Friday, November 4, 2011

वतन की राह में वतन के नौजवाँ शहीद हों....

आज देश को ज़रुरत है देश पर कुर्बान होने वालों की। सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के इस दौर में जहाँ शासक और रक्षक ही भक्षक बन गया है , वहाँ ज़रुरत है हमें सही और गलत मंतव्यों की पहचान कर आगे आने वालों की। दिशाहीन होकर बस जिए जाने से काम नहीं चलेगा। अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करनी है और उसे प्रशस्त भी करना है। देश की जडें खोदकर देश की नीव हिलाने वाले , कालाधन जमा करके अपने वतन के साथ गद्दारी करने वाले और धर्म का नाश कर अधर्म का प्रसार करने वालों को पहचानकर उनका बहिष्कार करना ही समय की मांग है , तभी राष्ट की रक्षा और सेवा की जा सकती है।

हमारे देश का सबसे बड़ा अभिशाप है गरीबी। इस देश में करोड़ों स्त्री और पुरुष और बच्चे हैं जो भूखे पेट , पानी पीकर सो जाते है और सुबह हो जाने पर , दो दाने अन्न की चाह में उनका पूरा दिन श्रम करते हुए निकल जाता है। ढाबों और होटलों की नाली से निकले जूठे अन्न को पाकर अपनी क्षुधा की शान्ति के लिए उन्हें कुत्तों से भोजन छीनना पड़ता है। कई बार वे हार जाते हैं जब कुत्ता त्वरित गति से उन दानों को चट कर जाता है और हमारे देश के बच्चे भूख से बिलबिलाते रह जाते हैं।

सत्ता में बैठे संवेदनहीन रक्षक अपनी जेबें भरने में ही इतने व्यस्त हो जाते हैं की अपनी प्रजा का ध्यान उन्हें ही रखना है, यह बात पूर्णतया भूल जाते हैं। आजादी के ६५ वर्षों बाद भी आधा भारत भूखे पेट सोये इससे ज्यादा शर्म की बात हम सबके लिए, खासकर हमारी सरकार (हमारे पालक ), के लिए और क्या हो सकती है।

न आतंकवाद पर नियंत्रण कर पा रही है , न बढती हुयी आबादी का पेट भर पा रही है , न ही काले धन की कालाबाजारी पर अंकुश लगा रही है , न ही तीन चौथाई जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही है।

ज़रुरत है हम पर शासन करने वाली सरकार को अपने लिए एक दिशा निर्धारित करने की , जिसमें देश का हित हो आम जनता का भला हो।

राष्ट्र सर्वोपरि हो
जय भारत !
जय हिंदुस्तान
वन्देमातरम !

Zeal

-----------------------------------------------------------------------------

श्री हरी ॐ पंवार (मेरठ विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफ़ेसर व प्रसिद्द वीर रस कवी), द्वारा रचित इस ओजमयी कविता को पढ़िए

मैं भी गीत सुना सकता हूँ शबनम के अभिनन्दन के
मैं भी ताज पहन सकता हूँ नंदन वन के चन्दन के
लेकिन जब संसद से पगडण्डी तक कोलाहल है
तब तक केवल गीत लिखूंगा जन गण मन के क्रंदन के
जब पंछी के पंखों पर हो पहरे बम के गोली के
जब पिजरे में कैद पड़े हों सुर कोयल की बोली के
जब धरती के दामन पर हों दाग लहू की होली के
कोई कैसे गीत सुना दे बिंदिया कुमकुम रोली के
मैं झोंपडियों का चारण हूँ आस उगाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ

अन्धकार में समाँ गए जो तूफानों के बीच चले
मंजिल उनको मिली कभी जो चार कदम भी नहीं चले
क्रान्ति कथा में गौण पडी है गुमनामी की राहों में
गुंडे तस्कर तने खड़े हैं राज महल की राहों में
यहाँ शहीदों की पावन गाथाओं को अपमान मिला
डाकू ने खादी पहनी तो संसद में सम्मान मिला
राजनीति में लौह पुरुष जैसा सरदार नहीं मिलता
लाल बहादुर जी जैसा कोई किरदार नहीं मिलता
ऐरे गैरे नत्थू खैरे तंत्री बनकर बैठे हैं
जिनको जेलों में होना था मंत्री बन कर बैठे हैं
लोकतंत्र का मंदिर भी लाचार बना कर डाल दिया
कोई मछली बिकने का बाज़ार बना कर डाल दिया
अब जनता को संसद भी प्रपंच दिखाई देती है
नौटंकी करने वालों का मंच दिखाई देती है
पांचाली के चीर हरण पर जो चुप पाए जाते हैं
इतिहासों के पन्नो में वे सब कायर कहलाते हैं
कहाँ बनेंगे मंदिर मस्जिद कहाँ बनेंगी राजधानी
मंडल और कमंडल पी गए सबकी आँखों का पानी
प्यार सिखाने वाले बसते मज़हब के स्कूल गए
इस दुर्घटना में हम अपना देश बनाना भूल गए
कहीं बमों की गर्म हवा है और कहीं त्रिशूल जले
सौन चिरैया सूली टंग गयी पंछी गाना भूल चले
आँख खुली तो पूरा भारत नाखूनों से त्रस्त मिला
जिसको ज़िम्मेदारी थी वो घर भरने में व्यस्त मिला
क्या यही सपना देखा था भगत सिंह की फांसी ने
जागो राजघाट के गांधी तुम्हे जगाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ

जो जो अच्छे सच्चे नेता हैं उन सबका अभिनन्दन है
उनको सौ सौ बार नमन है मन प्राणों से वंदन है
जो सच्चे मन से भारत माँ की सेवा कर सकते हैं
हम उनके क़दमों में अपने प्राणों को धर सकते हैं
लेकिन जो कुर्सी के भूखे दौलत के दीवाने हैं
सात समंदर पार तिजोरी में जिनके तहखाने हैं
जिनकी प्यास महासागर भूख हिमालय पर्वत है
लालच पूरा नील गगन है दो कौड़ी की इज्ज़त है
इनके कारण ही बनते हैं अपराधी भोले भाले
वीरप्पन पैदा करते हैं नेता और पुलिस वाले
केवल सौ दिन को सिंहासन मेरे हाथों में दे दो
काला धन वापस न आये तो मुझको फांसी दे दो
जब कोयल की डोली गिद्धों के धर आ जाती है
तब बगुला भक्तों की टोली हंसों को खा जाती है
जब जब भी जयचंदों का अभिनन्दन होने लगता है
तब तब साँपों के बंधन में चन्दन रोने लगता है
जब फूलों को तितली भी हत्यारी लगने लगती है
तो माँ की अर्थी बेटों को भारी लगने लगती है
जब जुगनू के घर सूरज के घोड़े सोने लगते हैं
तो केवल चुल्लू भर पानी सागर होने लगते हैं
सिंहों को म्याऊं कह दे क्या ये ताकत बिल्ली में है
बिल्ली में ताकत होती कायरता दिल्ली में है
कहते हैं की सच बोलो तो प्राण गंवाने पड़ते हैं
मैं भी सच्चाई गा गा कर शीश कटाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ

कोई साधू सन्यासी पर तलवारे लटकाता है
काले धन की चर्चा हो तो आँख चढाने लगता है
कोई हिमालय ताजमहल का सौदा करने लगता है
कोई गंगा यमुना अपने घर में भरने लगता है
कोई तिरंगे झंडे को फाड़े फूंके आज़ादी है
कोई गांधी को भी गाली देने का अपराधी है
कोई चाकू घोंप रहा है संविधान के सीने में
कोई चुगली भेज रहा है मक्का और मदीने में
कोई ढाँचे का गिरना यूं आइनों में ली जाता है
कोई भारत माँ को डायन की गाली दे जाता है
कोई अपनी संस्कृति में आग लगाने लगता है
सौ गाली पूरी होते ही शिशुपाल कट जाते हैं
तुम भी गाली गिनते रहना जोड़ सिखाने आया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ
घायल भारत माता की तस्वीर दिखाने लाया हूँ

आभार।




43 comments:

दीर्घतमा said...

आपने भारतीय ब्यस्था पर लिखा है जब-तक बिदेशियो के नेतृत्व में भारत चलेगा तब-तक यही होगा ,हो भी क्यों न उसे भारत या भारतीयों से क्या मतलब हम भृत्य भी ऐसे ही है गोरा देख हमें गुलामी ही यद् ही नहीं आती अच्छी लगने लगती है.

दीर्घतमा said...

बहुत प्रेरनादायी पोस्ट बहुत अच्छा लगा बहुत-बहुत धन्यवाद.

SAJAN.AAWARA said...

Mam bahut hi aham mudda samne rakhkha hai apne,.
Ab wo samay aa gaya hai ki jo so so rahe hain unko uthna chahiye lekin jo jagkar bho sone ka natak kar rahe hain unka kya karen?

Ham fozi to apna kaam kar rahe hai lekin hamare senapti or maharaja hi des ke baare me nahi soch rahe,,,
ye log shayad ye nahi jante ki inki aane wali pidhiya isi bharat me gujar basar karegi.........

Jago hindustaniyon jago....

Jai hind jai bharat

प्रवीण पाण्डेय said...

देश सुदृढ़ रहे।

अशोक कुमार शुक्ला said...

Good post.
Padhakar achcha lala
lekin aapki pichali poat par apne comment ka uttar ab bhi aapse apekshit jai.

JC said...

दिव्या जी, मैंने तीन टिप्पणियाँ एक अन्य डॉक्टर के ब्लॉग में लिखीं (उनके ट्रैफिक जैम और पुलिस के माध्यम से सत्य दर्शाते 'हास्यरस' की कविता पर) ,,, यहाँ भी 'वीर रस' की कविता पढ़ अवलोकन के लिए दे रहा हूँ... शायद मन की आँख से देखने की आवश्यकता का कुछ आभास हो, (जो कठिन प्रतीत होता है काल के प्रभाव के कारण क्यूंकि दिवाली के दिए भी बुझ गए हैं)... पर तुलसीदास जी भी कह गए "जाकी रही भावना जैसी / प्रभु मूरत तिन देखि तैसी"... काल के कारण हम 'हिन्दू' होते हुए भी भूल जाते हैं अथवा हमें पता ही नहीं होता है कि हमारे ज्ञानी पूर्वज वर्तमान को घोर कलियुग कह हमें माथा ठंडा रखने का उपदेश दे गए... किन्तु आज उपदेश देने वाले इतने हो गए हैं कि बच्चे रबैल हो गए हैं (और संहारकर्ता शिव जी का वाहन नंदी बैल है :)

१. वाह! वाह!
खड़े खड़े ही घणा घुमा दिया!
जीवन का सत्य दर्शा दिया!

२. जिन दिनों में पान खाता था तो, दुकान पर आये दो व्यक्तियों को गले मिलते देखा, और एक को कहते सुना, "मैंने यहाँ के ही थाणे में ज्वाइन कर लिया है / अब तू किसी का मर्डर कर आ, बाकि मैं देख लुंगा!"

और ऐसे भी हैं - http://www.youtube.com/watch?v=4S20Zi7tsIA&sns=em

मेरा भारत महान! (ऐसे ही नहीं है!)...

३. 'महाभारत' में कृष्ण के मित्र 'धनुर्धर अर्जुन' को ही केवल 'महारथियों' द्वारा रचित 'चक्रव्यूह' तोड़ पाने में सक्षम होना दर्शाया गया है... और दूसरी ओर, उसके साहसी किन्तु अज्ञानी पुत्र अभिमन्यु को भीतर तो पहुँच पाना संभव, किन्तु बाहर भी उसी प्रकार सम्पूर्ण ज्ञान के आभाव में सरलता पूर्वक निकल नहीं पाना, और मारा जाना, हर कोई पढता तो है, किन्तु इसे मानव जीवन का सत्य केवल योगी ही कह गए, और उसे योगी ही समझ सकते हैं :)

(कलियुग में 'पैसा' ही आम आदमी के लिए माध्यम है चक्रव्यूह को तोड़ सकने में..."Money makes the mare to go" :?!)

JC said...

दिव्या जी, मैं भूल गया था आपने चोरो के डर से ब्लॉग में भी मजबूर हो ताला लगा रखा है,.,
और योगियों के दृष्टिकोण से, हमारे आठ मंजिले मकान समान शरीर में विष्णु के प्रथम अवतार मगरमच्छ के जबड़े समान आठ तगड़े ताले जड़े हैं - कह गए ज्ञानी-ध्यानी पूर्वज... और बार बार विचार शक्ति द्वारा उन्हें खोलनाआवश्यक होता है सम्पूर्ण ज्ञान पाने हेतु... किन्तु उन में से केवल कुछ की ही चाभी प्रत्येक के पास जन्म के साथ दी गयी होती है, ग्रैंड डिजाइन के अंतर्गत... और तपस्या कर ही कोई व्यक्ति विशेष विष्णु/ शिव का कृपा पात्र ही अन्य तालों की भी चाभी पा सकता है ...
और इस कारण आपके ब्लॉग में कॉपी/ पेस्ट की सुविधा नहीं है...
इसलिए यदि कोई इच्छुक हो और वो जल्दी में न हो तो लिंक को कृपया डॉक्टर दराल के ब्लॉग से कॉपी कर देख लें...
जय भारत! जय हिंद!

पुनश्च -
एक और लिंक भी देख सकते हैं हिन्दू विचार के ऊपर
http://www.youtube.com/watch?NR=1&v=GhH0tj75FhM

अरूण साथी said...

साधु-साधु,
अतिसुन्दर,
सारगर्भित..
विचारनीय एवं गंभीर आलेख...

amrendra "amar" said...

sartak post ke liye aapka bahut bahut aabhar

प्रतिभा सक्सेना said...

गाली गिननेवाला कौन है यहाँ जो चक्र चला कर उस क्रम को समाप्त कर दे ?दिशा-हीन लोगोंके हाथ बाग-डोर थमाने का गुनाह भी तो हमारे ही लोगों का है.

DUSK-DRIZZLE said...

Bahut sundar

कविता रावत said...

bahut badiya sarthak chintan manan ke saath Hariom ji ki ojpurn rachna prastuti ke liye dhanyavaad..

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

डा. हरिओम पवांर की ये रचना वाकई बहुत शानदार है। उनसे मंचो पर ये रचना कई बार सुना चुका हूं।

जी एक सुधार करना चाहता हूं, पवांर इलावाबाद विश्वविद्यालय मे नहीं बल्कि मेरठ में कानून के प्रोफेसर हैं।

वन्दना said...

बेहतरीन शानदार लाजवाब पोस्ट ………भावो को बखूबी उकेरा है और कवितायें तो ओजपूर्ण हैं।

mridula pradhan said...

kash hamen vaisi sarkar mil pati......jaisa aap likhi hain.

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन
दिव्या दीदी
आपके शब्दों को पढ़कर आपके तल्ख़ विचारों को आसानी से समझा जा सकता है|
८४ करोड़ लोग आज भूखे सोते हैं, लाखों किसान आत्म हत्या कर रहे हैं, आधी रात को देश की जनता को बर्बरता से पीटा जाता है और हमारा प्रधान चैन की नींद सोता है| क्या ऐसे व्यक्ति को हमारा प्रधान बना रहना चाहिए?
मैंने खुद अपने जीवन में ऐसे ही कई भयानक दृश्य देखे हैं जिनसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आत्मा रो पड़े|
करीब एक साल का फटेहाल, एकदम कमज़ोर एक बच्चा भूखे होने के कारण ज़मीन पर सर पटक पटक कर रो रहा था और तभी उसकी माँ भागती हुई आई और उसे अपने कलेजे से लगा लिया| उस माँ के जार जार बहते आंसू उसकी विवशता को बयान कर रहे थे| बार बार वह अपने बच्चे को अपनी छाती में छुपा रही थी, इससे अधिक उसके पास कुछ करने के लिए रह भी नहीं गया था| अपने बच्चे को भूखा पाकर भी वह उसका पेट नहीं भर पा रही थी| पति ने आत्महत्या कर ली थी और उसके पास भी कोई रोज़गार नहीं था| ज़मीन हड़प ली गयी थी, घरबार उजड़ गया था| अपने बच्चे को अपना दूध पिलाने में भी असमर्थ क्योंकि लम्बे समय से खुद भूखी होने के कारण उसके अपने वक्षों में दूध ख़त्म हो गया था|
ऐसी लाचार स्थिति देखकर अपनी आँखों को भीगने से न रोक सका| रात भर रोया इस भयानक दृश्य को अपनी आँखों के सामने देखकर|

सरकार के प्रयास क्या हैं? कोई आतंकी हमला हो तो सरकार निंदा कर देती है| अरे यह काम तो हम भी कर सकते थे, फिर तुम्हे सरकार बनाने का क्या फायदा? और यदि सरकार को सच में देश की इतनी ही चिंता है तो छोड़ दो अपना सिंहासन इस देश के लिए| जब तुमसे देश नहीं संभल रहा तो क्यों इसे बर्बाद कर रहे हो?
किन्तु सरकार (कांग्रेस) ने तो यह सिंहासन पकड़ा ही इसलिए है ताकि वह इसी प्रकार हमारे मूंह का निवाला छीन कर अपनी तिजोरियां भरे|

कांग्रेस का कहना है कि

१. रामदेव ठग है
२. अन्ना भ्रष्टाचारी है
३. केजरीवाल डिफौल्टर है
४. किरण बेदी चोर है
५. संघ आतंकी है
६. मोदी साम्प्रदायिक है
७. सुब्रमण्यम स्वामी बडबोला है
८. रविशंकर पाखंडी है
९. मोहन भागवत देश तोड़क है

केवल और केवल एक कांग्रेस और गांधी परिवार ही महान(?), पवित्र(?), त्यागी(?), देशभक्त(?), धर्मनिरपेक्ष(शर्मनिरपेक्ष) और गरीबों का हितैषी(?) है|

दिव्या दीदी
हरी ॐ पंवार पंवार जी की यह कविता आपके ब्लॉग पर देखकर बहुत अच्छा लगा| २७ फ़रवरी को दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी यह कविता उनकी ही तेज़ आवाज़ में सुनकर शरीर का रोम रोम खडा हो गया था| उनकी तल्ख़ आवाज़ ने इस कविता को और भी सुन्दर बना दिया|
३५ वर्षों के बाद उन्होंने किसी रैली में कविता पाठ किया था, इससे पहले उन्होंने जे पी नारायण की बोटक्लब की उस रैली में कविता पाठ किया था जिसके शीघ्र बाद देश में आपातकाल लग गया था| उनकी आवाज़ का तेज़ इसी बात से जाहिर हो जाता है|

आप से ऐसे और भी लेखों की अपेक्षा है| क्योंकि आपके शब्दों में भी वही ताकत है, जिसकी आवश्यकता किसी भी भारतीय के स्वाभिमान को जगाने के लिए होती है|
आभार

kshama said...

Afsos to ye hai,ki,is sarkaar ko janta hee chuntee hai!

Ratan Singh Shekhawat said...

गरीबी मिटाने के नाम पर वोट बैंक बनाने हेतु सरकार इतनी खैरात बाँट रही कि उसके चलते गरीबी तो नहीं मिट रही पर कामचोरों की फ़ौज इस देश में बढ़ रही है|
साथ इस तरह की योजनाओं के चलते भ्रष्टाचार बढ़ रहा है वो अलग|

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

यथार्थपूर्ण क्रन्तिकारी लेख....
हरी ओम पंवार जी की कविता का क्या कहना ? ...रोंगटे खड़े कर देती है |

कुश्वंश said...

देश के लिए धड़कता है दिल,
देश के लिए रुकती है सांसें
क्या करैं ,कैसे करे किससे कहे
व्याकुल ह्रदय अटकी है फांसे.

दिव्या जी एक बेहतरीन कविता प्रस्तुत करने के लिए बधाई . आजकल ऐसे प्रेरक है कहाँ जिनके भीतर देश धड़कता हो , देश का दर्द धड़कता हो .

Bhushan said...

एक ही प्रार्थना की जा सकती है कि अब सत्ता उन लोगों के हाथ में जाए जो देश को देश समझें और देश की पूरी जनसंख्या को मानव संसाधन समझ कर उनका विकास करें. परंपरागत सोच देश का बहुत अहित कर चुकी है.

ZEAL said...

महेंद्र जी , भूल की तरफ ध्यान दिलाने के लिए आभार। पवार जी मेरठ विश्वविद्यालय के ही हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!
--
कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।।

Bikramjit said...

amen to tat .. when there are enough bhagat singhs ready to die for the country .. our nation will be number one

Bikram's

Human said...

bahut achhi pratuti,bahut bhaawparak kavita

mahendra verma said...

देश की वर्तमान परिस्थतियां चिंतनीय हैं। अब देश और समाज के हित में निस्वार्थ और समर्पित भाव से कार्य करने वालों की आवश्यकता है। हम कामना करें कि ऐसे लोग सामने आएंगे।

हरि ओम पवार जी का ओजस्वी गीत देश की स्थिति का वास्तविक चित्र प्रस्तुत कर रहा है। इसे यहां प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद दिव्या।

आशा जोगळेकर said...

बहुत व्याकुल कर गई घायल भारत माता की तसवीर । कहां से लायेंगे ईमानदार नेता । हमारे यहां तो टीना फैक्टर ही काम करता है ( There is no alternative) । ऐसी कविताएं झिंझोड कर रख देती है । पंवार जी का अभिनन्दन । इस कविता के लिये ।

मनोज कुमार said...

बहुत ही ओज पूर्ण कविता पढ़वाई आपने।
जय हिंद।

JC said...

इस देश मैं पहले हमने गद्दी से अंग्रेजों को हटाया और म्यूजिकल चेयर के खेल समान उनकी कुर्सी हटा दी गयी, और शेष कुर्सियों में हम, यानि हमारे प्रतिनिधि, बैठ गये... पुराने आउट होते चले गए और नए नए खिलाड़ी आते चले गए... और अब तो धोनी के धुरंधर समान करोडपति, मनमोहन के धुरंधर अपने को ही कुर्सी से हटाने आये हैं, (शायद द्वापर युग के अंत में तब के मनमोहन कृष्ण समान) ,'स्टेज' तोड़ने आये लगते हैं...सत्य युग लाना है ना! नया स्टेज नहीं बनाना?

Rakesh Kumar said...

सब कुछ चरित्र निर्माण पर निर्भर है.
यदि चरित्र ही न होगा,तो दुष्परिणाम होने ही हैं.

आपके सुन्दर लेख और डॉ श्री हरि ऊं पँवार जी
की ओजमयी रचना पढवाने के लिए आभार.

दर्शन कौर said...

watan ki raah men watan ke noujavan shahid ho ..bahut satik lekh ..

प्रेम सरोवर said...

आपके पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

मदन शर्मा said...

शान्ति बहुत हुई....
बहुत हुई अहिंसा की कायरता...
अब जरुरत है क्रांति की.. इन्कलाब की...
अब उठ्ठो... जागो... कफ़न बाँध लो माथे पर...
शूरवीरों... मेरी माँ भारती के वीर सपूतो... उठ्ठो... जागो...
वन्दे मातरम्...
जय हिंद... जय भारत...

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

वतन के वास्ते वतन का हर नौजवां शहीद हो........ सिवाय नेताओं के :(

चन्दन भारत said...

बहुत ओज पूर्ण कविता और आप का आलेख भी |
राष्ट्रनिर्माण के लिए सर्वप्रथम व्यक्ति निर्माण आवश्यक है|

अमित श्रीवास्तव said...

long time no see....

prerna argal said...

मुझे ये बताते हुए बड़ी ख़ुशी हो रही है , की आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (१६)के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप हिंदी की सेवा इसी तरह करते रहें यही कामना है /आपका
ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर स्वागत है /आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए / जरुर पधारें /

Rajesh Kumari said...

kya kahne is post ke aaj hi padhi jaane kaise bina padhe nikal gai thi blogers meetli ke maadhyam se padhi...vaah hari om panvaar ji ki kavita se to bhoochal sa man me uthne laga.yahi to lekhan ki khaasiyat hoti hai jo seedhe dil par prahaar kare.

Vaanbhatt said...

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास...

सिर्फ तटस्थ रहने से काम नहीं बनने वाला....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर प्रस्तुति...
जय हिंद.

Dr. shyam gupta said...

sundar....

Anonymous said...

Thank you for the auspicious writeup. It in fact was a amusement account it.
Look advanced to far added agreeable from you! By the
way, how could we communicate?

My website - EmmanuelNSchied

Anonymous said...

An interesting discussion is worth comment. I do think that you should write more on this subject, it may
not be a taboo subject but generally folks don't speak about these issues.
To the next! Many thanks!!

Here is my page - CharmainWKuske