Friday, June 29, 2012

हिंदी ब्लॉगर को प्रताड़ित करता अंग्रेजी विकिपीडिया.

भारत भूमि में कोई एक बिस्मिल नहीं पैदा हुआ। हर दिन एक भगत , एक अशफाक और बिस्मिल पैदा होते हैं यहाँ। जिसकी जीती-जागती मिसाल हैं हमारे हिंदी ब्लॉगर - डॉ एम् एल वर्मा 'क्रांन्त ' जी। वर्मा जी ने अभूतपूर्व योगदान दिया है हिंदी और अंग्रेजी विकीपीडिया को। लेकिन अफ़सोस , की इन कायर अंग्रेजों ने वर्मा जी के आलेखों को विकिपीडिया पर मॉडरेट करना शुरू कर दिया। जब डॉ वर्मा ने इस पड़ताल की तो कायर -विकिपीडिया ने हमारे डॉ वर्मा को ब्लाक कर दिया। क्योंकि उन्हें डर था की वर्मा जी द्वारा शहीदों पर लिखे जा रहे आलेखों से कहीं भारत की जनता के खून में दुबारा उबाल न आ जाये।

कृपया एक नज़र इस आलेख पर डालें।

Friends this article was written/edited by me on English Wikipedia but it was cruelly edited there by some biased editors. You can very well see this article in its present position there at English Wikipedia. I was going to make it better but in the meantime I was blocked for an indefinite period. Since I can not edit there hence I found it better to copy it from there and pasted it here on my blog. At least some people will be benefited here. This is the true story behind this article.

डॉ वर्मा की उत्कृष्ट रचना पढ़िए----
हमने बिस्मिल की तड़पती वो गज़ल देखी है

वक़्त-ए-रुख्सत जो लिखी थी वो नकल देखी है


जब क़दम वादी-ए-गुर्बत में उन्होंने रक्खा
हमने उस दौर की जाँबाज फसल देखी है


सरफ़रोशी की तमन्ना में भी कितना दम था
खाक में मिलने की हसरत पे अमल देखी है


आज जरखेज जमीनों में जो उग आयी है
हमने हालात की बीमार फसल देखी है


कल भी देखा था जो हम सबको हिला देता था
और जब कुछ भी न होता हो वो कल देखी है

'क्रान्त'
अब मुल्क की हालत पे हँसी आती है

रंज होता था कभी सबको वो कल देखी है


ZEAL

29 comments:

विनीत कुमार सिंह said...

ऐसा इस लिए है क्युकी हम पूरी तरह से इनके ऊपर ही आश्रित हैं...हमारी कोई अपनी ऐसी चीज नहीं है अभी तक जिसके जरिये हम अपनी चीजो को आगे बढ़ा सकें...पर जब हमारे लोग ऐसी चीज बनाने की कोशिस करते हैं तो हम ही होते हैं उसकी आलोचना करने वाले...पर साथ नहीं देते हैं...जरुरत है हमें अपनी ऐसी चीज सबके लाने की जिससे हम आजाद हो कर अपनी चीजो को सभी के सामने ला सकें...

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़कर मन स्फुरित हो गया..

Arvind Jangid said...

ये उनकी छोटी और स्वार्थपरक सोच का एक और नमूना है.

ZEAL said...

डॉ वर्मा जैसे विद्वान् आज हमारे बीच हैं और हमारे स्वर्णिम इतिहास को ज़िंदा रखने का पुनीत कार्य कर रहे हैं। ऐसे देशभक्तों के आगे शीश श्रद्धा से झुक जाता है। ईश्वर से प्रार्थना है डॉ वर्मा जैसे लेखकों की लेखनी में अंगार भर दें ताकि मार्ग में आने वाली बाधाएं उसके ताप से जलकर स्वतः भस्म हो जाएँ और उनकी लेखनी सतत चलती रहे। और हम भारतीय उनके लेखन से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते रहे और लाभान्वित होते रहे।

ZEAL said...

Very well said Vineet ji.

कविता रावत said...

पढ़कर दुःख हुआ..

Maheshwari kaneri said...

अंग्रेज हिन्दुस्तानियो के जज्बात से डरते है..

expression said...

:-(

hard to believe....
wiki??? you too????

Bharat Bhushan said...

विकिपीडिया पर बहुत कुछ होने के बावजूद अभी तक यह विश्वसनीय नहीं बन पाया. हिंदी और अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर मैंने कुछ आलेख दिए हैं. कुछ पर अन्य संपादकों ने मनमानी कर के उनका स्वरूप ही बिगाड़ दिया और असत्यापित सामग्री वहाँ डाल दी. कोई इन आलेखों को कब तक सुरक्षा देते रहे. अब वे भगवान भरोसे हैं. विकिपीडिया की नीति भी कहती है कि विकि पर आलेख लिखने वाले यह मान कर चलें कि उनके आलेख को पूरी तरह संपादित किया जा सकता है. वर्मा जी के मामले में ऐसा लगता है कि उनके आलेख को असमर्थित सामग्री मान कर हटाया गया है. वर्मा जी के बार-बार दोहराए संपादन के कारण उन्हें ब्लॉक कर दिया गया होगा. मेरा विचार है वर्मा जी को इस बारे में संदेश भी आए होंगे.

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

main vinit kumar जी से सहमत हूँ !

सुनीता शानू said...

देश भक्ति की इस रचना को पढ़कर मन में एक उमंग सी जाग उठी है। काश हम भी देख पाते उन वीर शहीदों को। वर्मा जी के देशभक्ति के जज़्बे को सलाम।
जय-हिंद।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aaderneeya divya jee..pahli baat to ye hai kee padadheen sapnehu sukh naahi..main bhee vineet jee ke baat se purntaya ittefaak rakhta hoon..dosri baat ye kee daman hamesh kranti ko janam deta hai..angrejo ka atyachaar desh kee ajadi ka sabab bana aaur ab wikipedia kee neetiyan krnatikari sahitya ke shrajan ka karan banegi...sadar badhayee ke sath

रविकर फैजाबादी said...

विकीपीडिया मीडिया, रक्खे आगे सोच |
कत्ल हकीकत का करे, पंख सत्य के नोच |

पंख सत्य के नोच, खोंच हर जगह लगावे |
खुद को लगे खरोंच, बेवजह शोर मचावे |

डाक्टर वर्मा धन्य, अन्य दूजे न पूजे |
रविकर जस चैतन्य, सत्य दुनिया में गूँजे |

वन्दना said...

यही तो दोगलापन रहा है हमेशा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (01-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जि‍सकी लाठी उसकी भैंस, ऐसे में लाठी अपने हाथ ही रखनी चाहि‍ए

veerubhai said...

बहुत बढ़िया पोस्ट लागाई है डॉ .जील आगे बढ़ने के लिए ऐसी बाधाएं आएं बारहा यह बहुत ज़रूरी है .हमारा सोलिड प्रोपेलेंट (रोकिट फ्यूल)भी रोका गया था .

हर तरफ एतराज़ होता है ,मैं जहां रौशनी में आता हूँ .डॉ क्रांत के लेखन की आंच यूं ही सुलगती रहे दिल जलों को सुलगाती रहे वैसे ये विकी -पीडिया स्साला खुद भी फ्ल्युइड स्टेट में ही रहता है यहाँ प्रामाणिक और अंतिम कुछ भी नहीं है .

veerubhai said...

बहुत बढ़िया पोस्ट लागाई है डॉ .जील आगे बढ़ने के लिए ऐसी बाधाएं आएं बारहा यह बहुत ज़रूरी है .हमारा सोलिड प्रोपेलेंट (रोकिट फ्यूल)भी रोका गया था .

हर तरफ एतराज़ होता है ,मैं जहां रौशनी में आता हूँ .डॉ क्रांत के लेखन की आंच यूं ही सुलगती रहे दिल जलों को सुलगाती रहे वैसे ये विकी -पीडिया स्साला खुद भी फ्ल्युइड स्टेट में ही रहता है यहाँ प्रामाणिक और अंतिम कुछ भी नहीं है .

Rajesh Kumari said...

चलती कलम और उफनते जज्बात को कोई रोक नहीं सकता ,जिसको असुरक्षा की भावना हो वो ही ऐसी ओछी हरकत करता है ,एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुलता है जय हिंद

प्रतुल वशिष्ठ said...

आज शिकायत ये नहीं कि यहाँ के लोगों के परिधान पाश्चात्य के रंग में रंग चुके हैं.

शिकायत ये है कि भारतीय बुद्धिजीवियों की मानसिकता पाश्चात्य प्रेमी हो गयी है. वे यहाँ के पूर्व क्रांतिकारियों, महापुरुषों, और साधु-संतों के प्रति विष-वमन करते नहीं अघाते.

'विकिपीडिया' को चला तो आखिर आदमी ही रहे हैं. वे किस सोच के हैं? जानना होगा.... वह कोई 'न्याय का दरबार' नहीं, जहाँ दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात रखें.

वहाँ तो केवल उनके चश्मे से ही दुनिया देखनी होगी. लेकिन विवेक के चक्षु खुले रखने वालों को सत्य के रास्ते दिखाने वाले टकरा ही जायेंगे.

Anonymous said...

खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर
आधारित है जो कि खमाज थाट
का सांध्यकालीन राग है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध
लगते हैं, पंचम इसमें वर्जित है,
पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी
किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
..

हमारी फिल्म का संगीत
वेद नायेर ने दिया है.
.. वेद जी को अपने संगीत
कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से मिलती है.

..
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