ये एक मानवीय स्वभाव है की अक्सर किसी को किसी की कोई बात बुरी लग जाती है और दुःख पहुँचता है। फिर विवाद होता है , और फिर रंजिश , फिर दूसरों पर अभद्र और अशिष्ट लांछन लगाना । कभी कभी ये सिलसिला थमता ही नहीं। कुछ व्यक्ति बदले की भावना से कब इस मनोविकार से ग्रस्त हो जाते हैं , उन्हें पता ही नहीं चलता। ऐसे व्यक्तियों के जीवन का बस एक ही प्रयोजन रह जाता है , किसी भी तरह दुसरे व्यक्ति को नीचा दिखाना। लेकिन ऐसा करते समय वे ये भूल जाते हैं की दुसरे का अपमान करते समय वे अपने ही संस्कारों और चरित्र का परिचय दे रहे होते हैं।
ऐसे अवस्था में सबसे दुखद बात ये है की , कुछ गुट्बाज जो ऐसा मौक़ा तलाशते हैं की पुरानी रंजिश कैसे निभाई जाए , वो इनके साथ हाथ मिलाकर इनके नफरत की आग को हवा देते हैं । विवाद में निष्पक्ष रह पाना शायद बहुत बड़ा गुण है फिर भी , विद्वान् पाठक अपने अनुभवों और समझ के अनुसार नीर छीर विभाजन कर ही लेता है।
एक सप्ताह पूर्व एक विद्वान् ब्लोगर ने अपने ब्लॉग पर एक स्त्री के खिलाफ एक लेख लिखा जहाँ रंजिश निकालने वाले दुसरे विद्वान् ब्लोगर ने आकर उस स्त्री पर अनेकों अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियां लिखीं। चूँकि लेखक और वो टिप्पणीकार एक ही गुट के थे , इसलिए उसकी टिप्पणियाँ वहां सजा कर रखी गयीं लेकिन जिन सभ्रांत पाठकों ने इस अश्लीलता का विरोध किया , उनकी टिप्पणियाँ वहाँ से डिलीट कर दी गयीं।
एक ब्लोगर प्रवीण शाह जब उस लेख पर आये तो उन्हें उस कीचड-उछाल लेख से बहुत प्रेरणा मिली तथा उन्होंने एक कविता लिखी - " मुझे झगडे बहुत पसंद हैं , मैं अमन के पैगाम नहीं देता " । इनकी पोस्ट पर जो टिप्पणियां आयीं उनमें से सभ्य टिप्पणियों को छोड़कर अशिष्ट एवं अश्लील टिप्पणियां डिलीट कर दी गयीं । लेकिन दुखद बात ये है की जिस लेख से उन्हें प्रेरणा मिली थी , उस लेख के ब्लोगर तथा मित्र टिप्पणीकार , जो एक स्त्री का तिरस्कार कर रहे थे , उनकी टिप्पणियां प्रवीण शाह ने डिलीट नहीं की तथा ट्रोफी की तरह सजा कर रखीं । क्या गुटबाजी लोगों के खून में समां गयी है?
मैं कोशिश करती हूँ की ऐसी टिपण्णी लिखूं जो किसी को दुःख न दे , पूर्वाग्रहों से रहित हो , ईर्ष्या से मुक्त हो , किसी के मन के दुःख न दे , भड़ास रहित हो तथा लेखक अथवा लेखिका के लिए प्रोत्साहन युक्त हो , तथा विषय की सार्थकता भी बढाए।
लेकिन शायद टिपण्णी लिखने में मुझसे कहीं कोई गलती हो रही है , इसलिए प्रवीण शाह जैसे विद्वान् ब्लोगर ने अशिष्ट टिप्पणियों के साथ मेरी टिपण्णी को डिलीट करना उचित समझा । मैं नीचे हरे रंग में अपनी उस टिपण्णी को यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ , कृपया उसे पढ़ें और बताएं , क्या यह अभद्र है ?, अश्लील है ? भड़ास है ? किसी का व्यक्तिगत अपमान है ? या इमानदार विचार है ।
आपके विचारों से मुझे मदद मिलेगी ये जानने में की आपको कैसी टिपण्णी पसंद है , और फिर आपके ब्लॉग पर टिपण्णी करते समय जरूरी सावधानियां बरतने में मुझे मदद मिलेगी।
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प्रवीण जी ,
बहुत अच्छी लगी कविता एवं प्रेरणादायी भी लगी । क्रोध के वशीभूत होकर कुछ लोग अत्यंत अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियां करते हैं। बदले की भावना के वशीभूत होकर होकर वो अपने नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे देते हैं।
किसी भी स्त्री को सरेआम बदनाम करने में कुछ पुरुष अपनी मर्दानगी समझते हैं। क्यूंकि जिस स्त्री का वो अपमान कर रहे होते हैं , वो उनकी अपनी माँ और बहन नहीं होती , इसलिए अश्लीलता से ओत-प्रोत टिपण्णी एवं लेख लिखकर मर्दानगी का परिचय देते हैं।
बहुत अफ़सोस होता है ये देखकर की आजकल के पुरुष माता-पिता के दिए संस्कारों की तिलांजलि कैसे दे देते हैं।जिसके घर माँ बेह्नेनें हों वो कैसे किसी अनजानी स्त्री को , साथी ब्लोगर को , किसी अनजान पुरुष की पत्नी को , किसी की बेटी को , और छोटे-छोटे बच्चों की माँ पर अभद्र एवं अश्लील टिपण्णी लिख सकता है ?
परिवार से बाहर की स्त्री को अपमानित करने का license , ये पुरुष कहाँ से लाते है ? स्त्री को अपमानित करते समय क्या ये अपने संस्कारों का परिचय नहीं दे रहे होते ?
बेहद खेदजनक है की यदि कोई लेखक एक साथी ब्लोगर पर अश्लील लेख लिखकर , लोगों को अभद्र टिप्पणियां लिखकर अपमानित करवाता है । कलम का इतना दुरुपयोग पहले कभी नहीं देखा था।
यदि आज के कुछ ब्लोगर स्त्रियों का इस तरह से अपमान करेंगे , तो समाज के लिया इनका क्या योगदान होगा ?
क्या इस विकृत मानसिकता के चलते हम समाज सुधार और विकास के बारे में कभी सोच भी सकेंगे ?
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आपके बहुमूल्य विचारों की अपेक्षा में..
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