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Thursday, August 11, 2011

"मन का मीत" -- Soulmate

हर मन को एक - "मन के मीत" की तलाश रहती है , जो दुर्भाग्य से उन्हें मिलता नहीं मिलेगा कैसे , उनके मन में इतना ठहराव तो है ही नहीं की मिलने वाले प्यार को महसूस कर सकें और आत्मिक रूप से जुड़ सकें

किसी के साथ यदि आत्माओं का मिलन नहीं है तो वह सम्बन्ध अधूरा है विचारों का मिलना तथा किसी के सानिध्य में आनंद की प्राप्ति होना ही आत्माओं का एकाकार होना है। एकाकार होने की अवधी कुछ क्षणों से लेकर कुछ वर्षों या फिर जीवन पर्यंत हो सकती है

आत्मा का मिलन एक से या फिर अनेक से हो सकता है , एक ही काल में विभिन्न देश काल आदि परिस्थियों में भिन्न भिन्न लोगों से मिलना होता है। कभी कभी तो कोई अजनबी इतना अच्छा लगता है की ह्रदय कह उठता है - मेरा तुझसे है पहले का नाता कोई ...

जैसे आत्माएं अपनी इच्छानुसार शरीर धारण करती हैं और जब उनका मन भर जाता है तो वे उस शरीर का त्याग कर देती है और वह शरीर निष्प्राण हो जाता है उसी प्रकार किसी भी रिश्ते में , किसी अजनबी के साथ अथवा मित्र के साथ आत्माओं का संयोग और वियोग चलता रहता है संयोग की स्थिति में सत-चित-आनंद रहता है और वियोग की स्थिति में हर रिश्ता निष्प्राण हो जाता है

जहाँ आत्माओं का मिलन होता है वहां संवाद बिना कुछ कहे ही सपन्न हो जाता है "मन का मीत" अनकहा भी सुन लेता है और बिना लिखा हुआ भी पढ़ लेता है

कुछ पंक्तियाँ समर्पित हैं मन के मीत को ....

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है
लबों पे नगमे मचल रहे हैं , नज़र में मस्ती छलक रही है

कभी जो थे प्यार की ज़मानत , वो हाथ हैं गैर की अमानत,
जो कसमें खाते थे चाहतों की , उन्हीं की नियत बहक रही है ,
हमारी साँसों में...

किसी से कोई गिला नहीं है , नसीब ही में वफ़ा नहीं है
जहाँ कहीं था हिना को खिलना , हिना वहीँ पे महक रही है
हमारी साँसों में ...

वो जिनकी खातिर ग़ज़ल कही थी , वो जिनकी खातिर लिखे थे नगमे
उन्हीं के आगे सवाल बनकर , ग़ज़ल की झांझर झनक रही है

हमारी साँसों में आज तक वो हिना की खुशबू महक रही है
लबों पे नगमे मचल रहे हैं , नज़र से मस्ती छलक रही है


Zeal