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Friday, June 10, 2011

पारदर्शिता की क्रान्ति -- Revolution of transparency.

भारत की मिटटी में जन्मे , वीर क्रांतिकारी बाबा रामदेव को नमन।

लोग देश के शहीद क्रांतिकारियों को वर्ष में एक दिन याद करके और 'नमन' करके अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन यदि कोई देशभक्त भूखा प्यासा रहकर देश की हित की बात करता है , तो जनता का एक बड़ा हिस्सा पूरी ताकत से उसकी खिलाफत करने में जुट जाता है। तोड़ देना चाहता है इस स्वर्णिम क्रान्ति की लहर को। देशभक्तों के मनोबल को

लेकिन क्या इस क्रान्ति को तोडना संभव है ? क्या सच्चाई की आवाज़ को दबाया जा सकता है ? क्या सांच को भी आंच होती है ?

ये पारदर्शिता की क्रांति है। जो काम पिछले ६५ वर्षों में नहीं हो पाया , वो बाबा ने भूखे रहकर करा दिया। अपनी संपत्ति का भी हवाला दिया और प्रधानमन्त्री से लेकर अन्य सभी नेताओं को मजबूर कर दिया पारदर्शिता के साथ अपनी संपत्ति का हवाला देने को।

यही विजय है इस आन्दोलन की। बाबा सफल हैं अपने आन्दोलन में देश के , वे डेढ़ लाख लोग , जिन्होंने पुलिस की लाठियां खायीं , वे भी सफल हुए। उनका त्याग रंग लाया। देश के वे करोड़ों लोग जो देश-विदेश में बाबा के समर्थक हैं , वे हर्षित हैं इस विजय पर और यथा संभव अपना योगदान कर रहे हैं।

बाबा को दिल्ली आने पर रोक लगा दी। ये तो तानाशाही की मिसाल है। क्या क्रांतिकारी तड़ीपार हैं ? जो विदेश में रहते हैं वो जानते हैं की अपनी धरती पर होने की ख़ुशी क्या होती है। लेकिन यहाँ तो बाबा को अपने ही देश में स्वतंत्रता नहीं है अपनी बात रखने की दिल्ली राजधानी है। यदि सरकार अपनी बात केंद्र में रहकर करती है, तो जनता को अपनी बात कहने के लिए राजधानी में आन्दोलन से क्यूँ वंचित किया।

क्या दिल्ली की सुरक्षा ज्यादा ज़रूरी है , हरिद्वार वालों को बाबा से कोई खतरा नहीं ? दिल्ली के बाहर क्या होता है और क्या नहीं , क्या इसकी जिम्मेदारी केंद्र की नहीं है?

सरकार किस बात से डर रही है ? और डर क्यूँ लगता है ? क्या चोर की दाढ़ी में तिनका है ?

यदि बाबा इतने मामूली हैं तो डर काहे का ? करने दो आन्दोलन हज़ार सैन्य बल द्वारा जनता को मारा , प्रताड़ित किया , इसके लिए कोई खेद है कसाइयों को ? मासूम जनता को बाबा से खतरा है या फिर इन वहशी कृत्यों को अंजाम देने वाली सरकार से ? हड्डी तोड़ी , लोगों को paralytic कर दिया , लोग कोमा में हैं ...क्या दया आती है निर्दयी सरकार को ? क्या शर्म की दो बूँदें शेष हैं आखों में ?

अपने संविधान में इस बात का प्राविधान है की लोग शांतिपूर्ण से तरीके से कहीं भी इकट्ठे होकर विमर्श कर सकते हैं , आन्दोलन कर सकते हैं। फिर सोयी हुयी जनता पर इतनी बर्बरता क्यूँ ?

यदि सरकार अपने दायित्वों को भुलाकर सोयी रहेगी तो आम जनता का ह्रदय तो छटपटायेगा ही क्यूँ नहीं काला धन वापस लाया जा रहा और क्यूँ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम पर केंद्र को आपत्ति है , किस बात का डर है ?

यदि कोरोड़ों की संख्या में जनता बाबा का समर्थन कर सकती है तो क्यूँ नहीं अन्य संगठन कर सकते हैं? फिर RSS के समर्थन करने पर विवाद क्यूँ ? देश हित के लिए हो रहे जन आदोलन में RSS , मौन दर्शक को नहीं रह सकती न। तटस्थ रहने वालों को इतिहास कभी माफ़ नहीं करता।

जो कर्मशील हैं , वो निजी लाभ से बहुत ऊपर उठकर देश-हित के लिए चिंतन करते हैं और सतत देश के विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। जब कोई अच्छे कार्यों के लिए आगे आता है तो असामाजिक तत्व उसके विरूद्ध में खड़े होकर बाधा उत्पन्न करने की कुचेष्टा करते हैं। लेकिन ऐसे शरारती तत्वों की दाल नहीं गलती , क्यूंकि बुरायी पर अच्छाई की लड़ाई में सारी प्रकृति और ईश्वर भी साथ आकर खड़ा हो जाता है जैसे रावण के खिलाफ राम और कुरुक्षेत्र में स्वयं श्रीकृष्ण सारथि बनकर युद्ध के मैंदान में सत्य की रक्षा के लिए उतर पड़े थे

ये कलियुग की महाभारत है , अब ये आपके ऊपर है की आप किस तरफ जाना चाहते हैं

मैं तो अपनी आवाज़ भारत-स्वाभिमान के इस आन्दोलन में मिला रही हूँ मैं बाबा के साथ हूँ, मैं अन्ना हजारे , केजरीवाल , किरण जी के साथ हूँ। मैं अपने देश की मासूम और देशभक्त जनता के साथ हूँ।

जय हिंद!
जय भारत !
वन्दे मातरम् !