Tuesday, October 19, 2010

आत्मा की उत्पत्ति तथा विनाश--आत्मा की संख्या कितनी है पृथ्वी पर ? -- Our Soul !




आत्मा अजर अमर है अथवा आत्मा का विनाश होता है ?

आत्मा का अस्तित्व शरीर के साथ होता है । जब पंचतत्वात्मक , नाशवान शरीर , मृत्यु के उपरान्त , मिटटी में मिल जाता है तो आत्मा की सत्ता भी समाप्त हो जाती है। यदि आत्मा मरती नहीं तो , शरीर के नष्ट होने के बाद से नया शरीर प्राप्त होने तक आत्मा कहाँ रहती है ?

अब बात करते हैं , आत्मा की संख्याओं की । इस पृथ्वी पर कुल कितनी आत्माएं हैं। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । इस वृद्धि को देखकर ये नहीं समझ आता की नयी आत्माएं कहाँ से आ रही हैं । जो पहले से विद्यमान हैं वो तो नया शरीर धारण कर लेंगी , लेकिन बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्मा कहाँ से आयेंगी ।

यदि यह मान भी लें की बहुत सी आत्माएं एक्स्ट्रा हैं , तो चिंता की कोई बात नहीं है। बढती हुई आबादी में जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु के लिए एक आत्मा की व्यवस्था हो सकेगी।

अब मन में एक प्रश्न है की मोक्ष क्या है ? और मोक्ष किसे मिलता है ? चूँकि शरीर तो नाशवान है, इसलिए निश्चित ही मोक्ष आत्मा को मिलता होगा। अब समस्या ये है की मोक्ष मिलने के कारण , आत्माओं की संख्या पृथ्वी पर निश्चित ही कम होती जायेगी । एक बात यह भी की , मोक्ष यदि अच्छी और पवित्र आत्माओं को ही मिलता है तो निश्चय ही पृथ्वी पर शेष आत्माएं कलुषित अथवा कम अच्छी होंगी। फिर रामराज्य कैसे आएगा। भ्रष्टाचार तथा कलियुग तो होगा ही न।

वापस आते हैं अपनी समस्या पर। मोक्ष के चलते आत्माओं की संख्या में कमी होने पर , बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्माएं कहाँ से आयेंगी। क्या आत्मा की भी उत्पत्ति संभव है ? यदि हाँ तो बेहतर गुणवत्ता वाली , तथा मोक्ष के योग्य आत्मा की उत्पत्ति कैसे की जाये ?

क्या आत्माओं का भी कोई धर्म होता है ? क्या एक हिन्दू आत्मा मुस्लिम परिवार में जन्म ले सकती है । यही हाँ तो फिर उस मासूम बच्चे का विचार अपने परिवेश से पृथक क्यूँ नहीं हो पता।

क्या आत्माएं नास्तिक होती हैं ? यदि नहीं , तो नास्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या नास्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ।

मेरे विचार से आत्मा एक शक्तिपुंज है , जिसका निरंतर क्षय होता रहता है तथा यह भी नाशवान है। आपका क्या विचार है कृपया प्रकाश डालें।

यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने मस्तिष्क में आने वाली विचारों की आंधी को साझा करें।

नोट- पोस्ट की गुणवत्ता आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों से द्विगुणित होती है, इसलिए आपके विचारों का स्वागत है।

आभार।

110 comments:

Coral said...

बहुत सुन्दर लिखा है ....
और सवाल वो है जो हमेशा मेरे साथ भी रहते है?

मै भी मानती हू कि इस ब्रम्हांड कि हर वस्तु नाशवंत है!

इस बात पर मेरी भी निरंतर सोच जारी रहती है ....

आत्मा ...(?) क्या है और है तो इसका स्वरुप क्या है ?

आज तक कोई समझा नहीं पाया है ... जो भी बाते है हमने सिर्फ पढ़ी है या सुनी है .... इसका वैद्यानिक कहिये या फिर तार्किक सन्दर्भ अगर कही से मिल गए तो ये पहेली सुलझ सकती है !

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

atma kuch nahi hai ! vigyan atma ko nahi manti ... haan agar hum hamare dimag me chalne wala soch prakriya ko atma ka naam dete hain to alag baat hai ... jab koi janm leta hai to uska sharir kaam karna shuru ho jata hai ... jisme dimag bhi hai ... aur jab mar jata hai to sabkuch khatam ... atma, purvjanm, mrityoprant jeevan etc etc are not believable ...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

the same way that a computer has a hardware and a software to make it work, a human also has a body with its organs which are the hardware and the functional part which is the software. This functional part consists of the chemical processes going on inside the body and the programme of growth, sustenance and death contained within the genes.
I am not a doctor, but that is what I understand. May be you can better explain it since you are a doctor yourself.

Kunwar Kusumesh said...

बड़े गूढ़ विषयों को आप अपने आलेख में उठाती हैं, वह भी वैज्ञानिक धरातल और सोंच के साथ.
आपके ब्लॉग का मैटर पढ़ने पर दिमागी उथल-पुथल शुरू हो जाती हैं.
अब आत्मा मृत्यु के बाद मरती है या नहीं ये तो नहीं पता परन्तु जीते-जागते तमाम लोगों की आत्मा इस भौतिकवादी युग में मर चुकी है इतना ज़रूर पता है.

कुँवर कुसुमेश
मेरे ब्लॉग:kunwarkusumesh.blogspot.com पर नई पोस्ट कृपया देखिएगा.

abhishek1502 said...

स्थूल शरीर नष्ट होने पर भी सुच्छम शरीर नष्ट नही होता सारा प्रयास तो उन सुच्छम शरीर को मिटने का ही है . जो एक एक तत्वों का कम करते हुए ही किया जा सकता है .सुच्छम शरीर के नष्ट होने पर तो आत्मा अपने मूल स्वरुप में आजाती है अर्थात अनन्त में विलीन , यही मोक्ष है

abhishek1502 said...

@ये बात ठीक है की जनसँख्या बढ़ रही है ,पर अन्य जन्तुओ की संख्या भी घट रही है . वे कहाँ जा रहे है ये विचार भी कीजिये .
प्रथ्वी पर उपस्थित कुल जीवन का नगण्य भाग ही मनुष्यों की संख्या है .हमारे शरीर में ही कितना जीवन है हमें यही पता नही है .शरीर में कुल कितनी जीवित कोशिकाए है , कितने बेक्टीरिया है .

सुधीर said...

न जायते म्रियते व विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न वभूव कश्चित।
अजो नित्यः शाश्वतोय पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

ऋग्वेद से लेकर गीता तक आत्मा की जो परिभाषा है वह वही जो साइंस में ऊर्जा की है। ऊर्जा न तो नष्ट होती है न उत्पन्न होती है, वह सिर्फ रूप बदलती है। आत्मा को अगर आप ऊर्जा के संदर्भ में लें तो आपकी काफी शंकाएं दूर हो जाएंगी। ब्रह्माण्ड की हर चीज ऊर्जा का ही साकार रूप है। उसका हिन्दू-मुस्लमान से कुछ लेना देना नहीं। दक्षिणपंथियों ने आत्मा की साइंटफिक परिभाषा को मनमाना रूप देकर मनमाने संदर्भों में व्याख्या दी है। इससी से सारे भ्रम और शंकाएं पैदा होती हैं।

ashish said...

आत्मा क्या है , कैसे है , क्यू है , बुरी है, अच्छी है , हिन्दू है, मुस्लिम है, आस्तिक है या नास्तिक है . इस पर जो भी बाते हो सकती है , लोग करेंगे , हम तो निष्कर्ष का इंतजार करेंगे .मुझे तो आत्मा के बारे में गीता का श्लोक याद है .

नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावकः
न चैनं क्लेदयन्ति आपोः, नैनं शोषयति मारुतः

cmpershad said...

`यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है ...'

और यदि वे जीवित हैं तो उनमें आत्मा होगी ही :)

सुज्ञ said...

1-आत्मा नश्वर नहिं, सही कहते है आत्मा अजर-अमर है।
2-नष्ट या घात होती है प्राणों की, जो आत्मा से जुडे होते है।
3-आत्मा अनंत है,अनंत आत्माएं मोक्ष गई और अनंत जन्म-मृत्यु के चक्र में है।
4-एक शरीर के छूटते ही आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है।
84 लाख योनियां है, और अनंत सुक्षम जीवराशी भी है,अतः जनसंख्या का प्रश्न बेमानी है।
5-शुभ आत्माओं का निरंतर पवित्रता विकास होता रहेगा, कर्म-सत्ता यह प्रबंध करती रहेगी। बेहतर गुणवत्ता की कक्षाएं होती है।
6-आत्माओं का कोई नामरूप धर्म नहिं होता, वस्तूत: जिसे हम धर्म कह्ते है वह आत्मा का निज-स्वभाव ही है। इसी लिये कोई व्यक्ती हिंसाप्रधान धर्म में जन्म लेकर भी, स्वभावत: अहिंसक हो सकता है। और कोई अहिंसा प्रधान धर्म में जन्म लेकर भी 'क्रूरता का सहभोजी' सम्भव है। अर्थार्त अपने परिवेश से पृथक भी हम देखते है।
7- हां, प्रत्येक व्यक्ति से उसकी आत्मा संवाद करती है,'मैं कौन हूं', 'क्या मैं एक आत्मा हूं' आदि प्रश्न भी उस आत्मा के ही होते है।
8- चेतना, ज्ञान और दर्शन आत्मा के ही गुण है।

सम्वेदना के स्वर said...

:)ZEAL ZEN

Ejaz Ul Haq said...

ख़ाली-पीली अहंकार क्यों ?
आदरणीय भाई पी.सी.गोदियाल जीने हकनामा ब्लॉग पर दूसरे ब्लोगर्स के कमेंट्स को उलटी दस्त की उपमा दी है जोकि सरासर अनुचित है और अहंकार का प्रतीक भी । अहंकार से और अशिष्ट व्यवहार से दोनों से ही रोकती है भारतीय संस्कृति जिसका झंडा लेकर चलने का दावा करते है, मुझे लगता है कि दावा सच नहीं है ।

sada said...

आपका लेखन निरंतर रूचिकर होता जा रहा है, आपके सवालों का जवाब लेकर या अपने सवालों के साथ धीरे-धीरे सभी आत्‍माएं प्रकट होंगी...बस हमें तो यही पता है कि आत्‍मा अजर-अमर है....और इनकी संख्‍या इतनी है कि शायद ही कभी संकट आये इसकी संख्‍या को लेकर ........।

गिरधारी खंकरियाल said...

दिव्या जी गूढ़ विषयों को लिखने के लिए बधाई . आत्मा अजर है अमर है नई आत्मा का प्रबंध सर्वोच्च सता उसी तरह करती रहती है जैसे किसी कारखाने में कच्चे माल व् पक्के माल की भरपाई होती रहती है सुधीर जी से मैं सहमत हों, परन्तु इन्द्राणी जी ने जो व्याख्या की वह गले नहीं उतरती . क्योनी मनुष्य माँ के पेट में भी हरकत करता है यानि जन्म से पहले ही उसमे जान होती है जिसे हम आत्मा कहते है जीवन कोई बिजली का पंखा नहीं है की प्लुग लगाओ , बटन दबाव और पंखा घूमने लग जाये , कम्पुटर के पार्ट्स भी ख़राब होते है तो भी हार्ड डिस्क में डाटा रहता है हवाई जहाज का ब्लैक बॉक्स , नष्ट होने के बाद भी सारा रिपोर्टिंग करता है इसलिए इनकी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हो सकते . आत्मा कोई इसी उर्जा है जो जीवन को चलती रहती है वही सर्वोच्च सता इसका प्रबंधन कट छंट करती होगी . हमारे धर्मं ग्रंथों , गीता रामायण , महाभारत, वेड पूरण सभी रचनात्मक एवेम वज्ञानिक ग्रन्थ हैं उनके सिधान्तो नकारना आस्सन नहीं है खास कर यूरोपीय विज्ञानं के तो बस की बात नहीं है

G Vishwanath said...

दिव्याजी,

दिनोदिन आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करना कठिन होता जा रहा है!

इसे compliment समझिये, criticism नहीं

इन गूढ विषयों पर हम केवल प्रवचन सुनने के आदि हैं।
कोई ढंग की टिप्पणी सूझती ही नहीं।
हम तो ठहरे सीधे सादे एक इन्जिनीयर।
हम संख्यों से, रेखाचित्रों से, फ़ॉर्मुलाओं से परिचित हैं।
ऐसे अमूर्त व निराकार विषयों पर टिप्प्णी करके हम अपना पोल नहीं खोलेंगे।
चुप चाप एक कोने में बैठकर औरों के विचारों को पढेंगे और प्रबुद्ध होंगे।
क्या पता अंत में कुछ समझ में आ जाएगी और फ़िर हम भी इस विषय पर प्रवचन करने योग्य बन जाएंगे।

शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

amar jeet said...

बहुत कठिन विषयो को आप बहुत सरल अंदाज प्रस्तुत करती है ! आपने अपने लेख के माध्यम से जहा आत्मा की उपस्तिथि अनुपस्तिथि पर प्रश्न किया है वही बदती जनस्ख्न्या पर भी कटाच्छ किया है ! वैसे zeel जी आपने इतनी आत्माए आती कहा से ये प्रश्न किया है तो वेदों पुरानो व कथाओ के अनुसार मनुष्य जरुरी नहीं है की मरने के बाद पुनह मनुष्य योनी में पैदा हो और कीड़े मकोड़े भी जरुरी नहीं है की वापस कीड़े मकोड़े बनकर पैदा हो ! अतः हो सकता है की कीड़े मकोड़े पशु पंछियों की संख्या घट रही हो और मनुष्यों की संख्या बाद रही है!

सुज्ञ said...

दिव्या जी,

श्री जी विश्वनाथ जी की व्यंगात्मक टिप्पणी में भी इस पुरे विषय कर सुंदर सी शिक्षा छुपी है।

आज निराकार चिजों पर चुप ही रहो, हो सकता है कल हम जानने और समझने में समर्थ हों जाय। फ़िर आज विरोधाभाषी व्याख्या क्यूं करना।

ZEAL said...

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सुज्ञ जी,

जो चुप होना जानते हैं वो निसंदेह ज्ञानी पुरुष हैं। मैं तो मूढ़ अज्ञानी हूँ, जो मन में प्रश्न आते हैं, वह बरबस ही आप सबके साथ साझा कर लेती हूँ। जीवन जीने का एक अंदाज़ कह लीजिये।

वैसे विश्वनाथ जी की टिपण्णी में कोई व्यंग नहीं लगा मुझे। एक सरल ह्रदय से की गयी , इमानदार टिपण्णी लगी मुझे।

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भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गूढ़ विषय, लेकिन कुछ न कुछ तो सत्य है ही इस दर्शन में. अमरजीत जी की टिप्पणी गौर करने लायक है...मेरे एक भाई का पुनर्जन्म हो चुका है इसलिये मैं तो मानता हूं..

नचनिया said...

भई ये बताईये कि आसमान में कितने तारे हैं?तारे रोज़ टूटते हैं और रोज़ जन्म लेते हैं. सर के बाल गिन लीजिये मोहतरमा ...आत्माओं की संख्या अपने आप पता चल जायेगी.



मज़ाक बहुत अच्छा किया है आपने.

सुज्ञ said...

दिव्या जी,

आप कदाचित मेरा भाव नहिं समझ पाई।
विश्वनाथ जी की टिपण्णी विषय पर व्यंग्य थी।
और चुप रहने से मेरा भावार्थ हम सब के लिये था।

G Vishwanath said...

दिव्याजी,
बिल्कुल सही कहा आपने।
मुझे ऐसे विषयों पर यंग्य करने की हिम्मत ही नहीं होती।
यह जानकर राहत मिली कि आपने मुझे गलत नहीं समझा।

सुज्ञजी,
यदि टिप्पणी में आपको व्यंग्य दिखाई दिया, तो दोष मेरा ही होना चाहिए।
हिन्दी में अभिव्यक्ति उतनी अच्छी नहीं हैं जितनी अंग्रेज़ी में है।
कभी कभी लोग मुझे गलत समझ लेते हैं।
आशा करता हूँ कि इस स्पष्टीकरण से आप संतुष्ट हैं।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

धर्म पुस्तक के पांचवें सफे की तीसरी कंडिका के पच्चीसवें पैराग्राफ में लिखा है की संसार में कुल 249.88932749283767620X10^762 आत्माएं हैं. जिसे इसमें यकीन न हो वह गलत सिद्ध करके दिखा दे.

प्रवीण शाह said...

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दिव्या जी,

बाप रे, पहले तो आपकी पिछली पोस्ट और अब यह भी... आत्मा-आत्मा सोचते सोचते बहुत भारी सा हो गया है दिमाग... शीघ्र ही इस विषय पर एक हल्की फुल्की पोस्ट डालूँगा... काफी सारा मैटर आपसे मिलेगा ही...

"क्या आत्माएं नास्तिक होती हैं ? यदि नहीं , तो नास्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या नास्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ।"


क्षमा कीजिये, पर आप नास्तिकता को समझने लायक समझ नहीं पा पाईं अब तक... यही सवाल मैं आपसे पूछूँ तो क्या कहेंगी आप... आप तो घोषित तौर पर आस्तिक हैं...चलिये आप ही बताइये...

सवाल-क्या आत्माएं आस्तिक होती हैं ? यदि हाँ , तो आस्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या आस्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ?

"यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने मस्तिष्क में आने वाली विचारों की आंधी को साझा करें। "

यदि 'आस्तिकों' और 'स्वयंभू लौह महिलाओं' में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने ब्लॉग में कमेंट पाने के लिये इस तरह के चैलेंज न दें... अच्छा नहीं लगता यह सब...
:))


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ZEAL said...

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Dear Nishant,

I expected something serious from you.

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ZEAL said...

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Praveen Shah ji,

You can definitely put a post on your blog by borrowing the idea from here , as you did from my previous post.

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P S Bhakuni (Paanu) said...

....यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने मस्तिष्क में आने वाली विचारों की आंधी को साझा करें।
आत्मा अर्थात जीवन, किसी भी निर्जीव वास्तू में आत्मा कि कल्पना भी नहीं कि जा सकती है ,अर्थात किसी भी जीवित प्राणी में एकआत्मा का वास होता है चाहे वह नास्तिक हो चाहे वह कोई महिला हो या पुरुष या फिर किसी भी प्रकार का कीड़ा-मकोड़ा ,
आप का कहना है कि -
इस पृथ्वी पर कुल कितनी आत्माएं हैं। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । इस वृद्धि को देखकर ये नहीं समझ आता की नयी आत्माएं कहाँ से आ रही हैं ।
आत्मा एक शक्तिपुंज है , जिसका निरंतर क्षय होता रहता है तथा यह भी नाशवान है।
मेरा मानना है कि-
जिस प्रकार सूरज जीवन का आधार है , फिर भी प्रत्येक प्राणी के लिए अलग-अलग सूरज नहीं है ,ठीक उसी प्रकार एक आत्मा अर्थात शक्ति पुंजभी सभी प्राणियों में समान रूप में वास करती है
अर्थात जन्म से पहले भी सूरज था और मृत्यु के बाद भी सूरज है ..........तो क्या इस शक्ति पुंज का निरंतर ह्रास हो रहा है ?
यह निर्भर करता है कि शक्ति पुंज का मूल स्रोत क्या है ? और उसकी क्षमता क्या है ?

उस्ताद जी said...

6/10

सुन्दर चिंतन--सुन्दर मनन
देख रहा हूँ कि अधिकाँश के पास धर्म शास्त्रों की पंक्तियाँ ही हैं. स्वयं का कोई अनुभव नहीं. इससे स्पष्ट है कि आत्मा जैसी चीज नहीं होती.
हमारे पुरखे बताते थे कि पहले हर इंसान के पास एक अदद आत्मा हुआ करती थी. कालांतर में अनुपयोगी होने पर विलुप्त प्राय होती गयी. बिलकुल वैसे ही जैसे कभी आदमजात पूंछ से सुसज्जित होता था. टाईगर प्रोजेक्ट जैसा कुछ करके आत्मा को भी संरक्षित करने की आवश्यकता है.

सुज्ञ said...

विश्वनाथ जी,

मुझे क्षमा कर दें, मैने अनावश्यक आपकी टिप्पणी की व्याख्या कर दी।
जो मेरा अधिकार नहिं था। मैने गूढार्थ गम्भिरतार्थ ढूंढ लिये।
कृपया अन्यथा न लें।

अन्तर सोहिल said...

इन सवालों का जवाब मेरे पास होता तो मैं भी बुद्ध, जीसस, महावीर, मोहम्मद, मंसूर, नानक, कृष्ण, कबीर, मीरा, पलटू, रविदास, सूरदास इनमें गिना जाता।
जिसके पास जवाब है वो यहां बताये या ना बताये उपरोक्त श्रेणी से है।

प्रणाम

मनोज कुमार said...

इस विषय को समझना उतना ही मुश्किल है जितना अज्ञेय की कविताओं को। जो आपने प्रश्न उठाए हैं उसके जवाब में उनकी ही कुछ पंक्तियां
मैंने देखा
एक बूंद सहसा
उछली सागर के झाग से :
रंग गयी क्षण भर
ढलते सूरज की आग से।

mahendra verma said...

उपनिषदों में आत्मा की और विज्ञान में उर्जा की परिभाषा में समानता है। ये परिभाषा या लक्षण इस प्रकार है- 1.उर्जा/आत्मा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट, 2. इनका रूपांतरण हो सकता है, 3. ये कण-कण में व्याप्त है, 4. उर्जा का पदार्थ में और पदार्थ का उर्जा में परिवर्तन संभव है, 5.ये भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त होते हैं, 6. ये गणनीय countable नहीं हैं, आदि। उपनिषदों के रचनाकारों ने, जिन्हें मैं तत्कालीन वैज्ञानिक कहूंगा, उर्जा के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग किया है। इसलिए वेदांत के अनुसार केवल जीवधारियों में ही नहीं अपितु निर्जीवों में भी आत्मा है।
आत्मा और जीव समानार्थी शब्द नहीं हैं। मोक्ष की आवश्यकता जीव को है, आत्मा को नहीं। आत्मा का अपना कोई गुण-दोष-धर्म-जाति-लिंग नहीं होता। यह पहले जीव और फिर शरीर से संयुक्त होकर गुण-दोष युक्त हो जाता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव क्रमशः आगामी जन्मों में मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। । बुरे कर्म करने वाले निम्नतर जैविक प्रजातियों में, फिर निर्जीव पदार्थ में परिवर्तित होते रहते हैं। मोक्ष प्राप्त होने का अर्थ है-जीवन,मृत्यु के बंधन से मुक्ति और अंततः समष्टि उर्जा में विलीन हो जाना, जिस तरह जीवित तारे ब्लैक होल में बदल जाते हैं। ब्लैक होल में केवल उर्जा होती है, पदार्थ नहीं।....आपके आलेख के प्रश्नों के उत्तरों को उक्त परिप्रेक्ष्य में खोजा जाना चाहिए।

Ganesh said...

The age old question of the SOUL. I guess the only place we can get an answer is from the SOUL OF THE MATTER itself.

Every being has a soul, whether we like it or not. It doesn't worry because it has no cause to worry. It doesn't fear because it has no reason to fear. Nobody can kill it. It is neither born nor does it die. It is not dependent on Science nor Science can understand it.
What we think of as death, is indeed life.
The body is made of fire, water, air, earth and
ether, and will disappear into these elements.
But the soul is permanent - so who are you?
When one has truly acquired sense-control, then one will experience the power of the divine within. In short, the soul is but the Divine. The Body is but a shelter for the Divine.

शोभा said...

बहुत सुन्दर लिखा है, आभार।

डॉ. नूतन - नीति said...

diyva ji !! aap Science ke niymo se acchi tarah vaakif hai... aap jaante honge ki Energy kabhi khatam nahi hoti.. uska transformation ho jata hai..chahey vo kinetic energy ho ya potential ye mechanical , electomeganetic energy etc.. ...sab kisi anya form me transfer ho jati hai ..unka total same hota hai.. to fir ye aatmaa ke andar nihit urjaa kis roop me tranform hota hai.... . Geeta me bhi Krishn ji ne kaha thaa....
vasaansi jirnaani yatha vihaya
navani grehnaati naroprani
tatha sareerarni vihaye jirna
nanyaani sanyati navani dehi




mera maanaa hai ki sukshm tatw jaroor hota hai...

sareer banta hai - marula zygot sab same number kee cells hoti hai... sareer banta hai janm hota hai .. mrityoo hoti hai....Sareer Vahi hai kintoo vo kaunsee cheej hai sareer ke andar jiske hone par sareer jiwit hota hai aur jiske jaane par seer khatam ho jata hai...Vo hai AATMA ?? Fir bhi maine aik question mark lagaya hai.ye meri soch hai... science bhi pust kar rahi hai par purn taur par nahi... abhi pushti kee ayshyktaa hai... Shubhkaamnayen

Vijai Mathur said...

महेंद्र वर्मा जी की टिप्पणी से पूर्णतः सहमत.
उन्होंने गागर में सागर भर दिया है.

Shekhar Suman said...

माफ़ कीजिये सुबह से थोड़ी तबियत ख़राब होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ पाया....
आत्मा के ऊपर इतनी लम्बी बहस क्यूँ भला ??? अंशुमाला जी के ब्लॉग पर भी यही बहस चल रही है...मैं तो विज्ञान के क्षेत्र से जुड़ा हूँ और इन बातों को नहीं मानता | इन्द्रनील जी ने जैसा कहा हमारा शरीर एक कंप्यूटर की तरह मान लें...तो जो हमें दिखता है वो और जो नहीं दिखता वो जिसे आप आत्मा कह सकती हैं |

इन्द्रनील जी ने बड़े सरल शब्दों में बता दिया हम विज्ञान वालों का दृष्टिकोण ..... विश्वनाथ जी के बातों से सहमत हूँ कोने मैं बैठकर टिप्पणियाँ पढने के बाद हो सकता है कुछ ज्ञान प्राप्त हो...

Shekhar Suman said...

hats off...indranil ji...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चिंता की कोई बात नहीं, भारत और चीन दुनिया भर की बाक़ी आत्माएं अपने यहां खींच लेंगे.

डॉ टी एस दराल said...

मेरे विचार से तो आत्मा --ऊर्जा की तरह है । जिसकी न उत्पत्ति हो सकती है और न विनाश । कहते हैं ८४ लाख योनियों के बाद मनुष्य का जीवन मिलता है । मनुष्य के कर्म बताते हैं कि अगले जन्म में आत्मा को कौन सी योनी मिलेगी ।
अब यदि मनुष्य बढ़ रहे हैं तो दूसरी तरफ कुछ स्पिसिज लुप्त भी हो रही हैं । हो गया हिसाब बराबर ।

abhishek1502 said...
This comment has been removed by the author.
abhishek1502 said...

यह पर बहुत लोग तो जीव और आत्मा में अंतर नही जानते है .और जीव के लक्षण को आत्मा मानते है .जो देह म्रत्यु पर भी न नष्ट हो वो सूछ्म देह है और उसे जीव कहते है .जब जीव का का सूछ्म शरीर नष्ट होता है तो वह अवस्था मोछ है .अंश पूर्ण में विलीन हो जाता है .आज भारतीय अध्यात्म पर प्रश् चिन्ह लग रही है ठीक वैसे ही जैसे आज से ५०० साल अगर कोई दुनिया को बताता ही विज्ञानं ने आश्चर्यजनक उन्नति की है तो उस की बात सुन कर उसे पागल घोषित है दिया जाता और लोगो का विज्ञानं के चमत्कारों पर विश्वास न होता वो तो उसे एक रोचक कहानी ही मानते .

'' आत्मा वह दर्पण है जिस में समस्त गुण जैसे क्रोध , दया ,छमा , आदि प्रतिबिंबित होते है ''
बिना इस ऊर्जा के इन गुणों का अस्तित्व ही कहाँ है .

hem pandey said...

'अब बात करते हैं , आत्मा की संख्याओं की । इस पृथ्वी पर कुल कितनी आत्माएं हैं। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । इस वृद्धि को देखकर ये नहीं समझ आता की नयी आत्माएं कहाँ से आ रही हैं । जो पहले से विद्यमान हैं वो तो नया शरीर धारण कर लेंगी , लेकिन बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्मा कहाँ से आयेंगी ।

यदि यह मान भी लें कि बहुत सी आत्माएं एक्स्ट्रा हैं , तो चिंता की कोई बात नहीं है। बढती हुई आबादी में जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु के लिए एक आत्मा की व्यवस्था हो सकेगी।'
- अजीब सा तर्क है | आत्माओं की गिनती भौतिक वस्तुओं की तरह की जा रही है | यही प्रश्न युवा ब्लोगर अनूप जोशी के ब्लॉग पर पहले उठाया जा चुका है |

abhishek1502 said...

@महेंद्र जी से पूर्णतया सहमत ,
मैं कुछ जानकारी रखना चाहूँगा .ब्लैक होल में सिर्फ ऊर्जा नही होती है .उस का द्रव्यमान का घनत्व बहुत अधिक होता है .जिस से उस की गुरुत्वाकर्षण शक्ति बहुत अधिक हो जाती है .ये इतनी अधिक होती है की प्रकाश की किरण भी वापस नही जाती .यही कारण है ये हमें नही दीखता .
१ चम्मच ब्लैक होल का द्रव्यमान १०००० अफ़्रीकी हाथियों के के बराबर होता है .

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

गहरा गूढ़ विषय है। हमारे एक ब्लॉगर भाई की नवजात बेटी की मृत्यु पर मुझ जैसे सतही व्यक्तित्व के इंसान को भी कुछ समय इस विषय ने परेशान कर रखा था इस तरह की बातों ने लेकिन ईश्वर रचित सॉफ़्टवेयर माया का प्रभाव है कि दोबारा सब सामान्य हो गया और हम फिर उसी जमीनी दुनिया में जहाँ सबको LSD यानि लक्ष्मी(धन),सरस्वती(ज्ञान),दुर्गा(शक्ति)की तमन्ना है जिसके लिये पूरा जीवन लग जाता है और हाथ आते हैं कुछ कमेंट्स....
जो मेरे भौतिकवादी दिमाग में आया उसे देखें
मेरी प्यारी बहना आशा है कि अब आप पूरी तरह से स्वस्थ हो गयी होंगी।
सादर
भइया

अजय कुमार said...

बड़ा गूढ़ विषय है ।

VICHAAR SHOONYA said...

कल से देख रहा हूँ लोग आत्मा चिंतन बहुत कर रहे हैं. कल प्रवीन शाह जी थे आज आप और अंशुमाला जी हैं. आपका आत्मा अवलोकन शानदार है. मुझे विश्वास है कि प्रतुल जी ने जैसे पिछली बार आत्मा मंथन कर इस विषय पर मेरा आत्मा विश्वास बढाया था वैसा ही कुछ वो इस बार भी करेंगे.....

मनोज भारती said...

ॐ शाश्वत नम:

'उदय' said...

... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!

Manoj K said...

आत्मा के अस्तित्व पर मेरा ज्ञान कुछ ज़्यादा नहीं पर हाँ यहाँ पर एक सीरिअस विषय पर चिंतन चल रहा है और विश्वनाथजी तथा सुज्ञ जी की आपस में बातचीत अच्छी लगी, बीच में आपका संवाद भी यह इंगित करता है की आप ब्लॉग पर सिर्फ 'ठेलती' नहीं हैं लिखतीं हैं.

अपनी लेखनी को यूहीं और सशक्त करते रहिये.

आभार
मनोज

kaafir said...

दिव्या जी ...
आपके इन सभी प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है ..
मात्र एक प्रयोग करना है .. साधारण सा..
शायद आप कर सके ... अपने आप से कभी एकांत में बस इतना पूछना..
" WHO AM I " - "मैं कौन हूँ " ???
और तब ये सवाल खुद से कीजियेगा जब तक पूरा सतुस्ट उत्तर ना मिल जाए .. it's must be A complete answer
क्या बस उतना ही है जितना नज़र आता है ?? या इसके अलावा भी कुछ और है आप..??
क्या आप मात्र एक शारीर भर हैं ? a physical matter only?

अगर ऐसा ही है तो इस शरीर के पूर्ण संतुस्ट, पूर्ण स्वस्थ, और सुखी होते हुए भी
क्या है जो हमें बेचैन किये रहता है लगातार हमें अपनी तरफ आकर्षित करता है
शायद आपको इसका अनुभव हो ..
सबकुछ है पर फिर भी हमें एक X की खोज क्यूँ है ??

सवाल के जवाब में सवाल करने की माफ़ी चाहूँगा.. पर आपका सारा उत्तर इसमें मौजूद है .. हाँ अगर आप
ऐसा कर सके तो...

डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
ZEAL said...

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आत्मा , निर्जीव वस्तुओं एवं पदार्थों में भी होती है। जैसे चाकू का कर्म है काटना । वही उसकी आत्मा भी है । लेकिन जब चाकू नष्ट हो जाता है , तो उसका गुण या आत्मा भी नष्ट हो जाती है ।

यदि आत्मा अमर है तो , वह नाशवान पंचभूतात्मक शारीर में क्यूँ निवास करती है। उसका सही स्थान तो फिर परमात्मा में विलय होना ही हुआ।

आत्मा का अस्तित्व किसी शारीर/ देह में ही है। मृत्यु के साथ उस आत्मा का भी अंत हो जाता है। किसी भी जीव में संचित उर्जा का क्रमशः क्षय होता है। जब इस उर्जा का पूरी तरह क्षरण हो जाता है , तब ही किसी जीवधारी की मृत्यु
होती है। जब तक आत्मा जीवित है , तब तक मृत्यु भी नहीं हो सकती।

व्यक्ति के अन्दर उत्साह का मरना , उसके अन्दर की क्षय होती हुई उर्जा का परिचायक है। जब व्यक्ति पूरी तरह निराश हो जाता है , तो अवसाद से ग्रस्त रहने लगता है और अक्सर मृत्यु का वरण कर लेता है।

हमारे देश के किसान जो आत्म-हत्या कर रहे हैं, उसका कारण भी उनकी निराशा तथा निरंतर क्षय होने वाली सकारात्मक उर्जा ही है।

जब ओज और उत्साह की कमी होती जाती है तो प्राणवायु कब तक जीवित रख सकेगी ?... आत्मा रूपी उर्जा का क्षय और मृत्यु का होना साथ ही होता है। नाशवान जीव अथवा पदार्थ में , एक नाशवान आत्मा ही रह सकती है।

यदि आत्मा बोलती है और संवाद करती है , तो वो सोचती भी होगी। और सोचना, बोलना, स्मृतियाँ, सभी हमारे दिम्माग का विषय हैं। इसलिए जब तक दिमाग सही कार्य कर रहा है, वो ह्रदय को धड़कने का आदेश देता है और शारीर को कार्य करने का। दिमाग ही सभी सभी एकादश इन्द्रियों को अपने अपने कार्य करने को प्रेरित करता है।

इसलिए जब तक दिमाग है, तब ही तक उर्जा है, और तभी तक जीवन है।

मृत्यु के पश्चात जब न दिमाग जिन्दा रहता है और न ही उसकी कोई कोशिका। फिर उसमें कोई स्मृतियाँ भी संचित नहीं हो सकतीं। न कोई आत्मा होती है, न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ।

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ZEAL said...

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ऊपर कोई महानुभाव ' नचनिया ' नाम से टीप गए हैं। उनसे मेरा प्रश्न है --

" Are you my rejected lover or any of my dejected brother ? "

..Grins ..

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ZEAL said...

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चार्वाक दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो पुनर जन्म को नहीं मानता।

इसके अनुसार--

यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

अर्थात इसी जन्म में हम सुख-दुःख को जी लेते हैं। सभी पाप और पुन्य कर्मों का फल भी यहीं इसी जीवन में मिल जाता है। इसीलिए मृत्यु के समय कुछ भी बकाया नहीं रहता।

अतः

नया जीवन --नयी स्मृतियाँ-- नया अनुभव--नया चिंतन ।


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मनोज भारती said...

यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

इस श्लोक का अर्थ है :: जब तक जीवो तब तक सुख के साथ जीवो ...ऋण लेकर भी दूध-घी का सेवन करना पड़े तो कीजिए ।

ZEAL said...

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मनोज भारती जी ...सही भावार्थ के लिए आपका आभार।

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दीर्घतमा said...

कुछ ज्यादे ही अध्यात्मिक पोस्ट हो गयी है
वैसे मै यह मानता हू की आत्मा होती है वह कही भी किसी क़े यहाँ जन्म ले सकती है.

पंकज मिश्रा said...

बहुत सुंदर मित्र। क्या कहने। बहुत पुराना और मुश्किल विषय उठाया है इस बार आपने। खूबसूरत वर्णन के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें। आगे भी इसी तरह के आलेख की उम्मीद करता हूं।

Harshal said...

इस विषय पर यदि गहन चिंतन मनन से लिखा गया शोधपत्र पढ़ना चाहें तो आयुर्वेद के अनुसार पदार्थ विज्ञान के नजरिये से लिखा अपने भाई डॉ.रूपेश श्रीवास्तव जी का पत्र पढ़िये जिसमें उन्होंने लिखा है कि पंच महाभूतों में वात सर्वात्मा है जिसके पाँच भेदों के पाँच-पाँच उपभेदों में से धनंजय नामक वात स्मृतियों को साथ लेकर अगले शरीर में जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे आप अपने कम्प्यूटर के डाटा को किसी दूसरे कम्प्यूटर पर स्थानान्तरित करके अपने कम्प्यूटर का पुनर्जन्म कर लेते हैं।
सुन्दर आलेख है और उससे भी अधिक दिलचस्प होता है आपका टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया करना ।

Shekhar Suman said...

इस बार मेरे ब्लॉग पर कोई कविता नहीं बल्कि एक चर्चा है क्या पुरुषों में भी असुरक्षा की भावना होती है...???क्या उन्हें भी डर सताता है ??? अपनी राय जरूर दें...

असुरक्षा पुरुषों में भी..

ZEAL said...

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डॉ अमर,

आपके विचारों का स्वागत है, आप यूँ ही बच कर नहीं जा सकते। डरना क्या उन लोगों से जिनके पास कोई टोपिक ही नहीं और जो व्यक्ति की आलोचना करके ही अपनी ब्लॉग की दुकानें चला रहे हैं। खुद वरिष्ट होते हुए भी उन्हें वरिष्ठ शब्द का अर्थ नहीं मालूम। लोगों की निंदा करना और टांग-खिंचाई करना उनका प्रिय शगल लगता है।

आप इन नादान लोगों की हरकतों से खुद को विचलित मत कीजिये। ये लोग तो आपकी टिप्पणियों से ही सीख रहे हैं। होने दीजिये इन लोगों का भला। इनकी आत्मा कभी तो चेतेगी । मोक्ष तो इन्हें मिलना नहीं है। जन्म-मरण के चक्कर लगाने दीजिये इन्हें।

इश्वर ने ऐसे मूढ़ अज्ञानी लोगों के लिए ही तो चौरासी लाख योनियों की व्यवस्था की है।

जलने वालों को और भी ज्यादा जलने दीजिये। हो सकता है अग्नि के संयोग से उसकी आत्मा के विकार भस्म हो जायें। और उसे सदबुद्धि प्राप्त हो जाए। वैसे उसके ऊपर 'तम' छाया हुआ है और वो ला-इलाज है। ये आप भी जानते हैं और मैं भी, और ज्यादातर बलोगर्स उसकी फितरत से वाकिफ हैं।

उसकी आत्मा का ह्रास हो चूका है । मेरी पोस्ट पर वो कभी अजित, कभी ज्ञान, कभी नचनिया आदि विभिन्न अवतारों से ज्ञान प्राप्त करने आया करता है।

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ZEAL said...

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मेरा पिछला लेख ' Past life regression " पर था जिस पर चिकित्सकीय अधिकार ज्यादा होने से बहुत से लोगों ने टिपण्णी करने में खुद को असहज पाया । मैंने देखा की पाठक मित्र आत्मा विषय और पूर्व जन्म में ज्यादा रूचि ले रहे हैं। उनकी इस रुझान को देखते हुए मैंने इस विषय पर लेख लिखना उचित समझा।

कुछ लोगों को ये आपति है , इस विषय में धर्म और सदियों से चली आ रही मान्यता का मखौल बनाया गया है। तो ये स्पष्ट कर दूँ की मखौल बना मेरा स्वभाव ही नहीं है ।

यहाँ सिर्फ अपने मन में आने वाले विचारों को रखती हूँ । और जिन प्रश्नों का उत्तर मैं स्वयं को नहीं दे पाती उन्हीं उत्तरों की तलाश में तार्किक रूप में अपनी दुविधा को आपके सामने प्रस्तुत करती हूँ।

यदि मेरे लेखों से किसी को आघात पहुँचता है तो करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ।

लेकिन भविष्य में भी मेरे मष्तिष्क में होने वाला मंथन मेरे लेखों में दिखाई देता रहेगा। इन लेखों से आने -वाले ज्वार- भाटे से कमज़ोर ह्रदय के पाठकों को सचेत करती हूँ।

बहुतेरे पाठक पहले ही पलायन कर चुके हैं। शेष भी स्वतंत्र हैं , बिना वीजा के आने अथवा जाने के लिए।

मैं स्वतंत्रता पसंद करती हूँ, इसलिए सभी की स्वतंत्रता का भरपूर सम्मान भी करती हूँ।

आभार।

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वाणी गीत said...

मैं आस्तिक तो हूँ मगर मुझे लगता है कि इस विषय पर जितना ज्यादा मनन करते हैं , उतना ही ज्यादा कंफ्यूजन हो जाता है ...!

प्रतुल वशिष्ठ said...

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ठीक यही विषय तो था कुछ महीनों पहले 'विचार शून्य' जी की पोस्ट पर. मैं वहीं से उठाकर फिर वही बात रखता हूँ. उनकी उस पोस्ट का लिंक है :
http://vichaarshoonya.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html

१० मार्च २०१० को वह वैचारिक मंथन हुआ था.

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मित्र दीप
आत्माओं की संख्या निश्चित नहीं और न ही आत्मा कोई उत्पादन जन्य इकाई है। आत्मा एक ऊर्जावान इकाई है और इस तरह की इकाइयाँ पूरे ब्रहमांड में व्याप्त हैं। जब किसी आत्मा को अपने उपयुक्त शारीरिक ढांचा मिल जाता है वह जीवंत हो उठता है। यह सच है की आत्मा अजर-अमर है, वह न तो जन्म लेती है और न ही उसकी मृत्यु होती है। किन्तु मित्र आप यह तो जानते ही होंगे की ऊर्जा का नाश नहीं होता, वह रूपांतरित होती है। इसी तरह की अनंत उर्जावान इकाइयाँ न केवल इस पृथ्वी पर गतिवान हैं बल्कि पूरे ब्रहमांड में ही इस तरह का संचार ज़ारी है।

मित्र, हम जो भी खाते हैं उससे हमें ऊर्जा मिलती है, जो अवशिष्ट होता है वह मल के रूप में बाहर आता है। इसी तरह न जाने कितनी ही आत्माओं रुपी उर्जावान इकाइयों का हम भक्षण भी करते रहते हैं, बस वे इसलिए जीवंत नहीं होते क्योंकि हमारे भीतर गर्भ (शारीरिक रचना) नहीं पाते। और अगर पाते हैं तो उपयुक्त-अनुपयुक्त का चुनाव किया जाता है।

जिस तरह कोई भी बेटरी किसी भी मशीन में नहीं लगती, कोई विशेष तरह की ही लगती है। उसी तरह हर शारीरिक रचना के लिए कोई विशेष प्रकार की बेटरी बनी होती है। वर्तमान के संस्कारों ( कर्म और स्वभाव) से हम शारीरिक रचना की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। और पूर्व जन्म के संस्कारों से हमारी उर्जावान इकाई आवेशित रहती है। इस कारण वह अपने लिए किसी विशेष गुणवतायुक्त शारीरिक रचना का चुनाव करती है।
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इन बातों को विस्तार नहीं दे पाया हूँ क्योंकि जटिल विषय के लिये भाषा भी जटिल हो जाती है और लक्षणा और व्यंजना का सहारा लेना पड़ जाता है.

आपके प्रश्न एक स्वस्थ चर्चा को प्रेरित करते हैं. इस चर्चा का व्यापक लाभ तो यही है कि इस बहाने हम आत्म-विवेचन करते हैं और ईश्वरीय सत्ता में धुंधलाता विश्वास नहा-धोकर लौट आता है.

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mahendra verma said...

दिव्या जी,
यदि यह सही है कि किसी टॉपिक पर उस विषय के अधिकृत अध्येता की बातों को निष्कर्ष के रूप में माना जाना चाहिए तो केवल सूचना के लिए यह निवेदन करना चाहता हूं कि मैंने गणित, भौतकी और रसायन विषय के साथ स्नातक तथा दर्शनशास्त्र विषय में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की है। शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में मैं इन्हीं विषयों का अध्ययन-अध्यापन करता हूं। आपसे अनुरोध है कि मेरी पूर्व टिप्पणी को एक बार और देख लें।
प्रतिक्रिया की अपेक्षा के साथ,
सादर...

सतीश सक्सेना said...

मुझे तो केवल आज की चिंता रहती है , आत्मा परमात्मा की समझ ही नहीं है यह तो कोई गूढ़ ग्यानी ही बता सकता है ! इससे पहले की कुछ साकार निराकार के बारे में पूंछा जाए भागते हैं, जब कुछ समझ ही नहीं आया तो जवाब क्या ख़ाक देंगे...

mahendra verma said...

पुनश्च-जैसे आप चिकित्सा शास्त्र की अध्येता हैं तो चिकित्साशास्त्र विषयक टॉपिक पर आपके निष्कर्ष सर्वमान्य होंगे।
सादर...

राम त्यागी said...

if your arguments are endless and senseless then they are called kutark ...I appreciate that you are putting the 'Dwand' going on in your mind but do you think it makes sense to related the aatma with a number of bodies ...you are trying to disapprove aatma theory or concept through a linear mathmatical equation which is not the sensible argument ....can you apply the mathmatical logic when a lady is pregnant, if a zero kid is there then how does it become 1 kid or two kid ? there is a bilogical transformation from the sperms which translate into a live body ...and that body is alive, that body takes the mind from their parents, ancestors ....

ZEAL said...

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महेंद्र जी,

आपकी टिप्पणियां अपने आप में सम्पूर्ण होती है। अपने हर लेख पर आपकी टिप्पणियों से मोहित होती हूँ। आपकी टिप्पणियां आपकी शैक्षणिक योग्यता स्वयं ही बता देती हैं। यदि आप यहाँ न भी बताते तो भी समझ लिया था पहले ही।

विज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम है। हमेशा मेरे मन को उद्वेलित करता है। विज्ञान मेरा विषय होने के कारण मन तर्क भी करता है, और कुतर्क भी। मुझे मस्तिष्क में चलने वाली इन आँधियों से प्यार हो गया है। अपने मन मस्तिष्क में उठाना वाले विचारों को यहाँ लिखती हूँ, और पाठकों की टिप्पणियों का विशेष सम्मान करती हूँ।

कुछ टिप्पणियां मेरा मनोबल बढाती हैं। कुछ टिप्पणिया आत्म-मंथन को प्रेरित करती हैं । और कुछ टिपण्णी और अधिक सोचने पर विवश करती है।

महेंद्र जी, आपकी टिपण्णी प्रत्येक लेख पर बहुत ध्यान से पढ़ी है। आपकी टिप्पणियां बहुत ही सार गर्भित होती है । पूर्वाग्रहों से रहित होती हैं। लेखक का मनोबल नहीं तोडती। किसी प्रकार का व्यंग भी नहीं होती।

आपकी टिप्पणियों में एक सुन्दर और स्पष्ट चिंतन झलकता है , जो काफी वैज्ञानिक होता है। आपकी टिप्पणियों से लेख की सार्थकता सदैव द्विगुणित हो जाती है। तथा मुझे बेहतर लिखने को प्रेरित करतीं है।

आभार ।

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sanjay said...

बहुतेरे पाठक पहले ही पलायन कर चुके हैं। शेष भी स्वतंत्र हैं , बिना वीजा के आने अथवा जाने के लिए।

aur bahuter chori-chori se ate hain aur chale jate hain......

chunki aapke blog par nirantar gudh vishyon ki charcha rahti hai .... so, jinme panditya hoga o
tark karenge aur jisme gyan hoga o manan karenge....aur sikhenge.....

jahan prasad bat raha ho.....wahan amantran ki koi jaroorat nahi hoti....log khud b khud pahunch jate hain......

ek bar phir apko sadar pranam.

ZEAL said...

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महेंद्र जी ,

कभी टिपण्णी का प्रत्युत्तर नहीं दिया तो ये मत समझिएगा की आपकी टिपण्णी को कमतर समझा। सच तो यह है , की आपकी टिपण्णी में जो लिखा होता है , वो काफी कुछ मेरे ही विचारों से मिलता है , इसलिए लिखने को कुछ शेष नहीं रह जाता वहां।

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ZEAL said...

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राम त्यागी जी,

जैसे भिन्न-भिन्न पाठक अपने तरीके से अपनी बात रखते हैं, वैसे ही मैं भी अपने मस्तिष्क की बात , अपने लेखों के माध्यम से रखने की कोशिश करती हूँ। और ये सच है की बहुत से लोगों को मेरे लेख senseless और अज्ञानता से भरे हुए लगेंगे। लेकिन त्यागी जी, सभी को खुश तो नहीं कर सकती न ?

क्या ये उचित नहीं है कि मैं , मैं ही बनी रहूँ ? मैंने खुद को कभी बड़ा भारी विद्वान् नहीं समझा , बस इतना ही काफी है मेरे लिए।

फिर भी आपके सुझाव के अनुसार बेहतर लिखने का प्रयास करुँगी आगे से।

आभार।

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ZEAL said...

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संजय जी,

आपको भी मेरा नमन ।

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Shekhar Suman said...

दिव्या जी आपका यह विषय बहुत सारे महापुरुषों को अच्छा नहीं लग रहा है...अगली बार पोस्ट डालने से पहले उनसे विषय पूछ लीजियेगा...
smiles...

Mansoor Ali said...

[आत्म] -'मंथन' कर जब 'ZEAL'* पे आया व्यथित हो बैठा ! [ जोश/उत्साह*]
प्रश्न के घेरे में, "ख़ुद ही था", विस्मित हो बैठा !!
मठ कर 'माखन' जमा किया, अब भोग की बारी थी !!!
'माखन' पूछे कौन हूँ मैं?, मैं भ्रमित हू बैठा !!!!

--mansoorali हाश्मी
http://aatm-manthan.com

विवेक सिंह said...

अरे ये मैं कहाँ आ गया !

निर्झर'नीर said...

आपका ब्लॉग बहुत ही ज्ञानवर्धक लगा ..आत्मा पर अभी कोई टिपण्णी नहीं हाँ लेखन पर आपकी पकड़ बहुत अच्छी है ..आपका मेरे ब्लॉग पे आना मेरी खुशकिस्मती है ...बहुत बहुत आभार

ZEAL said...

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शेखर जी,

दुनिया के रंग अजब , गजब और निराले हैं।

पाठकों कि टिप्पणियां पढ़ कर उनकी सोच का हल्का फुल्का अनुमान तो लगाया ही सकता है। इसका भी अपना एक आनंद है।

टिप्पणियां पढने के बाद कुछ लोगों के लिए सम्मान से मन भर उठता है तो कुछ लोगों के पूर्वाग्रह देखकर मन खिन्न भी हो जाता है। कुछ मुस्कुरा कर ही चल देते हैं । हम ये सोचकर खुश हो लेते हैं कि चलो ये मुस्कुराये तो । भड़ास तो नहीं निकाल कर गए।

किसी पे व्यक्तिगत कमेन्ट करना सबसे आसान है। किसी के खिलाफ , उसका मज़ाक उड़ाने के लिए पोस्ट लगाना भी आसान काम है।

लेकिन जब ब्लॉग पर लिखने के लिए बहुत कुछ हो तो कोई --

" ये क्यूँ लिखे , वो क्यूँ न लिखे ?"

-Smiles-

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Kailash C Sharma said...

दिव्या जी कभी कभी आप इतने गहन प्रश्न प्रस्तुत कर देती हैं कि वे कई दिनों तक दिमाग में घुमड़ते रहते हैं और उनसे बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है. आपने जो शाश्वत प्रश्न उठायें हैं उनका संतोषजनक उत्तर तो आजतक न कोई धर्म ग्रन्थ दे पाया है और न ही विज्ञान. मस्तिष्क कहता कि आत्मा, ईश्वर,पुनर्जन्म,मोक्ष कुछ नहीं, जो कुछ है यह जीवन और शरीर ही है. लेकिन दिल कहता है कि नहीं कहीं कुछ तो है जो शरीर, आत्मा और जगत को चलाता है, चाहे उसे ईश्वर कहें या आत्मा या और कुछ. दिल और दिमाग का यह संघर्ष तब तक चलता रहेगा जब तक कोई ऐसा उत्तर न मिल जाए जो दिल और दिमाग दोनों को स्वीकार हो. तब तक तो ये प्रश्न अनुत्तरित ही रहेंगे

ZEAL said...

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कैलाश शर्मा जी,

इश्वर ने मनुष्य को अन्य पशुओं से श्रेष्ठ बनाया है। क्यूंकि हमारे पास दिमाग है , जिसमें विचार आते हैं और निरंतर चिंतन चलता रहता है। चूँकि हम सामाजिक प्राणी हैं, इसलिए हम अपने मस्तिष्क में आये विचारों को बंधू-बांधवों के साथ बाँट लेते हैं और बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर भी पा लेते हैं। वर्ना दोपायों और चौपायों में फरक कहाँ रह जाएगा।

जब तक हम सभी लकीर से हटकर नहीं सोचेंगे , इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिल सकता। जो सदियों की मान्यता है , उसे काटना तो हमारा उद्देश्य नहीं, लेकिन यदि मन में कोई प्रश्न आता है, तो उसे दबाना सर्वथा अनुचित है। आज नहीं तो कल, उत्तर तो मिलेगा ही।

बरसों पहले किसी ने कहा -- " आत्मा अमर है "
आज बहुत से लोगों के मन में प्रश्न है -- " क्या सच में आत्मा अमर है "
कल हमारी संतानों के पास-- संभवतः इसका उत्तर भी होगा।

मस्तिक्ष में प्रश्न आना ही स्वास्थ्य चिंतन का प्रमाण हैं। प्रश्नों के घेरे में तर्क-वितर्क और असंख्य दुविधाएं । इसमें गोते लगाकर ही भव-सागर पार हुआ जा सकता है।

मृत्यु तो निश्चित है ही। आज नहीं तो कल हर आत्मा को अपना ये किराए का मकान खाली करना ही पड़ेगा। और भटकना पड़ेगा अगले आवास के लिए। [ मान्यता ]

जिस दिन मेरी मृत्यु होगी , उस दिन मेरे पंचभौतिक शारीर के साथ-साथ मेरी आत्मा का भी अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। [ मेरा विश्वास ]

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डा० अमर कुमार said...


एक विचार :
बुद्धिमान लोग किसी भी तथ्य को अँतिम सत्य नहीं मानते, बिना मनन किये वह कोई दावा नहीं किया करते ! त्वरित प्रतिक्रिया में केवल मूर्ख ही ऎसे दावे कर सकते हैं ।

प्रतिप्रश्न :
यह आप कैसे कह सकते हैं ?

प्रत्युत्तर :
क्योंकि यह मेरा दावा है !!

:)

मृत्‍युन्‍जय कुमार त्रिपाठी said...

जो भी चीजें ब्रहमांड में मौजूद हैं और दिखाई नहीं देती, सिर्फ हम महसूस कर पाते हैं, उनका थाह पाना काफी मुश्किल है। आत्‍मा को भी हम देख नहीं सकते। ईश्‍वर को भी नहीं देख सकते। आत्‍मा का होना और न होने का सवाल ठीक वैसा ही है जैसा ईश्‍वर के होने और न होने का है। ईश्‍वर के बारे में हमें ग्रंथ बताते हैं तो आत्‍मा के बारे में भी महाभारत के दौरान अर्जुन को भगवान श्रीकृष्‍ण ने समझाया है। भगवान श्रीकृष्‍ण के अनुसार, आत्‍मा अजर और अमर है। इसे कोई मार नहीं सकता। यह खुद भी कभी समाप्‍त नहीं हो सकता और कभी जन्‍म भी नहीं लेता। यानी, आत्‍मा ही शाश्‍वत है। पर, भगवान श्रीकृष्‍ण की यह तो तब मानी जाएगी जब सबसे पहले यह स्‍प्‍ष्‍ट हो जाए कि भगवान श्रीकृष्‍ण थे। जब हम आत्‍मा के बारे में संशय प्रकट करते हैं तो ईश्‍वर के बारे में भी यह विद्यमान है। हमारा मानना है कि कुछ चीजें इंसान की सोचों और जानकारियों से परे है। प्रकृति को समझने के लिए प्राकृतिक होना ही पड़ेगा जो कि इस युग में तो संभव नहीं। तथाकथित प्रकृति प्रेमी और ईश्‍वर का भक्‍त कहलाने से कोई प्रकृति के रहस्‍यों को नहीं जान सकता। हम ऐसा मानते हैं कि कुछ चीजें रहस्‍य रहने के लिए ही बनी हैं, और इंसानों को उस पर सोचने के लिए प्रतिबंध है। या यूं कहें कि चाहे इंसान जितना भी सोच ले, उसके पार जाना संभव नहीं...। जहां तक आस्तिक और नास्तिक की बात है तो इस बारे में हमारा ऐसा मानना है कि ईश्‍वर या प्रृकृति अथवा आत्‍मा को नास्तिक तथाकथित आस्तिकों से कहीं अधिक समझ पाते हैं। वे इसे समझने का प्रयास करते हैं और जब इसमें उन्‍हें सफलता नहीं मिलती तो या तो निरुत्‍साहित हो जाते हैं या फिर ऐसा मान लेते हैं कि ऐसा कुछ है ही नहीं। लेकिन इसके पहले वे तर्क या अन्‍य प्रयत्‍नों के द्वारा अपने सवालों को परखने की कोशिश अवश्‍य करते हैं। पर आस्तिकों की बात करें तो आस्तिक आंखें बंद कर चलने में यकीन करते प्रतीत होते हैं। उन्‍हें ऐसा लगता है कि यदि आंखें खोले तो पाप हो जाएगा। वे भगवान के होने और न होने, आत्‍मा के होने और न होने के सवालों से ही बचते हैं। और जो सवालों से बचता चले, उसे जवाब मिल पाना संभव नहीं। हमें कहना पड़ रहा है कि हम भी उसी प्रकार के आस्तिक हैं और हम आत्‍मा के होने और न होने के विषय में अधिक विमर्श नहीं कर सकते। हां, इतना अवश्‍य कह सकते हैं कि आत्‍मा निश्चित ही अमर है। हमे याद हैं जब हम छोटे थे तो हमारे गांव के बगल में एक बच्‍चा उत्‍पन्‍न हुआ था। जब वह सात-आठ साल का हुआ तो उसे दूसरे जिले के एक परिवार की सारी बातें याद थीं। वह वहां से करीब 150 किमी. दूर एक परिवार के घर की सारी बातें जानता था। यही नहीं, यह तब था जबकि वह कभी वहां गया ही नहीं था। बाद में उसकी कही सारी बातें सत्‍य पायी गयी और ऐसा माना गया कि उसी परिवार का वह कभी सदस्‍य था। ऐसी अन्‍य घटनाएं भी देखने को मिली हैं जो पूर्वजन्‍म को पुष्‍ट करती हैं। यदि पूर्वजन्‍म है तो निश्चित ही आत्‍मा अमर है। क्‍योंकि पूर्वजन्‍म का मतलब ही है कि आत्‍मा ने दुबारा शरीर शरण किया है। पूर्वजन्‍म की बातें उसे तभी याद रह सकती है कि जबकि उसी आत्‍मा ने इस जन्‍म में भी अपनी उपस्थिति दर्शायी हो। फिलवक्‍त आत्‍मा के बारे में अधिक विमर्श के लिए न तो मेरी उम्र काफी है, न मेरे अनुभव। आपसे जो जानकारियां मिलीं, उससे हमारा कुछ हद तक ज्ञानबद़र्धन अवश्‍य हुआ है पर संशय बरकरार है। सवाल अब भी मौजूद है।

मृत्‍युन्‍जय कुमार त्रिपाठी said...

जो भी चीजें ब्रहमांड में मौजूद हैं और दिखाई नहीं देती, सिर्फ हम महसूस कर पाते हैं, उनका थाह पाना काफी मुश्किल है। आत्‍मा को भी हम देख नहीं सकते। ईश्‍वर को भी नहीं देख सकते। आत्‍मा का होना और न होने का सवाल ठीक वैसा ही है जैसा ईश्‍वर के होने और न होने का है। ईश्‍वर के बारे में हमें ग्रंथ बताते हैं तो आत्‍मा के बारे में भी महाभारत के दौरान अर्जुन को भगवान श्रीकृष्‍ण ने समझाया है। भगवान श्रीकृष्‍ण के अनुसार, आत्‍मा अजर और अमर है। इसे कोई मार नहीं सकता। यह खुद भी कभी समाप्‍त नहीं हो सकता और कभी जन्‍म भी नहीं लेता। यानी, आत्‍मा ही शाश्‍वत है। पर, भगवान श्रीकृष्‍ण की यह तो तब मानी जाएगी जब सबसे पहले यह स्‍प्‍ष्‍ट हो जाए कि भगवान श्रीकृष्‍ण थे। जब हम आत्‍मा के बारे में संशय प्रकट करते हैं तो ईश्‍वर के बारे में भी यह विद्यमान है। हमारा मानना है कि कुछ चीजें इंसान की सोचों और जानकारियों से परे है। प्रकृति को समझने के लिए प्राकृतिक होना ही पड़ेगा जो कि इस युग में तो संभव नहीं। तथाकथित प्रकृति प्रेमी और ईश्‍वर का भक्‍त कहलाने से कोई प्रकृति के रहस्‍यों को नहीं जान सकता। हम ऐसा मानते हैं कि कुछ चीजें रहस्‍य रहने के लिए ही बनी हैं, और इंसानों को उस पर सोचने के लिए प्रतिबंध है। या यूं कहें कि चाहे इंसान जितना भी सोच ले, उसके पार जाना संभव नहीं...। जहां तक आस्तिक और नास्तिक की बात है तो इस बारे में हमारा ऐसा मानना है कि ईश्‍वर या प्रृकृति अथवा आत्‍मा को नास्तिक तथाकथित आस्तिकों से कहीं अधिक समझ पाते हैं। वे इसे समझने का प्रयास करते हैं और जब इसमें उन्‍हें सफलता नहीं मिलती तो या तो निरुत्‍साहित हो जाते हैं या फिर ऐसा मान लेते हैं कि ऐसा कुछ है ही नहीं। लेकिन इसके पहले वे तर्क या अन्‍य प्रयत्‍नों के द्वारा अपने सवालों को परखने की कोशिश अवश्‍य करते हैं। पर आस्तिकों की बात करें तो आस्तिक आंखें बंद कर चलने में यकीन करते प्रतीत होते हैं। उन्‍हें ऐसा लगता है कि यदि आंखें खोले तो पाप हो जाएगा। वे भगवान के होने और न होने, आत्‍मा के होने और न होने के सवालों से ही बचते हैं। और जो सवालों से बचता चले, उसे जवाब मिल पाना संभव नहीं। हमें कहना पड़ रहा है कि हम भी उसी प्रकार के आस्तिक हैं और हम आत्‍मा के होने और न होने के विषय में अधिक विमर्श नहीं कर सकते। हां, इतना अवश्‍य कह सकते हैं कि आत्‍मा निश्चित ही अमर है। हमे याद हैं जब हम छोटे थे तो हमारे गांव के बगल में एक बच्‍चा उत्‍पन्‍न हुआ था। जब वह सात-आठ साल का हुआ तो उसे दूसरे जिले के एक परिवार की सारी बातें याद थीं। वह वहां से करीब 150 किमी. दूर एक परिवार के घर की सारी बातें जानता था। यही नहीं, यह तब था जबकि वह कभी वहां गया ही नहीं था। बाद में उसकी कही सारी बातें सत्‍य पायी गयी और ऐसा माना गया कि उसी परिवार का वह कभी सदस्‍य था। ऐसी अन्‍य घटनाएं भी देखने को मिली हैं जो पूर्वजन्‍म को पुष्‍ट करती हैं। यदि पूर्वजन्‍म है तो निश्चित ही आत्‍मा अमर है। क्‍योंकि पूर्वजन्‍म का मतलब ही है कि आत्‍मा ने दुबारा शरीर शरण किया है। पूर्वजन्‍म की बातें उसे तभी याद रह सकती है कि जबकि उसी आत्‍मा ने इस जन्‍म में भी अपनी उपस्थिति दर्शायी हो। फिलवक्‍त आत्‍मा के बारे में अधिक विमर्श के लिए न तो मेरी उम्र काफी है, न मेरे अनुभव। आपसे जो जानकारियां मिलीं, उससे हमारा कुछ हद तक ज्ञानबद़र्धन अवश्‍य हुआ है पर संशय बरकरार है। सवाल अब भी मौजूद है।

RAJAN said...

इस मामले में पहली बार इतना सबकुछ जानने को मिला हालाँकि मेरा सोचना भी सतीश सक्सेना जी की तरह ही हैं।

शिक्षामित्र said...

मनुष्य सदा से अदम्य जिजीविषा लिए रहा है। सहज मृत्यु को योगी ही प्राप्त होते रहे हैं। आम आदमी अंतिम क्षणों में कितना घबराया,व्याकुल रहता है,हम सब जानते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन के प्रति इस लालसा को सांत्वना देने के प्रयोजन से ही,आत्मा की अमरता का सिद्धांत रखा गया होगा। एक आस रहती है मरते-मरते भी कि चलो,अभी शरीर नष्ट हो भी गया तो क्या,फिर जन्म होगा।

Apanatva said...

Divya aatma gyan moksh keval gyan mujh jaisee nacheez ke liye bhul bhulaiya me uljhane ke alava kuch nahee hai .sirf poora prayatn hai ki ek acche sacche insaano kee shrenee me khade hone layak ban jae ise janm me...... koi aisa kaam na ho jisse doosre ko kasht ho.......usme bhee swarth hai.....karan koi bhee dukh , kisee ka bhee dukhee mujhe bhee kar jata hai.........

JHAROKHA said...

divya ji,
bahut khoob jo kuchh bhi aapne aatma ke baare me vichar prastut kiye hain vah vaakai me ek vivhachrniya prashn hai .
kya atma ko aaj tak kisi ne dekha hai ,jaana hai?hamne bhi dadi,nani se hi suna hai ya fir kisson v kahaniyo me hi padha v suna hai.aapke blog par aana bahut hi achhalagta hai lagta jaise kisi darshnik se baat ho rahi hai.
"क्या आत्माएं नास्तिक होती हैं ? यदि नहीं , तो नास्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या नास्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ।"
bahut hi sochniy vtathy-parak prashn
sach bahut hi achha laga padh kar .
ha! ek baat bahut dino se aapse puchhnachahti hun agar aap anytha na le toyah jaanana chahti hun ki aapkahan ki rahne wali hai,matlab shadi se pahale.koi aisi baat nahi hai sirf man me ek duvidha hai aapke chehara meri bhaut kisi ajij se milta hai kya apke bachpan ka naam gudiya hai ?please mere prashn ka jawab ho sake to jaroor dijiyega. xhma sahit--------
poonam

जयकृष्ण राय तुषार said...

amazing nice

पी.सी.गोदियाल said...

"वापस आते हैं अपनी समस्या पर। मोक्ष के चलते आत्माओं की संख्या में कमी होने पर , बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्माएं कहाँ से आयेंगी। क्या आत्मा की भी उत्पत्ति संभव है ? यदि हाँ तो बेहतर गुणवत्ता वाली , तथा मोक्ष के योग्य आत्मा की उत्पत्ति कैसे की जाये ?"

दिव्या जी इस बारे में बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं रखता मगर एक बार पहले भी कहीं पर इससे मिलता जुलता एक प्रश्न मेरे समक्ष उठा था कि यदि आत्मा अजर और अमर है , और उसकी कोई नई उत्पत्ति नहीं है तो फिर आज की जनसंख्या जो आजादी के पहले से चार गुना ज्यादा हो गई है तो ये इतनी नई आत्माए कहाँ से आई ? किसी के द्वारा इसका जबाब यह दिया गया था कि भिन्न-भिन्न जीवो की आत्माए जो इस अथाह ब्रह्माण्ड में विचरण युगों से कर रही है वे मनुष्य योनी में आ गई, न कि नई आत्माओं ने जन्म लिया ! अब है तो यह भी विवाद का ही विषय मगर विचारणीय है !

Asha said...

मुझे यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी |आपने बहुत गहराई से सोच कर लिखा है |बधाई
आशा

मनोज भारती said...

अपना-अपना विश्वास
अपना-अपना ज्ञान
सत्य से फिर भी अनजान
यात्रा शुरु तो की गई
पर मंजिल अभी भी रहस्य

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

दिव्या जी,
नमस्कारम्‌!
आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ! जो प्रश्न अक्सर मेरे मस्तिष्क में उभरकर चिंतन को कुरेदते रहे हैं, आज पुनः उठ खड़े हुए। आपकी इस ‘आत्मा’ विषयक चर्चा पर र्मैं अपना अभिमत अपने ब्लॉग http://jitendrajauhar.blogspot.com/ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ...अभी एकाध घंटे के बाद आप उक्त ब्लॉग पर ज़रूर आइए, कुछेक बिन्दु वहाँ पर मैं आपके Reference के साथ साभार देने की कोशिश करूँगा....आप एवं आपके उपर्युक्त समस्त विद्वान मित्रगण/टिप्पणीकार साथी सादर आमंत्रित हैं। और हाँ...कोई बहुत बड़ी उम्मीदें लेकर न आइएगा...प्लीज़.... क्योंकि मैं कोई आधिकारिक विद्वान नहीं। बस आपको पड़कर कुछ विचार जागे हैं, सो प्रस्तुत करूँगा।

Prem said...

दिव्या जी -यह विषय गंभीर है ,मनन और चिंतन का ,जिसे अनुभव स्तर पर समझा जा सकता है ,संतों की पुस्तकें मार्ग दर्शन करती हैं । विजय दशमी की मंगल कामनाएं ।

Mayank Bhardwaj said...

बहुत सुन्दर लिखा है ....

ZEAL said...

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पूनम जी,

मैं लखनऊ की रहने वाली हूँ। कुछ समय फैजाबाद, ग्वालियर, इंदौर ,बनारस , दिल्ली में भी गुजरा है। इस समय थाईलैंड में रह रही हूँ। मेरा नाम गुडिया नहीं है। घर पर भी सभी दिव्या ही बुलाते हैं।

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ZEAL said...

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इस चर्चा में शामिल सभी सम्मानित ब्लोगर्स का बहुत-बहुत आभार।

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ZEAL said...

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अमित 'मस्त' जी की मेल से प्राप्त टिपण्णी जो २० तारिख को लिखी गयी थी। देर से प्रकाशित करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

hi divs
hows u
was reading thru ur blog and came up with ur latest posting in there abt 'reincarnation'
wanted to leave a comment, but wasn’t able to
think am not acquainted with the thing actually
anyway, here is what i intended to write in there .........

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What people call or term as reincarnation or what people think one tells about things from previous life, when under hypnotic stance, i will prefer calling it "summation of sub-conscious mind" ...... things which one may have felt or seen during their life AND things which one wish for themselves and/or for others during the tenure of their life based on such feelings ...... in other words, a tussle between one's Brain and Heart ....... a tussle which is there, prefer calling it as "Reality" and something which one things ought be there, prefer calling it "Truth" ....... think, lots can be solved and lot of ppl can be helped if the whole process can be evaluated under this hypothesis ........... (not sure if I was able to explain myself properly here)

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hope u doing well
happy dushhera wish it brings all happiness for you and your family

Amit

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JYOTI PRAKASH said...

मनुष्य आत्मा की संख्या पृथ्वी पर

सतोप्रधान युग के प्रारंभ पर : ९ लाख (लगभग )
कलयुग अंत (maximum ) : अज्ञात 'या' जबतक वे ९ लाख (लगभग) identified नही हो जाते , re-play के लिए |

जब ९ लाख (लगभग) play में act कर रहे होते हैं तो अन्य rest कर रहे होते हैं, आत्मा रूप में | उन्हे Zeal ने extra से संबोधित किया है |

शारीर के भान (देहभान) से मुक्ति 'या' मोक्ष की इक्छा का त्याग मोक्ष है |

मनुष्य आत्मा से मतलब मनुष्य योनि से जन्म लेने वाला हर चेतन शिशु |

JYOTI PRAKASH said...

शिशु के स्थान पर प्राणी शब्द उपयुक्त होगा |

दिगम्बर नासवा said...

देरी से आया हूँ इस पोस्ट पर .. इस लिए बस आनद ही आनद ले रहा हूँ ... लेख और टिप्पणियों दोनो का ....

Priya said...

Divya ji

Congratulations for drawing our souls towards such topic. Thinking and answering such questions is a reunion of AATMAA and PARMAATMAA.We all keep on ignoring such basic questions. Thanks for making us ponder over it.

abishek1502- 'Each cell has life'-very nice

'kitni aatmaa kaa ham bhakshan karte hain'- further nice.

Uataad ji-kataksh ati sarahniya hai.

mahendra verma- satya likha hai.

I do not agree with Charvaak darshan.

Ram tyagi ji aise sawaal kutark nahin hain balki chintan ki taraf le jaate hain.

I feel
Aatma never decays. It is different from energy 'urja' of science as it does not convert in any other type. you may also call it 'intelligence' or 'chetna'. It is there in living, non living and dead as well. It is in every particle even in dust. 'Yeh charachar jagat mein vyapta hai'. The intelligence' shows perceivable activity when it is in animal or plant body. While explaining several inexplicable events in science we take refuge of this term.

aatma digits mein nahin hai. yeh continuous hai.

Aatma is not good or bad or of a particular religion. It behaves according to the body to which it is holding/supporting/working for. Let us see a childish example.

Computer Hardware- Genes and the body
Operating system- atmosphere in which a
living being is brought up
Application Software---- our behaviour and
actions
Electricity & artifical intelligence-AATMAA-like

Therefore it is said that aatmaa or paramaatma has no colour , shape, smell, habit etc.etc. but even then it exhibits them (i.e. according to the body/plant/flower/dust etc.etc.)

Please ignore my immmaturity if any.

regards
priya

ZEAL said...

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प्रिया जी,

'आत्मा' विषय पर आपने जो जानकारी दी है, पढ़कर हैरत में हूँ। इतना गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विश्लेषण ! आपकी टिपण्णी से मेरी ये पोस्ट सार्थक हो गयी। आप उन चुनिन्दा टिप्पणीकारों में से हैं जिनसे मैं निरंतर कुछ नया सीखती हूँ।

मेरी सोच को एक नया आयाम देने के लिए आपका बहुत आभार।

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darshanic said...

Hi Divya, interesting topic ! I will post a link in this connection hoping that it will offer a perspective on souls as well as enlightenment. It will explain why immortal souls dwell in a perishable body.
http://www.godless-spirituality.com/reality.html

Prashant Mankar said...

आत्मा ना मरती है नहीं उत्पन्न होती है।
अब जो मनुष्य जाती में संख्या बढ़ी है तो वही जीव-कीटक,जंगल के प्राणी में कमी आई है।
वही मनुष्य जन्म लेते है।
तथा मनुष्य के जीने का ढंग और स्वभाव से पता चलेगा। वह किस प्राणी में है।
एक बात कहता हूँ
कहिपर अगर माटी का ढेर दिखे तो समझलो कही पर खड्डा पड़ा हुआ है।

Prashant Mankar said...

आत्मा ना मरती है नहीं उत्पन्न होती है।
अब जो मनुष्य जाती में संख्या बढ़ी है तो वही जीव-कीटक,जंगल के प्राणी में कमी आई है।
वही मनुष्य जन्म लेते है।
तथा मनुष्य के जीने का ढंग और स्वभाव से पता चलेगा। वह किस प्राणी में है।
एक बात कहता हूँ
कहिपर अगर माटी का ढेर दिखे तो समझलो कही पर खड्डा पड़ा हुआ है।

Prashant Mankar said...

दिव्या जी।
आत्मा नातो मरती है नाही जन्म लेती है।
अब सबको प्रश्न पड़ा की इतनी लोकसंख्या बढ़ी ये आत्मा कहासे आई।
मै बताता हु यह आत्मा कहासे आई।
आत्मा सिर्फ शरीर बदलती है।
जहां एक तरफ जंगल कटे तो जीव-कीटक, जंगली जानवर कम हुए,बाघ ,शिंह, हिरण आदि कम हुए इन्ही आत्मावोने मनुष्य देह धारण किया आपको उनके रहन सहन से पता चलेगा।

Prashant Mankar said...

दिव्या जी।
आत्मा नातो मरती है नाही जन्म लेती है।
अब सबको प्रश्न पड़ा की इतनी लोकसंख्या बढ़ी ये आत्मा कहासे आई।
मै बताता हु यह आत्मा कहासे आई।
आत्मा सिर्फ शरीर बदलती है।
जहां एक तरफ जंगल कटे तो जीव-कीटक, जंगली जानवर कम हुए,बाघ ,शिंह, हिरण आदि कम हुए इन्ही आत्मावोने मनुष्य देह धारण किया आपको उनके रहन सहन से पता चलेगा।
आत्माये बढ़ेगी नहीं वाही इस तराजू की तरह इस पारडे में जाएगी या दुसरे पराडे में जाएगी।
एक बात कहदु जहा मट्टी का ढेर दिखे वह समझ लेना की कहिपे तो खड्डा पड़ा है।

Prashant Mankar said...

आत्मा ना मरती है नहीं उत्पन्न होती है।
अब जो मनुष्य जाती में संख्या बढ़ी है तो वही जीव-कीटक,जंगल के प्राणी में कमी आई है।
वही मनुष्य जन्म लेते है।
तथा मनुष्य के जीने का ढंग और स्वभाव से पता चलेगा। वह किस प्राणी में है।
एक बात कहता हूँ
कहिपर अगर माटी का ढेर दिखे तो समझलो कही पर खड्डा पड़ा हुआ है।

kalpant sawashram said...

suder hai per itne bhash kya
ham bas yhe ruk jate hai bhas bhas
per yhe tho anubhav ka subject hai is per jetna padoge sunoge behamit hote jaoge