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Wednesday, April 23, 2014

कांग्रेस का असली चेहरा

कांग्रेस भ्रष्टाचार का विरोध इसलिए नहीं करती क्योंकि पर्त दर पर्त इनकी खादानी बखिया उधड़ती चली जायेगी ! स्विस पत्रिका (नवम्बर १९९१) में छपे तत्कालीन खाताधारकों में 'राजीव गांधी' की तस्वीर देखिये ! राजीव गांधी की तस्वीर के नीचे लिखा है उस समय (१९९१) का इनका बैंक बैलेंस जो है '2.5 billion Swiss Francs' अर्थात 13,200 करोड़ रूपए !
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Tuesday, July 31, 2012

निंदा करना ज़रूरी है क्या ?

बहुत से लोगों के मत में अन्ना टीम तानाशाही कर रही है, और बाबा रामदेव के आन्दोलन में विघ्न भी उत्पन्न करती है और भारत स्वाभिमान के प्रयासों का लाभ स्वयं ले लेना चाहती है। काफी हद तक ये बात सच भी है। कहीं-कहीं ये टीम स्वार्थी हो जा रही है। लेकिन आम जनता को इनके प्रति अपने मन में द्वेष नहीं रखना चाहिए। आम जनता तो बस कार्यों को देखें । यदि आन्दोलन जनहित में है तो समर्थन करना चाहिए। आन्दोलनकारी अपने आपसी मतभेदों से स्वयं ही निपट लेंगे। हमें बीच में नहीं पड़ना चाहिए। हमारा काम तो सद्प्यासों को आगे ले जाना होना चाहिए।

फेसबुक और ब्लॉग पर भी अनेक राष्ट्रवादी लेखक हैं, लेकिन वे सभी एक दुसरे से समन्वय और सामंजस्य बना कर रखते हों ऐसा नहीं है। अतः सबको अपने तरीके से काम करने देना चाहिए। मुख्य बात ये है, की सभी राष्ट्रहित में लिख रहे हैं। साथ रहे, या न रहे, ये ज़रूरीनहीं है।

मानव स्वभाव थोडा-बहुत ईर्ष्या और द्वेष से युक्त होता है। कोई संत ही होगा जो इन मानवीय दुर्गुणों से ऊपर उठ पायेगा। अतः मानवीय स्वभाव को समझते हुए इस बात पर गौर करना होगा। अच्छे मंतव्यों को तवज्जो दीजिये। उद्देश्य बड़ा होना चाहिए। अनशन करने वाला व्यक्ति नहीं।

Zeal

Sunday, May 13, 2012

Be careful Dev !

कुछ बातें सिलसिलेवार---

१- भगवा वस्त्रों के साथ मुल्ली-टोपी और पोप की टोपी, कैप और हैट और पगड़ी जंचती नहीं।
२- सत्यवादियों और स्पष्टवादियों को राजनीति और कूटनीति की बैसाखी की ज़रुरत नहीं होती।
३- आरक्षण एक कोढ़ है , फिर दलितों के नाम से आरक्षण की बात क्यों की गयी ? और मुस्लिम-दलित और इसाई-दलित क्या होता है? जो जागरूक नहीं है , पढ़ा-लिखा होते हुए भी अज्ञानी है , जो राष्ट्र-हित में न सोचता हो वो सभी दलित ही तो हैं । फिर ऐसे दलितों को आरक्षण देने से लाभ क्या? अजगर करे न चाकरी, सबके दाता राम की तर्ज पर ये आरक्षण का लाभ लेते हैं और सामान्य जनता अपना हक मारे जाने पर खून के आँसू रोती है।
४- इस दलित आरक्षण से सत्ता में एक से बढ़कर बे-शऊर लोग बैठे हैं जो पूरे प्रांत का स्तर गिरा रहे हैं। सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर-प्रदेश है।
५- कौआ हो अथवा हंस, जब वो अपनी चाल बदलता है तो औंधे मुंह गिरता ही है।
६- जनता जब किसी को सर आँखों पर बैठाती है, तो उससे बड़ी अपेक्षाएं पैदा कर लेती है। उससे एक छोटी सी भी गलती होने पर माफ़ नहीं करती।
७- सनद रहे-- बड़े लोगों को छोटी सी भूल पर भी "बड़ी-सजा" ही मिलती है।

अतः, भूल से भी कोई भूल हो ना.......

वन्दे मातरम् !

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Friday, June 10, 2011

पारदर्शिता की क्रान्ति -- Revolution of transparency.

भारत की मिटटी में जन्मे , वीर क्रांतिकारी बाबा रामदेव को नमन।

लोग देश के शहीद क्रांतिकारियों को वर्ष में एक दिन याद करके और 'नमन' करके अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन यदि कोई देशभक्त भूखा प्यासा रहकर देश की हित की बात करता है , तो जनता का एक बड़ा हिस्सा पूरी ताकत से उसकी खिलाफत करने में जुट जाता है। तोड़ देना चाहता है इस स्वर्णिम क्रान्ति की लहर को। देशभक्तों के मनोबल को

लेकिन क्या इस क्रान्ति को तोडना संभव है ? क्या सच्चाई की आवाज़ को दबाया जा सकता है ? क्या सांच को भी आंच होती है ?

ये पारदर्शिता की क्रांति है। जो काम पिछले ६५ वर्षों में नहीं हो पाया , वो बाबा ने भूखे रहकर करा दिया। अपनी संपत्ति का भी हवाला दिया और प्रधानमन्त्री से लेकर अन्य सभी नेताओं को मजबूर कर दिया पारदर्शिता के साथ अपनी संपत्ति का हवाला देने को।

यही विजय है इस आन्दोलन की। बाबा सफल हैं अपने आन्दोलन में देश के , वे डेढ़ लाख लोग , जिन्होंने पुलिस की लाठियां खायीं , वे भी सफल हुए। उनका त्याग रंग लाया। देश के वे करोड़ों लोग जो देश-विदेश में बाबा के समर्थक हैं , वे हर्षित हैं इस विजय पर और यथा संभव अपना योगदान कर रहे हैं।

बाबा को दिल्ली आने पर रोक लगा दी। ये तो तानाशाही की मिसाल है। क्या क्रांतिकारी तड़ीपार हैं ? जो विदेश में रहते हैं वो जानते हैं की अपनी धरती पर होने की ख़ुशी क्या होती है। लेकिन यहाँ तो बाबा को अपने ही देश में स्वतंत्रता नहीं है अपनी बात रखने की दिल्ली राजधानी है। यदि सरकार अपनी बात केंद्र में रहकर करती है, तो जनता को अपनी बात कहने के लिए राजधानी में आन्दोलन से क्यूँ वंचित किया।

क्या दिल्ली की सुरक्षा ज्यादा ज़रूरी है , हरिद्वार वालों को बाबा से कोई खतरा नहीं ? दिल्ली के बाहर क्या होता है और क्या नहीं , क्या इसकी जिम्मेदारी केंद्र की नहीं है?

सरकार किस बात से डर रही है ? और डर क्यूँ लगता है ? क्या चोर की दाढ़ी में तिनका है ?

यदि बाबा इतने मामूली हैं तो डर काहे का ? करने दो आन्दोलन हज़ार सैन्य बल द्वारा जनता को मारा , प्रताड़ित किया , इसके लिए कोई खेद है कसाइयों को ? मासूम जनता को बाबा से खतरा है या फिर इन वहशी कृत्यों को अंजाम देने वाली सरकार से ? हड्डी तोड़ी , लोगों को paralytic कर दिया , लोग कोमा में हैं ...क्या दया आती है निर्दयी सरकार को ? क्या शर्म की दो बूँदें शेष हैं आखों में ?

अपने संविधान में इस बात का प्राविधान है की लोग शांतिपूर्ण से तरीके से कहीं भी इकट्ठे होकर विमर्श कर सकते हैं , आन्दोलन कर सकते हैं। फिर सोयी हुयी जनता पर इतनी बर्बरता क्यूँ ?

यदि सरकार अपने दायित्वों को भुलाकर सोयी रहेगी तो आम जनता का ह्रदय तो छटपटायेगा ही क्यूँ नहीं काला धन वापस लाया जा रहा और क्यूँ भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम पर केंद्र को आपत्ति है , किस बात का डर है ?

यदि कोरोड़ों की संख्या में जनता बाबा का समर्थन कर सकती है तो क्यूँ नहीं अन्य संगठन कर सकते हैं? फिर RSS के समर्थन करने पर विवाद क्यूँ ? देश हित के लिए हो रहे जन आदोलन में RSS , मौन दर्शक को नहीं रह सकती न। तटस्थ रहने वालों को इतिहास कभी माफ़ नहीं करता।

जो कर्मशील हैं , वो निजी लाभ से बहुत ऊपर उठकर देश-हित के लिए चिंतन करते हैं और सतत देश के विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। जब कोई अच्छे कार्यों के लिए आगे आता है तो असामाजिक तत्व उसके विरूद्ध में खड़े होकर बाधा उत्पन्न करने की कुचेष्टा करते हैं। लेकिन ऐसे शरारती तत्वों की दाल नहीं गलती , क्यूंकि बुरायी पर अच्छाई की लड़ाई में सारी प्रकृति और ईश्वर भी साथ आकर खड़ा हो जाता है जैसे रावण के खिलाफ राम और कुरुक्षेत्र में स्वयं श्रीकृष्ण सारथि बनकर युद्ध के मैंदान में सत्य की रक्षा के लिए उतर पड़े थे

ये कलियुग की महाभारत है , अब ये आपके ऊपर है की आप किस तरफ जाना चाहते हैं

मैं तो अपनी आवाज़ भारत-स्वाभिमान के इस आन्दोलन में मिला रही हूँ मैं बाबा के साथ हूँ, मैं अन्ना हजारे , केजरीवाल , किरण जी के साथ हूँ। मैं अपने देश की मासूम और देशभक्त जनता के साथ हूँ।

जय हिंद!
जय भारत !
वन्दे मातरम् !

Sunday, June 5, 2011

मन बेहद-बेहद-बेहद उदास है -- इसे बर्बरता कहें या मक्कारी , अत्याचार कहें या अनाचार.

जून २०११ की रात १२.३० पर निर्दोष और मासूम सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज किया। देशभक्त युवाओं , स्त्री , पुरुषों एवं बुजुर्गों को बेरहमी से मारा-पीटा। आखिर क्या दोष था सत्याग्रहियों का ? शांतिपूर्ण तरीके से आन्दोलन कर रहे देशभक्तों का गुनाह क्या था।

सरकार के इस असंवेदनशील रवैय्ये को क्या कहा जाए ? बर्बरता या दोगलापन ?

भूखे प्यासे , नींद में डूबे हुए सत्याग्रहियों पर अचानक हज़ारों की संख्या में पुलिस द्वारा हुआ आक्रमण अत्यंत खेदजनक है। बच्चों , महिलाओं , युवाओं को जान बचने के लिए बहुत ऊँची-ऊँची दीवारों से कूदना पड़ा। बदसलूकी और बेरहमी से मार के कारण अनेकों कार्यकर्त्ता और सत्याग्रही आज ICU में भर्ती हैं मौत और जिंदगी के मध्य झूल रहे हैं। बाबा रामदेव के गले में पड़े अंगोछे को खींचकर फंदा बना दिया। क्या एनकाउन्टर का विचार था। जलियावाला बाग़ काण्ड तो अंग्रेजों ने किया था , लेकिन रामलीला मैदान पर जो हुआ वो तो हमारी ही सरकार ने अपनी प्रजा के साथ किया।

सरकारी तंत्र का हिस्सा बने लोग बाबा को 'ठग' की संज्ञा दे रहे हैं क्या देश के विकास के लिए सोचने वाला और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला 'ठग' कहलाता है ? जिन्होंने करोड़ों के घोटाले किये और देश को लूटा , उनके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं , लेकिन शांतिपूर्ण तरीके के आन्दोलन कर रहे सत्याग्रही देशभक्तों के ऊपर इतना अत्याचार ह्रदय को छलनी वाला कृत्य है।

ये लोकतंत्र की हत्या है।

Tuesday, April 12, 2011

भारत-स्वाभिमान सेनानी -- आप शीर्ष पर खड़े हैं , संतुलन बनाए रखिये

व्यक्ति जैसे जैसे ऊंचाई की तरफ अग्रसर होता है , वैसे वैसे संतुलन बिगड़ने लगता है , इसलिए बहुत आवश्यक है की इस संतुलन को बनाए रखें

अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। ही मर्यादा के खिलाफ हो , ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी जाए।

इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।

जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।

रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।

किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।

देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच गए हों।

हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा करें मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।

आभार

Monday, March 7, 2011

गजब की मानसिकता --The Indian crab mentality .

लेख के प्रारम्भ में एक छोटी सी कहानी है

एक बार १० ट्रक , अलग-अलग देशों के केंकड़ों से भरे हुए जा रहे थे सभी ट्रक ऊपर से बंद थे ताकि कोई केंकड़ा बाहर निकल जाए लेकिन भारतीय-केंकड़ों से भरा ट्रक खुला हुआ था मार्ग में इंस्पेक्टर ने जांच के दौरान पूछा , इसको खुला क्यूँ रखा है , कहीं कोई ऊपर से निकल गया तो ? ड्राईवर ने जवाब दिया - " नहीं जनाब , ऐसा नहीं हो सकता , ये भारतीय केंकड़े हैं जैसे ही कोई ऊंचाई तक पहुंचेगा , नीचे वाले उसकी टांग पकड़कर खींच लेंगे"

हर जगह ऐसा ही देखने को मिलता है अक्सर। आज बाबा रामदेव के पीछे पड़े हैं सभी क्यूँ ? यदि कोई इमानदारी के रास्ते पर चलकर , देश हित में कुछ करना चाहता है तो सारे असामाजिक तत्व इतना विचलित क्यूँ हो रहे हैं।क्या बाबा रामदेव ने कोई गुनाह किया है , घोटाला किया है , जो लोग उनके विरोध में सर उठा रहे हैं ?

सच तो ये है की लोग डरते हैं , सत्यवादियों से , इमानदार लोगों से , देश भक्तों से , अन्याय और अनाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों से ऐसा इसलिए है क्यूंकि उनकी बईमानी से चल रही दूकान बंद जो हो जायेगी।लोग स्वयं तो कुछ करना नहीं चाहते , लेकिन अच्छे लोगों की राह में रोड़ा अटकाना , निंदा करना आदि उनका प्रिय शगल बन जाता है ईर्ष्या का इलाज नहीं है

आज बाबा रामदेव के साथ करोड़ों लोग हैं इसका कारण है की करोड़ों लोगों के दिल में भ्रष्टाचार दूर करने की चाहत है लेकिन सबके पास इतना वक़्त , हिम्मत और परिस्थियाँ नहीं हैं लेकिन बाबा रामदेव सच्चे लोगों की एक बुलंद आवाज़ बन गए हैं , लोगों को उनमें एक आशा की किरण दिखने लगी है , इसीलिए करोड़ों लोग बाबा के साथ जुड़ गए हैं और जुड़ना चाहते हैं गुंडों के गिरोह में गुंडे जुड़ते चले जाते हैं , और इमानदार लोगों के साथ सच्चे और अच्छे लोग आज बाबा रामदेव के साथ , किरण बेदी , अन्ना हजारे और जेठमलानी जैसी हस्तियाँ जुड़ रही हैं

बाबा रामदेव का कहना है की काला धन वापस लाओ इसमें गलत क्या है ? अगर विदेशों में रखा काला धन वापस लाया जा सके तो इसमें देश की भलाई है इतनी बड़ी मात्रा में धनराशी विदेशों में क्यूँ है यदि इसे वापस लाया जा सके तो , आगामी ३० वर्षों तक भारतवासियों को टैक्स ही नहीं भरना पड़ेगा देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी तथा देश का काया-कल्प हो सकेगा

कुछ लोग डर क्यूँ रहे हैं ? क्या उनका नाम जाहिर हो जाएगा की काला धन उन्होंने जमा किया है ? पहले घर को लूटते हैं , फिर करोड़ों रूपए विदेशों में जमा करते हैं . चोरी करके डरने की क्या जरूरत है ? दिग्विजय सिंह जैसे लोगों को देश की फिकर कम , इसकी ज्यादा है की बाबा अमीर क्यूँ है , सशक्त क्यूँ है , लोकप्रिय क्यूँ है , देशभक्त क्यूँ है और लालू जी को तकलीफ है बाबा तो सन्यासी है फिर देशभक्ति क्यूँ कर रहे हैं बैमानों को चैन से जीने क्यूँ नहीं देते अरे ! देश के बारे में सोचना किसी की बपौती है क्या ? हर नागरिक को अधिकार है की वो देश के हित में सोचे देश के नाम पर कलंक तो वो लोग हैं , जिनकी विचारधारा अति संकुचित है , अपने परिवार के आगे कभी सोचते ही नहीं देश के हित में सोचने के लिए समय ही नहीं निकाल पाते

एक सार्वजनिक अपील -
  • एक बार सोचिये ये काला धन विदेशों में पहुँचता कैसे है
  • कितने लोग इस गिरोह में शामिल हैं
  • कैश जाता है या फिर किसी और तरह से
  • किसके मार्फ़त पहुँचता है
  • क्या कस्टम अधकारी सोते रहते हैं , जांच नहीं होती , या फिर ये भी मिले हुए हैं।
  • देश का एक पैसा भी विदेशों में आसानी से ट्रांसफर नहीं हो सकता पहचान बतानी होती है बैंक कार्यरत होते हैं
  • आखिर जाता कैसे है ये काला धन विदेशों में
  • इन सब में बड़ी-बड़ी हस्तियों की मिली-भगत है।

यदि सत्ता में बैठे लोग चाहें तो अन्य देश से बात करके , उन्हें हमारा पैसा वापस करने पर मजबूर कर सकते हैं विदेशों में जमा काला धन वापस आना ही चाहिए इस मुहीम में , मैं भी बाबा रामदेव के साथ हूँ। जो लोग भ्रष्ट हैं वो बाबा रामदेव से ईर्ष्या रखते हैं और ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है।

जय हिंद !