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Wednesday, March 30, 2011

आलोचना एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन !

दिन के बाद रात आती ही है और सुख के साथ दुःखइसलिए प्रशंसा की चर्चा के बाद 'आलोचना' पर विमर्श हो तो कुछ अपूर्ण सा लग रहा था

आलोचना क्या है -

किसी भी संस्था , समूह अथवा व्यक्ति के कार्यों में पाये जाने वाले दोषों की विवेचना ही आलोचना हैआलोचना द्वारा सुधार की गुंजाइश रहती है यदि आलोचना की दिशा सकारात्मक हो तोव्यक्ति के दोषों को इंगित करने के साथ-साथ , सुधार के लिए प्रयुक्त विकल्प अवश्य बताये जाने चाहिएयदि कोई संस्था अथवा व्यक्ति गलत उद्देश्य से किसी कार्य को कर रहा है तो वहाँ एक स्वस्थ्य आलोचना की दरकार है

लेकिन अतार्किक अथवा पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर , किसी की छवि बिगाड़ने के उद्देश्य से अथवा किसी को नीचा दिखाने के उद्देश्य से की गयी आलोचना , नकारात्मक आलोचना हैइस प्रकार की आलोचना अकसर नामचीन हस्तियों के विरोध में की जाती हैं , जिसका उद्देश्य उस व्यक्ति को अपने लोकप्रिय समुदाय की आँखों में छोटा बनाकर खुद सत्ता को हासिल करना होता है

कभी कभी किसी के अस्तित्व को ही नकार देने के उद्देश्य से की गयी आलोचना भी नकारात्मक हैउदाहरण स्वरुप - - "स्त्रियों को अधिक तर्क वितर्क नहीं करना चाहिए "। ऐसा कहकर स्त्रियों की आवाज़ को ही दबा देना-"आज की युवा पीढ़ी में संस्कार ही नहीं है " । इस प्रकार के एक बड़े समुदाय की आलोचना करके सिरे से खारिज कर देना भी नकारात्मक हैऐसी आलोचना विकास में बाधक हैआलोचना में सामान्यीकरण (sweeping generalization), अनुचित है

Discrediting tactic - यह भी एक प्रकार की आलोचना है , जिससे किसी के व्यक्तित्व को जबरदस्त क्षति पहुचाई जा सकती है , जिसकी आपूर्ति असंभव हैइसका उद्देश्य एक लोकप्रिय व्यक्ति को मैदान से समूल उखाड़ फेंकनाऐसा अक्सर लोकप्रिय public figures के खिलाफ होता हैउदाहरण - हिटलर के पास एक ही 'वृषण' (testicle) हैइस प्रकार के दुष्प्रचार से हस्तियों को एक नकारात्मक छवि देकर उनकी लोकप्रियता को क्षति पहुँचाना

अक्सर खुद को बेहतर साबित करके , जीत हासिल करने के उद्देश्य से व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप कर आक्रमण करना भी नकारात्मक आलोचना का ही स्वरुप हैयह आलोचक के छुद्र मंतव्यों को परिलक्षित करता है

एक आलोचक यदि नैतिक मूल्यों का भी स्मरण रखे तभी सार्थक आलोचना कर सकता हैआलोचना के दौरान किसी भी प्रकार से व्यक्ति की छवि और स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए, और उसके कार्यों के सार्थक उद्देश्य की अवहेलना नहीं होनी चाहिएकभी भी आलोचना द्वारा विवाद खड़ा करके किसी स्वस्थ्य बहस में बाधा नहीं उपस्थित करनी चाहिए

कबीर दास जी का दोहा है -

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाए ,
बिन पानी साबुन बिना , निर्मल करे सुभाय ।

यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात है की दोहा लिखने वाला एक संत है , वैरागी हैउसमें अहंकार नहीं हैवो तो आराम से आलोचना कर देगा - " काकर पाथर जोरि के मस्जिद दियो बनाये , ता चढ़ी मुल्ला बांग दे , का बहरा हुआ खुदाय" ।

एक संत अपने पास निंदक रख भी सकता है और निंदा भी अति सहजता से कर सकता हैऐसा करने में वो विचलित नहीं होगालेकिन एक साधारण मनुष्य को इस बात का बहुत ध्यान रखना है की वह संत नहीं है , अतः आलोचना करते समय उसके पूर्वाग्रह हों उसके साथ , तथा जिसकी आलोचना कर रहे हैं , उसकी भी वय , अनुभव , अवस्था , परिस्थिति का पूर्ण आंकलन कर लें आलोचक का दंभ बीच में आये , व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचे , तभी एक स्वस्थ आलोचना संभव है

आलोचक का मंतव्य पावन होना चाहिए था जिसकी आलोचना हो रही है , उसमें पर्याप्त दृढ़ता होनी चाहिएयदि दोनों का ही अहंकार बीच में आये तभी आलोचना की सार्थकता है

आभार