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कितने अपनेपन से पूछा था तुमने खैरियत उस ख़त में ।
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर।
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खुश हूँ तुम्हारे घर (ब्लॉग) अब वो आने लगे हैं
नाज़ जिनके उठाते थे तुम दर-ब-दर
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बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।
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जिस 'अपनेपन' को 'क्रोध' कहकर तुमने अपमानित कर दिया था ,
उस 'प्रसाद' को बचाकर रख लिया है किसी मांगकर चखने वाले के लिए।
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ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता।
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही ।
आभार