Tuesday, November 8, 2011

मर्दानगी

कलियुग में जिन गुणों का लोप हो रहा है , उसमें से एक है 'मर्दानगी' अतः उचित समझा इस विषय पर भी आपके विचार जाने जाएँ।

बढ़ रही मर्दों की संख्या, खो रही मर्दानगी
टकरा रहे अहम् के बादल , छुप रही मर्दानगी,
बेलगाम हो रहा अहंकार , बढ़ रहे शिकवे-गिले,
कर्तव्य से हो रहे विमुख सब, सिसक रही मर्दानगी

यहाँ 'मर्द' से अर्थ सामान्य-जन अर्थात स्त्री एवं पुरुष दोनों से हैतथा 'मर्दानगी' अथवा "पौरुष" भाववाचक संज्ञा (abstract noun) से है

मर्दानगी के विलुप्त होते इस दौर में भी अधिकाँश लोग इसी भ्रम में जीते हैं की उनसे ज्यादा मर्दानगी किसी में नहीं है। समझने के लिए कुछ उदाहण का ज़िक्र करूँगी


  • आज हमारी सरकार बड़े से बड़े मुद्दे पर 'चुप्पी' साधने में ही अपनी मर्दानगी समझती है।

  • दूध के धुले दिग्गी राजा , जिसे देखो उस पर ऊँगली उठाकर कटघरे में खड़ा करने में ही अपनी मर्दानगी समझते है।

  • युवराज राहुल तो दलितों के घर भोजन करने में ही अपनी मर्दानगी समझते हैं।

  • दिल्ली पुलिस की मर्दानगी तो भूखे प्यासे अनशनकारियों को आधी रात में पीटने में है।

  • बात करें अगर ब्लॉगजगत की तो दिन-प्रतिदिन संख्या बढ़ रही है 'पोपटलाल' और 'झपट कमाल' जैसे लोगों की संख्या बढ़ रही है , जो साथी ब्लॉगर पर अश्लील आलेख लिखते हैं और फिर भिखमंगों की तरह अपने अश्लील आलेख का लिंक बांटकर टिप्पणी की भीख मांगने में ही मर्दानगी समझते हैं। उससे भी ज्यादा मर्दानगी उन लोगों की है, जो टिप्पणियों की संख्या घट जाए , इस कारण से उन अश्लील टिप्पणियों को अपने ब्लॉग से हटाते तक नहीं।

  • कुछ लोग 'मोरल पुलिसिंग' बहुत करते हैं लेकिन ब्लॉगजगत में इतना कुछ अभद्र और अश्लील घट रहा है , लेकिन उस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती।

  • किसी के गुणों को पहचानकर उसकी प्रशंसा करना लोगों के अहंकार को चोट पहुंचाता है लेकिन किसी के पीछे पड़कर उसके खिलाफ अश्लील और अभद्र आलेख लिखकर उसकी गरिमा को हानि पहुँचाने में ही अपनी मर्दानगी समझते हैं।

धन्य हैं ऐसे मर्द और धन्य है ऐसी मर्दानगी।


वैसे मर्दानगी एक मिसाल सुभद्रा कुमारी चौहान के शब्दों में.....

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी

Zeal

32 comments:

वर्ज्य नारी स्वर said...

बहुत बढ़िया लिखा है.

दिगम्बर नासवा said...

मुझे लगता है मर्दानगी खतम नहीं हो रही अपने मायने बदल रही है बस ...

DUSK-DRIZZLE said...

JIS MUCH PAR PURUS GARV KARTA HAI VAH STRILING HAI AUR JIS KESHRASI PAR ISTRI ITARATI HAI VAH PURLING HAI . SANJAY VARMA

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
अच्छा विषय उठाया है आपने|
मर्द के रूप में पैदा हो जाने से ही मर्दानगी नहीं आ जाती| यदि ऐसा होता तो हम झांसी वाली रानी को मर्दानी न कहते| बहुत से लोग भी इसी मुगालते में जी लेते हैं की नर के रूप में जन्म लेकर हमने मर्दानगी को पा लिया| मर्दानगी कोई शारीरिक गुण नहीं अपितु मानसिक है| डर डर कर जीने वाला कोई पुरुष कोई भी मर्दानगी नहीं दिखा सकता|
पोपटलाल और झपट कमाल जैसे लोग इंटरनेट की आड़ में छुप कर कीबोर्ड पर बैठकर अश्लीलता फैलाने में स्वयं को मर्द समझ रहे हैं| इसकी घटिया टिप्पणियाँ मैंने कई ब्लॉग पर देखी हैं| आपके नाम पर लिखे एक अश्लील लेख को टिपण्णी के रूप में ये यहाँ वहां चिपका रहा है|
इसका घटियापन व नामार्दांनगी तो जग जाहिर है किन्तु वे ब्लॉगर भी मर्द नहीं हैं जिनके लेखों पर ये घटिया टिप्पणियाँ अभी तक चिपकी हैं| शायद इन्हें एक टिपण्णी कम होने का दुःख होगा|
यदि आपकी जगह इनकी ही माँ-बहन के नाम पर घटिया टिप्पणियाँ लिखी होती तो क्या ये टिप्पणियाँ अब तक वहां सुरक्षित रहतीं? वे टिप्पणियाँ भी हट जातीं और इस झपट कमाल के नाम पर लेख भी लिख दिए जाते|
पता नहीं नारीवादी(?) लेखिकाएं जो ब्लॉग जगत में यहाँ वहां भ्रमण करती रहती हैं, जो शायद ही किसी ब्लॉग को छोडती हैं, उनके चक्षुओं से घटियापन कैसे बचा रह गया?
कहाँ गए वे मर्द(?) जो दिव्या को तो उपदेश देते हैं की उसने सही लिखा किन्तु संतुलित नहीं, अब झपट कमाल को उपदेश देकर दिखाएं|
कुछ तो बड़े ही मासूम से ब्लॉगर भी हैं, जो हमेशा इसी ताक में रहते हैं की दिव्या ने क्या लिखा, उसके बाद उसी विषय पर उसी के विरुद्ध एक पोस्ट लिख देते हैं और समझते हैं की हम मर्द हैं|
वैसे कई बार मन में एक बात आती है की इन मर्दों(?) के मन में आतंक फैलाने वाली मर्दानी तो आप हैं| बेचारे इतने डर गए हैं की सोते-जागते, उठते-बैठे, खाते-पीते, हगते-मूतते केवल एक ही डर सता रहा है, की दिव्या ने क्या लिख दिया होगा?
अभी तो देखना, आगे आगे होता है क्या? अभी तो आपके इस विषय पर भी यहाँ वहां कई लेख आने वाले हैं, और स्वयं को मर्द समझने का भ्रम और जोर पकड़ता जाएगा|

ZEAL said...

शुक्रिया दिवस !

मनोज कुमार said...

मरदानगी एक फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ वीरता, शूरता, साहस और हिम्मत के रूप में होता है।
अब इसमें कोई कमी या ह्रास या फिर वृद्धि सापेक्षिक हो सकता है। जहां तक मेरा मानना है कि लोगों के अपने अपने क्षेत्र होते हैं, अपनी-अपनी कुशलता और क्षमता होती है। और बुद्धिमत्ता यह है कि अपने सामर्थ्य और विशेषज्ञता के अनुसार ही मरदानगी दिखानी चाहिए।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर वाह!

Bikramjit said...

Total agree with you .. mardangi is a over used word and in reality people dont know what it is. even the men have forgotten what it use to be .. TO BE A MAN

Bikram's

Deepak Saini said...

अधिकतर लोग इसी भ्रम में है की वे मर्द है

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

आपने जो लिखा है उससे भिन्न राय नहीं है मेरी "मर्दानगी" के बारे में, जिस्मानी तौर पर कोई पुरुषांग लेकर पैदा हुआ हो और हरकतें भामाशाह जैसी हों तो उसे मर्द कहने में भी संकोच होता है। पुरुषवाद, नारीवाद से उपजे विवाद तब समाप्त हो जाते हैं जब हम ब्लॉगिंग करने वालों के बीच मनीषा नारायण जैसी मर्दानी शख्सियत मौजूद हैं जो कि शारीरिक तौर पर भले ही लैंगिक विकलांग हैं, मेरी बहन डॉ. दिव्या जैसी लौह महिला मौजूद है जो कि पुरुषांग लेकर पैदा हुए वैचारिक षंढों पर अकेले ही भारी पड़ रही है। मर्दानगी असल में शरीर से नहीं बल्कि विचारों से सामने आती है।
पोपटों और कमालों के बारे में फ़िक्रमंद नहीं होना चाहिये उनकी नियति निर्धारित है। वर्चुअल संसार से निकलने के बाद इन लोगों को इनकी मर्दानगी के बारे में आइना दिखाया जा सकता है तो ये मुँह छिपा कर ही कुकर्म कर सकते हैं।
भइया

Anshuman said...

ye huyi n mardon waali jabardast post..
kalyug mein besharmon ke fauz lambhi hai..
kis-kisko dikhiye..

mahendra verma said...

सामयिक और सार्थक विचार।
हर तरफ भीरुता और कायरता का ही बोलबाला है। ऐसे लोग इस धरती के बोझ हैं। आजकल पौरुष, पुरुषार्थ और साहस का अभाव सा दिखता है। कायरता का ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शन ही मर्दानगी समझा जाने लगा है।

dheerendra said...

बहुत सुंदर रचना ....
अच्छी पोस्ट ...
नई पोस्ट में स्वागत है |

प्रदीप श्रीवास्तव said...

bahut sundar ,vastvikata ko chipaya nahi ja sakata.

M VERMA said...

बेहतरीन/ज्वलंत मुद्दा उठाया है...

अरूण साथी said...

दिव्या जी मैं आपके विचार से असहमत हूं।
मेरा मानना है कि मर्दो की मर्दानगी कम नहीं रही है। किसी खास और कम संख्या वालों को देखकर ऐसा कहना उचित नहीं है। कुछ भी अन्ना के आंदोलन में आम आदमी ने बढ़कर अपनी मर्दानगी दिखाई है और वहीं आज भी अपने देश में देश पर जान देने वालों की कमी नहीं है फिर एक आधा युवराज और महारानी के नामर्द होने से समुचे देश को नहीं आंका नहीं जा सकता।

JC said...

'महाभारत' में (वर्तमान तथाकथित कलियुग में अंग्रेजों द्वारा रचित कानूनी तंत्र समान) 'धर्म' का साथ देने वाले भीष्म पितामह समान तत्कालीन शक्तिशाली 'मर्द' को भी शिखंडी के कारण शर-शैय्या में लेटना पडा - वैसे तो शरीर के तत्कालीन सिद्ध धनुर्धर अर्जुन के बाणों से बिंधे होने के कारण, किन्तु जिसके पीछे परम ज्ञानी कृष्ण के उपदेशों से मन में एकत्रित धूलि की सफाई के पश्चात ही अर्जुन लड़ने के लिए राजी हो पाया:)

हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने यूँ शक्ति के साथ बुद्धि भी आवश्यक है जाना, अर्थात माँ काली और माँ सरस्वती दोनों की कृपा ही केवल आवश्यक नहीं है, अपितु माँ लक्ष्मी की शरीर की सुरक्षा के लिए कृपा भी! यानी शिव की अर्धांगिनी अष्ट भुजाधारी दुर्गा की!

प्रवीण पाण्डेय said...

मधुमक्खी ढूढ़े सुमन को, मक्खी ढूढ़े घाव,
अपनी अपनी प्रकृति है, अपना अपना चाव।

A said...

Morality is scarce these days. Power is misused by all genders and pathetic situation will continue. If you get a chance read my post 'Civilization and Civil Conflicts'

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

आजकल मर्दानगी की परिभाषा ही बदल हई है :)

Atul Shrivastava said...

जो खुद भीतर से कमजोर है वह ही इस तरह की हरकतें करता है।
ऐसे लोगों पर कहने को काफी कुछ है पर मैंने कहीं यह पढा है और समझा है कि सुंअर के साथ लडाई करोगे तो कुछ समय बाद खुद को कीचड और गंदगी से सना पाओगे जबकि सुंअर तो इसी स्थिति में रहने का आदी होता है.... यानि हर हाल में खुद गंदा होना पडेगा जीतने पर भी और हारने पर भी.... इसलिए ऐसे लोगों की बातों पर जवाब न देना ही बेहतर। सटीक और सार्थक विषयों पर ही बात हो तो अच्‍छा।
वैसे आपने जो लिखा है वह आपके साथ घटे घटनाक्रम के मद्देनजर सही हो सकता है पर वास्‍तव में ऐसा नहीं है.... इस मामले में मैं अरूण साथी जी के विचारों से सहमत हूं।

JC said...

वर्तमान में विभिन्न क्षेत्र के प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्तियों की तुलना में हमारे 'सिद्धि' प्राप्त ऑल राउनडर पूर्वज भी विचित्र रहस्यवादी थे! वे आम आदमी के हित में मनोरंजक कथा कहानी पुराण आदि, आदि के माध्यम से सभी के लिए सांकेतिक भाषा में 'परम सत्य', शिव तक पहुँचने के लिए संकेत छोड़ गए...

आज बैकुंठ चतुर्दशी की सभी को शुभ कामनाएं देते हुए कहानी सुनी है कि इस दिन विष्णु भगवान् शिव की पूजा करने काशी में मणिकर्णिका के घाट पहुँच शिव की पूजा में सहस्त्र स्वर्ण-कमल चढाने ले गए, किन्तु उनकी परीक्षा लेने हेतु शिव ने उनका एक फूल छिपा दिया!... और जब पूजा के अंत में विष्णु ने पाया की एक फूल कम है तो उन्होंने अपनी एक आँख ही चढादी!
तो शिव जी प्रगट हो गए और प्रसन्न हो उन्हें सुदर्शन चक्र दान में दिया ! इत्यादि इत्यादि...

और कृष्ण को भी विष्णु के प्रतिनिधि अथवा अवतार कहा जाता है, सुदर्शन-चक्र धारी ही नहीं अपितु मुरलीधर कृष्ण भी, जो बहुरुपिया भी माने जाते हैं क्यूंकि वो माया द्वारा सभी के भीतर भी दिखाते हैं, यद्यपि साड़ी सृष्टि उनके भीतर समाई हुई है! .... इत्यादि इत्यादि...
और यह भी मान्यता है कि केवल कृष्ण ही एक मात्र 'मर्द' अर्थात 'पुरुष' हैं, और शेष सभी मानव नारियां :)

क्या आप आज खगोलशास्त्र का मौलिक ज्ञान के अभाव में परम-सत्य, बैकुंठ तक पहुँच सकते हैं ???

गिरीश"मुकुल" said...

विचारोत्तेजक आलेख वाह ज़ील वाह

aarkay said...

सटीक सामयिक आलेख ! कवि दिनकर बरबस याद आते हैं . उनका कहना था " मर्दाने मर्दों और
औरतानी औरतों ने सब हिसाब बिगाड़ रखा है मज़ा तो तस्ब है जब मर्द कुछ औरताना और औरतें कुछ मर्दाना हों. "
यदि मर्द होने का अर्थ केवल सिक्स पैक वाला शरीर या macho छवि ही हो तो अच्छा होगा स्त्रियों के कुछ गुण भी पुरुषों में आयें . मर्दानी औरतों की बात करें तो रानी झाँसी का उदाहरण है ही . वैसे आपके अनुसार मर्द होना हर कठिनाई का सामना करना है न कि उसे अनदेखा करना अथवा पलायन , जिस से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता.

Human said...

बहुत अच्छा लेख,अच्छा लिखा है आपने !

NISHA MAHARANA said...

good explanation.

Bhushan said...

आपका दृष्टिकोण सही दिशा देता है. बढ़िया.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

विचारणीय प्रश्नों के साथ बहुत अच्छी प्रस्तुति!

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
एक बात और मन में आई है| देख रहा हूँ कि अभी मांसाहार व कुर्बानी के विरुद्ध आए आपके दो आलेखों से ब्लॉग जगत में कुछ हलचल है| इससे पहले भी इस विषय पर आपके आलेख आ चुके हैं| उस समय भी काफी खलबली मची थी| बल्कि मैं तो कहता हूँ काफी आतंक फ़ैल गया है|
इसी कारण आजकल ब्लॉग जगत में आपको कुछ गालियाँ पड़ रही हैं| ये तो कुछ भी नहीं, अभी तो आगे आगे देखिये होता है क्या?
आपको मर्दानी सिद्ध करती एक बात मन में आई| जब जब कुछ दरिन्दे(जो आपका ब्लॉग पढ़ते हैं व मांसाहार और कुर्बानी के समर्थन में अपना कथित पौरुष दिखाकर आपसे लड़ने आते हैं) कुर्बान किये गए चौपाये की लाश को निवाले के रूप में खा रहे होंगे, तब तब निवाला मूंह तक पहुँचते ही आपकी स्मृति हो आएगी(स्मरण रहे आपके नाम का आतंक पहले ही कईयों को डरा रहा है)| और आपके वही शब्द दिमाग में घूमेंगे| लाश खाने का मज़ा(?) आधा रह जाएगा| तब देखिये कितनी गालियाँ पड़ती हैं| मतलब आग तो आपने लगा दी है|
यह भी मर्दानगी है|

और हाँ, मैं तो देख रहा हूँ आपसे असहमत होने में भी आजकल लोग अपनी मर्दानगी समझ रहे हैं| समझे भी क्यों न, आखिर एक मर्दानी का विरोध कर रहे हैं|

Rajesh Kumari said...

divya yeh post thodi der se padhi aapki post par auron ki tippani padhne me bhi ek maja hai usme kai jagah tilmilahat dekhne ko milti hai,kahte hain na chor ki dadhi me tinka aaj ke mudde me bhi na jaane kis kis ki dadhi me tinka chubhega.vaise aapki baat se main sahmat hoon ki kuch log doosro ko neecha dikhane me hi apni mardangi samajhte hain kintu vaapas unhe muh ki khaani bhi to padti hai..main jo kahna chahti hoon praveen panday ji ne do panktiyon me kah diya...have a good day.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
देखिये एक और मर्द(?) अपनी मर्दानगी दिखाने आया है| जब मैंने उसे जवाब दिया तो मुझे धमकी देने लगा| देखिये यहाँ
http://drayazahmad.blogspot.com/2011/11/blog-post_10.html

और यह मेरा कमेन्ट-

"आपने मुझे यहाँ टिपण्णी करने से मना कर दिया और कह दिया कि आइन्दा इस ब्लॉग पर कमेन्ट करने की जुर्रत न करना|
केवल नसीहत देनी ही आती है या उस पर अमल करना भी आता है? तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई कि तुम पिछले हर पोस्ट में दिव्या के पीछे पड़े हो? क्यों लाइन से दिव्या के नाम पर पोस्ट लिख रहे हो? किसने अधिकार दिया तुन्हें उनका अपमान करने का? वे भी किसी की बहन हैं, माँ हैं, बेटी हैं, पत्नी हैं, और सबसे बड़ी बात एक स्त्री हैं| वह तुम्हारी बपौती नहीं है कि जब चाहे उनका अपमान कर लो| तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई यूं सार्वजनिक रूप से किसी स्त्री का अपमान करने की? किसकी आज्ञा से तुम यहाँ ये गंदगी फैला रहे हो? क्या पोस्ट लिखने से पहले तुमने दिव्या की परमिशन ली थी, जो मुझे धमकी दे रहे हो कमेन्ट न करने की?
कोई तुम्हारी माँ-बहन के खिलाफ इतनी गंदगी फैलाए तो तुम क्या करोगे?
तुमने तो उनके परिवार को भी घसीट लिया| तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई अपनी मर्यादा भंग करने की?
क्या यही सिखाया जाता है तुम्हारे दीन में? क्या कुरआन में यही शिक्षा दी जाती है कि जो स्त्री तुम्हारे हाथ न आए, जिससे तुम्हे खतरा हो, उसका सरे बाज़ार अपमान करो? कोई स्त्री यदि पुरुषों पर भारी पड़ जाए तो इसको कुचल दो?
अब मुझसे यह मत कहना कि मैंने तुम्हारे दीन को क्यों घसीटा? यदि तुम किसी के परिवार को ब्लॉग में घसीट सकते हो तो मैं किसी के दीन को भी ब्लॉग में घसीटने के लिए स्वतंत्र हूँ|
दिव्या के नाम का इतना खौफ?
यदि किसी का सम्मान नहीं कर सकते तो अपमान करने की भी इजाज़त नहीं है|
पोस्ट लिखने के लिए विषय ख़त्म हो गए हैं तो दिव्या दीदी के आगे हाथ फैला दो, विषय वे बता देंगी| फिर भी लिखना न आए तो कन्टेंट भी दे देंगी| और यदि फिर भी न लिख सको तो छोड़ दो ब्लॉगिंग|

तुम सब छड़ों से तो वे कहीं आगे हैं| जिस औरत ने अपने लेखों से तुम सब मर्दों(?) की रातों की नींद हराम कर दी, उसकी सार्थकता के लिए इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा?

अभी तक तो तुम्हे कोई भी जवाब देने नहीं आया तो क्या समझ लिया ब्लॉग जगत में सभी नामर्द हैं? जब कोई जवाब देने आया तो उसे धमकियां दे रहे हैं की कमेन्ट करने की जुर्रत न करें|"

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

बिलकुल सही लिखा दिव्या जी ...
वैसे ये सब मर्दानगी के उदाहरण नहीं , कायरता के हैं |