Monday, April 11, 2011

फुलगेंदवा न मारो ..न मारो ..लगत करेजवा पे चोट ..

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कितने
अपनेपन से पूछा था तुमने खैरियत उस ख़त में
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर

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खुश हूँ तुम्हारे घर (ब्लॉग) अब वो आने लगे हैं
नाज़ जिनके उठाते थे तुम दर--दर

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बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी

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जिस 'अपनेपन' को 'क्रोध' कहकर तुमने अपमानित कर दिया था ,
उस 'प्रसाद' को बचाकर रख लिया है किसी मांगकर चखने वाले के लिए

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ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही

आभार

68 comments:

अभिषेक said...

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

.......acchi line hai zeal ji...


aap khush rahen hamesha..

खुश हूँ तुम्हारे घर (ब्लॉग) अब वो आने लगे हैं
नाज़ जिनके उठाते थे तुम दर-ब-दर

aur mere ghar aate rahen...
main nahi badalunga...

घनश्याम मौर्य said...

खुश हूँ तुम्‍हारे घर अब वो आने लगे हैं

इस पर एक शेर याद आ गया-

इलाही मेरे दोस्‍त हों खैरियत से,
कि घर में क्‍यूँ पत्‍थर नहीं आ रहे हैं।

IRFANUDDIN said...

Mushkil hai ab shahar mein nikale koi ghar se
Dastaar pe baat aa gai hoti hui sar se....

Nikle hain to raste mein kahin shaam bhi hogi
Suraj bhi magar aayega is raah-guzar se....

Regards,
irfan.

Coral said...

:) ..क्या बात है ....

Kajal Kumar said...

:)

ashish said...

beautiful ghazal , i am loving it .

डा. अरुणा कपूर. said...

वाह!..मजा आ गया!

arvind said...

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।
...vaah...kyaa khoob likha hai.

aarkay said...

एक अंदाज़ यह भी :

" ख़ुशी इस बात की नहीं कि पत्थर की जगह फूल मारा
ग़म इस बात का है कि तुमने भी गुनाहगार समझा "

सुंदर अभिव्यक्ति, दिव्या जी !

मनीष said...

@ ये सच है की की कोई भी मुल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता...

divya ji, Marvelous … It’s trend setter for me. …
I don’t know who u is... But an institution for me….

I do not know as me, that I’m a good customer... Or you are a good seller?? For thought exchange…

But in that business... I’m always in profit wid you..

Keep it on. Thanks’ you..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूब ...नया अंदाज़ ...

cmpershad said...

खुश हूँ तुम्हारे घर (ब्लॉग) अब वो आने लगे हैं

..... लो जी, हम आ गए हाज़री दलाने :)

दर्शन लाल बवेजा said...

वाह!..मजा आ गया!
मेरी समझ में भी आने लगी हैं कवितायें

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह, क्या पंक्तियाँ है?

Mukesh Kumar Sinha said...

कितने अपनेपन से पूछा था तुमने खैरियत उस ख़त में ।
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर।

wah divya jee ye naya andaaj kaise??

shikha varshney said...

नया अंदाज भी बढ़िया है.

वाणी गीत said...

क्या बात है....
तेरे सवालों के जवाब , तेरे लिए दुआएं ...
देखा तो ग़ज़ल बन गयी ...
सुभान अल्लाह !

Kavita said...

ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता।
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही ।

Khoobsurat ehsaas hain...

सम्वेदना के स्वर said...

जब देखो तब हाथ में खंजर रहता है,
उसके मन में कोई तो डर रहता है

गौर से देखा हर अक्षर को तब जाना,
प्रश्नों में ही तो हर उत्तर रहता है
-अशोक रावत जी से साभार्!

मनोज कुमार said...

रचना के बीच-बीच में ब्रेक क्यों लगा दिया है। पूरी काव्यात्मक भावाभिव्यक्ति एक अलग रचनाकार से परिचय कराती है।
उस ख़त में कितने अपनेपन से
पूछी थी तुमने खैरियत
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर।
खुश हूँ तुम्हारे घर अब वो आने लगे हैं
नाज़ जिनके उठाए फिरते थे दर-ब-दर
बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।
जिस 'अपनेपन' को 'क्रोध' कहकर
तुमने अपमानित कर दिया
किसी मांगकर चखने वाले के लिए
उस 'प्रसाद' को बचाकर रख लिया
सच है कभी अंतिम नहीं होता मूल्यांकन कोई भी।
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही ।

मनोज कुमार said...

सम्वेदना के स्वर को पढ़कर मुझे भी एक शे’र याद आ गया। शेयर कर लूं?

इसका इस रचना से कोई ताल्लुक़ात नहीं है, बस यूं ही ..

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया,
पत्‍थर को बुत की शक्‍ल में लाने का शुक्रिया।
सूखा पुराना जख्‍म, नए को जगह मिली।
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया।

अमिताभ मीत said...

Beautiful, all of them .... but this one remains with me ....

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

Thanks .... simply superb !

सम्वेदना के स्वर said...

मनोज जी वाला डिस्क्लेमर "सम्वेदना के स्वर" का भी माना जायें!

प्रतुल वशिष्ठ said...

अँसुआ गया. न जाने क्या सोच कर?

Poorviya said...

apni samajh se bahar hai ki yeh sab kis ke liya likha gaya hai .....lakin jo likha hai sunder likha hai.....

jai baba banaras.....

सुज्ञ said...

यह दर्द हुआ साकार है।
यह कौन रचनाकार है।
कौन है भटक गया,
घर किसका इन्तज़ार है॥

कौन अक्ल का फ़नकार है।
या मिलीजुली सरकार है।
बुजर्गों में अब भला,
कहां समझ की दरकार है।

अपनेपन का सत्कार है।
या क्रोध की फुफकार है।
मांगने वाले पर क्यों?
यह प्रेम असरदार है।

यह कौन रचनाकार है?

डॉ टी एस दराल said...

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

वाह , वाह , क्या बात है ।

रचना said...

great

mahendra verma said...

कितने अपनेपन से पूछा था तुमने खैरियत उस ख़त में ।
दर्द बढ़ गया है तुम्हें सच्चाई बताकर।

भावनाओं के मोती शब्दों के रूप में झिलमिला रहे हैं।

हर एक शेर जैसे एक कहानी को प्रतिबिम्बित कर रहा है। कविता के रूप में ढलने के बाद शब्दों की ताकत बढ़ गई है।

kshama said...

ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता।
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही ।
Kya kahane! Wah!

M VERMA said...

बहुत खूब

G.N.SHAW said...

फुलगेंदवा न मारो ..न मारो ..लगत करेजवा पे चोट ..बहुत ही नाजुक...

जाट देवता (संदीप पवांर) said...

जाट देवता की राम-राम,
चलो इंतजार खत्म तो हुआ।

Suman said...

जिस अपनेपन को क्रोध कहकर तुमने अपमानित कर दिया था
उस प्रसाद को बचाकर रख लिया है किसी मांगकर चखनेवाले के लिए !
बहुत खुबसूरत ! नया अंदाज पसंद आया है !

संतोष त्रिवेदी said...

'बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।.....'

सच में जीवन का अनुभव निचोड़ दिया,फिर भी हम प्यासे रहे !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया पोस्ट!
बधाई!

डा० अमर कुमार said...

.
जो भी लिखा अच्छा.... अच्छा लिखा
मैं तो नुक्ताचीं हूँ, मेरा काम है नुक्स निकालते रहना
ग़र भूल जाऊँ तो, आपका हक़ है याद दिलाते रहना

आदाब अर्ज़ है !

Dilbag Virk said...

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।
main kahta hoon
umrdraz hokr jo ab syane bne baithe hain
vo bhi to khtabar honge agr khtabar hai jvani
sahitya surbhi

सुशील बाकलीवाल said...

वाकई बेहद चुनिन्दा । बधाईयां...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

naI vidha me bhi achchha likha hai..

कौशलेन्द्र said...

अरे दिव्या जी ! यह क्या लिख दिया ?
इतनी तराशी हुयी नज़्म......!
सच्ची बताना कितने दिन लगे इसे लिखने में ?
खैर यह तो परिहास था. पर वाकई ....अभी तक आपकी जितनी भी दो चार कवितायें पढी हैं उनमें सर्वश्रेष्ठ है यह कविता. लगता है जैसे किसी मंजे हुए साहित्यकार की रचना है. आज अपने माथे पे काला टीका लगा लेना. और हाँ ! अब उतर पड़ो इसी विधा में ....... आज तुम्हें बहुत-बहुत आशीष देने का मन हो रहा है ....तुम्हें मेरे हृदय का, समा न पाए इतना आशीष. जीती रहो ....आयुष्मान भव....कल्याणमस्तु ! ! !

Bhushan said...

Unable to express. :(( and :))

कुश्वंश said...

ये सच है कि अन्दाजे बया
जुदा-जुदा सा है
ये भी सच है
हाथ मे शब्दों से लिपटा
आइना सा है

rashmi ravija said...

सुन्दर लिखा है..

Kunwar Kusumesh said...

भई वाह,एकदम नए अंदाज़ में आना बहुत अच्छा लगा .
आपकी बात से सम्बद्ध नहीं है लेकिन,
कभी किसी मौक़े पर लिखा था,सुनाता हूँ:-
कभी कहते मुहब्बत ही नहीं है.
कभी कहते की नफ़रत भी नहीं है
शिकयातदार लहज़े में हैं लेकिन.
अजी उनको शिकायत भी नहीं है.
वैसे ये हैं कौन ?जिसने आपको शायर बना दिया.

मदन शर्मा said...

नमस्ते दिव्या जी! बहुत अच्छा लिखती हैं आप!

बाबुषा said...

kya baat ! kya baat !kya baat !

Deepak Saini said...

अच्छे शेर है
हर शेर में एक अलग ही बात है
आभार

दीर्घतमा said...

जो भी आप लिखती है उससे प्रेरणा ही मिलती है चाहे गद्य ही या पद्य .बहुत अच्छा बहुत-बहुत धन्यवाद.

ethereal_infinia said...

Dearest ZEAL:

I begin with the acknowledgment of my existential triviality thus -

Maanaa ke musht-e-khaak se badhkar nahi hoon main
Lekin hawaa ke rehm-o-karam par nahi hoon main
[Musht-E-Khaak = Speck Of Sand]

With this, I present to you a ghazal wherein the corresponding thought is picked up from your lines, in that very order. Here it is, written for you and only you:

Jo lekar aayaa thaa khat tumhaare dar pe naamaabar
Laautaa paigaam-e-nighaahi-e-shauq le ke baraabar
[Naamaabar = Messenger,
Paigaam-E-Nighaahi-E-Shauq = Message Conveyed By The Beloved’s Eyes]

Naaz ki to kyaa baatein kare, hum to ulfat ke maare hain
Maano chaahe naa maano, sach baaki yehi hain saraasar

Waaiz hue hum ke hue aashuftaasar, aap jaane yaa Khudaa
Hum chale chale hain qazaa ki aur, pakde umr ki rehguzar
[Waaiz = Learned, Aashuftaasar = Mad, Qazaa = Death, Rehguzar = Path]

Baat hain dil mein tere yakin ki, marz ko koi jaane kyaa
Rakho bachaake yaa keh do use, tum hi to ho chaaraagar
[Marz = Ailment, Chaaraagar = Doctor / Healer]

Qaafilaa-e-waqt mein jude ‘Arth’ se taab-e-hayaat puchh
Raahzaan bane yahaan kaun uskaa, tum jab bane ho raahbar
[Qaafilaa-E-Waqt = Time’s Caravan, Taab-E-Hayaat = Zeal Of Life,
Raahzaan = Robber / Thief, Raahbar = Guide]

I will end with another couplet of the same ghazal that I began with.

Here, I pay the tribute to your colossal stature.

Ghalib teri zameen mein likhi to hain ghazal
Tere qad-e-sukhan ke baraabar nahi hoon main
[Qad-E-Sukhan = Level Of Creation]


Semper Fidelis
Arth Desai

sidheshwer said...

wit !
too good..

शोभना चौरे said...

दोस्तों ये जमाना क्या हो गया
जिसे अपना माना वो बेवफा हो गया |

आकाश सिंह said...

बहुत ही बढ़िया पोस्ट है
बहुत बहुत धन्यवाद|
----------------------
एक मजेदार कविता के लिए यहाँ आयें |
------------------------
www.akashsingh307.blogspot.com

धीरेन्द्र सिंह said...

आपकी यह पहली कविता मैं पढ़ रहा हूँ, अच्छी लगी. उम्मीद है अब आप की कवितायेँ जल्दी-जल्दी मिलती रहेंगी.

Apanatva said...

जिस 'अपनेपन' को 'क्रोध' कहकर
तुमने अपमानित कर दिया
किसी मांगकर चखने वाले के लिए
उस 'प्रसाद' को बचाकर रख लिया

bahut badiya......

सञ्जय झा said...

sundar....ati sundar........

pranam.

रश्मि प्रभा... said...

ये सच है की कोई भी मूल्यांकन कभी अंतिम नहीं होता।
लेकिन अंतिम मूल्यांकन की अब ताब नहीं रही ।
...
kai baar hota hai n ki soch apni beinthaan milti hai

संजय कुमार चौरसिया said...

रामनवमी पर्व की ढेरों बधाइयाँ एवं शुभ-कामनाएं

अरूण साथी said...

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

बेहतरीन रचना। आभार।

poonamsingh said...

आपकी यह कविता अच्छी लगी.

Rakesh Kumar said...

लगता है बहुत गहराई में चली गई हैं इस बार.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

चलओ खंजर..फुल गेंदवा न मारो...लगत करेजवा पे चोट...
...वाह! यह भी खूब रही।

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

फुलगेंदवा न मारो ..न मारो ..लगत करेजवा पे चोट.

शीर्षक बड़ा प्यारा है !

बुजुर्गियत को अक्ल का पैमाना समझते हैं वो
उम्र मेरी अनायास ही गुनहगार हो गयी।

बहुत खूब .....

इस बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बधाई
आपको भारतीय नए वर्ष के साथ-२ राम नवमी की भी हार्दिक शुभकामनाएँ!

अमित श्रीवास्तव said...

बुज़ुर्गी बा-अकलस्त ,ना बे-अज़ साल,
तवंगरी बा-दिलस्त ,ना बे-अज़ माल ।

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

ये तो आज बिलकुल हट के लग रहा है.... बहुत अच्छी लगी सारी पंक्तियाँ व उनमे बसा सार.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

वाह क्या बात है !
सभी नदियाँ ,,,पर्वत के सीने से ही निकलती हैं |

nivedita said...

बेहद भावपूर्ण ,विषेशकर अन्तिम दो पंक्तियां -
-कोई भी मूल्यांकन अन्तिम नहीं होता -
लाजवाब ...

सदा said...

वाह ... बहुत खूब ।