first " , लेकिन कटने के डर से कोई अपना स्वभाव नहीं त्याग सकता। जैसे ही अपना स्वार्थ देखा किसी ने , वो स्पष्टवादी से कूटनीतिज्ञ बन जाएगा।
मेरे लेख पर टिपण्णी करने वाले अधिकाँश टिप्पणीकार मुझसे बुद्धि एवं अनुभवों में श्रेष्ठ हैं , इसलिए निवेदन है , कृपया आपने अनुभवों से विषय को सार्थकता प्रदान करें ।
आभार।
आज चर्चा करुँगी स्पष्टवादिता की । स्पष्टवादी लोग नफे-नुकसान के बारे में ज्यादा नहीं सोचते , केवल अपनी बात को स्पष्ट तौर पर कह देते हैं , जिससे समाज का किसी न किसी तरह से भला ही होता है । सुनने वाला नाराज़ हो जाता है , लेकिन वह भी कहीं न कहीं विचारों से परिष्कृत हो जाता है । वो आत्मचिंतन करता है , खुद में सुधार लाता है और कभी-कभी अहम् के चलते दूरी भी बना लेता है ।
लोग कहते हैं स्पष्टवादियों के दुश्मन ज्यादा ज्यादा होते हैं । और उन्हें कम लोग पसंद करते हैं । लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता । मेरे विचार से ईमानदार और सच्चाई पसंद लोग अक्सर स्पष्ट वक्ता ही होते हैं । आनायास झूठ के बोझ और दिखावे को ढोते नहीं हैं। उनके शब्दों में चाशनी भले ही न घुली हो , लेकिन लोगों के विचारों में घुले द्वेष को जड़ से मिटाने में सक्षम होते है।
स्पष्ट कहने सुनने में एक अनजाना सा संतोष मिलता है। स्पष्ट कहकर ऐसा लगता है जैसे मन का बोझ हल्का कर लिया हो और समाज में फैले मानसिक प्रदूषण को भी दशमलव में कम कर दिया हो। स्पष्टवादिता से लोग नाराज़ तो होते हैं , लेकिन परिपक्व मानसिकता वाले लोग नाराज़ नहीं होते बल्कि अहमियत समझते हैं इस गुण की ।
स्पष्टवादिता से किसी का दिल तो दुःख सकता है लेकिन मन में मलिनता नहीं आती । कहीं न कहीं कुछ सार्थकता ही है स्पष्टवादी होने में । फिर कहा भी गया है - "सत्य कटु होता है" -- स्पष्टवादिता एक बड़े समुदाय के हित में होती है । उसमें जो सही है वही कहा जाएगा । दूसरों को मीठा लगे इसकी चिंता नहीं की जाती । अन्यथा स्पष्टवादिता अपना अर्थ खो देगी।
चाणक्य ने कहा है - "Straight trees are cut first " , लेकिन कटने के डर से कोई अपना स्वभाव नहीं त्याग सकता। जैसे ही अपना स्वार्थ देखा किसी ने , वो स्पष्टवादी से कूटनीतिज्ञ बन जाएगा।
मेरे लेख पर टिपण्णी करने वाले अधिकाँश टिप्पणीकार मुझसे बुद्धि एवं अनुभवों में श्रेष्ठ हैं , इसलिए निवेदन है , कृपया आपने अनुभवों से विषय को सार्थकता प्रदान करें ।
आभार।