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Friday, August 24, 2012

इस मनचले ब्लॉगर का आभार


कल एक मनचले ब्लॉगर की पोस्ट पर एक टिप्पणी पढ़ी। अब ये न पूछियेगा किसकी टिप्पणी थी। अरे उसी मनचले ब्लॉगर की टिप्पणी थी जिसके ब्लॉग पर लिखी थी। बस उसका शौक है की अपने ही ब्लॉग पर 'बेनामी' बनकर खुद ही टिप्पणी करता है....Smiles...

खैर टिप्पणी में लिखा क्या था ?

लिखा था-- " दिव्या ने अपने ब्लॉग पर ३० साल पुरानी तस्वीर लगा रखी है , पता नहीं किसको आकर्षित करने के लिए"

पढ़कर मन में यही ख़याल आया की ये इतना बुज़ुर्ग हो गया है, लेकिन महिलाओं की तस्वीरों में ही उलझा हुआ है अभी तक। ब्लॉगर तो बुद्धिजीवी वर्ग में आते हैं, लेकिन ये तो किसी के विचार नहीं पढता, बल्कि तसवीरें ही देखता है।

लेकिन फिर सोचा , बात तो सही कह रहा है बेचारा। इतनी पुरानी तस्वीर लगाने क्या फायदा। चलो कोई बुढापे वाली शानदार तस्वीर लगाई जाए। कुछ तो डरेगा ये मुझसे। बस फिर क्या था , ढूंढना शुरू किया एक अदद तस्वीर को , जिसने पैसठ (६५) बसंत देख लिए हों।

वो कहते हैं ना-- जहाँ चाह , वहां राह......मिल गयी ना आखिर एक अदद तस्वीर श्रीमती दिव्या श्रीवास्तव की।

नोट- दोनों तस्वीरों में परिधान एक ही है (वही तीस साल पुराना), सर्फ़ एक्सेल का कमाल है !!


Hey ! Thanks Mr मनचले !

Zeal

Tuesday, February 8, 2011

हम ब्लोगिंग क्यूँ करते हैं ?

मेरी मित्र राधिका , जो वर्षों जो मुझे जानती है , ने कहा - " दिव्या तुम बहुत complicated हो "

मैंने सादगी से कहा - " हाँ हूँ , तुम्हारे लिए " क्यूंकि जब प्रश्न हल नहीं हो पाता , तो 'कठिन' कहलाता है , जब अंगूर अप्राप्य हो जाता है तो 'खट्टा' कहलाता है और जब कोई किसी की सादगी कों समझ पाने में असफल रहता है , तो उसे complicated' कहता है।

राधिका कौन है ? -
राधिका कोई एक चरित्र नहीं बल्कि एक symbolic पात्र है । मेरा किसी से भी जो संवाद होता है , वो राधिका के नाम से लिखती हूँ। और एक ही लेख में बहुत से भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से हुआ संवाद राधिका के नाम से ही कहा गया है , इसलिए कोई भी स्वयं कों राधिका न समझे , हाँ इसे पढने के बाद आपको अपनी झलक कहीं कहीं राधिका में अवश्य मिलेगी।

दिव्या कौन है ? -
दिव्या एक स्त्री है जो स्वयं कों सुधारना चाहती है और अपने साथ साथ , पूरे समाज कों सुधारना चाहती है । वो एक ऐसी दुनिया की कल्पना करती हो जहाँ स्त्री पुरुष समान अधिकार और सम्मान के साथ जिए, एक समाज जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो , एक परिवेश जिसमें सभी संवेदनशील हो , द्वेषमुक्त हों तथा अपनापन हो।

वो एक मुखर , स्वीकारात्मक व्यक्तित्व की है जो अपने सामने आई समस्याओं कों no-nonsense तरीके से सुलझाने का प्रयास करती है। वो एक सामान्य व्यक्ति की तरह कुछ कमजोरियों और कुछ अच्छाइयों का मिश्रण है जो अपने मन के द्वन्द कों स्वयं तक ही सीमित रखती है और उनके हल ढूँढने के बाद समाजोपयोगी रूप में प्रस्तुत करती है । उस सहानुभूति पसंद नहीं है क्यूंकि वो उसे कमज़ोर करती है , और कमज़ोर व्यक्तित्व समाजोपयोगी नहीं रह जाते । वो अपने चारों तरफ एक कठोर आवरण बुन कर रखती है , जो अभेद्य कवच की तरह उसकी रक्षा करते हैं। वो अपने मित्रों के साथ कठोरता से ( straight forward) तरीके से पेश आती है , क्यूंकि वो उन्हें भी कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहती , उन्हें strong देखना चाहती है। मित्रों की strength दिव्या की भी ताकत है ।

दिव्या अन्दर से एक कोमल और भावुक व्यक्तित्व की धनी है , लेकिन अपनी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं करती क्यूंकि उसे लगता है की इस विनाश शील सृष्टि में भावनाओं का कद्र करने वाले विरले ही हैं। कोई चार दिन आपको समझेगा लेकिन फिर मानवीय दुर्गुण जैसे - पूर्वाग्रह , ईर्ष्या, अहंकार , द्वेष आदि उस पर हावी हो जायेंगे जो परस्पर सम्बन्धों में दूरी लाते हैं। इसलिए बेहतर है की हर किसी के साथ एक निश्चित दूरी पर ही रहा जाए।

आप अच्छे थे पहले अजनबी की तरह ।
मुझसे मिलते तो थे अपनों की तरह ।
अपना बनकर तो आप बहुत दूर हो गए
अब कुशल क्षेम भी होती है गैरों की तरह ।


एक बार राधिका ने मुझसे कहा - " मैंने मित्रों से शर्त लगाई है , तुम्हारी ब्लोगिंग छह महीने से ज्यादा नहीं चलेगी। मैंने कहा- " हर चीज़ का अंत तयशुदा है । मैं हारूंगी तो तुम्हारी जीत का जश्न मनाऊँगी । "

कल राधिका ने मुझसे पूछा - " तुम ब्लॉगिंग क्यूँ करती हो , पैसा भी नहीं मिलता और समय की बर्बादी करती हो , तुम जो कर रही हो उसे समझने वाले भी बहुत कम हैं "

मैंने कहा -
  • आज तक समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है , अब मेरी बारी है लौटाने की । मेरा भी छोटा सा योगदान होना चाहिए उस समाज कों जिसमें मैं रहती हूँ। ( social service )
  • मेरा समय किसी सकारात्मक जगह उपयोग हो इसलिए लिखती हूँ।
  • लिखने के बहाने पढ़ती भी हूँ , जिससे मेरा खुद का ज्ञानार्जन होता है ।
  • किसी विषय पर दूसरों से सीखती हूँ और कुछ विषयों पर लगता है मैं योगदान कर सकती हूँ। कोई भी अपने आप में सम्पूर्ण नहीं है।
  • संसार में हमारा जन्म किसी विशेष प्रयोजन से होता है । उसे पहचानना है और उसे अंजाम देना है । हर कार्य का पुरस्कार " धन " नहीं होता। कुछ कार्य अपने आत्मिक संतोष के लिए निस्वार्थ भाव से भी किया जाता है ।
  • ब्लोगिंग से बहुत कुछ सीखा है । इसके कारण मेरे मस्तिष्क के अन्दर नया वसंत आ गया है । रंग बिरंगे फूलों की तरह अनेक सतरंगी विचार आते हैं और उस पर पाठकों के विचार पूरे उपवन की सुन्दरता कों द्विगुणित कर देते हैं।
  • लोगों का व्यक्तित्व पढना मेरा शौक भी है , जिसके लिए ब्लोगिंग एक सार्थक माध्यम है ।
  • जीवन एक सफ़र है , जिसमें मुसाफिर मिलते हैं और एक मकाम आने पर बिछड़ जाते हैं। कारवां बनता और बिखरता है । इसी प्रक्रिया में मोह-माया से गुज़रते हुए एक दिन ये प्राण उस अनंत यात्रा पर निकल जायेंगे।

एक बार मैंने राधिका से पूछा - " तुम मुझे पत्र लिखती हो , मेरे लेखों का इंतज़ार करती हो , शिद्दत से पढ़ती हो , मुझसे कहती हो - मेरा सम्मान भी करती हो और प्यार भी करती हो । फिर क्यूँ कतराती हो अपने विचार रखने से मेरे लेखों पर ? ".......राधिका ने जवाब नहीं दिया।

मैंने राधिका से कहा - " Beauty lies in the eyes of beholder "
एक बार प्यार से तो देखो , सादगी भी दिखेगी ।

Wednesday, November 17, 2010

कहीं आपका बच्चा भी तो ' Couch potato' नहीं बन रहा ?

जीवन की भाग-दौड़ और आपा-धापी में आजकल माँ बाप अपनी संतान को ठीक से समय नहीं दे पा रहे हैं। परिणामतः बच्चे का विकास सही दिशा में नहीं हो रहा। वो स्वयं को व्यस्त रखने के लिए टेलिविज़न तथा कंप्यूटर पर ज्यादा समय व्यतीत कर रहे हैं, जो उनकी नोर्मल ग्रोथ के विपरीत है।

टेलिविज़न पर अधिक समय गुजारने वाले बच्चे स्कूल में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार ३० % बच्चे चार से अधिक घंटे टीवी देख रहे हैं। इससे उनका मानसिक स्तर घट रहा है। गणित, विज्ञान , अंग्रेजी आदि विषयों में उनकी परफोर्मेंस निरंतर घट रही है। पढ़ाई में concentration भी घट रहा है अक्सर ये बच्चे स्कूल में सो जाते हैं। इन्हें PE [ physical education ] जैसे vigorous activities में रूचि नहीं रहती इनकी स्टेमिना भी कम हो जाती है।

शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों को ये कम ही देखते हैं। ज्यादातर हिंसा या हॉरर वाले प्रोग्राम ही पसंद करते हैं रात्री नौ के बाद वाले प्रोग्राम तो ये चोरी से देखते हैं इस प्रकार के प्रोग्राम देखने से मासूम बच्चों के अन्दर एक प्रकार का भय अथवा हिंसा पैदा हो जाती है। कभी कभी इतना प्रतिकूल प्रभाव होता है की ये अपने आप में सिमट जाते हैं।

३५ % बच्चों का टीवी उनके बेडरूम में होने के कारण , उन पर निगाह भी नहीं रखी जा सकती , ही वो बच्चे परिवार के साथ ज्यादा समय व्यतीत कर पाते हैं। ऐसे बच्चे एकाकी जीवन ज्यादा पसंद करने लगते हैं , तथा लोगों से घुल मिल नहीं पाते ये दोस्त बनाने में भी असक्षम होते हैं। थोड़े असामाजिक हो जाते हैं।

टीवी के आलावा कम्पूटर भी बर्बाद कर रहा है बच्चों को मार-काट वाले विडिओ गेम उनके अन्दर हिंसा भर रहे हैं तथा उन्हें addict कर रहे हैं। ऐसे बच्चे काफी एग्रेसिव हो रहे हैं और जब उनके मन का नहीं होता तो ये लड़ाई-झगडे का विकल्प अपनाते हैं

आठ साल से कम उम्र के बच्चों को कंप्यूटर के इस्तेमाल से दूर रखना चाहिएआज शैक्षणिक संस्थानों में ICT [information and communication technology] , को शामिल करने के कारण, बच्चों में cognitive skills और power of retention काफी कम हो रहा हैकंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल उनके concentration को प्रभावित कर रहा है तथा दिमाग की सेल्स को डैमेज कर रहा हैसबसे ज्यादा प्रभाव बच्चे के गणितीय [ mathematical skills ] पर पड़ता है

समय रहते माता पिता को कुछ जरूरी नियम बना लेने चाहिए--

  • टीवी उनके बेडरूम में न हो।
  • एक दिन में एक घंटे से ज्यादा टीवी न देखें।
  • रीडिंग की आदत डालें
  • टीवी देखते समय कुछ खाने को न दें , मोटापा भी बढाता है।
  • पहले होम-वर्क कर लें फिर टीवी देखें।
  • नौ के बाद टीवी न देखें।
  • १० बजे हर हाल में सो जाएँ। नीद पूरी लें।
  • खेलों में रूचि बढायें।
  • कम्पूटर पर गेम्स की इजाजत न दें।
  • उन्हें समझायें की कौन कौन सी साइट्स नुकसानदायक है और उन्हें दूर रहना है उनसे।
हो सके तो माता-पिता रोज अपने बच्चों के साथ कुछ समय बात करें, उनकी बातें सुनें, उनके सुख दुःख और जिज्ञासाओं में शामिल हों और उनके सपनों को जानें।

आभार।

Thursday, October 21, 2010

इन्द्रिय निग्रहण --- ईर्ष्‍या एक घातक मानसिक विकार --- Jealousy-A malignant cancer !

वेदों , उपनिषदों , संहिताओं और ग्रंथों में भी यह कहा गया है कि - काम , क्रोध, लोभ , मोह, मद और मत्सर से बचिए। हमें अपने मन में आये इन वेगों को धारण करना चाहिए अर्थात इन पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। जब तक हमारी इन्द्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होगा , तब तक हम अनेकानेक मानसिक विकारों से ग्रस्त होते रहेंगे।

ईर्ष्‍या एक ऐसा ही घातक मानसिक विकार है , जिसकी परिणति अक्सर भयानक होती है। लोगों को पता भी नहीं चलता कि कब वो ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो गए हैं। यह एक ऐसा मानसिक विकार है जो व्यक्ति को अति-दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है ईर्ष्‍या का मन में प्रादुर्भाव अक्सर कुछ खो देने अथवा दूर हो जाने के एहसास के कारण होता है।

ईर्ष्‍या में अक्सर एक त्रिकोण होता हैं । त्रिकोण के दो सिरों पर खतरा मंडराता रहता है। और ईर्ष्यालु व्यक्ति खुद को तो नष्ट कर ही रहा होता है। अर्थात तीनों कि ही हानि होती है।

प्यार जब अप्राप्य हो जाता है तो भी व्यक्ति ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो जाता है , तीसरे व्यक्ति से द्वेष रखने लगता है कि इसने मेरा प्यार छीन लिया। वह उस तीसरे व्यक्ति को अपना प्रतिद्वंदी समझने कगता है। ऐसी स्थिति में अक्सर स्त्री का जीवन खतरे में होता है। ईर्ष्‍या बढ़ने के साथ साथ वह व्यक्ति उन दोनों कि मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

आफिस में एक कर्मचारी को दुसरे से इर्ष्या हो सकती है, कि यह बौस का ज्यादा प्रिय है। प्रायः सास को बहू से ईर्ष्‍या होती है कि यह मेरे पुत्र को मुझसे छीन रही है। जबकि वास्तविकता यह नहीं होती। विवाह के बाद पुरुष का प्यार तो बंटना ही है। समझदार माएं कभी बहू से ईर्ष्‍या नहीं रखती और उनके घर में बहू , एक बेटी कि तरह शान से रहती है।

अक्सर ये ईर्ष्‍या बच्चों और उन टीनेजर्स में भी देखने को मिलती है , जिनमें आत्मविश्वास तथा आत्म सम्मान [ self esteem ] कम होता है। तथा उनमें ये ईर्ष्‍या ऐग्रेसिव [ आक्रामक ] रूप धारण कर लेती है । यही कारण है आज बच्चों में बढ़ते क्राइम का। बच्चों में अक्सर गहरी दोस्ती , उनके अन्दर भावनात्मक असुरक्षा तथा एकाकीपन पैदा करती है । वो यह नहीं बर्दाश्त कर पाते कि उनका दोस्त किसी दुसरे से बात करे।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि , छेह महीने वाले नवजात शिशु भी ईर्ष्‍या से ग्रस्त हो सकते हैं। यदि माँ किसी दूसरे बच्चे पर ज्यादा ध्यान दे रही है, तो शिशु डिस्ट्रेस के लक्षण व्यक्त करता है। इसी कारण से सिबलिंग- राइवेलरी भी होती है।

ईर्ष्‍या एक ऐसी प्रतिक्रिया है , जिसमें ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य , किसी के बारे में मनमाना रिश्ता बनाकर सोचने लगता है , जो कभी सच , कभी आभासी तो कभी पूर्णतया काल्पनिक होता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति सदैव अपने को एक अनजाने खतरे से घिरा हुआ पाता है । उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और वो भावनात्मक रूप से टूटने लगता है । भय और शंका से ग्रस्त होकर वो अक्सर अजीबोगरीब हरकतें करता है और खुद को बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंचा देता है।

वह जहाँ भी जाता है , उस व्यक्ति कि निंदा अपने साथियों के साथ करता है। उसके इस कृत्य में उसके ' लो सेल्फ-इस्टीम ' वाले साथी , उसका साथ देते हैं , और उसको बर्बादी कि ओर अग्रसर करते हैं । इन मौका परस्त दोस्तों के साथ जब वह निदा करके अपनी भड़ास निकाल लेता है तो थोडा सा संयत महसूस करता है और तब ही भोजन ग्रहण करने कि अवस्था में आ पाता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह व्यक्ति अपनी निजी गांठें खोल चुका होता है तथा समाज के सामने नंगा हो चुका होता है।

एक ईर्ष्यालु व्यक्ति , अपनी ईर्ष्‍या कि बढती हुई भावना के चलते , लगातार अपने आस पास वालों से ये आश्वासन मांगता रहता है कि वह बेहतर है , और धीरे-धीरे वह इसी भ्रम में अपनी जिंदगी गुजारने लगता है।

एक
ईर्ष्‍या से ग्रस्त व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण देखे जा सकते हैं--

  • कुछ खो देने का भय
  • किसी के धोखा देने का संशय अथवा गुस्सा
  • अनिश्चितता तथा जिंदगी में खालीपन
  • अपने किसी ख़ास व्यक्ति या मित्र को किसी दुसरे प्रभावी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के हाथों खो देने का भय
  • खुद पर अविश्वास
  • हीन भावना से ग्रस्त होना।
  • खोई हुई वास्तु या मित्र को पाने के लिए छटपटाना
  • परिस्थियों से द्वेष रखना [ रिसेंटमेंट ]
  • जिससे इर्ष्या करता है उसका निरंतर बुरा सोचना तथा उसको नुक्सान पहुंचाने कि योजना में लिप्त
  • अक्सर अपने निंदनीय कार्यों के कारण , आत्मग्लानि के बोझ तले दबा रहता है
  • अपने प्रतिद्वंदी कि खूबियों को पा जाने कि लालसा रखना
  • अपनी भावनाओं [ इर्ष्या ] को स्वीकार करने से इनकार करना
  • ऐसे लोग बहुत ही पजेसिव प्रवित्ति के होते हैं.
ईर्ष्यालु व्यक्ति कि सोच पर पर्दा पड़ जाता है। उसकी सही दिशा में तार्किक शक्ति का लोप हो जाता है तथा लोजिकल और रैशनल बुद्धि उससे विदा ले लेती है। उसकी शिक्षा भी ईर्ष्‍या कि अग्नि में भस्म हो जाती है। उसके चाटुकार मित्र उसको उकसाते रहते हैं और एक दिन उसका सब कुछ समाप्त हो जाता है। किसी ने सच ही कहा है--"ईर्ष्‍या तू न गयी मेरे मन से " ।

ईर्ष्‍या में व्यक्ति , दुसरे से ज्यादा खुद को ही नुकसान पहुंचाता है । यह एक घातक मानसिक विकार है। इसपर नियंत्रण रखिये।

ईर्ष्‍या से बचने का उपाय -

ईर्ष्‍या से बचने के लिए , उसकी प्रशंसा कीजिये जिससे आप ईर्ष्‍या रखते हैं और अपने मन को निर्मल रखिये।

एक दिन वो मेरे ऐब गिनाने लगा मुझे ,
जब खुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा ....

आभार।

Tuesday, October 19, 2010

आत्मा की उत्पत्ति तथा विनाश--आत्मा की संख्या कितनी है पृथ्वी पर ? -- Our Soul !




आत्मा अजर अमर है अथवा आत्मा का विनाश होता है ?

आत्मा का अस्तित्व शरीर के साथ होता है । जब पंचतत्वात्मक , नाशवान शरीर , मृत्यु के उपरान्त , मिटटी में मिल जाता है तो आत्मा की सत्ता भी समाप्त हो जाती है। यदि आत्मा मरती नहीं तो , शरीर के नष्ट होने के बाद से नया शरीर प्राप्त होने तक आत्मा कहाँ रहती है ?

अब बात करते हैं , आत्मा की संख्याओं की । इस पृथ्वी पर कुल कितनी आत्माएं हैं। जनसंख्या लगातार बढ़ रही है । इस वृद्धि को देखकर ये नहीं समझ आता की नयी आत्माएं कहाँ से आ रही हैं । जो पहले से विद्यमान हैं वो तो नया शरीर धारण कर लेंगी , लेकिन बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्मा कहाँ से आयेंगी ।

यदि यह मान भी लें की बहुत सी आत्माएं एक्स्ट्रा हैं , तो चिंता की कोई बात नहीं है। बढती हुई आबादी में जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु के लिए एक आत्मा की व्यवस्था हो सकेगी।

अब मन में एक प्रश्न है की मोक्ष क्या है ? और मोक्ष किसे मिलता है ? चूँकि शरीर तो नाशवान है, इसलिए निश्चित ही मोक्ष आत्मा को मिलता होगा। अब समस्या ये है की मोक्ष मिलने के कारण , आत्माओं की संख्या पृथ्वी पर निश्चित ही कम होती जायेगी । एक बात यह भी की , मोक्ष यदि अच्छी और पवित्र आत्माओं को ही मिलता है तो निश्चय ही पृथ्वी पर शेष आत्माएं कलुषित अथवा कम अच्छी होंगी। फिर रामराज्य कैसे आएगा। भ्रष्टाचार तथा कलियुग तो होगा ही न।

वापस आते हैं अपनी समस्या पर। मोक्ष के चलते आत्माओं की संख्या में कमी होने पर , बढती जनसँख्या के लिए नयी आत्माएं कहाँ से आयेंगी। क्या आत्मा की भी उत्पत्ति संभव है ? यदि हाँ तो बेहतर गुणवत्ता वाली , तथा मोक्ष के योग्य आत्मा की उत्पत्ति कैसे की जाये ?

क्या आत्माओं का भी कोई धर्म होता है ? क्या एक हिन्दू आत्मा मुस्लिम परिवार में जन्म ले सकती है । यही हाँ तो फिर उस मासूम बच्चे का विचार अपने परिवेश से पृथक क्यूँ नहीं हो पता।

क्या आत्माएं नास्तिक होती हैं ? यदि नहीं , तो नास्तिक व्यक्ति के अंतरात्मा की आवाज कैसी होती है । क्या नास्तिक व्यक्ति के साथ उसकी आत्मा संवाद करती है ।

मेरे विचार से आत्मा एक शक्तिपुंज है , जिसका निरंतर क्षय होता रहता है तथा यह भी नाशवान है। आपका क्या विचार है कृपया प्रकाश डालें।

यदि नास्तिकों और महिलाओं में भी आत्मा है और वो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन सकते हैं तो कृपया अपने मस्तिष्क में आने वाली विचारों की आंधी को साझा करें।

नोट- पोस्ट की गुणवत्ता आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों से द्विगुणित होती है, इसलिए आपके विचारों का स्वागत है।

आभार।

Thursday, October 7, 2010

इतना मुश्किल भी नहीं आपको समझना --आप तो मेरी ही तरह भावुक हैं...

वैसे तो ये जीवन बहुत छोटा है एक दुसरे को समझने के लिए। फिर भी हम कोशिश करते हैं की सबको जानें और समझें। कभी उसके चेहरे को पढ़कर, कभी उसकी ख़ामोशी को, कभी उसकी मुस्कराहट से, कभी आँखों में छलकते आंसुओं से, कभी उसके विचारों से , कभी हथेली की रेखाओं से।

आज हम कोशिश करेंगे आपको जानने की, आपकी जन्म-तिथि तथा उसके मूलांक से।

तो बताइए अपने जन्म की तारीख और मदद कीजिये मेरी , आपको समझने में।


मूलांक
-

संचालक ग्रह - सूर्य
जन्म-तारीखें - १, १०, १९, २८
शुभ दिन- रविवार , सोमवार।
शुभ रंग- सुनहरा , पीला भूरा
मित्र अंक- २, ३
शुभ रत्न - रूबी , हीरा।
शुभ धातु- तांबा, सोना।
आपकी विशेषताएं- बेहद महत्वकांशी , अविष्कारक, दृढ-निश्चयी , जिद्दी , बंधन पसंद न करने वाले, जहां भी होते हैं, अपना वर्चस्व बनाकर रखते हैं।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ -- वैज्ञानिक लेनिन , मार्टिन लूथर, इंदिरा गाँधी , बिल क्लिंटन , माइकल जेक्सन, मदर टेरेसा, ऐश्वर्या राय।

मूलांक -

संचालक ग्रह - चन्द्रमा
जन्म-तारीखें - २, ११, २०, २९
शुभ दिन-रविवार, सोमवार, शुक्रवार।
शुभ रंग- सफ़ेद, क्रीम हरा, हलके रंग। ,
मित्र अंक-१, ४, ७
शुभ रत्न -मोती, पन्ना, मून स्टोन
शुभ धातु- चाँदी , प्लेटिनम
आपकी विशेषताएं- सौम्य, कल्पनाशील, विचार एवं संवेदनशील, भावुक , अछे परामर्शदाता, अध्यात्मिक, एकांत प्रिय , सत्यवादी तथा स्पष्टवक्ता। इनमें नेतृत्त्व का अद्भुत गुण होता है।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, विनोबा भावे, राजीव घंधी, मिखाइल गरबाचोव,थामस एल्व एडिसन , अडोल्फ हिटलर, जोन्स कीट, गुरुनानक, स्टेव फोर्ड, रोबेर्ट क्लइव , अमिताभ बच्चन ।

मूलांक -

संचालक ग्रह - बृहस्पति
जन्म-तारीखें - ३, १२, २१, ३०
शुभ दिन- मंगल, गुरु, शुक्रवार
शुभ रंग- मोव , बैगनी
मित्र अंक- ६, 9
शुभ रत्न - नीलम, एमेथिस्ट
शुभ धातु- सोना
आपकी विशेषताएं- महत्वाकांक्षी , गर्वीले, बेहद स्वतंत्र विचारों वाले, न्याय एवं अनुशासन प्रिय , थोड़े से तानाशाह एवं बुलंद हौसले वाले। , dynamic , स्वाभिमानी तथा उच्च पदस्थ होते हैं।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- स्वामी विवेकानंद, अब्राहम लिंकन, विंस्टन चर्चिल, ग्राहम बेल , वैज्ञानिक डार्विन, बेनजीर भुट्टो, रजनीकांत।

मूलांक-

संचालक ग्रह - राहू।
जन्म-तारीखें - ४, १३, २२, ३१
शुभ दिन- रवि, सोमवार
शुभ रंग- सफ़ेद, नीला, सिलेटी
मित्र अंक- १, २, 7
शुभ रत्न -नीलम
शुभ धातु- तांबा
आपकी विशेषताएं- थोडा विद्रोही [रिबेल] , बेहेसी, बुद्धिमान, हर बात बिलकुल विपरीत नज़रिए से देखते हैं। अतिवादी प्रवित्ति के , एनालिटिकल ।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- माइकल फैराडे, एस रामानुजन, सरदार वल्लभ भाई पटेल , सरिजिनी नायडू,


मूलांक -

संचालक ग्रह - बुद्ध
जन्म-तारीखें -५, १४ , २३।
शुभ दिन- बुद्धवार
शुभ रंग- सभी हलके रंग
मित्र अंक- सभी अंक इनके मित्र अंक हैं।
शुभ रत्न - पन्ना , हीरा।
शुभ धातु- चाँदी, प्लेटिनम
आपकी विशेषताएं- बेहद हिम्मतवाले, जोखिम उठाने वाले, बुद्धिमान, धनी, बेहद दोस्ताना स्वभाव वाले होते हैं।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- भगवान् बुद्ध, जवाहर लाल नेहरु। डॉ एस राधाकृष्णन।

मूलांक -

संचालक ग्रह - शुक्र
जन्म-तारीखें - ६, १५, २४
शुभ दिन- मंगल, शुक्रवार
शुभ रंग- नीला, गुलाबी
मित्र अंक- ३, ९
शुभ रत्न - पन्ना, तर्कोइज़
शुभ धातु- चाँदी, प्लेटिनम
आपकी विशेषताएं- आप जानते हैं की आप बेहद आशिक मिजाज़ हैं। आप मधुर स्वभाव वाले , बुद्धिमान तथा प्रेम करने वाला सुन्दर व्यक्तित्व रखते हैं।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ--टैगोर , नेपोलियन बोनापार्ट , श्री और्बिन्दो , अख़बार, रोनाल्ड रीगन , सरदार भगत सिंह।

मूलांक -

संचालक ग्रह -केतु
जन्म-तारीखें - ७, १६, २५,
शुभ दिन-सोम, रविवार
शुभ रंग- सफ़ेद , हरा, हल्का पीला
मित्र अंक- १, २, ४
शुभ रत्न - कैट्स आई
शुभ धातु- प्लेटिनम
आपकी विशेषताएं- बहुत ही स्वतंत और मौलिक विचार वाले। परफेक्शनिस्ट , अध्यात्मिक , पैसों तथा भौतिक ऐश्वर्य के प्रति उदासीन , थोड़े जिद्दी, अकेले कार्य करना पसंद करते हैं।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ--मदन मोहन मालवीय, कुईं एलिज़ाबेथ चार्ल्स डिकेंस, मेरी क्युरी, गोविन्द रानाडे। अटल बिहारी बाजपाई।

मूलांक -

संचालक ग्रह - शनि
जन्म-तारीखें - ८, १७, २६
शुभ दिन- सोम, शनि, रविवार.
शुभ रंग- गहरा नीला
मित्र अंक- १, ५ , ६
शुभ रत्न - नीलम, हीरा
शुभ धातु- सोना
आपकी विशेषताएं- भौतिकवादी, धार्मिक, सज्जन स्वाभाव के, अपने ध्येय पर सदैव दृष्टि रखते हैं, अवसरवादी तथा आशावादी।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- इश्वर चंद्र विद्यासागर, जोर्ज बर्नार्ड शा , हैदर अली, स्वामी सिवानन्द , गुरु नानक।

मूलांक-

संचालक ग्रह - मंगल
जन्म-तारीखें - ९, १८, २७
शुभ दिन-मंगल , बृहस्पत, शुक्रवार।
शुभ रंग- लाल, क्रिमसन, गुलाबी।
मित्र अंक- ३, ६
शुभ रत्न -रूबी, रेड कोरल , गार्नेट
शुभ धातु-तांबा
आपकी विशेषताएं- दृढ निश्चयी तथा प्रबल इच्छाशक्ति वाले , सर्वत्र विजेता , बेहद स्वतंत्र विचारों वाले , दोमिनेतिंग, गुस्सेवाले परन्तु दयालु।

इस अंक की मशहूर हस्तियाँ-- राम कृष परमहंस, लिओ टालस्टाय , नेलसन मंडेला, विजय लक्ष्मी पंडित , जॉन मिल्टन ।

आभार।

Sunday, September 26, 2010

महिलाओं की तसवीरें , टेलीफोन नंबर -----और अदरख की चाय.

कुछ शुभ-चिंतकों ने ये प्रश्न खड़े किये जिससे प्रेरित होकर ये पोस्ट लिख रही हूँ...

सन २००५ से इन्टरनेट का उपयोग करना शुरू किया। कभी तस्वीर नहीं लगायी प्रोफाइल में। शायद डरती थी । तो अब क्यूँ लगायी , मित्रों ने पुछा -क्या दुनिया अब बदल गयी है ? न भाई , कुछ नहीं बदला । सिर्फ मैं बदल गयी हूँ। अपने मन के बे-बुनियादी भय को भगा दिया है।

बहुत लोगों ने भय दिखाया तरह-तरह का। लेकिन जब दिव्य-ज्ञान हुआ तो समझा क्या रखा डरने में। छोटी सी तो जिंदगी है , निर्भय होकर जियो। लोगों के आक्षेप लगते रहे की फर्जी आई-डी है , न कोई प्रोफाइल, न फोटो, मत करो यकीन इस का।

शुक्र है इश्वर का , आज कल अग्नि-परीक्षा का चलन नहीं है, नहीं तो खामखाह , वो भी देनी पड़ती। खैर दिल ने हिम्मत दिखाई और दिमाग ने सहमति दे दी , और आज मुझे फर्जी होने के संगीन आरोप से बरी करवा दिया।
अरे भाई जब बाकी लोग निर्भय हैं तो मुझे एक तस्वीर लगाने से क्या डरना ?

अब बात करते हैं टेलीफोन नंबर की। जिसको देखो वही ये समझाइश देता मिलेगा महिला हो, अपना टेलीफोन नंबर मत देना किसी को । अरे भाई आप पुरुष हैं, तो आप सुरक्षित हैं ? और आप अपनी बुद्धि से अछे-बुरे की पहचान करके अपना नंबर दे सकते हैं ? आप जरूरत पड़ने पर शीघ्रतम उपाय [दूर-संचार ] से मित्रों की सलाह ले सकते हैं , लेकिन एक महिला के लिए ये गुनाह क्यूँ समझा जाता है की वो अपने किसी शुभ चिन्तक पर यकीन करके , जरूरत के वक़्त बात कर सके।

जो महिलाएं नौकरी कर रही हैं, वो अपना नंबर , अपने साथ काम करने वालों को दे सकती हैं, और जो महिलाएं चिकित्सा जैसे पेशे में हैं, उनका नंबर तो मरीज के पर्चे पर बिन मांगे बंटता है। फिर जो महिलाएं घर में रहती हैं, घर- परिवार के दायित्वों से ही जुडी हैं , क्या उन्हें अपना टेलीफोन नंबर सहोदर भाई, बहिन, माँ, पिता , पति तथा नजदीकी रिश्तेदारों तक ही सीमित रखना चाहिए ?

क्या महिलाओं को इंसान परखने की शक्ति नहीं होती ? क्या वो मुर्ख हैं जो बिना व्यक्ति को ठीक से समझे , किसी पर भी विश्वास कर लेती हैं? क्यूँ महिलाओं को स्वतंत्र नहीं है अपना भला बुरा सोचने-समझने की ? या फिर महिलाएं एक दायरे से स्वयं ही बाहर नहीं आना चाहतीं ?

क्या सिर्फ महिलाओं के ही टेलीफ़ोन नंबर का मिसयूज़ हो सकता है ? पुरुषों को कोई खतरा नहीं ?

चलो माना कभी-कभी किसी को अच्छा समझकर उसपर यकीन कर लेते हैं। बाद में पछताना भी पड़ता है । लेकिन भाई , इसके लिए भी उपाय हैं। बदमाशों का नंबर सेव कर लीजिये, यदि कोई परेशान करे तो मत उठाइये। एक दिन थक-हार कर आपको परेशान करना बंद ही कर देगा।

और यदि कोई सिरफिरा आपका पीछा करते-करते आपके घर पहुँच जाये तो उसको अदरख की चाय पिलाइए । सारी जिंदगी के लिए सुधर जाएगा और यही कहेगा ---

" फलाँ के घर का नमक खाया है......ooooooopsssssss ......उनके घर की चाय पी है। अब और त्रस्त नहीं करूँगा "