अना हजारे का राजनीति में आने का निर्णय १०० फीसदी गलत है। नयी पार्टी बनाकर वे हिन्दू वोटों को बाँट कर खंडित करेंगे। हमारी शक्ति कमज़ोर होगी। दलालों की पार्टी कांग्रेस तो चाहती ही यही है। उसकी तो चांदी हो जायेगी। क्योंकि मुल्लों को तो उसने खरीद ही रखा है। मुल्लों के वोट तो बाटेंगे नहीं , वे तो दलाल कांग्रेसियों को ही मिलेंगे। मैं अन्ना के निर्णय का पुरजोर विरोध करती हूँ। अन्ना को भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई जारी रखनी चाहिए। अनशन द्वारा जान देकर नहीं बल्कि धरना देकर , उनकी नाक में दम करके। राजनीति में उतरने का विचार त्याग दीजिये। राजनीति आपको मुद्दों से भटका देगी। पहले ही अनेक पार्टियाँ भटकी हुयी हैं । आप क्यूँ उसका हिस्सा बनना चाहते हैं ? जन नायक ही बने रहिये ना।
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Friday, August 3, 2012
Tuesday, July 31, 2012
निंदा करना ज़रूरी है क्या ?
बहुत से लोगों के मत में अन्ना टीम तानाशाही कर रही है, और बाबा रामदेव के आन्दोलन में विघ्न भी उत्पन्न करती है और भारत स्वाभिमान के प्रयासों का लाभ स्वयं ले लेना चाहती है। काफी हद तक ये बात सच भी है। कहीं-कहीं ये टीम स्वार्थी हो जा रही है। लेकिन आम जनता को इनके प्रति अपने मन में द्वेष नहीं रखना चाहिए। आम जनता तो बस कार्यों को देखें । यदि आन्दोलन जनहित में है तो समर्थन करना चाहिए। आन्दोलनकारी अपने आपसी मतभेदों से स्वयं ही निपट लेंगे। हमें बीच में नहीं पड़ना चाहिए। हमारा काम तो सद्प्यासों को आगे ले जाना होना चाहिए।
फेसबुक और ब्लॉग पर भी अनेक राष्ट्रवादी लेखक हैं, लेकिन वे सभी एक दुसरे से समन्वय और सामंजस्य बना कर रखते हों ऐसा नहीं है। अतः सबको अपने तरीके से काम करने देना चाहिए। मुख्य बात ये है, की सभी राष्ट्रहित में लिख रहे हैं। साथ रहे, या न रहे, ये ज़रूरीनहीं है।
मानव स्वभाव थोडा-बहुत ईर्ष्या और द्वेष से युक्त होता है। कोई संत ही होगा जो इन मानवीय दुर्गुणों से ऊपर उठ पायेगा। अतः मानवीय स्वभाव को समझते हुए इस बात पर गौर करना होगा। अच्छे मंतव्यों को तवज्जो दीजिये। उद्देश्य बड़ा होना चाहिए। अनशन करने वाला व्यक्ति नहीं।
Zeal
Monday, April 16, 2012
भारत देश के गांधी कितने घातक ?
गांधियों ने बहुत क्षति पहुंचाई है अनजाने ही इस देश को। मोहनदास करमचन्द्र गांधी की 'मुस्लिम तुष्टिकरण' की नीति' , भीमराव अंबेडकर जी का जात-पात बढाता हुआ देश को विभक्त करता संविधान, और अब अन्ना हजारे की गांधीगीरी/अन्नागीरी । लोगों का अल्पज्ञान एवं देश के इतिहास में अरुचि उन्हें बहुत सी सच्चाईयों से दूर रखती है।
पढ़िए ' नियाज़ अहमद सिद्धिकी ' की बेबाक टिप्पणी--
Niaz Ahmed Siddique
Saturday at 8:21pmपढ़िए ' नियाज़ अहमद सिद्धिकी ' की बेबाक टिप्पणी--

Ambedkar was the first Munna of Anglos - he never went to any jail for independence. But he gave service to create yet another AbraHarami book which we call today Indian Constitution. This book ensures that Indians divide themselves by religion, caste and region and crooks and criminals get elected election after election. ambedkar was a mediocre brain bookish clerk who created this alien AbraHarami book by "copy-paste." It will never bring true democracy. The second Munna is present PM. What first Munna did for polity and governance second Munna did for economy. First Munna ensured that the East India Company rules by proxy and second Munna made sure that the loot and plunder in Trillions go on. Indians you never got any independence. Ambedkar a below average match-fixing player is being eulogized unnecessarily. Only good thing he did was choosing Boudhism even though Angloes put pressure to choose one of the AbraaHaramic religions - either Christianity or Islam. Angloes had good experience in subduing and using these religions for keeping people idiots and without any power.
Zeal
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Tuesday, April 12, 2011
भारत-स्वाभिमान सेनानी -- आप शीर्ष पर खड़े हैं , संतुलन बनाए रखिये
व्यक्ति जैसे जैसे ऊंचाई की तरफ अग्रसर होता है , वैसे वैसे संतुलन बिगड़ने लगता है , इसलिए बहुत आवश्यक है की इस संतुलन को बनाए रखें ।
अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। न ही मर्यादा के खिलाफ हो , न ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , न ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी न जाए।
इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है । फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई । तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं । किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।
जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को । लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता । और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।
रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर न आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ । क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।
किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं । वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं । आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।
देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच आ गए हों।
हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा न करें । मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।
आभार
अन्ना हजारे , बाबा रामदेव , किरण बेदी आदि जिस ऊँचाई पर पहुँच चुके हैं , वहां पर करोड़ों जोड़ी आखें उनकी तरफ उम्मीद के साथ देख रही हैं। इस स्थिति में उनके मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को बहुत नपा तुला होना चाहिए। न ही मर्यादा के खिलाफ हो , न ही किसी को ठेस पहुँचाने वाला हो , न ही आपसी वैमनस्य को दर्शाए और अहंकार तो गलती से छू भी न जाए।
इस आन्दोलन में उतरे देश के अनमोल रत्नों ने ये साबित कर दिया की एकता में ही बल है । फिर भी व्यक्ति तो भिन्न ही हैं इसलिए थोड़ी बहुत वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक ही है। यदि अन्ना जी को भूषण-द्वय ज्यादा उपयुक्त लगे और रामदेव जी को किरण जी का होना ज्यादा उपयुक्त लगा तो इसमें बुराई नहीं है कोई । तीनों ही व्यक्तित्व अपने आपमें किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं हैं । किरण जी रहें या फिर भूषण जी , दोनों ही इमानदारी की मिसाल हैं और देशभक्ति से ओत-प्रोत , इसलिए दोनों ही परिस्थियों में देश का भला ही होगा।
जहाँ तक भूषण-द्वय का सवाल है , बहुत इमानदार व्यक्तित्व हैं और इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त भी हैं , सराहना पड़ेगा अन्ना जी के निर्णय को । लेकिन यदि केवल पिता अथवा बेटे में से किसी एक को लिया जाता तो बेहतर होता क्यूंकि एक अन्य व्यक्ति के समावेश से उस गठन को विस्तार मिलता । और परिवार के एक व्यक्ति को दुसरे का समर्थन और सहयोग तो वैसे भी मिलता ही है।
रामदेव जी का भाई-भतीजावाद का आरोप सही नहीं है , लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। एक परिवार में यदि दोनों ही काबिल हैं तो एक को लेने के साथ, एक किसी अन्य योग्य व्यक्तित्व को शामिल किया जा सकता था। लेकिन कोशिश यही होनी चाहिए की भीतर की बात बाहर न आने पाये और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएँ । क्यूंकि भ्रष्ट तंत्र तो मौके की तलाश में 'Divide and rule" वाली निति लिए तैयार खड़ा है।
किरण बेदी जी तो इस पद के लिए पहले ही मना कर चुकी थीं , क्यूंकि जिनता मैं उन्हें जानती हूँ , वे इस पद के बहुत ऊपर उठ चुकी हैं । वे नेतृत्व बेहतर कर सकती हैं । आज देश को पद धारकों से ज्यादा सही दिशा देने वालों की और सही नेतृत्व करने वालों की आवश्यकता है।
देश के इस आन्दोलन में शामिल हस्तियों को देखकर लगा मानों स्वतंत्रता के समय के लाल, बाल , पाल , बोस और भगत सिंह , डॉ राजेन्द्र प्रसाद, और जय प्रकाश जैसे व्यक्तित्व पुनर्जीवित होकर इन हस्तियों के रूप में भारत को स्वाभिमान दिलाने पुनः हमारे बीच आ गए हों।
हमारा भी दायित्व है की हम इनकी अनावश्यक निंदा न करें । मानवीय भूलों के प्रति उदार रहें तथा उनके ऊपर समय तथा तंत्र के दबाव को भी समझें। आखिर वे हमारे और देश के लिए ही इतने कष्ट सह रहे हैं।
आभार
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