Friday, September 17, 2010

मिश्र जी ने तलाक दिया --पांच फेरे काफी न थे --एक शर्मनाक फैसला इतिहास का !

१६ सितम्बर २०१० , कानपूर फॅमिली कोर्ट में जज ने यह कहकर की सेक्शन -११ के अनुसार बिना सात फेरों के , हिन्दू विवाह अधूरा है , एक मासूम स्त्री नीरू का जीवन अन्धकार से भर दिया।

नीरू के पति , महोदय संतोष मिश्र ने कहा की शादी में केवल पांच फेरे ही लगे थे जिसके कारण ये शादी हिन्दू रीती के अनुसार अवैध है। और तलाक ले लिया।

नीरू की शादी के बाद मिश्र जी ने उसे पत्नी की तरह साढ़े तीन साल अपने घर में रखा। पत्नी की तरह, यानी उसके तन और मन का पूरा पूरा उपभोग किया। जब दिल भर गया तो शादी के साढ़े तीन साल बाद उसे मार-पीट कर घर से निकाल दिया। और यह कहकर तलाक ले लिया की शादी में केवल पांच फेरे ही लगे थे , जो हिन्दू रीती के विरुद्ध है।

नीरू ने न्याय की गुहार की सन २००१ में । न्याय मिला नौ साल बाद २०१० में। फैसला हुआ मिश्र जी के हक में। मासूम , अभागी नीरू का विश्वास उठ गया है इन्साफ पर से। उसने हाई कोर्ट में अपील से इनकार कर दिया , हार मान ली नीरू और उसके पिता ने।

यदि यह विवाह मान्य नहीं था तो मिश्र जी ने साढ़े तीन साल तक नीरू के साथ बलात्कार क्यूँ किया ?

न्यायालय में साक्ष्य के तौर पर विडियो दिखाया गया , जिसमें सात फेरे पूरे हैं। पंडित जिसने विवाह कराया था, ने गवाही दी की पूरे सात फेरे कराये थे। बहुत से गवाहों ने बयान दिया की वे प्रत्यक्षदर्शी हैं उन सात फेरों के । लेकिन माननीय जज महोदय ने कहा की दो फेरे कम हैं, अतः ये विवाह अवैद्य है।

हिन्दू शास्त्रों में १२ प्रकार के विवाह वर्णित हैं। जिसमें , सुर विवाह, असुर विवाह , गन्धर्व विवाह , प्रजापत्य विवाह आदि हैं । प्रजापत्य विवाह प्रचलन में है।

शास्त्रों के अनुसार , हिन्दू विवाह में चार , पांच , छेह तथा सात फेरों का प्राविधान है । यदि चार फेरे भी हो गए हैं , तो विवाह वैद्य मन जाएगा।

शास्त्रों में यह भी कहा गया है की , शादी में सबसे पहले ' संकल्प ' लिया जाता है । यदि मन में संकल्प लिया जा चूका है , तो भी विवाह पूर्ण माना जाएगा।

नीरू के वकील का कहना है की कोर्ट में अपील करेंगे, न्याय निश्चित मिलेगा , लेकिन निर्दोष , मासूम नीरू टूटकर बिखर चुकी है । उसने कोर्ट के इस घिनौने फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाने से इनकार कर दिया है । उसका इन्साफ पर से विश्वास उठ चुका है।

आप बताएं नीरू को क्या करना चाहिए ?

70 comments:

cmpershad said...

लिव इन रिलेशन को जहां मान्यता है, तो ५ या ७ फेरों में क्या अंतर होगा, यह तो न्यायाधीश ही बता सकते हैं:) हमारी न्यायप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। एक गम्भीर मुद्दा उठाया है आपने॥

anoop joshi said...

ye paid judjement tha sayad?

ashish said...

ये तो सरासर अन्याय हुआ है नीरू के साथ . आश्चर्य है की न्यायविदो ने पुरे सात फेरे देखने के बाद ऐसा न्याय कैसे दिया. लेकिन सामाजिक धरातल पर ये निंदनीय कार्य हुआ है. ४२ महीने तक साथ रहने के बाद मिश्रा जी को लगा की शादी अधूरी है . हम कानून का कितना नाजायज उपयोग कर सकते है , ये ज्वलंत उदहारण है . नैतिकता तो गयी तेल लेने . सामाजिक विभत्सता का उदहारण.

'उदय' said...

... बेहद दुखद समाचार ... इन परिस्थितियों में जब विवाह अवैध है तब धारा-३७६ का अपराध तो हुआ ही है क्योंकि निश्चिततौर पर उस महिला के साथ भय, दहशत, जान से मारने की धमकी देते ... !!!

Akhtar Khan Akela said...

bhn ji yeh fesla qaanun ke khilaf he zrur haikort ise bdl degi sath hi jj saahb ke khilaaf bhi tippni kregi , yeh sb femili kort men vkil ki upsthiti ki pabndi se gdbdiyaa honti hen nhin to sb thik ho jaaye abhi femili korton men mhilaon ka aektrfa shoshn hi hotaa he is lliyen vhaan vkilon ki uspthiti zruri he. akhtar khan akela kota rajsthaan

G Vishwanath said...

यह समाचार सुनकर मैं तो दंग रह गया।

यह कैसे हो सकता है?
जब प्रत्यक्षदर्शी और पुरोहित भी कह चुके हैं कि सात फ़ेरे हुई थीं तो दो फ़ेरे कम कैसे हुए?
जब विडियो प्रमाण भी पेश किया जा चुका है तो क्या जज साहब को गिनना नहीं आता?
दाल में कुछ काला है।

आजकल सर्वोच्च न्यायालय की इमानदारी पर भी सवाल उठाए गये हैं
क्या हमारी न्याय प्रणाली दूषित हो चुकी है?
क्या आज न्याय खरीदा जा सकता है?

महिला संगठनों को इस मामले में हस्तक्षेप करनी चाहिए।
मैं यह मानकर लिख रहा हूँ कि आप सारी बात सामने लायी हैं और कोई बात छुपायी नहीं।
क्या उस आदमी के पक्ष में कोई बात या सूचना उपलब्ध है?
क्या विडियो प्रमाण में जज साहब को कोई कमी यह हस्तक्षेप नजर आइ थी?
आजकल विडियो या कैमेरा के चित्रों पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता।
कैमेरा प्रमाण भी शायद स्वीकार्य नहीं है।
क्या पति के पक्ष में और भी ज्यादा साक्षी थे जिन्होंने कहा कि पाँच ही फ़ेरे हुए थे?
क्या अब न्याय भी लोकतांत्रिक हो गया है? जिसके अधिक साक्षी वह विजयी?
क्या जज साहब भी किसी कारण लाचार थे?
यह जानते हुए भी, कि पति दोषी है, उनहें मजबूरन यह फ़ैसला सुनाना पडा?
जज को अपनी आत्मा की आवाज को नजरनदाज़ करके ठोस सबूत, और कानून की प्रावधानों के आधार पर ही फ़ैसला सुनाना चाहिए।

यह समाचार आपको कहा मिला? कृपया बताएं।
और जानना चाहता हूँ और इस किस्से को follow करना चाहता हूँ।

शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ

Akanksha~आकांक्षा said...

इसे न्याय तो नहीं ही कहा जा सकता...
__________________
'शब्द-शिखर' : एक वृक्ष देता है 15.70 लाख के बराबर सम्पदा.

ZEAL said...

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आदरणीय विश्वनाथ जी,
सुबह से लगातार टेलिविज़न पर यह समाचार प्रसारित हो रहा है। लंच के समय जब यह समाचार सुना तो घृणा से मन भर गया । ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह बात पहुंचे इसलिए ये पोस्ट लगा दी। नेट पर भी ये न्यूज़ उपलब्ध है ।
आभार।

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

न्यायपालिका भी भ्रष्ट हो सकती है!
--
आजकल तो जज भी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं!

रंजन said...

क्या बकवास है.. पहले तो जज को घर भेजो.. फिर मिश्र जी को...

पता नहीं कौनसी सदी में जी रहे है...

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " said...

बहुत दुखद है.. पहले तो ऐसे आदमी को ही सजा मिनी चाहिए थी जिसने बिना किसी मानवीय भावनाओं के एक महिला को कैद किया..पत्नी माने बगैर और फिर ठुकरा दिया..... ऐसे जज ऐसी कारवाही पर भी कारवाही होनी चाहिए ...

dhratrashtra said...

जज महोदय मेरी तरह अंधे तो न थे कहीं......या गांधारी की तरह से आँखों पर कोई पट्टी तो नहीं बंधी थी....

मनोज कुमार said...

उफ़्फ़! हद है!!
किस पर विश्‍वास करें। ये घर को जोड़ेंगे या ...
@ आप बताएं नीरू को क्या करना चाहिए ?
अब आपके इस प्रश्‍न का क्या जवाब दूं , जब माझी ही नाव डूबो दे ...
फिर भी उससे ऊपर के न्यायालय का दरवाज़ा तो खटखटाना ही चाहिए। पर आज कल जो समाचार आ रहे हैं सर्वोच्च न्यालाय के बारे में तो कुछ भी कहना कठिन है।

प्रवीण पाण्डेय said...

अक्षम्य, पूर्णतया।

डॉ टी एस दराल said...

अजीब न्याय है यह तो ।

हमारीवाणी.कॉम said...

दिव्या जी ने सही कहा, यह सही में एक शर्मनाक फैसला है.





हमारीवाणी को और भी अधिक सुविधाजनक और सुचारू बनाने के लिए प्रोग्रामिंग कार्य चल रहा है, जिस कारण आपको कुछ असुविधा हो सकती है। जैसे ही प्रोग्रामिंग कार्य पूरा होगा आपको हमारीवाणी की और से हिंदी और हिंदी ब्लॉगर के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओँ और भारतीय ब्लागर के लिए ढेरों रोचक सुविधाएँ और ब्लॉग्गिंग को प्रोत्साहन के लिए प्रोग्राम नज़र आएँगे। अगर आपको हमारीवाणी.कॉम को प्रयोग करने में असुविधा हो रही हो अथवा आपका कोई सुझाव हो तो आप "हमसे संपर्क करें" पर चटका (click) लगा कर हमसे संपर्क कर सकते हैं।

टीम हमारीवाणी


आज की पोस्ट
हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

Pratul said...

हमने तो एक फेरा ही लिया था और सप्तपदी की थी. हमें तो न्याय मिला.

न्यायालय के फेरे लगा-लगाकर लोग पूरी उम्र गुजार देते हैं लेकिन तब भी न्याय नहीं मिलता.

फिर एक फेरे में ही मिश्र जी ने कैसे न्याय का रिजल्ट प्राप्त कर लिया? संतोष जी के पास लगता कोई कोष अवश्य है. जिसका गुपचुप इस्तेमाल हुआ है.

प्रतिभा सक्सेना said...

नीरू अब ऐसे घटिया आदमी के साथ ,अगर वह चाहे तो भी,समझौता न करें .हमारा समाज उनका मनोबल बढ़ाए और उनकी सहायता करे कि वह स्वावलंबी बनें और सिर उठा कर जीवन -यापन करें .

Priya said...

shaadi ka function hua tha , atah shaadi hui thi.
sankhya se koi fark nahin padta.

judge kaa trial hona chahiye.
kisi women organisation yaa NGO ko trial karvana chahiye.
tab zaroor nyaya hoga aur judge ko naukri se haath dhona padega.
yehi neeru ke liye bhi nyaya hoga.

akele neeru ko nahin varan kisi organisation ko ladna hoga.

neeru ko apna face beautiful world ki taraf ghumakar apne ko punarsthapit karna chahiye.

nyaya to usko uparwala dega hi. 9 years fight karke usne apni duniyabi duty poori kar di hai

hamare desh mein jo anaaj paida ho raha hai usko khaakar teachers doctors aur judges sabhi apni vishishtaayen kho baitthe hain.
neeru ke baare mein kuchh aur to nahin maaloom , phir bhi woh yadi bachchon ke vikas mein lage, apne father yaa kisi ki help se koi NGO le le to uske jeevan mein phir se bahar aa jayegi.

shubhkamnaayen

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शर्मनाक! समाज के लिए भी और कानून के लिए भी.....
सच में "कानून बिकता है"....

boletobindas said...

यहां सीधे तौर पर मिश्र की नीयत में खोट नजर आ रही है। अगर फेरे कम लिए तो दोबारा ले सकते थे दिल की तसल्ली के लिए। ये सरासर मक्कारी है।

जज साहब ने ये निर्णय क्यों किया इस बारे में पूरा फैसला पढ़े बिना कहना या टिपण्णी करना बेमानी है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस मामले की ओपन सुनवाई होती है। कानपुर के कोई ब्लॉगर भाई उस फैसले की कॉपी को पढ़कर इस फैसले का कारण बता सकें तो अच्छा होगा।

जहां तक नीरु जी का प्रश्न है उनके वकील को आगे बड़ी अदालत में तो जाना ही चाहिए। पर ये काम अब उन्हें अकेले करना होगा। एक स्त्री और लड़की के पिता की दशा को आसानी से समझा जा सकता है। उन्हें तो दिलासा देना भी किसी के वश में आसान नहीं होगा। महिला संगठन अगर इस मसले पर कुछ कर सकें तो जरुर कुछ हो सकता है। मिश्रा की खोटी नीयत का सख्त विरोध होना चाहिए। पर हो सकता है कि कोई बाप अपनी बेटी इन महाश्य से ब्याह दे। बेहतर होगा कि उसे दूसरा ब्याह किसी कीमत पर करने दिया जाए। अगर ये महाश्य धनवान हुए तो कहना ही क्या।

Apanatva said...

sharmnaak haadsaa aur vaisaa hee sharmnaak faisalaa .par aise vykti ke sath jeevan nirvaah karanaa to umer kaid kee sazaa se bhee badattar hotaa.

महेन्द्र मिश्र said...

बेहद दुखद समाचार...

ZEAL said...

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यदि नीरू हाई कोर्ट में अपील करे तो उसकी जीत निश्चित है। क़ानून के जानकारों का भी यही कहना है की निर्णय गलत हुआ है । रेप अथवा इस प्रकार के प्रकरणों में स्त्री के वक्तव्य का विशेष महत्त्व होता है। लेकिन यहाँ तो नीरू की बात पर ध्यान ही नहीं दिया गया ।

शास्त्रों की बात करें तो चौथे फेरे में सप्तपदी हो जाती है, इसलिए चार फेरे में हिन्दू विवाह पूर्ण माना जाता है। फिर पांच फेरों में विवाह अधुरा कैसे हुआ ?

सतोष मिश्र को साढ़े तीन साल लगे ये समझने में की विवाह अधुरा है ? और जज महोदय को फेरे गिनने में नौ साल ?

एक स्त्री की भावनाओं का इतना तिरस्कार ? मिश्र जी को इतना भी संवेदनाओं से विहीन नहीं होना चाहिए । नीरू का तो जीवन नरक हो चुका है। क्या वो कभी समाज में इज्ज़त की जिंदगी बसर कर पाएगी ?

नीरू को हाई कोर्ट में अपील करनी चाहिए , उसकी जीत निश्चित है, उसके वकील का भी यही कहना है। लेकिन उसे निराश होकर यूँ ही नहीं बैठना जाना चाहिए. उसे हिम्मत करनी ही होगी , इसमें उसकी बहुत सी निर्दोष और मासूम बहनों की जीत होगी । और मिश्र जी जैसे अपराधियों को उचित दंड मिलेगा।

रोहित जी, आप मिडिया में हैं, संभवतः आप कुछ कर सकें। और यदि हम लोग भी कुछ करते हों तो कृपया बताइये।

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Udan Tashtari said...

ये किस तरह का न्याय है भई...

ZEAL said...

और कोर्ट-मैरिज ?....उसमें तो फेरों की रस्म अदायगी भी नहीं होती ।

राजकुमार सोनी said...

आपने जिस मिश्र का जिक्र किया है वह ठीक नहीं है,
इसके पहले जिसने विवाद खड़ा किया था वह भी दूध का धुला हुआ नहीं है.

Ratan Singh Shekhawat said...

शर्मनाक! समाज के लिए भी और कानून के लिए भी !!

सात फेरे ले या पांच इससे क्या फर्क पड़ता है शादी की रस्म तो संपन्न हुई ही थी |
और कौन कहता है कि शादी के लिए सात फेरे नहीं हो शादी मान्य नहीं , राजस्थान में हमारे यहाँ राजपूत समाज में तो सिर्फ चार फेरे ही होते है यही रिवाज है तो क्या यहाँ होने वाली सभी शादियाँ उन जज महोदय की नजर में कानून सम्मत नहीं है ?

(राजस्थान के लोक देवता पाबू जी राठौड़ ने तीन फेरे ही लिए था कि उन्हें सन्देश मिला कि कुछ लुटेरे किसी वृद्धा का पशुधन लूटकर ले जा रहे है इसलिए सिर्फ चार फेरे ही लिए और पशुधन की रक्षा के लुटेरों से लड़ने चल पड़े और पशुधन को बचाने के बाद शहीद हो गए तब से हमारे यहाँ शादी में सिर्फ चार फेरे ही करवाए जाते है)

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

वाणी गीत said...

ये भी कोई वजह हो सकती है तलाक की ...
और वो भी साढ़े तीन साल बाद ...

शर्मनाक ...निश्चित ही ...!

Coral said...

शर्मनाक ...

खुशदीप सहगल said...

अजब जज का गजब न्याय...

जय हिंद...

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बेहद शर्मनाक फैसला.....लिव इन रिलेशन में यहाँ पत्नी के हक दिए जा रहे हैं और
और इस मामले में फेरों की गिनती को आधार बनाया जा रहा है...... घोर अफ़सोस

पी.सी.गोदियाल said...

जज भी कोई संतोष मिश्र का ही भाई रहा होगा ! जिस देश में १६ में से ८ मुख्य न्यायाधीश ही पक्के भरष्ट हो उस देश को भगवान् भी नहीं बचा सकता ! :)

यशवन्त माथुर said...

Divya ji,
This is not the first time.
This is one more example of our The Great Indian Justice Syestem.

I also put my feelings on YouTube-Under the the below link-

http://www.youtube.com/watch?v=wgaS26UlxyM

Please also see this.


With Regards
Yashwant Mathur

PADMSINGH said...

अवैध विवाह के बाद एक स्त्री से तीन साल तक सम्बन्ध रखना भी अवैध ही हुआ ... इनके ऊपर तीन साल तक बलात्कार का आरोप लगाते हुए दुबारा कोर्ट में जाना चाहिए ... जज महोदय ने शर्मसार किया है न्याय व्यवस्था को .

shailendra said...

आप बताएं नीरू को क्या करना चाहिए ?

jo vyakti 3.5 saal bad ek phere ke chakkar me aisi
grinit evam nindniya karya kiya hai.....ooske sath
.....phir nibahane ke liye kuch na kar ..... jo
nuksan hua hai ooski chatipurti ke liye larni chahiye .....khud pe bharosa kar .... apnai jindgi jina chahiye. chahe adalt se ho ya samaj
se ..... oose dand abasya milni chahiye....

pranam

सम्वेदना के स्वर said...

दिव्या जी!
न्याय तंत्र की एक और पोल आजकल मशहूर वकील शांति भूषण भी खोल रहें हैं, जिसमें उन्होनें कोर्ट में हलफनामा देकर पिछले दस मुख्य न्यायधीशों में से छ पर उंगली उठायी है, अदालत को चैलंज भी किया है कि वो गलत हों तो उन्हें जेल में डाल दो!

आपसे एक पोस्ट इस पर भी दरकार है.

भारतीय की कलम से.... said...

बेहद दुखद समाचार है यह ........
आज के आधुनिक समय में भी लोग इन रश्मों पर न जाने क्यों इतना अधिक सर खपाते हैं वैसे भी यहाँ मामला केवल सात फेरों का नहीं है अगर होता तो तीन वर्षों तक वह क्या आँखों में पट्टी लगाये हुए थे? ऐसे मानवता के नाम पर कलंक व्यक्ति के खिलाफ तो निश्चित रूप से कार्यवाही होनी चाहिए|
हम सब नीरू जी के साथ हैं और अगर हम कोई मदद कर सकें तो हमें अवश्य करना चाहिए रहा सवाल न्यायपालिका का तो पूरा फैसला जाने बिना कुछ कहना उचित नहीं है |
आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ इतने संवेदनशील मामले सा हमें अवगत कराने के लिए !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

एक ज्ञानी के फैसले पर कानूनी निरक्षर व्यक्ति क्या कह सकता है?

गिरीश बिल्लोरे said...

इस मसले पर निर्णय पर सिर्फ़ वकीली दांव पेंच का गहरा असर हुआ नज़र आता है. बेशक बेहद दु:खद फ़ैसला. इस पर व्यापक बहस के साथ कारगर क़ानून ज़रूरी है.

शोभना चौरे said...

ye kaisi nyay prakriya hai ?
niru ko har nahi manni chahiye .
sadhe teen sal bad tlak ka karn adhre fere btana
vivah sanstha ke sath khilvad karna hi hua .

Suresh Chiplunkar said...

बेहूदा मुकदमा और घटिया निर्णय…
नकल मारकर पास तो नहीं हुए थे जज साहब?

डा० अमर कुमार said...
This comment has been removed by the author.
Vijai Mathur said...

Diviyaji,
Is barey me aapne khud hi apne post dt.15.6.2010 MARRIAGE-A UNION OF TWO SOULS me likha-union of heart,mind and Soul in a marriage -hota hai.Is mamley me Mano ka mel nahi tha aur vivah bhi ponga panthi tarikey se dong,pakhand-dharam-karam dwara hua hoga.Muharat - Samay ka palan nahi kiya gaya hoga.Natija sabkey samney hai.
JANNI MAA AUR MATA post dwara 23.8.2010 ko mene aisi hi samasyaon per ishara kiya tha.Vivah ki SAFALTA hetu lagna-muharat-samay ka sahi palan Aniwrya hai.

संजय भास्कर said...

शर्मनाक! समाज के लिए भी और कानून के लिए भी !

सलीम ख़ान said...

कहीं इशारा ............ की तरफ तो नहीं, खैर मेरे दर्द को बयां कर दिया इस लेख ने...! मैंने तो मौन धारण कर रखा है..., संतों की तरह.

Saba Akbar said...

बेहद शर्मनाक फैसला...

ऐसे बातें सुनकर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या हम एक सभ्य समाज में रहते हैं ?

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

क्या यह वाकई में न्याय है या .......

Babli said...

बहुत ही आश्चर्यजनक और शर्मनाक घटना है! ये सब सुनकर बहुत दुःख और अफ़सोस होता है आखिर हमारे देश का क्या होगा!

anshumala said...

आप लोगों की जानकारी बढ़ा दू की मिश्रा जी खुद कानून के जानकार है वह वकील है | कुछ साल पहले जब ये मामला कोर्ट में दाखिल हुआ था तो उस समय के जज ने कहा था की दो फेरे कम हुए है तो अब लेलो | साथ में मिश्रा जी ना कहा था की विवाह के हफ्ते दस दिन पहले उनके पिता की मौत हो गई थी और उनका परिवार सूतक में था और सूतक में विवाह मान्य नहीं होता है | अब ये सुन कर आश्चर्य हो रहा है की जज ने ये कहा हो संभव हो की तलाक देने का आधार कोर्ट का कुछ और हो टीवी वाले सिर्फ इस बात का जिक्र कर रहे हो | जो पति उसे रखने को तैयार नहीं है मुझे लगता है की पत्नी को भी उसके साथ नहीं रहना चाहिए मिश्रा जी ऊपरी अदालत में ले जा कर खर्चे की मांग करनी चाहिए |

Kailash C Sharma said...

क्या पति पत्नी का सम्बन्ध केवल ७ फेरों तक ही सीमत है?.....

mukti said...

मुझे अंशुमाला की बात सही लग रही है. जो पति इस तरह की हरकत करे उसके साथ पत्नी को रहना ही नहीं चाहिए.
लेकिन ये निर्णय तो किसी भी तरह ठीक नहीं है.

ethereal_infinia said...

Part 01 of 02

Dearest ZEAL:

The way our social system is, any annulment of marriage – for whatsoever reasons and on whatsoever grounds – always leads to ignominy for the woman.

My sympathies are with the female complainant in this particular case.

I have read the post and the comments thereon heavily siding with the complainant which is very much comprehensible.

But, I would like to talk about the role of media in over-hyping ‘injustice’.

Television journalism in India is pathetically shoddy. I would not want to rely on mere television reports about the ‘truth’ of this matter or that of any other matter.

Yellow journalism is most rampant in television today with the advent of 24-hour news channels mushrooming all over. After all, they have no option but to resort to gory ‘over-hyping’ of any issue since their channel has to have ‘news’ round-the-clock.

The same 2-minute footage is played over and over all through the shelf-life of the ‘news item’ and create a huge ruckus over it. Dumb ‘experts’ grace the studio with their two-penny bit on the issue and talk big. The studio gets its material, the ‘experts’ get air-time, the news-channel producers are scripting further. All are busy and importantly, merry!

Nobody cares for the victim.

The news channel is happy that such a thing occurred and they got something to have viewers glued to their channel and make the sponsors happy in turn. Amid the saddening ‘breaking news’, the petite anchor will comically announce a commercial break which would probably flash advertisements of ‘happy families’ as the sponsors’ analysts and number-crunchers know that most of the viewers of such events are homely people who value family systems a lot and thus it is the best time to advertise their products. How ironic!!

With this background in mind [some may want to call it bias, go ahead, feel free], I have severe doubts on the integrity of the news channels and therefore, by logical extension, on the news they broadcast.

I do not feel any shame in saying that I am an yester-gen person who still prefers to read The Times Of India for news rather than watch TV for it. TV is for entertainment only – be it sports, reality shows, sit-coms, soap-operas and in that very line, news.

If one wants news for entertainment, nothing better than the TV news-channels.

[continued]

ethereal_infinia said...

Part 02 of 02

Coming to the judiciary, I beg to differ as I can not agree with the comments of many here, that it is as open-and-shut a case as depicted and the judge seemingly have done grossest injustice. After all, whenever a judge pronounces a judgment, he cites a very logical reasoning for the decision on the case. Not only he mentions the witnesses and takes into the account evidences presented for and against the complainant’s claim, the judge also refers to various past judgments and mentions them too as the basis for the judgment. And of course, he also goes by the laid down statutes of law as he will award the judgment in accordance with the provisions of the concerned law.

I am not saying the judge was right or wrong. I simply deny to accept the news-channel reported ‘story’ as the ‘only fact’. There ought to be more to the case than what apparently meets the eye. Unless I know it, any presumption on my part would be erroneous of whether the case was mishandled – erroneously or deliberately.

About the slow process of judiciary, civil courts are all the more slow in clearing cases – let us not use the term ‘dispensing justice’. That is an issue in itself. Zmiles.

Finally, let us honestly accept that corruption is not a malaise faced by our society.

In India, it is simply a way of life and it is so deep-rooted in our system that at least in the foreseeable future there is no solution to it.

Niru was a stranger to me yesterday, is a stranger today and will be so tomorrow. I do not know her nor do I want to know her beyond the news.

Humanitarian values make me feel sorry for it. But that is what I feel for even those who face natural calamities.

After such a long estrangement, the marriage is as such dead but she must fight on if she believes she has been done injustice. She might be barely 30 and given the pace of our judiciary, if she has to go all the way to Supreme Court, she should be able to get a judgment before her 60th birthday.

Incidentally, the average life-expectancy of females according to recent demographic analysis in India is 65 years.

Niru can very well be seeking solace in the song:

Ajeeb daastaan hain yeh
Kahaan shuru, kahaan khatam
Yeh manzile hain kaunsi
Naa woh samajh sake, naa hum

My thoughts may come across as radical to some, but I stand by them with conviciton. If it offends anyone, I can’t offer a sorry for that nor do I intend to.

Arth Desai

[under strongest protest against moderation]

कुमार राधारमण said...

ऐसे कानूनों और फैसलों का जवाब स्त्री की आत्मनिर्भरता ही हो सकती है।

boletobindas said...

देखिए इस मामले को लेकर सीधे उपरी कोर्ट में ही कुछ हो सकता है। जबतक इस फैसले को पूरा नहीं पढ़ लिया जाए कुछ कह पाना मुहाल है। दूसरे इस केस को कोई काबिल वकील ही उठा सकता है। अगर ये मामला उंची अदालत में नहीं पलटता है तो एक अजीबो-गरीब नजीर बन जाएगी शादी के नाम पर माखौल करने की। इस मामले में कानपुर के स्थानीय समाज को आगे आकर नीरूजी की मदद करनी चाहिए। क्योंकि महिला आयोग को ज्यादा अधिकार नहीं है। वो हद से हद उसे पैरों पर खड़ा कर सकने में मदद कर सकता है औऱ वकील प्रोवाइड कर सकता है।

कानपुर के ब्लॉगर दोस्त अगर एकजुट हो जाएं औऱ समाजिक आंदोलन खड़ा करें तभी कुछ हो सकता है। पर इसके लिए समय चाहिए। कोई निकाल पाएगा समय। प्रश्न यही है। ब्लॉगर मीटिंग से आगे बड़कर कुछ करने का मौका है देखें हो पाता है या नहीं।

मीडिया के होने से यही होता है कि मामला प्रकाश में आ जाता है। पर विसंगतियों को दूर करने के लिए समाजिक पहल जरुरी है। औऱ इस पहल का समर्थन मीडिया कर सकता है। अदालत में इसे प्रशांत भूषण जी जैसा कोई वकील जोरदार ढंग से उठा सकता है। नीरुजी के वकील को मेरे हिसाब से अब इसे समाजिक समस्या मानते हुए अपने दम पर हाईकोर्ट में जाना चाहिए। हस्ताक्षर अभियान या मोमबत्ती जलाने से ज्यादा असर नहीं होगा। कानपुर का समाज खुद ही जबतक आगे नहीं आएगा तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता। नीरुजी को समाजिक साहस की जरुरत है। नीरुजी अकेली महिला नहीं हैं, ऐसे अनगिनत केस हैं।

RAJAN said...

समझ मे नहीं आता कि ऐसे नालायक लोग इतने बडे और महत्तवपूर्ण पदों पर पहुँच कैसे जाते हैं।

VIJAY KUMAR VERMA said...

इस तरह के शर्मनाक माहौल में जीने के हम आदी हो चुके है ...आपने इसे मंच दिया जिससे कुछ लोगो को अपने जिन्दा होने का ज्ञान हुआ ...प्रयास के लिए बधाई

ZEAL said...

मेल से प्राप्त विश्वनाथ जी की टिपण्णी--

Dear Divya,

I tried to post this comment on your blog but failed.
I get the message "eblogger is unable to process your request"
I request you to post this comment.
Regards
GV

Dear Arth Desai,

This is just to record publicly that I enjoyed reading your long comment.

I agree with your thoughts.
I also had wondered while sending my earlier comment if we really had all the facts of the case.
I am sure the judge had his reasons.
He will not risk his career and reputation by pronouncing an incorrect judgement which can't withstand scrutiny of his peers.

Even if he is corrupt and has been bought off, he will not be so foolish. He will have plausible reasons for backing up a partisan judgment.

The judge has to decide on the evidence before him, not on his feelings of sympathy for someone who has been wronged.

Video or photographic evidence has never been foolproof. I think it is not given much weightage by the courts.
Moreover it is possible that the judge may have felt that the case presented by the woman's lawyer did not meet legal requirements and the man's lawyer did a more competent job.
After all there are instances where even known criminals, aided by clever lawyers who exploit loopholes in law go scot free and the judge dismisses the case against them out of sheer helplessness, while also passing strictures against the police and the prosecution for doing a shoddy job of investigation and an incompetent job of preparing the prosecution's case.

Your thoughts on the media are also shared by me.

I am disgusted with the plethora of 24/7 news channels and the fare they dish out.
I remember some months ago two anchors of a national channel gleefully discussing how Deepika Padukone disappointed Ranbir Kapoor!
It seems, those days, when everyone was discussing how soon they would be tying the knot, at a party Ranbir had got an icecream for her. It was a single cone and he had hoped to share the ice cream with Deepika and that they could lick it together,alternatively and may be, try for a secret meeting of the tips of their tongues!
No luck for Ranbir! Deepika hogged the ice cream herself !

While you prefer newspapers, I prefer neither.
I find newspapers too have compromised on journalistic principles and yielded to commercial considerations. Where is the Times of India edited by Frank Moraes, Shamlal, Girilal Jain and the old stalwarts? Today it has become the "The advertisements of India". Rock bottom was reached when the Front page of the newspaper carried a full page advertisement! To me it was analogous to selling your face to an advertiser who has used it to paint his commerical message on your forehead!

I don't blame them. I only refuse to retain my respect for them or to take them too seriously.


And yes, before I conclude, I do hope you will withdraw your "strongest protest " against moderation.

I am one of those who actually suggested and recommended that Divya should moderate the comments. You are of course one of those whose comments need no moderation. I hope Divya also includes me in that list. However we live in dangerous and bad times today. Innocent and good citizens must put up with some inconveniences for protection against the few bad elements. I am sure you will cheerfully put up with airport security. It is needed to prevent one among 10,000 who may be carrying a bomb. I am also sure your computer has an anti virus software package installed which will screen even this comment before it allows you read it.


Thanks for this opportunity to supplment some of your thoughts and to air a few of my own. Hopefully this comment is not as long as yours and it will be read with the same interest and patiences.

Regards
G Vishwanath

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ZEAL said...

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By G Vishwanath-


Dear Divya,

Please refer to my email sent a few minutes earlier.
The last word in the last line should be "patience" and not "patiences"
Please correct it before posting.
Thanks
GV

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ZEAL said...

रोहित जी,

" Where there is will, there is a way "

बहुत कुछ किया जा सकता है। यदि नीरू का संपर्क नंबर मिल जाए तो उसके टूटे विश्वास को जगाया जा सकता है। उसे मालूम होना चाहिए की कितने ज्यादा लोग उसके साथ हैं। यदि ऐसा कुछ आप कर सकें तो मुझे सूचित कीजियेगा।

नीरू को ये लड़ाई तो लड़नी ही चाहिए। लोअर कोर्ट के फैसले ने उसे आधे से ज्यादा जीता दिया है अपर कोर्ट के लिए।

ये लड़ाई उसे संतोष के साथ उसके घर में रहने के लिए नहीं लड़नी है , बल्कि अपने सम्मान और स्त्री को उसके अधिकारों के लिए लड़नी है । यदि वो चुप होकर बैठेगी तो समाज के असामाजिक तत्वों को बहुत बल मिलेगा और स्त्रियों की दशा २१ वि शताब्दी में और भी बदतर हो जायेगी। जो चाहेगा वोही स्त्री का तमाशा बनाने के बाद , उसे जिल्लत की जिंदगी जीने के लिए छोड़ देगा। स्त्री न हो गयी use and throw की वास्तु हो गयी।

रोहित जी, आपसे अपेक्षा है आप जरूर कुछ कर सकते हैं। कृपया करें, और मुझे भी बताएं, मेरी तरफ से क्या हो सकता है।

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ZEAL said...

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@ Arth Desai,

For me , source of information is not important. I am more concerned about victim's grievances . I am thankful to Media that the case reached to sensitive lot. People overseas are also worried about the innocent girl Neeru.

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दिगम्बर नासवा said...

शर्म की बात है .... मिश्रा जी जैसे लोग क़ानून को बेचते हैं और लोगों का विश्वास क़ानून से उठ जाता है .... पर ये कैसे हो सकता है जबकि सात फेरे भी वीडियो में क़ैद हैं ..... ज़रूर न्याय बिका हुवा है ....
पर ये एक पहलू है बात का ... दूसरे पहलू पर आएँ तो इस बात से समझ आना चाहिए की क़ानून में भी बदलाव लाने की आवश्यकता है .... जब वैदिक पद्धति ने १२ तरह के विवाह मानी किए हैं तो क़ानून ने एक तरह को ही मान्यता क्यों दी है ... कोई भी क़ानून समय के अनुसार नही बदला जाए तो वो प्रेगमेटिक नही रहता ...

ZEAL said...

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दीगम्बर नासवा जी ,

आप की बात सही है, क़ानून में बदलाव की सख्त ज़रुरत है । नीरू के केस में जो निर्णय लिया गया है , वो सन १९५५ में बने कानून पर आधारित है। जैसा की समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ है।

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अजय कुमार said...

फिर तो बहला फुसलाकर संबंध बनाने का केस बनता है ,कानूनविद अच्छी तरह बतायें ।

बेचैन आत्मा said...

शर्मनाक!

shyam1950 said...

किसी भी औरत को शादी करनी ही क्यों चाहिए ? इस पुरुष-वर्चस्व-वादी मानसिकता को यदि सचमुच राह पर लाना है तो स्त्रिओं को सामूहिक रूप से शादी जैसी व्यवस्था का बहिष्कार कर देना चाहिए.. क्यों बंधना चाहिए एक स्त्री को एक आदमी के पल्लू से ? क्या इस देश की स्त्रियां अपनी स्वतंत्रता का सम्मान करना कभी नहीं सीख पाएंगी..? आखिर कमी क्या है भई आप लोगों में?

डा. अरुणा कपूर. said...

....निरु को चाहिए कि संतोष मिश्र पर धोखाधडी का केस दायर करें!....हिन्दु रीति-रिवाज से शादी की, तो सात फेरे क्यों नही लिए?...इस साजिश में शादी कराने वाले पंडित का भी हाथ है...उसे भी इस केस में लपेटना चाहिए!....अपने आप निर्दोष साबित करने के लिए वह सच्चाई उगाल देगा कि शादी में सात ही फेरे लिए गए थे....या संतोष मिश्र ने जान बुझ कर पांच फेरों में ही शादी संपन्न करने की हिदायत पंडित को दी थी!...मै वकील नहीं हूं...लेकिन इस घट्ना को देखते हुए मैने यह पोइंट निकाला है!..निरु के साथ अन्याय हुआ है, उसे न्याय तो मिलना ही चाहिए!...समाज में नारी की कमजोर स्थिति की छबी आपने पेश की है....धन्यवाद दिव्या!

manu said...

use bade saahab ke yahaan comment karnaa chaahiye