व्यक्ति जैसे जैसे ऊंचाई की तरफ अग्रसर होता है , वैसे वैसे संतुलन बिगड़ने लगता है , इसलिए बहुत आवश्यक है की इस संतुलन को बनाए रखें ।
अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। न ही मर्यादा के खिलाफ हो , न ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , न ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी न जाए।
इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है । फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई । तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं । किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।
जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को । लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता । और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।
रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर न आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ । क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।
किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं । वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं । आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।
देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच आ गए हों।
हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा न करें । मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।
आभार
अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। न ही मर्यादा के खिलाफ हो , न ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , न ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी न जाए।
इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है । फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई । तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं । किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।
जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को । लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता । और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।
रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर न आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ । क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।
किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं । वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं । आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।
देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच आ गए हों।
हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा न करें । मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।
आभार