Wednesday, March 23, 2011

कृपया अगरबत्ती न जलायें , ग्लोबल वार्मिंग हो रही है -- Global warming

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ब्लॉग जगत में भ्रमण के दौरान दो वक्तव्य पढने में आया कि -
  • होलिका दहन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और
  • होलिका दहन से वनों की कटाई [deforestation] हो रही है ।

विज्ञान विषय पर टिपण्णी अति शीघ्रता में नहीं करनी चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसी समस्या है , जो २० वीं शताब्दी के मध्य से शुरू हुई है , जिसका मुख्य कारण है -industrial revolution।

होलिका दहन तो सदियों से हो रहा है , जिसमें गोबर के उपलों , सूखी डंडियों , डालियों , सूखी पत्तियों को जलाया जाता है । जिसकी आंच से ग्लोबल वार्मिंग नहीं होती । और होलिका दहन में हरे वृक्ष कदापि नहीं काटे जाते , जिसके कारण deforestation की चिंता की जाए। आज तक कभी नहीं सुना की हरी लकड़ियों से भी किसी प्रकार कि आग जालाई जा सकती है।

वृक्ष की टहनी काटी जाती है , जिससे वृक्ष सूखता नहीं है , बल्कि उसकी ग्रोथ और तेज़ी से होती है। हरे वृक्ष को न ही काटा जाता है , न ही जलाया जा सकता है , इसलिए इस प्रकार का दुष्प्रचार करना और लोगों की आस्था का उपहास करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है ।

कल को लोग कहेंगे घर के चूल्हे भी ग्लोबल वार्मिंग कर रहे हैं ,
सिगरेट का धुंआ भी फेफड़े न जलाकर , ग्लोबल वार्मिंग कर रहा है।
ईर्ष्या का धुंआ भी , प्रेम की अग्नि भी और श्वास निष्कासन के दौरान निकली कार्बन डाई ओक्साइड भी ग्लोबल वार्मिंग कर रही है।

क्यूँ पहले जान लिया जाए की ग्लोबल वार्मिंग आखिर है क्या -

ग्लोबल वार्मिंग - पृथ्वी के वातावरण में उपस्थित ग्रीन हाउस गैसेज़ , सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित कर वैश्विक ताप को निरंतर बढ़ा रही हैं , इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं । इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं -

  • प्रकृति द्वारा [Natural]
  • मनुष्यों द्वारा [Anthropogenic]
  • ओजोन परत में छिद्र होना [Ozone layer depletion]
  • वनों की कटाई [deforestation]

सूर्य की तीव्र किरणें जो पृथ्वी पर पहुँचती हैं , उसमें से अधिकाँश भाग परावर्तित होकर पृथ्वी के वातावरण [atmosphere] से बाहर चला जाता है , लेकिन सूर्य की इन्फ्रा-रेड किरणें , पृथ्वी के आवरण के नीचे trap होती रहती हैं , जो निरंतर वैश्विक ताप को बढ़ा रही हैं।

दूसरा प्रमुख कारण हैं -मानव की बढती गतिविधियाँ । १९४९ के बाद से पूरे विश्व में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति के कारण फैक्ट्री से निकली CO2 का प्रतिशत वातावरण में तेजी से बढ़ा है , जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी है। पिछले ६० वर्षों में CO2 का प्रतिशत ३१३ ppm से बढ़कर तकरीबन ३७५ ppm हो गया है । औद्योगिक संस्थानों में प्रयुक्त होने वाले कोयले , LPG , CNG, HSD और furnace oil आदि के जलने से वातावरण में CO2 म्निरंतर बढ़ रही है । जो खतरे की घंटी बजा रही है

तीसरा प्रमुख कारण है चिलर, रेफ्रिजरेटर , एयर कंडिशनर आदि में प्रयुक्त chloroflourocarbon [CFCs] gases , जो वायुमंडल में उपस्थित Ozone के क्रिया करके उसे नष्ट कर रही हैं , परिणाम स्वरुप Ozone layer में छिद्र का होना तथा इस छिद्र से सूर्य की इन्फ्रा-रेड किरणों का अधिक मात्रा में पृथ्वी के आवरण के नीचे trap होना।

चौथा कारण वनों की कटाई - पेड़-पौधे जो सूर्य की रौशनी में खाना बनाने की प्रक्रिया [Photosynthesis]में CO2 का उपयोग करके वातावरण को शुद्ध oxygen देते हैं , उनका नष्ट होना । इस deforestation का मुख्य कारण है globalization , industrialization , over population , cattle ranching , extractive industries तथा Urbanization .

इस प्रकार से वातावरण में उपस्थित ग्रीन हाउस gases [पानी की वाष्प , CO2, मीथेन , nitrous oxide , क्लोरोफ्लोरो कार्बन] , सूर्य की किरणों की ऊष्मा को अवशोषित करके ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रही हैं ।

समाधान -
  • जितने पेड़ काटे जाएँ , उतने ही रोपित किये जाएँ कम से कम [reforestation]
  • CFCs की जगह R-134a का इस्तेमाल हो कुलिंग के लिए। इससे Ozone परत को कोई खतरा नहीं है ।

आवश्यक बातें -
  • जानकारी के अभाव में अनावश्यक दुष्प्रचार न करें ।
  • किसी की आस्था पर ऊँगली उठाने के पूर्व सौ बार सोचें ।
  • ये कहने के बजाये कि फलां व्यक्ति हरा वृक्ष काट रहा है , अज्ञानियों को टोकें तथा स्वयं भी वृक्षारोपण करें। यदि एक अरब जनता मात्र एक वृक्ष लगाये प्रति वर्ष तो समस्या का समाधान मिल सकता है
  • खुद भी जागरूक रहे और लोगों को भी जागरूक बनाएं ।

आभार

73 comments:

दर्शन लाल बवेजा said...

हो सकता है वो पोस्ट किसी पूर्वाग्रह की वजह से हो ...

mridula pradhan said...

thanks for so much information.

Rakesh Kumar said...

good informative post.Thanks

डॉ टी एस दराल said...

तीसरा कारण सबसे महत्त्वपूर्ण है । यहाँ विकसित देशों की धूर्तता आड़े आ रही है ।

राज भाटिय़ा said...

अजी झोला छाप विज्ञानिक भी तो मिलते हे....:)
अजी हम आह भी भरते हे तो लोग कहते हे कि .....ग्लोबल वार्मिंग हो रही हे... क्या करे?

प्रवीण पाण्डेय said...

जागरूक करती पोस्ट।

Bhushan said...

सही कहा है. कई लोग ग्लोबल वार्मिंग के नाम पर एनजीओ चला रहे हैं और बिना कुछ किए चाँदी काट रहे हैं.

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

दुष्प्रचार से बहुत नुक्सान है....समझने वाली बात है....अगर होली जलाने से ग्लोबल वार्मिंग होती है....तो लोहरी में आग जलाने से गरम कपडे पहनने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए

योगेन्द्र पाल said...

ये अगरबत्ती वाले भाई साहब कौन हैं, जरा बताइए मुलाकात कर के आता हूँ,

यहाँ तो पता नहीं क्या क्या हो रहा है :) :D

कभी पपीते में से बकरी की टांग निकल रही है, कभी उद्देश्य हीन ब्लॉग समूह बन रहे हैं|

हिन्दी की अच्छी सेवा कर रहे हैं, हिन्दी ब्लोगिंग को बदनाम कर के रख दिया है, हद होती है वेवकूफी की

अब कोई ब्लोगर नहीं लगायेगा गलत टैग !!!

kshama said...

Jaankaaree se bharpoor aur sanjeeda aalekh!

Dr Varsha Singh said...

पर्यावरण जैसे ज़रूरी विषय पर आपका लेखन सार्थक है.

Udan Tashtari said...

सार्थक आलेख.

मदन शर्मा said...

दिव्या जी नमस्कार! सही कहा है आपने !!
आज कल तो अनेकों तथाकथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा ये प्रचारित किया जा रहा है की हिन्दुओं के शव दह क्रिया से भी
प्रदूसण फ़ैल रहा है जो की ग्लोबल वार्मिंग का कारण है. अब ऐसे लोगों की बुद्धि को क्या कहा जाय.

shikha varshney said...

ईर्ष्या का धुंआ भी , प्रेम की अग्नि भी और श्वास निष्कासन के दौरान निकली कार्बन डाई ओक्साइड भी ग्लोबल वार्मिंग कर रही है
अरे इससे तो पूरी दुनिया नष्ट होजाती है.वाकई .:) :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

ग्लोबल वार्मिंग के बारे में सचेत करने के लिए धन्यवाद!

अरूण साथी said...

लो जी कर लो बात। इसी को कहते है पर उपदेश कुशल बहुतेरे। खुद ए. सी. में रहेगें और दूसरों को कहेगें कि होलिका दहन न करों। होलिका दहन एक ऐसी परंपरा है जिसमें बेकार पड़े जलाबनों को जलाया जाता है। यह तो पृथ्वी को सााफ करने की प्रक्रिया है।
करारा लिखे है दिव्या जी।

जयकृष्ण राय तुषार said...

विषय का चयन और जानकारी उपयोगी है बधाई |

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

दिव्या जी आप कुछ प्वाइंट लिखना भूल गयी ।
बकरे भैंसे मुर्गे मारने से भी पर्यावरण प्रभावित होता है ।
किसी भी मृतक जीव देह का अंतिम स्थान शमसान होता है । जाहिर है कि इनको पेट में रखने वाले चलते फ़िरते मुर्दाघर हैं ।
शब को जमीन में दफ़न करने से बहुत अधिक जमीन बरबाद होती है ।
एक विशेष उत्सब पर कागज चमकीली पन्नी से बनी झांकियाँ नदी आदि में प्रवाहित करने से जल प्रदूषण होता है ।

अरविन्द जांगिड said...

यदि सभी अपने हिस्से का वृक्ष लगा दें तो समस्या का समाधान हो जायेगा. ये बात अन्य बातों पर भी लागू होती है, जैसे की हम ठान लें की मुझे न तो भ्रष्टाचार करना है और ना ही इससे प्राप्त होने वाली सुविधाओं को ही लेना है तो फिर भ्रष्टाचार को समाप्त होते देर नहीं लगेगी. लेकिन समस्या यही है की हम दूसरों से कुछ और अपेक्षा करते हैं और खुद करते कुछ और ही हैं.


आभार.

ashish said...

वैश्विक गर्माहट के तमाम कारणों पर आपने प्रकाश डाला , धर्म सम्बन्धी कु प्रचारों से भी अवगत कराया और बचने की सलाह दी . धरती की और गरम ना होने देने के उपायों पर भी दृष्टि डाली आपने . हम पढ़कर अनुगृहित हुए . बहुत ही गुणात्मक और ज्ञानवर्धी आलेख .

BK Chowla, said...

Such posts are so well meaning and informative

खुशदीप सहगल said...

तलाक को भी ग्लोबल वार्मिंग की वजह माना जाता है...वहां शादियां कम ही टिकती हैं...इसलिए जब भी कोई जोड़ा अलग होता है तो वो फिर नए सिरे से एसी, फ्रिज जैसे इलेक्ट्रिक एप्लायेंसेंस खरीदता है...मतलब ज़्यादा ग्रीन हाउस गैसेज का उत्सर्जन...शुक्र है भारत में शादियां जन्म-जन्मान्तर तक चलती है...

जय हिंद...

पी.एस .भाकुनी said...

.........अगरबत्ती जलाइए ,अपना ही नहीं पड़ोसियों का घर भी महकाइये , लेकिन पहले अरब मुल्कों में जल रहे तेल के कुवो को बुझाइए ताकि ग्लोबल वार्मिंग को कुछ कम किया जाय,
जागरूक करती पोस्ट हेतु आभार............

देवेन्द्र पाण्डेय said...

होलिका दहन से प्रज्वलित अग्नि वातावरण को शुद्ध करती है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही ध्यान दिलाया। सांस लेना तो चलो सभी प्राणी करते हैं मगर खाना पकाने का काम तो प्रकृति में कोई भी प्राणी नहीं करता। होलिका दहन से पहले घर का चूल्हा दहन बन्द करना पडेगा। हो सकता है कोई तानाशाह ऐसा हुक्म देने के लिये तैयार ही बैठा हो।

रचना said...

i wish you had posted the links so that more people could read that article

i am not posting it as its your blog

Deepak Saini said...

पढी थी वो पोस्ट भी मैने, उसका लेखक किसी पुर्वाग्रह से ग्रस्त लगता है
आपने सही पोस्ट किया
आभार

प्रतुल वशिष्ठ said...

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मेरे मन की बात आपने कह दी और वह भी बड़े कायदे से.
कल ही अमित जी से 'अतिवादिता' पर चर्चा हो रही थी और
'मिथ्या जागृति प्रचार' पर परस्पर चुटकियाँ ले रहे थे.
— ग्लोबल वार्मिंग का भय दिखाकर मजदूर का चुल्हा तो बुझा देंगे, लेकिन विकसित देश परमाणु-परीक्षण, मिसाइल परीक्षण बर्फीले प्रदेशों जारी रखेंगे.
— जल-समाप्त होने का भय दिखाकर एक गिलास पानी लुढ़क जाने को जल बरबादी बताया जाएगा, लेकिन तमाम उद्योगों द्वारा जल-प्रदूषण करने और कत्लगाहों में जल-सप्लायी निरंतर जारी रखी जायेगी.
— 'ग्लोबल' (गौरव) वार्मिंग वहाँ ही होती है जहाँ तर्क कमज़ोर पढ़ते दिखते हैं. विभिन्न साक्ष्यों के साथ तभी ग्लोबल अवतार हो जाता है.
— आपकी पोस्टें और कमेन्ट भी ब्लोगल वार्मिंग करते रहे हैं... सभी जानते हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ said...

दिव्या जी,
जान बूझकर ग्लोबल और ब्लोगल को मैंने एकरूप कर दिया है. इससे संवाद में मैंने हास्य निर्मित कर बहस को बढ़ाना चाहा है.

रश्मि प्रभा... said...

aapko padhna yun lagta hai, jaise gyankosh padh rahi hun

Sawai Singh Rajpurohit said...

आदरणीय दिव्या जी
आज'ग्लोबल वार्मिंग'दुनिया के लिए कितनी बड़ी समस्या है, ये बात एक आम आदमी नहीं समझ सकता है और वैसे ग्लोबल वार्मिंग एक वैज्ञानिक घटना है जिसका मतलब ये की धरती के वायुमंडल में कार्बन डाईओक् साइड की अदिक होनाऔर जिससे धरती का औसत तापमान बढ़ता है!

Poorviya said...

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ek jawalant samasaya par ek khub surat charcha-------------

jai baba banaras---

सदा said...

हमेशा की तरह बेहतरीन आलेख ...इस बेहतरीन प्रस्‍तु‍ति के लिये बधाई ।

अजय मोहन said...

आस्था.....
विज्ञान....
अपनी अपनी सोच का चश्मा...
अपना-अपना आग्रह....
जबरन वैज्ञानिकता का जामा....
@योगेन्द्र पाल
जिधर पपीते में से बकरी की टांग निकली उधर टिप्पणी करने की बजाए जबरिया हाइपर लिंक लगा कर इधर छुछुआ रहे हो। सिर्फ़ संबंधित कमेंट करें तो बेहतर रहता है।
दिव्या जी अच्छा आलेख है साधुवाद स्वीकारिये।

सम्वेदना के स्वर said...

हम ब्लोगरों के कम्प्यूटरॉं से भी "हीट" निकलती है...

कुछ लोग कहते हैं कि जितनी बिजली यह कम्प्यूटर पीते हैं उतनी बिजली के उत्पादन के लिये फिर ऊर्जा के और स्त्रोत नष्ट होते है....

घनश्याम मौर्य said...

post ka sheershak hi puri post ko bayan kar deta hai.

सुज्ञ said...

विज्ञान का ज्ञान जब कुटिल स्वहित साधकों के हाथ लग जाय जो उसका दुरपयोग निश्चित है। प्रकृति और पर्यावरण पर जब पूरी दुनिया एक मत
से चिंतित है, कुत्सित मानसिकता से उसे हथियार बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

हमारे आवास सम समस्त धरा-प्रकृति की निर्मल-निर्दोष मन से चिंता करो, इसी में इस इंसान की इंसानियत सुरक्षित है।

Kunwar Kusumesh said...

आपने जिस समझदारी से आस्था पर चोट करती उस पोस्ट का जवाब दिया है उसके लिए आप बधाई की पात्र हैं.

गिरधारी खंकरियाल said...

होली पर अभी f R I देहरादून की रिपोर्ट आइ थी जिसमे उन्होंने देश में लगभग ५० लाख से भी अधिक होलिकाए जलने का अनुमान लगाया था और उस पर कर्च होने वाली लकड़ी का अनुपात पेड़ों में बदल कर लिखा था उससे तो यही पता चलता है किकहीं न कही इस त्यौहार पर भी deforetation का काम हो रहा है जिसका असर जलवायु पर तो पड़ता ही है

ZEAL said...

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गिरधारी लाल खंकरियाल जी ,

ऐसी ही बेतुकी रिपोर्टों पर विचार करने की आवश्यकता है। ५० लाख जगह पर होलिका दहन हुआ , उसके लिए प्रयुक्त लकड़ी को पेड़ों में बदल कर गिनवा दिया । प्राप्त संख्या को deforestation का नाम दे दिया गया। आपको कम से कम पता होना चाहिए , की यह लकड़ी पेड़ों को काटकर इकठ्ठा की गयी थी , या फिर इसका souce क्या है । deforestation किस कारण से हो रहा है , कम से कम आपको पहले इसकी पूरी तसल्ली कर लेनी चाहिए। यदि होलिका दहन ही इसका कारण है तो बड़े बड़े देशों को इसकी सूचना दीजिये ताकि शीघ्रता से हिन्दुओं के त्योहारों की अनावश्यक कर्म कांडों पर रोक लगाई जा सके ।

लोग आजकल जितनी तेज़ गति से नास्तिक होते जा रहे हैं , उसके कारण संस्कृतियाँ तो शायद मध्यम वर्ग के ही कारण थोडा बहुत जीवित है । इस पर भी लोगों को संतोष नहीं है । साल में एक दिन जली होलिका पर खर्च होने वाली लकड़ी की रिपोर्ट तो बना दी , लेकिन प्रतिदिन गरीबों के चूल्हे में कितनी लकड़ी जलती है , उसका आंकड़ा नहीं दिया ।

विकसित देश जिस तरह से fossil fuel , use कर रहे हैं , और पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं , तथा वनों की कटाई कर रहे हैं , आधुनिक साज सज्जा में , कभी इसका आंकड़ा इकठ्ठा किया है ?

हिन्दू रीति-रिवाज बहुत ही वैज्ञानिक सोच के साथ बनाए गए हैं । इनसे पर्यावरण को खतरा नहीं है , न ही इनमें प्रयुक्त लकड़ियाँ वनों की कटाई का कारण हैं । बेतुके आंकड़े देकर अनुचित दलीलों के साथ उसका प्रस्तुतीकरण यदि किया जाए तो बुद्धिजीवियों का ये दायित्व है की उस पर मन करें , आँख बंद करके इस तरह की बातों पर यकीन नहीं करें ।

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ZEAL said...

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लकड़ी द्वारा की जाने वाली साज साज्जा , लकड़ी की tiles और उससे बनने वाले wooden floor , staircase , drawing रूम में लगने वाले नक्काशीदार कैबिनेट , रैक , , सोफे , दीवान , अलमारियां , dining tables , पलंग , सायटी , लकड़ी के भव्य झूले , कुर्सी-मेज , आदि ...कभी इनपर खर्च होने वाली लकड़ी पर किसी ने आकडे इकठ्ठा किये ? या सिर्फ हिन्दू धर्म की आस्था पर चोट करना ही विद्वानों का प्रयोजन है।

हर छमाही लोग कागज़ की रद्दी बेचते हैं , अब उसको भी जोड़कर , पेड़ों में बदलकर , आंकड़े दे दें तो कोई क्या कर सकता है ? अरे भाई राद्धि निकलेगी तो बिकेगी ही । कोई पेड़ काटकर तो रद्दी एकत्र नहीं की गयी । उसी प्रकार होलिका दहन में प्रयुक्य लकड़ी , टहनी , डंडी , उपले तो पेड़ के रूप में गिनाकर deforestation का नाम दे देना , एक बहुत ही आग्यांतापूर्ण विवेचन है जो आंकड़े देने वाले के मंतव्यों को संदिग्ध करता है।

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ZEAL said...

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यदि चिंता ही करनी है तो सार्थक दिशा में कीजिये । पिछले ८० वर्षों में जितना fuel खर्च हो चुका है , उतना तो पिछले ८०० वर्षों में नहीं खर्च हुआ है । कैसे होगी इसकी भरपाई ? ऊपर लिखे हैं कारण और उसके निदान , उस पर गौर करने की ज़रुरत है ।

आज वैज्ञानिक भी sure नहीं हैं climatic changes के कारणों पर , और यहाँ लोग होलिका दहन को पर्यावरण के असंतुलन के लिए जिम्मेदार ठहराने पर तुले हुए हैं ।

आज वैज्ञानिक ये नहीं sure है की समुद्रों और dams से बनती पानी की वाष्प भी ग्लोबल वार्मिंग के लिए responsible है अथवा नहीं , लेकिन अफसोसजनक ये है की बेतुके आंकड़े देकर आपसी द्वेष बढाने के लिए दिशा अवश्य दे रहे हैं ।

आज जापान की सुनामी , पूर्व की सुनामी , जगह -जगह भूकंप और radiation , तेल के कुओं में आग से होने वाले पर्यावरण के नुकसान और climatic changes के आंकड़े पहले इकठ्ठा करें , उनका अध्ययन करें तो ज्यादा भला होगा सम्पूर्ण विश्व का।

कोई आंकड़े देगा की प्रति व्यक्ति कितना बकरा कटता है ? , कितना ऊंट , कितना भैसा इत्यादि । छह फुट लम्बे व्यक्ति को दफनाने के लिए कितनी भूमि लगती है ? इस भूमि तो जुटाने के लिए कितने वनों को काटकर कब्रिस्तान बनाते हैं ?

कोई बतायेगा इन आंकड़ों को ?

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मुकेश कुमार तिवारी said...

डॉ. साहिबा,

होली के अवसर पर बेजा चिंतन पर सवालिया निशान उठाता हुआ आलेख तथ्यपरक हैं और आपकी खूबसूरत लेखनी से सजा हुआ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

नोट : आपके ब्लॉग पर कुछ टिप्पणी देना मेरे लिये न जाने क्यों टेढी खीर की तरह ही है। कोई जावा की त्रुटि की वज़ह से अक्सर विंडो ओपन ही नही होती है और आपने ईमेल पता भी नही दिया है जो अपनी बात आप तक पहुँचायी जा सके। धन्यवाद!

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

आदरणीय दिव्या जी बिलकुल सही जानकारी...मै भी कई बार कई लोगों को इसके बारे में बता चूका हूँ पर लगता है जैसे सभी लकीर के फ़कीर हैं| कुछ तो ऐसे भी मिले जो मूंह में सिगरेट दबाए ग्लोबल वार्मिंग पर भाषण दे रहे हैं और अगरबत्ती, धूपबत्ती आदि से होने वाले नुकसानों पर चर्चा करते हैं| भारत देश हर साल सिगरेट बनाने के लिए आईटीसी नामक कम्पनी तकरीबन २०० करोड़ से ज्यादा पेड़ काट देती है| वो तो इन्हें दिखाई नहीं देता| अब वे भी क्या करे जब तक अपनी ही संस्कृती का मज़ाक न बनाएं तो ब्रॉड माइंडेड कैसे कहलाएंगे?


आज काफी दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ| क्षमा चाहूँगा आज कल निरंतर आपका ब्लॉग नहीं पढ़ पा रहा हूँ, थोडा काम का दबाव अधिक था| किन्तु जल्दी ही समय निकाल कर इस अंतराल में आपके सभी लेख पढूंगा|

सादर

दिवस

मनोज कुमार said...

जागरूकता लाना बहुत ज़रूरी है और अपका यह प्रयास स्तुत्य है।
मैं तो जन्म दिन और वैवाहिक वर्षगांठ पर वृक्ष ज़रूर लगाता हूं।
हर सरकारी अनुष्ठान, जैसे राजभाषा सम्मेलन पर कार्यक्रम का आरंभ वृक्षारोपण से ही करवाता हूं।

mahendra verma said...

आपके तथ्यों और तर्कों से पूर्णतया सहमत।

आशुतोष said...

हिन्दू धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक है..कुछ दुश्प्रचारी किस्म के लोग ये बोल सकते है जिन्होंने हिन्दू धर्म के खिलाफ भ्रामक अफवाह फ़ैलाने का प्रण ले रखा है..
एक शोध के अनुसार जिन जगहों पर हवन होता है वहां ओजोन परत के नष्ट होने की संभवाना कम है और अगर कुछ नष्ट हुआ भी है तो वह कम हो जाता है...ये मैं नहीं विज्ञानं कहता है...
हिन्दू पूजा पद्धति आज के हजारों साल पहले वैज्ञानिक और सामाजिक हित के परिपेछ्य में अविष्कृत की गयी है..

जाट देवता (संदीप पवांर) said...

जाट देवता की राम राम,
आपने ग्लोबल वार्मिंग के बारे में काफ़ी कुछ लिख दिया है, कुछ नया भी मिला

H K Dubey said...

People are really using Green trees for Holika Dahan and this has been the case for many years. I have fought war against cutting of trees for holika dahan in Patna in year 1991-93. A rally was taken out from Gandhi Maidan to Ashok Rajpath Chouk where green tree branches were put for holika dahan. This was widely covered by the press and if you want I can show you the press clipings. This was under the banner of Taru Mitra Study Circle for Environment - the college wing of Taru Mitra. There were many witnesses for the green tree branches on every nook and corner of Patna at that time and some of them are now living in Delhi NCR currently.

Even these days, I find green branches of trees cut and piled up for Holika Dahan. Brainless people put these branches 15-20 days before the day of Holika Dahan and by the time you are ready for the Dahan these are dried-up.

Please roam around 15-20 days before the holika dahan day in the cities and see for yourself.

It is painful to see branches of green trees cut for getting a little sunlight during the winters in urban areas which have very few trees. People think that trees have no life. They are wrong. Tree do have life, and they do give us life. They must be saved.

Harit Dhara Sangathan

rashmi ravija said...

बहुत ही जानकारीपूर्ण सार्थक आलेख

ZEAL said...

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एच के दुबे जी ,

जहाँ पर लोग पूरे का पूरा पेड़ धराशायी कर रहे हों , वहां ज़रूर रोक लगनी चाहिए , लेकिन पेड़ों की टहनियां काटने से वृक्ष को कोई नुकसान नहीं होता। या बात तो एक माली भी बता देगा । पेड़ों की कटाई- छंटाई तो वृक्ष के विकास के लिए भी आवश्यक है । भारत में तो रिहायशी इलाके में ख़ास कार बारिश के मौसम में आये दिन बिजली के तार टूटते हैं और हादसे होते हैं , कारण है , बेहिसाब बढे हुए वृक्ष , जिनकी बेतरतीब बढ़ी हुयी डालियों को कटाई की आवश्यकता है ।

पेड़ों की यदि शीर्ष से काटते हैं ( apically), तो वृक्ष सघन होकर बढ़ते हैं , और यदि अगल-बगल की टहनियां काटते हैं तो वो लम्बाई लेकर ऊर्ध्व दिशा में बढ़ते हैं , लेकिन काटने से बढ़ते ही हैं , इसलिए वृक्षों की शाखाएं काटने से वृक्ष को कोई नुकसान नहीं है।

हाँ यदि कोई अज्ञानता वश वृक्षों को समूल नष्ट कर रहा है , तो उस व्यक्ति का दोष है , जिस पर कार्यवाई होनी चाहिए।

आज जिस तरह से हिन्दुओं की एक बड़ी तादात अपने ही धर्म के खिलाफ हो रही है , उससे तो स्पष्ट है होलिका दहन जैसी environment friendly रिवाज़ शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगे ।

शेष क्या कहना , सब ऊपर लिखा हुआ है , जो मेरे पक्ष को समझना ही न चाहे उससे अधिक क्या कहना।

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ZEAL said...

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Pruning is a horticulture practice involving the selective removal of parts of a plant including tree branches, buds and roots .Reasons to prune plants include deadwood removal, shaping (by controlling or directing growth), improving or maintaining health, reducing risk from falling branches, preparing nursery specimens for transplanting, and both harvesting and increasing the yield or quality of flowers and fruits. The practice entails targeted removal of diseased, damaged, dead, non-productive, structurally unsound, or otherwise unwanted tissue from crop and landscape plants. Specialized pruning practices may be applied to certain plants, such as roses, fruit trees, and grapevines. Different pruning techniques may be deployed on herbaceous plants than those used on perennial woody plants. Hedges, by design, are usually (but not exclusively) maintained by hedge trimming, rather than by pruning.

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ZEAL said...

Arborists, orchardists, and gardeners use various garden tools and tree cutting tools designed for the purpose, such as hand pruners, loppers, or chainsaws. In nature, meteorological conditions such as wind, ice and snow, and seawater mist can cause plants to self-prune. This natural shedding is called abscission.

ZEAL said...

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February is a great time to prune many trees. The branches don't have leaves yet, which makes it easier to prune and to haul away the cut branches.

February is still not too late to spread grass seed. As the ground freezes and thaws, the seeds tend to work their way down into the ground, increasing their chances of growing once Spring comes.

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ZEAL said...

फ़रवरी में पतझड़ के बाद सूखी पत्तियां और डालियाँ किस कदर कचरा बढ़ा देती हैं । होलिका दहन तो कचरा प्रबंधन ( disposal of waste) की दृष्टि से भी न्यायसंगत है।

ZEAL said...

Cutting and pruning a tree takes a basic knowledge of how each kind of tree will react to the cuts. Cutting a tree can provide it with the ability to grow to its full potential or harm it forever, depending on how the cut is made. Improper cutting also could kill a tree. Amateur tree cutters should take extra precautions when cutting trees to avoid accidents.

ZEAL said...

Watch for branches that grow with no foliage. If they are dead or damaged, they can be harmful to the growth of the tree and should be cut off. Dead or diseased branches can be cut any time during the year except following spring growth when the trees have exuded the energy to bloom and revitalize.

ZEAL said...

Cut branches to allow better penetration of light to the entire tree. Remove lower branches if they are in the way of a building or walkway. Reduce the size of a tree by cutting the larger limbs off the top to make room for utility lines

Mukesh Kumar Sinha said...

iski heading ne dil ko chhoo liye.....:)

aapke adhiktar lekh sarthak aur prernadayak hote hain!

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

दिव्या जी ये ब्लाग भी आपका स्वागत करने के लिये इंतजार कर रहा है ।
http://yeblogachchhalaga.blogspot.com/

anand said...

very informative zeal ji ....pruning is a welcoming mechanism in the larger interest of the tree /plant ..
we dont have to take it too serious when some one maked remarks based on religious grounds ..if they do the same in the name of god in some other name ,they wont mind prolly ..lol
anyways its a call for a rational thinking ..lets save our nature and at the same time lets uphold our traditions ..there is always a latent significance in these practises ..jai hind

दर्शन कौर धनोए said...

दिव्या जी ऐसे ही लेखो के कारण आप इतनी फेमस है आज का लेख तो बहुत ही विविधता लिए हुऐ हे! ग्लोबल वार्निग के बारे में जानते हुए भी हम में से कुछ लोग ऐसा काम करते है जो आगे की पीडी के लिए खतरनाक है !मै अपने जन्म दिन के उपलक्ष में पेड़ ही लगाती हु यह काम मै पिछले १० सालो से कर रही हु !

H K Dubey said...

Monika ji,

Tree pruning allows tree to grow. Agreed. But in urban areas where there are hardly any tree, when people cut all branches leaving just the main branch, the sight itself is painful. The trees look like a person with both hands cut and clean-shave head.

Moreover, the green cover is reduced at least for a few months whether you consider it or not.

Practice of cutting green branches (not small twigs) should be stopped.

Simple equation:

Less green cover = less conversion of CO2 to O2

Burning of green banches and leaves = Increase of CO2.

Thanks.

ZEAL said...

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Dubey ji ,

Don't give the credit of my work to Monica Samille Lewinsky .

I am Divya.

Smiles..

.

anand said...

felling of trees must be curbed at any cost...if pruning helps the trees to grow better and shapely it must be carried out sans any issues ...
but if we observe carefully most of our traditions ,be it new or old ,apart from imparting a festive mood and gaiety it significantly carries some message to the humanity ..
as per my knowledge in these bol fires ....old and redundant furniture is used ...
to strike a balance when there is a compulsive need to cut tree et al ,be it for any reason ,they have to be compensated with more plantations .....this way we can emerge a winner in both ways ....

anand said...

bon fire **

ZEAL said...

Well said Anand !

anand said...

divya ji wot a pity such thought provoking and informative posts are been written in hindi ,mush to the anguish of hindi professors like me hehehe..try in english too ...would be worthwhile

Dilbag Virk said...

sty kathn

H K Dubey said...

Sorry for the wrong name.

STRANGER said...

With due respect to this article, I fully agree that होलिका दहन तो सदियों से हो रहा है , जिसमें गोबर के उपलों , सूखी डंडियों , डालियों , सूखी पत्तियों को जलाया जाता है जिसकी आंच से ग्लोबल वार्मिंग नहीं होती but time has come to trim its ugly part which is endangering all of us.
I add that only to celebrate Holi, हरे वृक्ष नहीं काटे जाते, but it is a fact that trees are chopped to get sunlight. This funny thing is very common in India and I have been writing against this. Let me explain in detail :-

During winter season, fully grown up branches of trees are chopped by people here which is a regular practice; they do it to burn the same and enjoy the heat. How can such people contribute to protection of environment ?

Festivals should be celebrated in its true spirit for which it has been initially designed by our ancestors. But I am sorry to say, it is not happening. The state of Communal-harmony, is well-known to all despite having festivals every alternate day. Business Houses are the ppl who are benefiting out of it.

During Holi, everyone is perturbed to find streets/roads blocked, whole night intoxicated rowdies driving motorbike rashly creating nuisance taking whole area for ransom. Civil authorities limit their role by simply watching everything like a mere spectator who are fearful of political intervention on taking preventive action. Is this what our God-fearing ancestors expected the fate of our festivals to be ?

Discipline is needed to celebrate any festival. I'd love to celebrate Holi that Lord Krishna celebrated.

Jai Shri Krishna

मोहिनी said...

दिव्या जी ! आपका पोस्ट कितना अच्छा है | आस्था का मजाक उडाने का फैशन सा आ गया है | आपका पोस्ट पढके बहुत सुकून मिला | शायद मै भी इस दुष्प्रचार की शिकार हो जाती |

ZEAL said...

Welcome Mohini ji .