एक दिन नेहा को अपनी सहेली प्राची का पत्र मिला , जिसमें उसने अपने माँ ना बन पाने के असीम दुःख का उल्लेख किया था। आसुओं से भीगे उस पत्र में मदद की गुहार थी। स्वभाव से अति-भावुक नेहा ने अपनी सहेली की मदद करने की ठान ली। उसने अपने पति , राम से इस सन्दर्भ में बात की। दोनों ने ही ख़ुशी-ख़ुशी प्राची व उसके पति को अपना बच्चा देना स्वीकार कर लिया। नेहा ने अपने इस फैसले की सूचना अपनी सहेली प्राची को दी और समय के साथ नेहा गर्भवती हो गयी..जैसे जैसे गर्भ में पल रहा बच्चा बड़ा हो रहा था , नेहा की व्यग्रता बढती जा रही थी क्यूंकि प्राची और उसके पति ने एक बार भी पलटकर नेहा से इस सन्दर्भ में बात करना जरूरी नहीं समझा । उन्हें शायद उधार की कोख में रूचि नहीं थी। नेहा ने निराश होकर राम से अपनी चिंता जाहिर की। राम ने नेहा से कुछ समय इंतज़ार करने को कहा । लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। प्राची और उसके पति को शायद नेहा के बलिदान की जरूरत नहीं थी। उन्होंने नेहा से बात नहीं की। नेहा की सेहत गिरती जा रही थी ...गर्भ डेढ़ मॉस का हो चला था। नेहा तथा उसके पति राम ने निराश होकर गर्भपात कराने का निर्णय लिया। इस दौरान नेहा अपने परिवार तथा दो छोटे बच्चों का ध्यान भी नहीं रख पा रही थी। उसकी जिंदगी अस्त व्यस्त सी हो गयी थी। गर्भपात कराकर नेहा मानसिक तौर पर बहुत टूट चुकी थी। एक मासूम की जान लेने का गुनाह उससे हो चुका था। इस बोझ से तो उसे जीवन भर जूझना है अब । नेहा ने फोन पर अपनी सहेली को इन सब बातों से अवगत कराया, लेकिन प्राची तटस्थ थी। उसने इसे कहानी की तरह सुन लिया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। नेहा को अपने गुनाह की सज़ा भी अविलम्ब मिल गयी । Ultra sound से नेहा को पता चला की उसके गर्भाशय में ट्यूमर है । नेहा अब मरीज बन गयी है और अस्पतालों के चक्कर लगा रही है। राम चिंतित है नेहा के गिरते स्वास्थ्य के कारण और उनका परिवार एक मुश्किल मानसिक दौर से गुज़र रहा है। नेहा को भावुकता में लिए गए निर्णय का असीम पश्चाताप है , लेकिन जिंदगी ने उसको एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा दिया था। नेहा ने समझ लिया था उसका कोई मित्र नहीं है । सभी स्वार्थी हैं। नेहा का भरोसा सब पर से उठ चुका है। और उसने सबसे अपना नाता तोड़ लिया है। नेहा अब इस कोशिश में जी रही है की अपने गिरते स्वास्थ्य के कारण अपने परिवार वालों की चिंता कम कर सके। और उनके प्रति अपने दायित्वों को निभा सके। [नेहा की कहानी एक सत्य घटना है , इस अनुभव से शायद किसी को लाभ मिल सके इसलिए इसे यहाँ प्रस्तुत किया गया है। जो भावुकता की कद्र करने वाला न हो , उसके लिए भावुक होकर निर्णय नहीं लेने चाहिए। ]आभार।
दिल्ली में एक नवविवाहित जोड़ा अपने परिवार वालों से डरकर छुपता फिर रहा है। उन्हें डर है उनके घर वाले कहीं उन्हें मरवा ना डालें। उस दम्पति का जुर्म सिर्फ इतना है की उन्होंने प्रेम-विवाह किया है । २८ साल का युवक जिसकी दोनों टांगें पोलिओ से ग्रस्त हैं , को एक ऐसी सुन्दर और सुशील लड़की मिली जो सर्व गुण संपन्न है तथा इस युवक से प्यार करती है। कल जब दोनों का सुन्दर , मासूम और सहमा हुआ चेहरा टीवी पर देखा तो मन में यही प्रश्न आया की क्या प्रेम-विवाह करने वाले घुट-घुट कर जीने तथा समाज से तिरस्कार मिलने के लिए अभिशप्त हैं ?वही माता पिता जो अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने के लिए तत्पर रहते हैं , वो आखिर क्यूँ अपनी संतान के खिलाफ हो जाते हैं जब वो अपनी पसंद की लड़की अथवा लड़के से शादी करना चाहते हैं। जब बच्चे वयस्क हो जाते हैं , तो वो अपना अच्छा बुरा समझने के लायक हो जाते हैं। इसलिए विवाह जैसा अहम् फैसला संतान की मर्जी से ही होना चाहिए। और माता-पिता को अपने बच्चे की ख़ुशी में शामिल होकर अपने आशीर्वाद के साथ , उनके चयन को सम्मान देकर उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए। जीवन में चाहे आपदाएं आयें, चाहे समस्याएं , चाहे तिरस्कार , प्रत्येक स्थिति में यदि कोई साथ देता है तो वो हैं माता पिता और परिवार वाले। फिर प्रेम विवाह जैसी परिस्थिति में माँ बाप साथ क्यूँ नहीं देते जबकि उस समय उन मासूम बच्चों को समाज के प्रतिकार से बचने के लिए अपनों की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है । प्रेम तो एक सदगुण है फिर प्रेम विवाह समाज में इतना उपेक्षित क्यूँ है ? क्या मनचाहा जीवन-साथी पाने के लिए अपनों से जुदा होना ही नियति है मासूमों की ? या फिर क्रूर परिवार वाले अपने झूठे दंभ को पोषित करने के लिए इसी तरह प्रेम करने वालों की जान के प्यासे बने रहेंगे सदा ?