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Monday, December 24, 2012

लाचार भारत की एक तस्वीर

आज़ादी के बाद देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है ।
लोकतन्त्र के साये में कुल का आकार बढ़ा है॥
भारत भ्रष्टाचार राशि दोनों की एक रही है ।
काँग्रेस के साथ करप्शनका भी हाल यही है॥
पहले केवल हरे नोट पर गान्धी जी आए थे।
उसके माने काँग्रेस ने हमको बतलाए थे ॥
चपरासी बाबू अफसर जब दफ्तर में तन जाए।
हरा नोट दिखला दो बिगड़ा हुआ काम बन जाए॥
आम आदमी को पहले इसकी आदत डलवाई ।
उस के बाद करप्शन की सीमायें गईं बढ़ाई ॥
दस के बाद पचास बाद में सौ पर बापू आए ।
उसके बाद करप्शन ने अपने जौहर दिखलाए ॥
काँग्रेस ही सूटकेस की धाँसू कल्चर लाई ।
बापू की तस्वीर पाँच सौ के नोटों पर आई॥
दो गड्डी में पेटी भर का काम निकल जाता है।
लेन देन का धन्धा भी सुविधा से चल जाता है॥
अब तो चिदम्बरम साहब चश्में को पोंछ रहे हैं।
भ्रष्टाचार घटाने की तरकीबें सोच रहे हैं ॥
बड़े-बड़ों के घर आए दिन छापे डाल रहे हैं ।
गान्धी बाबा गड़े हुए हैं उन्हें निकाल रहे हैं ॥
पहले सारा गड़ा हुआ धन ये बाहर ले आए ।
फिर हजार के नोटों पर गान्धीजी को छपबाए॥
पेटी अब पैकेट बनकर पाकेट में आ जाती है।
सोन चिरैया भारत में अब नजर नहीं आती है॥
लालू एक हजार कोटि की सीमा लाँघ चुके हैं।
नरसिम्हा चन्द्रास्वामी सब इसे डकार चुके हैं॥
माया के चक्कर में बी.जे.पी. ने साख गँवाई।
छ: महिने में माया ने अपनी माया दिखलाई॥
गली- गली नुक्कड़-नुक्कड़ चौराहे-दर-चौराहे।
बाबा साहब भीमराव के स्टेचू गड़वाए ॥
नोटों पर गान्धी बाबा ने अपना रंग दिखाया ।
चौराहे पर बाबा साहब ने वोटर भरमाया ॥
स्विस-लाण्ड्री से जिनके कपड़े धुलकर आते थे।
और मौज मस्ती को जो स्वित्ज़रलैंड जाते थे॥
काँग्रेस ने उनसे इन्ट्रोडक्शन करा लिया है।
नाती-पोतों के खातों का मजमा लगा दिया है॥
रानी की शह पाकर ए.राजा ने हद कर डाली।
कलमाड़ी के कीर्तिमान की कली-कली चुनवा ली॥
मनमोहन बन भीष्म बैठकर नाटक देख रहे हैँ।
चीर- हरण हो रहा और वे आँखें सेंक रहे हैँ ॥
अब तक 65 सालों में जो कुछ हमने पाया है।
वह सब विश्व बैंक के चैनल से होकर आया है॥
काँग्रेस का बीज यहाँ अँग्रेजों ने बोया था ।
जिसके कारण भारत का जो स्वाभिमान खोया था॥
उसको योग-क्रान्ति के द्वारा फिर वापस लाना है।
'क्रान्त' का ये सन्देश आपको घर- घर पहुँचाना है॥
ओम् 'क्रान्ति'!!!

By Dr M L Verma Krant 

Saturday, June 18, 2011

लेखक और क्रांति

क्या अकेला चना कभी भाड़ फोड़ सकता है ?

जब भी कहीं किसी देश में , किसी मुद्दे पर क्रांति आती है तो यह बिना जन-चेतना के संभव नहीं है। हर क्रान्ति के पहले वैचारिक-क्रांति का मस्तिष्क में होना सबसे जरूरी है। इसी को जागरूकता कहते हैं यह जागरूकता कैसे आती है ? संवाद से , मीडिया से , पठन से विमर्श आदि से

आज कम्पूटर द्वारा , अनेकों वेब-साईट्स पर , फेस-बुक पर , ट्विट्टर पर , ब्लॉगिंग द्वारा करोड़ों लोगों तक पहुंचा जा सकता है। अपने विचारों को अनेक लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। लोगों की आवाज़ में आवाज़ मिलाना संभव हुआ है । Information और technology की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

संचार के माध्यम से हिंसा-रहित , बिना खून-खराबे के , विचारों का आदान-प्रदान संभव हो सका है जन चेतना जगाने में आधुनिक तकनीक की महती भूमिका है।

व्यस्तता के इस दौर में जहाँ रोजी-रोटी के लिए व्यक्ति हड्डी-तोड़ मेहनत कर रहा है , और उसके पास आन्दोलनों में सड़क पर उतरने का वक़्त नहीं है , वहाँ पर संचार माध्यम से अपनी बात को लिखकर अपना योगदान कर पा रहा है बच्चा-बच्चा। और यही लिखित शब्दों की ताकत ही है जो समाज को , क्रांति की नयी ऊर्जा से भर रहा है

कितने ही लोग सड़क पर उतरकर आन्दोलन का हिस्सा नहीं बन पाते , अनशन पर भी नहीं बैठ पाते , लेकिन वे लेखन के माध्यम से अपना योगदान करना चाहते हैं , अपनी आवाज़ क्रांतिकारियों की आवाज़ में मिलाना चाहते हैं और हर क्रान्ति को सफल बनाने के लिए वैचारिक क्रांति लाना चाहते हैं। तो क्या लेखन में समय देना व्यर्थ है??

कोई भी क्रान्ति किसी एक के लाने से नहीं होती , जन-जन का सहयोग जब विभिन्न स्तर पर होता है , और लोग जी-जान से समर्पित होते हैं , वैचारिक क्रांति उन पर पूरी तरह छा जाती है , तभी कोई क्रांति अपना रंग लाती है।

क्या लेखक जो अपने लेखन से विचारों के बीज बोता है और विचारों को पैदा करता है , उसे आयाम देता है , और समय के साथ उसमें से क्रांति के अंकुर फूटते हैं , क्या यह भूमिका नगण्य है ?

Zeal

Friday, June 10, 2011

पारदर्शिता की क्रान्ति -- Revolution of transparency.

भारत की मिटटी में जन्मे , वीर क्रांतिकारी बाबा रामदेव को नमन।

लोग देश के शहीद क्रांतिकारियों को वर्ष में एक दिन याद करके और 'नमन' करके अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन यदि कोई देशभक्त भूखा प्यासा रहकर देश की हित की बात करता है , तो जनता का एक बड़ा हिस्सा पूरी ताकत से उसकी खिलाफत करने में जुट जाता है। तोड़ देना चाहता है इस स्वर्णिम क्रान्ति की लहर को। देशभक्तों के मनोबल को

लेकिन क्या इस क्रान्ति को तोडना संभव है ? क्या सच्चाई की आवाज़ को दबाया जा सकता है ? क्या सांच को भी आंच होती है ?

ये पारदर्शिता की क्रांति है। जो काम पिछले ६५ वर्षों में नहीं हो पाया , वो बाबा ने भूखे रहकर करा दिया। अपनी संपत्ति का भी हवाला दिया और प्रधानमन्त्री से लेकर अन्य सभी नेताओं को मजबूर कर दिया पारदर्शिता के साथ अपनी संपत्ति का हवाला देने को।

यही विजय है इस आन्दोलन की। बाबा सफल हैं अपने आन्दोलन में देश के , वे डेढ़ लाख लोग , जिन्होंने पुलिस की लाठियां खायीं , वे भी सफल हुए। उनका त्याग रंग लाया। देश के वे करोड़ों लोग जो देश-विदेश में बाबा के समर्थक हैं , वे हर्षित हैं इस विजय पर और यथा संभव अपना योगदान कर रहे हैं।

बाबा को दिल्ली आने पर रोक लगा दी। ये तो तानाशाही की मिसाल है। क्या क्रांतिकारी तड़ीपार हैं ? जो विदेश में रहते हैं वो जानते हैं की अपनी धरती पर होने की ख़ुशी क्या होती है। लेकिन यहाँ तो बाबा को अपने ही देश में स्वतंत्रता नहीं है अपनी बात रखने की दिल्ली राजधानी है। यदि सरकार अपनी बात केंद्र में रहकर करती है, तो जनता को अपनी बात कहने के लिए राजधानी में आन्दोलन से क्यूँ वंचित किया।

क्या दिल्ली की सुरक्षा ज्यादा ज़रूरी है , हरिद्वार वालों को बाबा से कोई खतरा नहीं ? दिल्ली के बाहर क्या होता है और क्या नहीं , क्या इसकी जिम्मेदारी केंद्र की नहीं है?

सरकार किस बात से डर रही है ? और डर क्यूँ लगता है ? क्या चोर की दाढ़ी में तिनका है ?

यदि बाबा इतने मामूली हैं तो डर काहे का ? करने दो आन्दोलन हज़ार सैन्य बल द्वारा जनता को मारा , प्रताड़ित किया , इसके लिए कोई खेद है कसाइयों को ? मासूम जनता को बाबा से खतरा है या फिर इन वहशी कृत्यों को अंजाम देने वाली सरकार से ? हड्डी तोड़ी , लोगों को paralytic कर दिया , लोग कोमा में हैं ...क्या दया आती है निर्दयी सरकार को ? क्या शर्म की दो बूँदें शेष हैं आखों में ?

अपने संविधान में इस बात का प्राविधान है की लोग शांतिपूर्ण से तरीके से कहीं भी इकट्ठे होकर विमर्श कर सकते हैं , आन्दोलन कर सकते हैं। फिर सोयी हुयी जनता पर इतनी बर्बरता क्यूँ ?

यदि सरकार अपने दायित्वों को भुलाकर सोयी रहेगी तो आम जनता का ह्रदय तो छटपटायेगा ही क्यूँ नहीं काला धन वापस लाया जा रहा और क्यूँ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम पर केंद्र को आपत्ति है , किस बात का डर है ?

यदि कोरोड़ों की संख्या में जनता बाबा का समर्थन कर सकती है तो क्यूँ नहीं अन्य संगठन कर सकते हैं? फिर RSS के समर्थन करने पर विवाद क्यूँ ? देश हित के लिए हो रहे जन आदोलन में RSS , मौन दर्शक को नहीं रह सकती न। तटस्थ रहने वालों को इतिहास कभी माफ़ नहीं करता।

जो कर्मशील हैं , वो निजी लाभ से बहुत ऊपर उठकर देश-हित के लिए चिंतन करते हैं और सतत देश के विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। जब कोई अच्छे कार्यों के लिए आगे आता है तो असामाजिक तत्व उसके विरूद्ध में खड़े होकर बाधा उत्पन्न करने की कुचेष्टा करते हैं। लेकिन ऐसे शरारती तत्वों की दाल नहीं गलती , क्यूंकि बुरायी पर अच्छाई की लड़ाई में सारी प्रकृति और ईश्वर भी साथ आकर खड़ा हो जाता है जैसे रावण के खिलाफ राम और कुरुक्षेत्र में स्वयं श्रीकृष्ण सारथि बनकर युद्ध के मैंदान में सत्य की रक्षा के लिए उतर पड़े थे

ये कलियुग की महाभारत है , अब ये आपके ऊपर है की आप किस तरफ जाना चाहते हैं

मैं तो अपनी आवाज़ भारत-स्वाभिमान के इस आन्दोलन में मिला रही हूँ मैं बाबा के साथ हूँ, मैं अन्ना हजारे , केजरीवाल , किरण जी के साथ हूँ। मैं अपने देश की मासूम और देशभक्त जनता के साथ हूँ।

जय हिंद!
जय भारत !
वन्दे मातरम् !