Tuesday, November 22, 2011

वतन की माटी ..

अनेक मंचों पर चर्चाओं के दौरान लोगों के ये ताने सुने कि -"आप तो विदेश में रहती हैं , आपको भारत देश के बारे में सोचने का क्या अधिकार है ? "

इस बचकानी दलील का क्या जवाब दूं ? ...आप दुसरे शहर में बस जाते हैं तो क्या माँ को भुला देते हैं ? बेटियां विदा होने के बाद मायके को भूला बैठती है ?

वो भारतवासी क्या जो भारत कि माटी को ही भुला दे।

जन्मभूमि से जुडी हमारी जडें इतनी कमज़ोर नहीं कि विदेशी धरती पर पाँव रखते ही मुरझा जाएँ।

अपनी माँ अपनी ही है , अमिट प्यार जो है करती...

वन्दे मातरम् !

Zeal

40 comments:

PRO. PAWAN K MISHRA said...

ये बात वही करते है जो भारत मे रह कर देश द्रोही गतिविधियो मे लिप्त है और ये बाते अनेक मंचो से नही एक व्यक्ति ही करता रहता है छद्म नामो से.

सदा said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... अपनी मां अपनी ही है ... कहलाएंगी तो आप भारतीय ही ...।

vedvyathit said...

vnade matrm
aap ki desh bhkti sadhuvad ki patr hai swikar kren jin logon ko dosh dhoondhne hain un ki prvah krne ki jroort hi nhi hai
aap ka mere blog pr aane ke liye bhut 2 hardik aabhar
sneh bnaye rhiye

aarkay said...

आप से पूरी तरह सहमत हूँ. शायद उन लोगों ने फिल्म " काबुलीवाला " का गीत " ऐ मेरे प्यारे वतन ......." नहीं सुना , या सुना तो फिर समझा नहीं. इसी प्रकार " चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है ...." गीत भी झकझोर कर रख देता है. देशभक्ति या देश प्रेम केवल देश में रहने से ही नहीं आते और स्वदेश में रहना ही देश भक्ति का प्रमाण नहीं .
बढ़िया आलेख , बधाई !

Kailash C Sharma said...

बहुत सही कहा है...अपने वतन से दूर रहने का दर्द वतन से दूर रह कर ही जाना जा सकता है..

जयकृष्ण राय तुषार said...

दमदार बात बधाई और शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय said...

आप भारत के लिये धड़कती रहिये, निर्विघ्न..

वन्दना said...

ये क्या मतलब हुआ कि कोई विदेश चला गया तो अपने वतन के लिये कुछ कहने का उसे हक नही रहा…………मुझे तो इस सोच पर ही तरस आ रहा है जब ऐसी लोगो की मानसिकता होगी तो इन से किसी सकारात्मक सोच की उम्मीद कैसे की जा सकती है दिव्या जी। देश प्रेम के लिये किसी प्रमाण की जरूरत नही होती।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

दिव्या दीदी
ऐसी बचकानी बातें वे लोग बोलते हैं जो आपके शब्दों के आगे निरुत्तर हो जाते हैं| किन्तु अपना अहम् त्यागने को तैयार नहीं है तो अब व्यक्तिगत आक्षेप लगाते हैं| आखिर एक स्त्री इतनी स्पष्ट व शक्तिशाली कैसे हो जाए यह उन्हें बर्दाश्त नहीं होता| पुरुषवादी अहम् तो आड़े आएगा ही|
ये मुर्ख इतना भी नहीं सोच सकते कि जब इनके दादा परदादा इस देश में आए थे तो ऐसा नहीं था कि यहाँ रहते हुए वे हिन्दुस्तान से प्यार करते थे| बल्कि वे तो इसका दोहन कर रहे थे| यहाँ तक कि आपके लिए ऐसी घटिया बयानबाजी करने वाले पीढ़ियों से यहाँ रहकर भी इस देश के न हो पाए और देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं आपको?
जिसकी जहां जड़े हैं वही उसकी मिटटी है| यह तो हम भारतीयों का बड़प्पन है कि हम चाहे किसी भी देश में रहें, उसका अहित नही कर सकते, साथ साथ अपने देश से प्रेम करना व उसके लिए मर मिटने का जज्बा भी नहीं छोड़ सकते|
किन्तु आपके लिए ऐसी घटिया बातें बोलने वालों के विषय में क्या कोई ऐसी ही राय रख सकता है? जो खुद इस देश के न हो पाए उन्हें क्या अधिकार है आप पर प्रश्न चिन्ह लगाने का?

अरुण चन्द्र रॉय said...

बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... अपनी मां अपनी ही है ..

दीनबन्धु said...

मातृभूमि के प्रति प्रेम को आपने सही अभिव्यक्त करा है जो विदेशों में बसे भारतीयों से उनकी मातृभूमि से प्रेम करने का अधिकार छीनना चाहे वह हृदयहीन कानून हो सकता है जो कि अत्यंत जड़ हो चुका होता है। यदि कोई ब्लॉगर आपको ऐसा कह रहा है तो उसके पीछे उसका गहरा स्वार्थ होगा और निःसंदेह वह अरबी अथवा अंग्रेजी साम्राज्यवाद के पोषण की चिंता में लीन होगा तभी आप जैसे भारत माता से प्रेम करने वालों से घबराया हुआ है।
प्रणाम

mahendra verma said...

भारतीय संस्कार यह है -‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी‘
कोई कैसे भूल सकता है, अपनी मां को, अपनी मातृभूमि को।
जो सच्चा भारतीय है वह विदेश में रहते हुए अपनी मातृभूमि के साथ और अधिक निकटता का अनुभव करता है। आपके अनेक आलेख इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

Jyoti Mishra said...

Proud to be an India no matter where u r :)

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

वाह दिव्या जी वाह !
वन्दे मातरम् !

कुश्वंश said...

वतन पर मिटने वालों का देश में होना क्या अनिवार्य है ? कदापि नहीं , देश प्रेमी कही भी रहे देश के प्रति सोच और समार्पण का ज़ज्बा होना चाहिए. देश के बाहर रहकर देश सेवा और भी दुरूह कार्य है इसे समझना चाहिए.बेसिर पैर की बातों पर द्यान न देते हुए दिव्या जी देश के लिए जो कुछ भी कर सके कीजिये इस देश को अन्दर वालों ने ही खोखला किया है बाहर वालों ने नहीं. आपके देशप्रेम को नमन और आपको शुभकामनाये. वन्देमातरम , जय हिंद

रचना said...

zeal
india has a constitution and some people dont come under that constitution they have their own laws a person who does nor respect our constitution can "SHOUT" any thing from the roof top does that count no it does not .
those who dont have knowledge of law also say such things because they are ignorant of the fact that many indians working abroad still have indian passports .

i just have one objection with indians settled abroad { this is a general objection and not personal } when they try to find solutions for indian problems but want to remain settled abroad . then i feel that they have no right to debate because many of them have deserted india just because they are getting more money and better jobs and more facility . then i feel those living in india can be better judge for problems / solutions in india as they fae the same on day to day basis

and one piece of advice " stop caring and keep writing "

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

वाह आयरन लेडी वाह,
आज मारा सचमुच लोहे का मुक्का देश के कथित ढोंगियों के मुँह पर। वन्दे मातरम.....

दिलबाग विर्क said...

दिल चाहिए भारतीय , बाकी बातों में क्या रखा
जय हिंद

dheerendra said...

भारत देश हमारी माँ के समान है
हम कही भी रहे क्या अपनी माँ को भूल सकते है
सुंदर सार्थक पोस्ट
मेरे नये पोस्ट पर आइये आप का स्वागत है |

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

रचना जी
सबसे पहले तो मुझे यही लगा कि आप दोनों पालों की बातें कह रही हैं| आपको किसी से objection क्या है? मैंने यह देखा कि आप दिव्या दीदी की पिछली दो महत्वपूर्ण पोस्ट पर नदारद थीं| जहां कम से कम मैं तो आपकी बेबाकी का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था| मुझे लगा कि यहाँ आपके विचारों से कुछ मार्गदर्शन मिलेगा| वैसे यह आपकी व्यक्तिगत इच्छा है कि आप जहां चाहें वहाँ टिपण्णी करें| किन्तु ऐसा क्यों होता है कि आप विषय ढूंढ-ढूंढ कर टिप्पणियाँ करती हैं?

सबसे पहले तो क्या देश में सबसे बड़ी समस्या नारी समस्या ही है? क्या इनसे इतर कोई समस्या नहीं रह गयी?
आपने कहा कि कुछ भारतीय पैसों के लिए विदेश में स्थाई हो जाते हैं|
क्यों हमेशा उनके पैसों पर ही नज़र मारी जाती है? कोई यह क्यों नहीं देखता कि अगला एक प्राइवेट कंपनी का नौकर है| कंपनी उसे जहां भेजेगी, उसे वहां जाना पड़ेगा? कोई यह क्यों नहीं देखता कि उसे भी अपने स्वजनों से बिछड़ने का दुःख होगा? मुझे तो यही लगता है कि नौकरी करने वालों को वहां भी उसी स्तर का पैसा मिलता है जितना वे यहाँ भारत में कमा लेते हैं? फिर देश विदेश के मुद्दे पर पैसा कहाँ से बीच में आ गया? पैसे पर नज़र है किन्तु कोई उनके जज्बे को क्यों भूल जाता है? क्या आपको लगता है कि देश की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर डॉ.दिव्या श्रीवास्तव के अलावा कोई और हिंदी ब्लॉगर इतनी बेबाकी से अपनी कलम चला सकता है?

यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश विदेश में रह कर भी देश की समस्याओं पर चिंतित है तो क्यों नहीं उसे प्रोत्साहित किया जाता? किन्तु जब कभी थोडा विवाद होता है तो आक्षेप लगाने में कोई पीछे नहीं रहता?

आप ही सोचिये क्या दिव्या दीदी को ये सब भारी भरकम समस्याएँ (जिन पर लेख लिखने तो दूर टिपण्णी करने में ही कथित जागरूक लोगों की रूहें काँप जाती हैं) छोड़कर चाँद-सितारों पर लिखना शुरू कर देना चाहिए? या ज्यादा से ज्यादा कोई समस्या उठानी है तो नारी प्रधान समस्याओं के अतिरिक्त किसी भी समस्या को नहीं उठाना चाहिए?

काश आपने इसी ऊर्जा के साथ अपने विचार पिछली दो पोस्ट पर भी लिखे होते तो कुछ बात होती|

जब भी देश की कोई समस्या की बात हो तो हमारे नेतागण अमरीका का मूंह ताकते हैं कि शायद वह कोई सहायता करे| किन्तु जब कोई भारतीय विदेश में रहता है तो उस पर शंका जताई जाती है| क्या विदेशों रहने वाले भारतीय भारत में कहीं बम बरसा रहे हैं? और वे अमरीकी तो भारतीय भी नहीं हैं, फिर उनसे अपेक्षाएं क्यों रखी जाती हैं| ये अपेक्षाएं यदि विदेशों में रह रहे भारतीयों से ही रख ली जाए तो अधिक सार्थक होगा|

रचना जी, मुझे तो यही लगता है कि दिव्या दीदी की बेबाकी और देश की समस्याओं पर ऐसे आलेख लिखना जिन पर टिपण्णी मारने में भी लोग कतराते हैं, उनके विदेश में रहने को नकार देता है| हिंदी ब्लॉग जगत में बहुत से ब्लॉगर हैं, जो विदेशों में रहते हैं| क्या उनमे इतना दम है कि वे इन समस्याओं पर इतनी बेबाकी से कलम चला सकें?
तब क्यों नहीं उन्हें कुछ शिक्षा दी जाती?

रचना जी, एक बात बताएं, विदेशों में रह रहे भारतीयों से क्या अपेक्षा रखती हैं आप? यदि वे देश की समस्याओं पर लिखें तो उन्हें इग्नोर कर दिया जाता है| फिर वे क्या करें, क्या जिस देश में रह रहे हैं, वहां की समस्याओं पर लिखना शुरू क़र दें?
भला वे कैसे अपना योगदान दें?

रचना जी, कभी किसी की प्रशंसा करना भी सीखिए|

Bhushan said...

कुछ लोगों ने विदेश में रह कर वतन परस्ती खोई है. वे बुरे उदाहरण हैं. अधिकतर लोग अपनी जडों को नहीं भूलते और अपने देश का अहंकार रखते हैं. वे अच्छे उदाहरण हैं.

Vaanbhatt said...

आपक़े पोस्ट से भारत माँ के प्रति आपकी व्याकुलता सहज जाहिर होती है...कौन रोकता है आपको मिट्टी के प्रति समर्पित होने से...

Sunil Kumar said...

.माँ तो माँ ही रहेगी चाहें बेटा या बेटी कहीं भी रहें दोनों का प्यार कम नहीं हो सकता ....

मनोज कुमार said...

सही कहा, इस बकवास सोच का क्या जवाब दिया जाए।

प्रतिभा सक्सेना said...

हम दुनिया में कहीं भी जा बसें, जिसकी की माटी से यह देह रची है उस देश से कैसे उदासीन हो सकते हैं !

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

वतन के माटी की सोंधी सुगंध तो सदा अतीत की ओर खींचती ही है॥

A said...

Very good answer :))) Great post

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत बढ़िया जबाब दिया है बकवासियों को आपने

Gyan Darpan
Matrimonial Site

DUSK-DRIZZLE said...

MERA EKDAM NIJI VICHAR HAI KI BHARAT MAIN RAHANE VALE KE BAJAY VIDES MAI RAHANE VALE BHARTIY RASTRA KO ADHIK SAMMAN DETE HAI.

Atul Shrivastava said...

बढिया जवाब।
इंसान कहीं भी रहे...उसका मन, उसका दिल, उसका दिमाग मां से जुडा ही रहता है और रहना भी चाहिए.... फिर मां पर चर्चा क्‍यों न करे......

NISHA MAHARANA said...

dur rhkr adhik yad aate hain vtan n vtan ke log.

रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

बधाई ||

dcgpthravikar.blogspot.com

Bhola-Krishna said...

बचपना नहीं ओछापन है उसका जो विदेश में रहने वाले भारतवासियों से भारत के विषय में सोचने का अधिकार भी छीनना चाहते हैं ! उनकी दृष्टि में वे असंख्य भारतीय गुणीजन जिन्होंने विदेशियों में भारतीय ज्ञान विज्ञानंमय समग्र चिंतन का प्रचार प्रसार किया और आज भी कर रहे हैं , अपराधी हैं तथा उनकी ऐसी सभी चेष्टाएं अनुचित और अनाधिकारिक थीं / हैं ! वास्तविकता से सर्वथा अनिभिग्य हैं ऐसे लोग ! उनके कथन से ह्म भी दुखी हुए क्यूंकि वे तो हमारा भी अधिकार छीनने वाले हैं ! हम प्रार्थना करते हैं कि ऐसे विचार वाले महापुरुषों को सुबुद्धि मिले !

Rakesh Kumar said...

भारत में जो रहते हैं,वे भारत की बाते न करें
देश के साथ गद्दारी करें,विदेशों में काला धन
जमा कराएँ तो कोई बात नही.पर विदेश में
रहने वाले को अपने वतन से प्यार हो,वतन
की चिंता हो ,वह वतन के लिए जज्बा रख
कुछ करें तो आपत्ति ?

धिक्कार है ऐसे लोगो को.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,दिव्या जी.

Vaneet Nagpal said...

जिसके दिल में अपने देश के लिए प्रेम बसा है | उस अहसास को कोई दूसरा कैसे जान सकता है | इस का अहसास तो वही कर सकता है जो इस खुद इस अहसास से ओतप्रोत हो |

टिप्स हिंदी में

अमित श्रीवास्तव said...

अपनी मिट्टी अपना देस,
अपनी खुश्बू अपना भेस,
रास कबहुँ न आये बिदेस ।

ashish said...

लगे रहो जी . फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी . गायब तो हम भी थे लेकिन मुद्दे पर साथ है .

PARAM ARYA said...

Uttam Vichar .

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

आप सत्य कहती हैं....एक भारतीय कहीं भी रहे वह भारतीय ही है और अपनी मातृभूमि की चिनता करने से उसे कोई कैसे रोक सकता है....
जय भारत.

रविकर फैजाबादी said...

मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
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बुधवारीय चर्चा मंच